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Tuesday 12 Nov 2019

सुन रहा हूं इस वक्त

खड़ा और अड़ा रहूंगा तुम्हारे साथ सदैव

इस संसार की रचना में प्रकृति का जो सबसे अंतरंग साथी रहा होगा वह निश्चित ही कोई कवि रहा होगा, क्योंकि कवि के भीतर ही वह क्षमता है जो हवा के प्रवाह में विद्यमान गीत को सुन सकता है। तूफान की विनाशकारी ध्वनि को शब्द दे सकता है। पर्वत की गंभीरता, समुद्र की लहरों के स्वर, नदियों की कल-कल की भाषा समझ सकता है। सतीश सिंह कवि, कविता, उनके दायित्व, सत्ता, और समाज में उनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता पर कुसुमादपि कोमलता से प्रकाश डालते हंै।

इस स्वतंत्र देश में सत्ता के साथ हम सभी संभवत: अपनी उन जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त किए हुए हैं जिसके तहत हम यह जानने की कोशिश भी करें कि यह जो गली की नालियों से, गटरों से, हमारे घरों से निकाल फेंके कचरे में अपने जीवन के लिए जो उपयोगी सामान ढूंढते है,अपने उदर पूर्ति के साधन खोजते हैं, जो अपने जीवन के लिए हमारे खारिज किए चीजों में अवलंब तलाशते हंै, वे क्या खाते-पीते है कैसे-जीतेे हंै? उनके होने ना होने से हमें कोई फर्क पड़ता है या नहीं पड़ता। दूसरी दफा उनसे भेंट होती क्यों नहीं है? इस स्वतंत्र भारत में उनका अस्तित्व कितने दिनों तक मौजूद रहेगा...की चिंता कौन करता है? यह कवि हिमालय की गोद में मनुष्य समाज से विरक्त होकर लोक की चिंता लिखने वालों पर विश्वास नहीं रखते अपितु आचार -विचार, व्यवहार विनिमय हो सकने वाले लौकिक समाज में जीकर, जिबह होने तक हुंकार भरने और सच कहने की हिम्मत रखने को कवि का असल गुण मानते है -जब तक जिंदा हूं/ शब्दों के तीर छोड़ता रहूंगा/तुम्हारे जादुई भ्रम के दीवारों को/अपने हौसलों की छेनी से/ लगातार तोड़ता रहूँगा...

राजनीतिज्ञों की वादाखिलाफी, जुमलेबाजी, पर कविता निर्माण करना कवि के लिए आसान काम है किंतु राजनीतिज्ञों के बच्चे पद और पैसों की भीड़ में अपने ही मां बाप के प्रेम से किस तरह वंचित रह जाते हैं, पिता की पीठ पर चढ़कर मस्ती करने से कैसे चूक जाते हैं, इस कवि की नजर इन सूक्ष्म किंतु अनिवार्य घटनाओं पर पड़ती है। महिलाएं अपने बलबूते आसमान और सागर के ओर छोर की यात्रा कर तो रही है किंतु हमारी सामाजिक संरचना ऐसी बन गई है कि हम स्त्रियों को कभी सम्मान न देने के अख्खड़पन के साथ अपनी आत्म मुग्धता से जी रहे हैं। उन्हें बाजार की वस्तु बना दिए हैं। उनकी खुली टांगों की नुमाइश के बिना किसी बाजार में कोई उत्पाद ही नहीं बिकता। चड्डी बनियान उनकी देह को दिखाए बिना बेच पाते? समाज का बुनियादी ढांचा इतना कमजोर होना कवि की चिंता का सबब है। गांवों में, निर्धन घरों में,पति के बीत जाने के बाद, सीधी-साधी सभ्य सुशील असहाय स्त्रियों को टोनही में परिवर्तित कर देना, हमारे समाज के पास बनी बुनाई पद्धति है जो देखते ही देखते स्त्रियों के पीछे पड़ जाती है। देखते ही देखते बैगा-गुनिया सब तैनात हो जाते हैं। ऐसी स्त्रियों का जीवन नारकीय बन जाता है। स्त्रियां घुट-घुट कर मर जाती हैं। समाज सभ्य होने की आत्मवंचना से हम भले ही आनंदित होते रहे किंतु यह हमारे समाज की तल्ख हकीकत है। स्त्रियों को दुर्गा काली का नाम देकर पूजा की वस्तु बना देते हंै। ये कैसी भावना है हममें कि हम किसी पराई स्त्री या बच्ची जो कोई वस्तु बेचने दिखाने घर या दफ्तर आती हैं, में अपनी विलासिता की वस्तु खोजने लग जाते हैं। चश्मा, ढेकी, ताला, बसनी, लाठी, जाला, सिक्का, गोरसी, आग आदि इनकी प्रतीकात्मक कविताएं हैं। ये केवल वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि इसने हमारे पुरखों को लंबे अर्से तक सुविधाएं प्रदान की हैं और उस जमाने में मनुष्य से मनुष्य को जोड़ा है।

चश्मा हमें देखने में मदद करता है, किंतु यदि हमारे अंतर्चक्षु पर ही चश्मा लग जाए तो वह हमें हमारे ही जीवन से ही बहिष्कृत कर देता है। हम दूसरों के विचारों के अधीन होकर लोक कल्याण के कार्यों के दुश्मन बन जाते हैं।

'ताला' पर हमारा विश्वास होता है कि इस संसार पर अभी भरोसा किया जा सकता है। दुनिया में अभी लिहाज बचा हुआ है। वह अकेला सिपाही है जो अदम्य साहस के साथ हमारे विश्वासों को जिंदा रखने के लिए खड़ा रहता है। 'लाठी' कुत्ते भगाने से लेकर असहाय को संबल देने का काम भी करती है। किंतु यह यदि दुराचारियों के हाथ लग जाए तो विनाशकारी परिणाम भी देती है। कवि ने प्रतीक और बिम्बों के माध्यम से समाज के कोने कोने को चित्रित करने का प्रयत्न किया है। कुछ पंक्तियां अपनी लावण्यता और धार के कारण महत्वपूर्ण और बहुत प्रेरक लगतीे हैं। ऐसा रचना विन्यास घटना को देखे जीये, लीले और पचाए बिना संभव नहीं है। यथा- बच्चे बड़े हो रहे है, मुझे अक्सर ही रूलाएगा, बहू का टोनही में बदलना, लिखो कवि जिबह होने से पहले, स्त्रियां उन्हें अपना गोपन दुखड़ा बताती, उसके जिस्म को घूरती है एक साथ कई कामुक और विधुर आंखें, यह तुम हो मां जिसके भीतर लौटता हूं मैं बार बार....ढीली पेंट सम्हाले मेरा दौडऩा...उसके पांव रखते ही आश्वस्ति से भर उठते है...हात हूत करने पर भी नहीं भागते थे मुंडेर के कौवे...उनके कमरे में आराम फरमाते हैं शनि...अंगीठी की राख कुरेदते झर जाती ऊंगलियों से कई कई स्मृतियां...इस जहान में कोई तो होगा उस महत्वपूर्ण का अपना कहने को...

यह कवि जगाने वाला मात्र नहीं है अपितु स्वयं जागने वाला है। वे कहते हंै-चश्मा को तोड़ देना चाहता हूं कि दिख सके सूर्य का दिपदिपाता चेहरा। हम जानते हैं हमारे विचारों का चश्मा हमें श्रम का मूल्यांकन करने नहीं देता। आश्चर्यजनक निर्माणों को करने वाले हमारे श्रमिक हमेशा उपेक्षित रह जाते हंै। उस चश्मे का टूटना जरूरी है। 'धरती बंजर नही होती' सच है। इस धरती का कोई मनुष्य कभी बेकार नहीं हो सकता। सबमें कुछ ना कुछ कलाएं होती हैं। अवसर के छेनी हथौड़ी से तराशे जाने से वे मरहूम रह गये हैं। उपेक्षा और तिरस्कार की मनुष्य समाज में जगह नहीं होनी चाहिए। आज जब पड़ोसी से पड़ोसी का मिलना असहज होते जा रहा है। याद आती है आग और गोरसी। तब आम घरों में आग मांगने और तापने जाने की हमारी आदत थी। अपनी बातों को तब बुजुर्गों के पास बताने या फरियाद सुनाने का यह सुनहरा अवसर होता था। ढेकी से बहू और सास एक दूसरे से बतियाती दाल या चांवल कूट लेती थी। ऐसे काम के लिए पड़ोसिनें आस पड़ोस जाया करतीं। चूल्हा बनाने वाली महिलाओं को बड़े कद्र के साथ नेवती जाती कि जांजगीरहिन भौजी जरा समय निकाल के हमरो चूल्हा ल बना दीहा। बेसनी कमर में लटकने वाला पर्स है जिसमें रोजगार करनेवाली कामकाजी महिलाएं पैसे रखा करती। देखिये उस समय में भी पैसों की कमी तो थी ही, चोर उचक्के भी थे, पर हमें कमर में लटकने वाली बेसनी पर रखे पैसे के लूट लिए जाने का डर नहीं था। हमारा धैर्य जवाब दे रहा है। इस संग्रह में बुजुर्गों की दशा पर गंभीर चित्र खींचा गया है। हमारे लिए बुजुर्ग जैसे बोझ बनकर रह गए हैं। यह बात बुजुर्गों को सालती है, पर उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है। जिनकी चिंता में जीवन गुजर गया, उनकी झोली में बुजुर्ग मां-बाबूजी के लिए रत्तीभर स्नेह नहीं।  एक बानगी....

उकता जाते है

आज्ञाकारी बच्चे भी

उनकी लंबी बीमारी से

तब चेहरा पर चेहरा

खोजते हैं वे अपनापन

खोजते हैं और छीजते हैं

भीतर भीतर..

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प्रेम पर कवि इस तरह लिखते हैं

प्रेम का प्रताप ही कुछ ऐसा है कि-

ताजा हो जाते है

गुलदान पर रखे फूल

तुम हो तो प्रेम है..

किंतु प्रेम का दूसरा पहलू है प्रेमी जोड़ी का पटरी पर बिछ जाना, पेड़ पर लटक जाना, जीवन वीणा के तारों को स्पर्श किए बिना ही मर जाना। यह घटना आहत करती है इसलिये कि हमारा अहम हमें इसे स्वीकारने नहीं देता।

प्रेमी युगल की क्या इस वसुंधरा के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है? प्रेम का महत्व केवल शादी कर लेना ही तो नहीं है। मां के बिना कवि की कविता पूर्ण नहीं होती और वह शब्दों में समेटा जाए ऐसा संभव भी नहीं है। कवि बार बार अपनी मां, अपनी धरती मां, अपनी जड़ों की तरफ लौटते हैं। दुख संताप खुशी और आवेग को समो लेते हंै...कविताएं अनुभव से उपजी हुई हंै, इसलिए शब्द स्वयं उपजे है किंतु शब्दों की धार से कविता की धार चोटिल ना हो, और कम शब्द खरचने से हमें परहेज ना हो। इस आशा के साथ भाई सतीश सिंह को महत्वपूर्ण लेखन के लिए धन्यवाद।