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Monday 17 Dec 2018

आत्मदाह कर मरे पोखरे

आत्मदाह कर मरे पोखरे       

हम सावन में न हरियाये                           

और न जेठ झुराये,              

हाँ, रैली,घेराव,धरने में

डंडे खाय-अघाये;

हम अपनी क्या कहें कहानी,  

इसमें कोई न राजा-रानी!   

कहो तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या? 

कॉमरेड इस दौड़-होड़ में,  

कूद-फाँद कर रहे बहुत तुम     

खींच-तान में,जोड़-तोड़ में; 

आग लगाकर चिल्लाते हो  

दौड़ो-दौड़ो कुंआ खोदने,

डालो पानी आग बुझाओ,

जली जा रही है राजधानी! 

 मर-खप गये पालकी ढोते  

 लेकिन कुंभ नहा न पाये,

उनके हाथ-अंगुलियाँ महकें   

जिनके पुरखे थे घी खाये;

आत्मदाह कर मरे पोखरे,   

हम नदियों की रेत निचोड़ें;  

चढ़ी दुपहरी स्वेद नहाये

तप करते हम औघड़दानी! 

रहे सींचते खेत खून से 

लस्त-पस्त पांवों के छाले,       

हाथ जुड़ाती लम्बी रातें  

काट रहे उम्मीदें पाले;  

पाला पिटी ख्वाहिशों की

भरपाई सैकड़ा और दहाई;

अच्छे दिन के दावे करती

लचर  दलीलें पीटें पानी!  

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