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Tuesday 20 Nov 2018

मुखिया-पति या अर्दली

एक जिला पदाधिकारी के दफ्तर में इलाके के मुखियों की बैठक थी। उस बैठक में कितने ही मुखिया-पति भाग लेने आ गये थे। बैठक में पहले मुखिया-पति ने ज्यों ही अपना परिचय दिया, पदाधिकारी महोदय बिफर उठे, ''भागो यहाँ से; मैंने मुखिया को बुलाया है कि मुखिया के अर्दली को!'' सारे  मुखिया-पति बैठक से निकल भागे।

पूरे इलाके में हल्ला हो गया कि मुखिया-पति फूलो झा को जिला पदाधिकारी ने क्या कहकर भगाया।

उस दिन हर मुखिया-पति की पत्नी ने बैठक से भागकर आये हुए अपने पति को किन निगाहों से देखा होगा? 'पति परमेश्वर' या...? पति के परोक्ष होते ही कैसी मुस्कराहट उसके होंठों पर उतर आयी होगी? अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे।

अगले चुनाव में मैं भी खड़ी होऊँगी, हर विवाहिता ने मन ही मन यह निर्णय ले लिया होगा।

एक विधुर मुखिया पर तब वज्रपात हुआ जब सरकार ने अगले पंचायत चुनाव में उस पंचायत के मुखिया का पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया। अब क्या हो? मुखियागिरी के बगैर वे जिन्दा कैसे रहेंगे? तमाम विरोधों-अवरोधों को धता बताकर उन्होंने शादी का पुख्ता निर्णय ले लिया। वधू की तलाश में चारों ओर विशेषज्ञ दौड़ा दिये गये, दुलहा देखकर कोई बिदके मत, तीन बार के मुखिया की अकूत दौलत को देखे; उसके महल और मोटरगाड़ी को देखे। और सबसे बड़ी बात, शादी के बाद दुलहन की मुखियागिरी पक्की।

सचमुच सबसे बड़ी बात!

'खट्टे नहीं अंगूर' कहानी का एक अंश पढ़ लीजिये, मुखिया और मुखिया-पति के बीच का वार्तालाप:

''यह क्या! एक भी धुली साड़ी नहीं है! आपने मेरी साड़ी धुलवायी नहीं थी क्या?''

''धोबी गाँव से बाहर गया हुआ है।''

''मैं तो आपको कहकर गयी थी साड़ी धुलवाकर रखने?''

''हाँ, कहकर तो गयी थी, मगर धुलती कैसे? बिलटा काम का नौकर है, मगर औरत के कपड़े धोने को वह तैयार नहीं।''

''नौकर धोने को तैयार नहीं और धोबी गाँव के बाहर हो, तब तो मेरे कपड़े नहीं धुलेंगे? आप भी गाँव से बाहर चले गये थे क्या? जब आप मुखिया थे, तब बारह-बारह बजे रात में भी मैं आपके कपड़े धोती थी या नहीं? कुछ तो समझ रखिये कि मैं थककर आती हूँ और दिन में मुझे कपड़े धोने का समय नहीं मिलता।ÓÓ ़ ़ ़

''चाय अभी तक नहीं बनी?''

''बन रही है।''

''जब सब उठकर चले जायेंगे, तब बनेगी?''

''बन तो रही है।''

''मुझे बार-बार दरवाजे से उठकर अन्दर आना अच्छा नहीं लगता। दो-चार प्याली चाय बनाना भी आपके लिए पहाड़ हो जाता है। जब आप मुखिया थे, तब मैं दस-दस आदमियों के लिए पलक झपकते चाय तैयार कर देती थी या नहीं? मैं जाती हूँ, चाय लेकर आ जाइयेगा।'' ़ ़

़''अरेरेरे, यह क्या कर रही हो?''

''देख नहीं रहे क्या?''

''देख तो रहा हूँ, धान तुलवा रही हो; मगर, किसलिए?''

''अब यह भी बताऊँ? बेचने के लिए।''

''कितना बेच रही हो?''

''चार मन।''

''इतने पैसों का क्या करोगी?''

''अब यह भी बताऊँ? प्रखण्ड कार्यालय जाती हूँ, तो रिक्शा-ताँगा में भाड़ा लगता है। वहाँ लोग घेरे रहते हैं; चाय-पान में खर्च होता है।''

''घर का पैसा लगाकर मुखियागिरी करोगी?'' बोलकर मुखियाजी बुदबुदाये, ''दुर्गाथान वाली सड़क की मरम्मत दिखाकर पैसे निकाल लो।''

''एक मरम्मत में तो आपके जेल जाने की नौबत आ गयी है; अब दूसरी मरम्मत में मैं जेल जाऊँ?'' ़ ़ ़

''सुनिये, मुखिया होकर मैं जाऊँ दरवाजे पर झाड़ू देने?''

''दरवाजे पर झाड़ू नहीं पड़ा है?''

''नहीं।''

''बिलटा!''

''जब आप मुखिया थे, तो मैं सुबह-सुबह सबसे पहले दरवाजे को बुहार आती थी या नहीं? लोग सुबह से ही मिलने के लिए आने लगते हैं। आप यह तक नहीं देखते कि दरवाजा साफ-सुथरा है या गन्दा।''

''रे बिलटा!''

''बिलटा को क्यों हाँक लगाने लगे? वह गया होगा कहीं किसी काम से। बिलटा दो-चार दिनों के लिए अपने घर चला जाये, तो दरवाजा गन्दा ही रहेगा? सब काम नौकर के भरोसे? कल मैं दरवाजे पर गयी, तो मेरी कुरसी पर धूल जमी हुई थी। अब मैं कुरसी की धूल पोंछने के लिए अपने साथ पोंछना लेकर निकलूँ?'' ़ ़ ़

''रात कर दी?''

''हाँ, हो गयी।''

''इतनी देर बाहर मत रहा करो।''

''किसी काम से ही रहना पड़ा। आप मुखिया थे, तो देर होती थी या नहीं?''

''तुम औरत हो।''

''हाँ, मगर बच्ची तो नहीं हूँ।''

''बताकर तो जाती, कहाँ जा रही हो।''

''यह पता रहता है कि कब किधर निकलना पड़ जाये? आप मुखिया थे, तो बताकर जा पाते थे?''

''कहाँ देर हो गयी?''

''प्रखण्ड विकास पदाधिकारी ने रोक लिया था।''

''तुम्हें अकेले?''

''नहीं, और भी कई पंचायतों के मुखिये थे। कुछ जरूरी बातें बता रहे थे।''

''इस आदमी को दिन में बातों के लिए समय नहीं मिलता!'' बुदबुदाकर मुखियाजी ने मंगली देवी से कहा, ''मैं अभी ही तुम्हें सावधान कर देता हूँ। इस पदाधिकारी के बारे में मैंने बहुतकुछ सुन रखा है। यह आदमी अच्छा नहीं है। तुम उसके सामने गम्भीर बनकर ही रहना; भूल से भी कभी हँसकर बातें नहीं करना।''

''हँसने की बात होगी, तो हँसी रोक पाऊँगी क्या? जब आप मुखिया थे और आँगनबाड़ी की किरण दीदी के साथ चिपके रहते थे, तब क्या मैं आपको सावधान करने जाती थी कि वह कैसी औरत है और आप उसके साथ हँस-हँसकर बातें मत किया कीजिये?'' ़़ ़ ़

''दरवाजे पर कौन लोग आये हैं?''

''गाँव के ही हैं।''

''क्या पूछ रहे थे?''

''पूछ रहे थे, तुम कितनी देर में बाहर आओगी।''

''क्या कहा आपने?''

''मैंने कहा, तुम्हें कुछ देर लगेगी।''

''आपने जो कहा, वह मैंने सुना। आपने कहा, मंगली को आने में देर लगेगी।''

''मंगली नहीं कहा, मंगली देवी कहा।''

''क्यों कहा मंगली देवी? मैडम नहीं बोल सकते? कह नहीं सकते थे, मैडम को आने में कुछ देर होगी?'' ़ ़ ़।

जीबछपुर का नेतलाल परेशान है पंचायत चुनाव के चलते। औरतों के लिए दो-दो पद हैं, तो उसकी दोनों ही बीवियाँ चुनाव में कूद पड़ी हैं। किसी बीबी को यह कैसे मंजूर कि वह तो 'मैडम' बने और मैं...? दो बीवियों की आँच में तो झुलसता ही रहा था नेतलाल अब तक, अब तो जान सांसत में है। साइकिल की पिछली सीट पर बीवी को बैठाकर चुनाव प्रचार में निकलता है वह, सुबह में 'पुरनकी' को लेकर और शाम में 'नयकी' को, पूरे चुनाव क्षेत्रा को धांगकर आता है। किसी के खर्च में कोई बेईमानी नहीं, एक के प्रचार में दस औरतें, तो दूसरी के प्रचार में भी दस से कम नहीं। दोनों दलों को बीड़ी और सुपारी के पैसे बराबर-बराबर। 

सिमरा के घनानन मंडल के घर में नया बवाल। सास बहुत मीठे स्वर में बहू को समझा रही है, ''मेरे मुखिया बनने से तुम छोटी तो नहीं हो जाओगी, बहू। तुम्हारे मायके तक में शोर हो जायेगा कि ननकेसर मडड़़ की समधिन  गाँव की मुखिया है। देखो ननकेसर की बेटी का भाग्य! इस गाँव की और किसी बेटी का यह भाग्य कहाँ!''झिटकियावाली मुँह पर जवाब दे देती है, ''मेरे मुखिया बन जाने से क्या आपका भाव नहीं बढ़ जायेगा? टोला-मोहल्ला में निकलेंगी आप तो लोग कहेंगे, 'देखो बुढिय़ा को; जब से पतोहू मुखिया बनी है, इसके पाँव तो जमीन पर पड़ते ही नहीं।'''

  यात्रा : गाली से लाठी तक की

चतुरी मंडल साल भर से विधुर चल रहे सोमी मंडल को कहावत तो सुनाते हैं, 'बिन घरनी घर सून', मगर बोलते हैं, ''साल भर गुजार दिया अकेले; अब भनसिया ले ही आइये, सोमी भाय।'' हमारे ग्रामांचल में दिन भर खेतों में देहतोड़ परिश्रम करने वाली 'अद्र्धांगिनी' को 'भनसिय' का दर्जा प्राप्त है। भनसिया का मतलब भानस करने वाली, भानस मतलब रसोई। भनसिया कही जा रही इन औरतों को जरा भी मलाल नहीं; रानी नहीं, घरनी नहीं, भनसिया तो भनसिया ही सही। अपने ही मरद से क्यों पंगा ले कोई!

बाहर-बाहर कोई ऐंठ नहीं, कोई तकरार नहीं, मगर दिल के अन्दर तो है ही सब कुछ, परवशता का दर्द, आजादी के लिए विकलता। दिल की भड़ास को निकालती ही हैं वे 'जट-जटिन' खेलकर।

जट-जटिन का आयोजन सावन-भादों की अंजोरिया रात में किसी खुली जगह में किया जाता है। इस नृत्य-नाट्य में केवल महिलाएँ ही भाग लेती हैं। दो दल होते हैं, एक जट का, दूसरा जटिन का। एक दल में आठ-दस महिलाएँ होती हैं। जट का अभिनय करने वाली महिला पुरुष पोशाक में रहती है और जटिन रंगीन साड़ी पहनकर और फूलों-पत्तियों से सजकर रहती है। दोनों दल आमने-सामने खड़े होकर अभिनय प्रारम्भ करते हैं। अभिनय के समय एक दल गाता और नाचता हुआ दूसरे दल के पास जाता है और फिर उल्टे ही वापस लौटता है।

इस नृत्य-गान के दर्शक भी महिलाएँ ही होती हैं। कम आयु के बच्चे इसका आनन्द उठा सकते हैं। पुरुष का वहाँ जाना, लुक-छिपकर देखना भी मना है, सख्त मना है।

मना है...क्यों?

क्योंकि यहाँ स्त्रियाँ वे सब बकती हैं जो वे अपने मर्दों के आगे कहीं घर-बाहर नहीं बक सकतीं। मरदों की अनुपस्थिति में निधड़क, निडर होकर बोलती हैं वे। जब जट कहता है जटिन से...

लिबके चलिहें गे जटिन, लिबके चलिहें गे।

जइसे लीबे धान के सिसवा वैसे लिबहें गे।

जटिन यह स्वीकार नहीं करती कि वह झुककर चलेगी। उसका जवाब आता है...

नहिंये लिबबौ रे जटा, नहिंये लिबबौ रे।

हम त बाबा के दुलारी धीया तनि के चलबौ रे।

जट के बार-बार झुककर चलने की चेतावनी देने पर भी जटिन उसकी एक सुनने को तैयार नहीं और हर बार उसे दुत्कार देती है। वह साफ-साफ सुना देती है कि अब वह उसी तरह चलेगी जैसे गाँव का जमींदार चलता है, वह हाथ फेंककर चलेगी, गोड़ फेंककर चलेगी। सुन ले जट कि अब जटिन केले के थंभ की तरह तनकर रहेगी; अब वह 'काँच करचिया' की तरह झुककर नहीं, जिस तरह बाँस का 'कोपरबा' चलता है, उस तरह चलेगी।

जट आँखें फाड़कर देख रहा है जटिन को, 'हाय राम, यह क्या जमाना आया कि 'बाबा की दुलारी बेटी' अब 'ऐंठकर' चलेगी! बेलगाम!'

जमाना तो अब ऐसा आया है कि जट-जटिन का यह खेल अब खुलकर खेला जाने लगा है। देखें अब मरद भी, और जो करना चाहें कर लें, कर ही लें!

'जट-जटिन' अब इस अंचल की संस्कृति का अंग बन गया है। मंच पर प्रस्तुति होती है और अब गाँव के मर्द ही नहीं, बाहर के मेहमान भी आते हैं, बुलाये जाते हैं, इस प्रस्तुति को देखने।

मगर इतना होकर ही नहीं रह गया है। मंच से उतरकर दिन दहाड़े गाँव में चहलकदमी कर रही हैं ये, चल रही हैं हाथ फेंककर, गोड़ फेंककर, केले के थंभ की तरह तनकर, 'काँच करचिय' की तरह झुककर नहीं, बाँस के 'कोपरबा' की तरह चलकर।

और यह क्या! अब हाथों में लाठियाँ भी? मरदों को लठियाने के लिए? अब मरदों के लिए समय आ गया है 'काँच करचियाÓ की तरह झुककर चलने का।

अब औरतों को भला किसका डर!

अब औरतों की गुप्त सभाएँ होने लगी हैं।

मर्द पूछता है, ''कहाँ गयी थी?''

जवाब आता है औरत का, ''गयी थी काम से।''

''बताकर नहीं गयी?''

''आप कुछ बताकर कहीं जाते हैं क्या?''

मर्द भौचक बीवी को निहारता है, मन ही मन सोचता है, ओझा-मन्तरिया को बुलाना पड़ेगा क्या!

पचासों साल पहले सिंहेश्वर मेला में एक सर्कस कम्पनी आयी थी। सर्कस की लड़कियाँ सुबह शौच के लिए खुले मैदान में बैठती थीं, तो कुछ शोहदे युवक आनन्द मनाने के लिए कुछ दूर से उन पर ढेले फेंकते थे। एक सुबह अचानक पाँच-सात लड़कियाँ हाथ में लाठी लिये तंबुओं से निकलीं और शोहदों को दूर तक खदेड़ आयीं। शोहदे सिर पर पाँव रखकर भागे थे।

यह किस्सा दूर-पास के सारे गाँवों में नाच गयी थी। औरतों को तो विश्वास ही नहीं होता था कि औरत के हाथ में लाठी हो और वह मरदों को खदेड़ रही हो। औरत के हाथ में लाठी!

अभी जिन औरतों ने हाथ में लाठी धारण किया है, उनमें से कोई एक भी उस समय तक कोख में भी आयी नहीं होगी। औरत के हाथ में लाठी का यह किस्सा भी भुला दिया गया था। मगर आज अचानक फिर...फिर हाथ में लाठी! औरत के हाथ में लाठी!

घर में घुसते ही मुसाय की नजर ओसारे के एक कोने में खड़ी लाठी पर जाती है। वह घूरता है लाठी को और बुदबुदाता है, ''यह नयी लाठी? कोई आया है क्या?'' वह पिछवाड़े की ओर बढ़ जाता है और वहाँ सब्जी की क्यारी से भिंडी तोड़ रही अपनी घरवाली से पूछता है, ''समदावाली, कोई आया है क्या?''

''इस घर में?''

''हाँ।''

''हाँ, एक लाठी आयी है।''

समदावाली का टेढ़ा जवाब अच्छा नहीं लगा मुसाय को। उसने बिना चिढ़े पूछा, ''किसकी है?''

''मेरी है?''

''तुम्हारी?''

''हाँ।''

कुछ रुककर पूछा मुसाय ने ''यह किसलिए?''

''लठियाने के लिए।'

चौंकता है मुसाय। अब तक तो औरतों के बीच होने वाले हर वाक्युद्ध-पर्व का पारण झोंटा-झोंटी से होता आया है; यह क्या हुआ कि अब समदावाली के हाथ में लाठी?

पूछ बैठता है वह, ''किसी से झगड़ा हुआ है क्या?''

''हाँ।''

''किससे?''

झिड़क देती है जनाना, ''मैं क्या-क्या बताऊँ किससे, किससे, किससे। अब न जाने इस नये जमाने में किस-किस बात पर किस-किस से झगड़ा हो! घरघुसा को क्या पता कि गाँव में नया जमाना आ गया है! एक फेरा लगा आइये गाँव का; पता चल जायेगा 'किससे' और 'उससे' का।''

औरत के ऐंठ भरे जवाब से घबराता है मुसाय, चिंतित हो उठता है: यह नया जमाना क्या है? कब आ गया? और, उसके घर में कब घुस गया बगैर उसकी इजाजत के?

कुछ देर के ऊहापोह के बाद वह निकलता है घर के बाहर घरवाली के नया जमाना को देख आने।

घर से निकलकर थोड़ी दूर ही चलना होता है उसका कि उसे दूर-पास के कई घरों के सामने गोल बाँधे तीन-तीन, चार-चार लोग हाथ भाँज-भाँजकर बतियाते नजर आते हैं। वह पहले गोल के पास जा खड़ा होता है, जगरूप के घर के सामने। उस पर निगाहें तो सबकी पड़ती हैं, पर कोई एक भी उसे नहीं टोकता। मुसाय के मन में कई तरह की शंकाएँ उभरने लगती हैं। अपने घर के ओसारे में घरवाली की लाठी देखकर आया था वह।

जब वहाँ की बातचीत का कोई छोटा टुकड़ा भी उसकी समझ में नहीं आया, तो वह जगरूप से जा सटा और पूछा, ''क्या बात हुई है, जगरूप भैया?''

जगरूप ने मुसाय को कोई जवाब नहीं दिया, लतड़ू से कहा, ''बता दो इसे, क्या बात हुई है।''

''बात तो,'' लतड़ू बोला, ''समदावाली भाभी ने बतायी ही होगी।''

''नहीं,'' मुसाय ने सिर हिलाया, ''उसने मुझे कुछ नहीं बताया है।''

''तुम्हें कोई जानकारी नहीं?'' इस बार जगरूप ने ही पूछा मुसाय से।

मुसाय को समदावाली के हाथ में लाठी नजर आने लगी थी; उसने झट सुनाया, ''नहीं भैया, कोई जानकारी नहीं, भगवती किरिया।''

''हद हो गई!'' इतना भर बोलकर चुप लगा गया जगरूप।

''औरतों के गुट में समदावाली भी थी।'' लतड़ू मुसाय की ओर मुँह करके बोला।

''कोई मानेगा कि घर की औरत हाथ में लाठी लेकर घर ये बाहर  निकलती है हंगामा करने और घर के मर्द को कुछ पता ही नहीं होता?'' जगरूप ने विकृत हँसी के साथ मुसाय की ओर से मुँह फेरते हुए तीखी आवाज में सुनाया।

सब हँस पड़े।

बेटी को पहली बार ससुराल के लिए विदा करते ही माँ अपने इष्टदेवों को सुमरती थी, ''हे बाबा सुरुजदेव, हे माँ दुर्गा-काली-चण्डी, ससुराल में जो सुख-दुख लिखा है, वह तो मेरी बेटी को भी होगा ही, मगर मेरी इस मुँहदुब्बर बेटी को इतना कल्लादराज जरूर बना देना कि गाल बजाकर वह हर मोरचा जीत जाये।''

बेटी अपने साथ मायके में अर्जित गालियों की पोटली, या कहें टोकरी, लेकर विदा होती थी ससुराल के लिए। अब क्या ऐसा होगा? बेटी विदा होते समय माँ से पूछेगी, ''गे माँ, मेरी हरौतिया बाँस वाली लाठी कहाँ है? मुझे बिना लाठी के ही भेजोगी क्या?''

आस-पास खड़ी एक भी औरत हँसेगी नहीं; माना कि बेटी की माँ को हजार काम हैं, मगर यह कैसे भूल गयी कि...?''

          पोदिनमा का नाती

भीड़ को विश्वास दिलाने के लिए कि वह भारी गुस्से में आ गया है, मुसाय तेज कदमों से घर का रुख करता है, मगर घर पहुँचने के पहले ही अचानक वह ठिठकता है जब दूर से ही वह अपने घर से तीन-चार औरतों को निकलकर जाते हुए देखता है। उसके कदम धीमे पड़ जाते हैं। तो क्या, वह सोच में पड़ जाता है, यह समदावाली ही लठैत औरतों के दल की मेठ है? अब आगे बढ़ते हुए उसके कदम लडख़ड़ाते हैं। इस तरह तो कभी शराब पीने के बाद भी कदम नहीं लडख़ड़ाये थे उसके।

वह हिम्मत बटोरकर आगे बढ़ता है। हाथ में लाठी है तो क्या हुआ, है तो एक औरत ही, उसकी घरवाली, उसके इशारे पर नाचने वाली, उसकी भनसिया।

घर पहुँचते ही वह सबसे पहले ओसारे पर पड़ी लाठी को कब्जे में लेता है और फिर वहीं से हाँक लगाता है, ''समदावाली! कहाँ हो? यहाँ आओ।'

समदावाली को पता है कि अब क्या होने वाला है। वह अपने को तैयार कर अपने मरद का सामना करती है।

''आप अभी चिल्लाये थे क्या?'' समदावाली बगैर लडख़ड़ाये बोलती है।

अंगार उगलती आँखों से घूरता है मुसाय अपनी भनसिया को और चिल्लाकर जवाब देता है, ''हाँ।''

''क्या कह रहे थे?'' धीमी आवाज में पूछती है समदावाली।

''तुम सुबह-सुबह घर से बाहर गयी थी?''

''हाँ।''

''कहाँ गयी थी?''

''मुंशी साह की शराब की भ_ी तोडऩे।''

''घर से लाठी लेकर?''

''हाँ।''

''बगैर मुझसे पूछे?''

''हाँ।''

''तुम लाठी लेकर घर से निकलोगी गाँव में बवाल मचाने और मुझसे पूछोगी तक नहीं?''

''मैं किसी नेक काम से निकली थी; मुझे हर हाल में जाना था, और तुरन्त जाना था,'' समदावाली ने सहज लहजे में जवाब दिया और फिर बोली, ''मैंने यह जरूरी नहीं समझा कि आपको सोते से जगाऊँ और फिर आपकी इजाजत लूँ बाहर जाने के लिए।''

मुसाय के तलवों में आग लग गयी, ''सुन लो, सुन लो, समदावाली, कान खोलकर सुन लो कि यह मेरा घर है, सिसवा के मुसाय मंडल का घर, और सिसवा के मुसाय मंडल के घर में किसी औरत की यह मनमर्जी नहीं चलेगी कि वह  बिना घर के मालिक की इजाजत के लाठी लेकर घर के बाहर जाये गाँव-टोला में बवाल करने...झाड़-जंगल में बकरी ढूँढऩे भी नहीं।''

''आप भी सुन लीजिये कि अब इस गाँव के हर घर में औरत की यह मनमर्जी चलेगी कि वह जरूरत पडऩे पर बिना घर के मालिक की इजाजत के लाठी लेकर घर के बाहर जायेगी। मर्द घर का मालिक है, तो औरत भी घर की मालकिन है।''

''क्या कहा, मालकिन?''

''हाँ, मालकिन। आप घर के मालिक हैं, और मैं घर की कुछ भी नहीं?''

''कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं; बस एक भनसिया।''

''कुछ भी नहीं; तब ठीक है, मैं यह घर ही छोड़ देती हूँ।''

''घर छोड़ दोगी?''

''हाँ, छोड़ दूँगी।''

''कहाँ जाओगी, नैहर?''

''गरीब की बेटी हूँ, नैहर में रहूँ या ससुराल में, या कहीं और, हाथ-गोर चलाकर ही पेट भरना है; कहीं भी रह लूँगी, जी लूँगी।''

''कहीं भी रह लोगी, मगर मेरी बात में नहीं रहोगी?''

''नहीं रहूँगी, आपकी किसी गलत बात में आपके साथ नहीं रहूँगी।''

''मेरी कोई बात गलत नहीं होती; मेरी हर बात तुम्हें माननी है। यह मत भूलो कि मैं तुम्हारा भतार हूँ, और भतार की हर बात माननी होगी।ै''

''नहीं मानूँगी।''

''नहीं मानोगी?''

''नहीं, नहीं, सौ बार नहीं।''

मुसाय कुछ असहज हो जाता है, दम लेता है यह सोचने के लिए कि अब क्या किया जाये और फिर काफी सँभलकर बोलता है, ''सुन लो समदावाली, अभी मैं कितने गुस्से में हूँ, इसका तुम्हें पता नहीं। तुम कान खोलकर सुन लो; अब अगर तुम मेरी बात से बाहर गयी, तो मैं तुम्हारा...''

''क्या तुम्हारा?''

''तुम्हारा वही हाल कर दूँगा जो हाल...''

''जो हाल,'' समदावाली ने जोड़ा, ''जगदीश मास्टर ने पड़रियावाली का किया था। यही बोलने जा रहे थे न! अभी गाँव में हर मरद की जबान पर जगदीश मास्टर ही चढ़ा हुआ है, मगर सुन लजिये कि अब जगदीश मास्टर में भी वह बूता नहीं रहा कि पड़रियावाली पर हाथ उठा ले।''

''जगदीश मास्टर में नहीं रहा,'' मुसाय ने अपनी आवाज बुलन्द की, ''पर मुझमें है; है मुझमें बूता। अब तुम बताओ, साफ-साफ  बताओ, तुम्हें मेरा डर है या नहीं?''

''कोई गलत काम करूँगी, तब डर आपका, डर किसी का भी,'' समदावाली ने जवाब दे दिया, ''नहीं तो किसी का भी डर नहीं।''

''मेरा भी नहीं?'' मुसाय ने आँखें लाल-पीली कीं।

''नहीं, आपका भी नहीं।''

जगेसर मंडल के छोटे बेटे सिबुआ की शादी हाल ही में हैरपुर के सोमन मंडल की बेटी के साथ हुई थी। जो आग अब जाकर सुलगी है मुसाय के कदमा गाँव में, उस आग को धधकते हुए देखकर आयी थी हैरपुरवाली अपने मायके से। वह तो ससुराल में कभी बहू बनकर रही ही नहीं, आते-आतेे 'जट-जटिन' की जटिन बन गयी जो जट को सुना देती है,'नहिंये लिबबौ रे जटा, नहिंये लिबबौ रे।' वह साफ-साफ सुना देती है कि अब वह उसी तरह चलेगी जैसे गाँव का जमींदार चलता है, वह हाथ फेंककर चलेगी, गोड़ फेंककर चलेगी। सुन ले जट कि अब जटिन केले के थंभ की तरह तनकर रहेगी; अब वह 'काँच करचिया' की तरह झुककर नहीं, जिस तरह बाँस का 'कोपरबा' चलता है, उस तरह चलेगी।

खुद तो 'जटिन' थी ही हैरपुरवाली, सिसवा की हर औरत को 'जटिन'बना दिया। 'पोदिनमा का नाती' वाला 'फकड़ा' भी वह अपने मायके से लेकर ही  आयी थी। यह 'फकड़ा' उसने गाँव की एक चाची के मुँह से सुना था और    सिसवा की एक-एक औरत की जबान पर इसे चढ़ा दिया था।

जब मुसाय ने समदावाली से पूछा कि उसके अन्दर अपने भतार का डर है या नहीं, तो समदावाली ने सोचा न समझा और 'पोदिनमा का नातीÓ वाला 'फकड़ाÓ ज्यों का त्यों दुहरा दिया,

''किसी का डर नहीं...

शूली न फाँसी का, घुन्ना न घाती का;

डर किसका? डर अब पोदिनमा के नाती का?''

पोदिनमा का नाती!

मुसाय के तलवों की आग मगज तक जा पहुँची। उसने आव देखा न ताव  और समदावाली के चूतड़ पर कड़े हाथ से लाठी जमा दी।

'अरे बाप! गे माय!' जैसा कुछ समदावाली के मुँह से नहीं निकला; उसके मुँह से निकला, ''खबरदार!''

इस एक 'खबरदार' के साथ कई 'खबरदार' मुसाय के घर में घुस आये।  रामनगरवाली इन 'खबरदारों' की मेठ थी। उसने आगे बढ़कर मुसाय से कहा, ''खबरदार, मुसाय मंडल, अब यह सब नहीं चलेगा। हाथ की लाठी फेंकिये  और बाहर का रास्ता नापिये, नहीं तो अभी ही हम सब थाना चले जायेंगे। फिर सलटते रहिये आप थाना-पुलिस से।''

मुसाय हतप्रभ था। उसने सारे 'खबरदारों' पर नजर दौड़ायी। उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि अब वह क्या करे। घोर कलियुग का अचानक प्रवेश! हाल ही में तो जगदीश मास्टर ने...

मुसाय ने हाथ की लाठी तो नहीं फेंकी, मगर बाहर का रास्ता नापने के लिए घर से बाहर निकल गया। बाहर आकर उसने वही देखा जो देखकर वह घर के अन्दर दाखिल हुआ था। अभी भी कई घरों के सामने गोल बाँधे तीन-तीन, चार-चार लोग हाथ भाँज-भाँजकर बतिया रहे थे। वह इस बार भी  जगरूप के पास जा पहुँचा।

जगरूप ने हँसकर पूछा, ''क्या हाल है, मुसाय बाबू?''

मुसाय ने तीखी निगाहों से जगरूप को घूरा और फिर बोला, ''जो हाल मेरे घर का है, वही हाल अब यहाँ के हर घर का है। अब गाँव के सारे मरद बैठकर विचार करें कि जो आग गाँव में लगी है उस पर कैसे काबू किया जाये।

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