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Wednesday 11 Dec 2019

प्रेम - 1

प्रेम  - 1

मैंने तुम्हें उस समय भी प्रेम किया

जब स्थगित थी सारी दुनिया भर की बातें

मैंने तुम्हें

हर रोज प्रेम किया

जिस दिन गिलहरी को

बेदखल कर दिया गया पेड़ से

मैं गिलहरी के संताप के बीच

तुमसे प्रेम करता रहा

जब एक औरत ने अपने अकेलेपन से ऊब कर

बादलों के लिये स्वेटर बुना

उस दिन भी मैं तुम्हारे प्रेम में था

जब इस सदी के सारे प्रेम पत्र

किसी ने रख दिया था ज्वालामुखी के मुहाने पर

उस दिन भी मैंने तुम्हें प्रेम किया

रेलगाडयि़ों में यात्रा करते हुए

कई शहरों को धोखा दे कर निकलते हुए

मैंने तुम्हें प्रेम किया बहुत ज्यादा

मैंने खुद से कई बार कहा

यह शहर जितना प्रेम में है नदी के

मैंने तुम्हें प्रेम किया उतना ही

प्रेम  - 2

उन दोनों के बीच प्रेम था

पर वह प्रत्यक्ष नहीं था

उन दोनों ने एक दूसरे को कई साल फूल भेजे

एक-दूसरे के लिये कई नाम रचे

वे शहर बदलते रहे और एक दूसरे को याद करते रहे

वे कई-कई बार अनायास चलते हुए पीछे मुड़कर देखते थे

उन्होंने कई बार गलियों में झांक कर देखा होगा

फिर कई सदियाँ बीती

वे दोनों पर्वत बने

पिछली सदी में वे बारिश बने

इतना मुझे यकीन है

इस सदी में वे ओस बने

फिर किसी सफेद फूल पर गिरते रहे

प्रार्थना और प्रेम के बीच औरतें

प्रार्थना करती औरतें

एकाग्र नहीं होती

वे लौटती है बार-बार

अपने संसार में

जहाँ वे प्रेम करती हैं

प्रार्थना में वे बहुत कुछ कहती है

उन सबके लिए

जिनके लिए बहती है

 वह हवा बन कर

 रसोईघर में भात की तरह

उबलते हैं उसके सपने

वह थाली में

चांद की तरह रोटी परोसती है

औरतें व्यापार करती हैं तितलियों के साथ

अपने हाथों से

रंगती है पर्यावरण 

फिर औरतें झड़ती है आँसुओं की तरह

 कुछ कहती नहीं

इस विश्वास में है कि

जब हम तपते रहेंगे वह झड़ेगी बारिश की तरह

 एक दिन    ।।

एक चुप रहने वाली लड़की

साइकिल चलाती एक लड़की

झूला झूलती हुई एक लकड़ी

खिलखिला कर हँसने  वाली एक लड़की

के बीच एक चुप रहने वाली लड़की होती है

जो कॅालेज जाती है

 अशोक राज पथ पर सड़क किनारे की पटरियों पर कोर्स की पुरानी किताब खरीदती है

 उसके चुप रहने से जन्म लेती है कहानी

 उसके असफल प्रेम की

 उसे उतावला कहा गया उन दिनों

 वह अपने बारे में  कुछ नहीं कहती

 चुप रहने वाली वह लड़की

एक दिन बन जाती है पेड़

 पेड़ बनना चुप रहने वाली लड़की के हिस्से में ही होता है 

एक दिन पेड़ बनी हुई लड़की पर दौड़ती है गिलहरी

हँसता है पेड़ और हँसती है लड़की

टूटता है भ्रम आदमी दर आदमी

मुहल्ला दर मुहल्ला

एक चुप रहने वाली लड़की भी

जानती है हँसना   ।।

प्रेम का आविष्कार करती औरतें

प्रेम का आविष्कार करती औरतों

ने ही कहा होगा

फूल को फूल  और

चांद को चांद

हवा में महसूस की होगी

बेला के फूल की महक

उन औरतों ने ही

पहाड़ को कहा होगा पहाड़

नदी को कभी सूखने नहीं दिया होगा

उनकी सांसों से ही

पिघलता होगा ग्लेशियर 

उन्होंने ही बहिष्कार किया होगा 

ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों का

चुना होगा इस धरती को

वे जानती होगी इसी ग्रह पर

पीले सरसों के फूल खिलते हैं ।