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Wednesday 13 Nov 2019

सूरदास : नए संदर्भ

भारतीय साहित्य में कृष्ण काव्य की परंपरा काफी पुरानी है। हिन्दी समेत लगभग सभी भारतीय भाषाओं में कृष्ण काव्य की परंपरा का उल्लेख मिलता है। हिन्दी में कृष्ण काव्य परंपरा के अनन्य साधक कवि सूरदास का नाम उल्लेखनीय है। सूरदास के काव्य को नई दृष्टि देकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कदम उठाया है सूरदास : नए संदर्भ के लेखक मान्धाता राय ने। आज साहित्य और समाज में नए-नए आयाम उभर कर आ रहे हैं। मनुष्य का जीवन उलझकर रह गया है। लेखक इस ओर संकेत करते हुए लिखते हैं कुंठा और अनास्था नगर-संस्कृति की पहचान है। स्वार्थ साधन, महत्वाकांक्षा और ठगी इसकी उपलब्धियाँ हैं। नगर जन तिकड़म से अपना मतलब साधते हैं। वे कोई भी हथकंडा अपनाते हैं- (सूरदास : नए संदर्भ, पृष्ठ 128)। स्त्री चिंतन, बाजारवाद, भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद, पौरत्यवाद में उलझ कर रह गया है। उसके पास अपनों के लिए समय ही नहीं है। मनुष्य मात्र मशीन बन गया है। लेखक आगे लिखते हैं -हर समय कार्य की व्यस्तता के चलते मस्तिष्क तनावग्रस्त हो जाता है। आज भी फुर्सत के क्षणों में हम रेडियो, दूरदर्शन, सिनेमा या अन्य तरीके से नृत्य-गीत देखते सुनते हैं। वर्जनाओं के चलते मानव मन कुंठित हो गया है। लोकसंस्कृति के इन तत्वों का विकृत रूप पाश्चात्य संगीत के रूप में आयातित होकर आया है जो कुंठित नयी पीढ़ी को राहत दे रहा है। सूरदास ने प्रत्यक्ष रूप से तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का आधार न लेकर उस समय के प्रचलित संस्कारों, संस्थाओं और मनोविनोद के साधनों का उल्लेख किया है- (वही पृष्ठ 130)। मनुष्य के पास संबंधों के लिए लेश मात्र समय नहीं है। उसके पास अपने अतीत में झाँककर देखने का समय नहीं है। ठीक ऐसे समय में आलोचक, लेखक मान्धाता राय की द्वारा सूरदास के पदों को तार्किकता की कसौटी पर कसकर उसका पुनर्मूल्यांकन करना एक क्रांतिकारी कदम है। सूर और सूर के पद कभी पुराने नहीं हो सकते हैं उसको जब-जब पढ़ा एवं मथा जाएगा तब-तब उसमें से नए-नए संदर्भ उभरकर सामने आएँगे। शायद इसलिए कहा गया है कि रावरे रूप कि नीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यों ज्यों निहारिए। इसी पंक्ति को साकार करती एवं उसकी प्रासंगिकता बताकर समय समाज से मुठभेड़ करती प्रतीत होती है, मान्धाता राय की पुस्तक सूरदास: नए संदर्भ।

मध्यकालीन पृष्ठभूमि पर अपनी रचनाओं से साहित्य को समृद्ध कर रहे सूरदास ने अपने समय समाज के सभी तत्वों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। इन सभी पुटों को अपनी पुस्तक में स्थान देकर लेखक ने पाठकों को नई दृष्टि दी है। जब भी सूरसागर की चर्चा होती है तब सूर के वात्सल्य रस के साथ-साथ काव्य के सभी अंगों का विस्तृत विवेचन हमारे मन-मस्तिष्क पर छा सा जाता है। इस पुस्तक के लेखक ने सूरसागर के उन सभी पक्षों की विस्तृत चर्चा की है। जो मानवीय भावों, अनुभवों एवं जीवन के विविध पक्षों से जुड़े हुए हैं। लेखक लिखते हैं कि श्लोकसंस्कृति, संगीत, संवाद योजना, शब्द चयन, अलंकार एवं विभिन्न रसों के प्रयोग की दृष्टि से भी यह ग्रंथ महत्वपूर्ण है। लोकजीवन में होने वाले सभी संस्कारों, रीति-रिवाजों, प्रथा-परंपरा, खान-पान, टोना-टोटका, चौसठ कलाओं, नृत्य, गीत सबका वर्णन इसमें हुआ है। कृष्ण की कथा को केंद्र बनाकर सूर के कवि हृदय ने सभी दिशाओं में ऊँची उड़ान ली है। सूरसागर के पद केवल वर्णित न होकर पात्रों की बातचीत के बीच धक्का खाते हुए आगे बढ़े हैं। कवि की संवाद योजना चुस्त, स्वाभाविक, मार्मिक एवं हृदय-स्पर्शी है- (वही पृष्ठ 19)।

 सूरसागर का पाठानुसंधान करते हुए लेखक ने उसके गुणों एवं दोषों के बारे में लिखा है। वे लिखते हैं -इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर हम सूरसागर के प्रकाशित संस्करणों पर विचार करें तो अब तक प्रकाशित चारों संस्करण दोषपूर्ण दिखते हैं। यह अवश्य है कि इन सभी संस्करणों के संपादकों ने प्राचीन हस्तलेखों एवं विभिन्न प्रतियों के संकलन हेतु अथक प्रयास किया और सारी सामग्री एकत्रित की। परंतु किसी संस्करण में न तो विभिन्न पाठभेदों का उल्लेख हुआ है  और न रचनाकाल की परिस्थिति के अनुसार भाषा की प्रकृति पर ही विचार किया जा सका है। फिर संदिग्ध शब्दों की तुलनात्मक ढंग से विवेचना एवं ऐतिहासिकता के आधार पर सही पाठ स्थिर करने की बात तो दूर रही -(वही पृष्ठ 39)।

इस पुस्तक का आकर्षक पक्ष यह है कि इस पुस्तक की रचना सूचनात्मक एवं व्याख्यात्मक तरीके से की गई है। पुष्टिमार्ग, आनंद, प्रेममार्ग एवं भक्ति के उन सभी प्रकारों की विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में की गई है। लेखक लिखते हैं पुष्टिमार्ग में श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं। वे ही दिव्य गुणों से सम्पन्न होकर पुरुषोत्तम कहलाते हैं। वे सत चित आनंदमय हैं। वे अवतारी रूप में भक्तों के साथ लीला करते हैं। वृंदावन, यमुना, वंशी, गाय और गोवर्धन इनके नित्या रूप हैं। सूरसागर में इन्हें कृष्णरूप माना गया है। भगवान की प्रेममार्ग से प्राप्ति की तीन अवस्थाएँ होती हैं प्रेम, आसक्ति और व्यसन। व्यसन ही सबसे पुष्ट दशा है जिसके द्वारा जीव हर प्रकार की मुक्ति का तिरस्कार भगवान की नित्य सेवा द्वारा परमानंद को प्राप्त करता है -(वही पृष्ठ 61)।     प्रस्तुत पुस्तक में सूरसागर का महत्व, उसमें वात्सल्य वर्णन, भ्रमरगीत की मौलिकता, सूर साहित्य की प्रासंगिकता, प्राकृत, अपभ्रंश का काव्य का प्रभाव, जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सविस्तार से चर्चा किया गया है । इस विस्तार में इस तथ्य पर ध्यान रखा गया है कि सूर साहित्य का काव्यगत सौंदर्य पूरी तरह से उद्घाटित हो जाए और उसमें निहित पौराणिक गूढ़ रहस्यों तक पाठक को ले जाया जा सके। इस पुस्तक में सूर साहित्य के काव्य मर्म को उद्घटित करने वाले अ_ारह से ज्यादा निबंध सम्मिलित हैं। लेखक के इस प्रयास से हिन्दी का अध्येता वर्ग कृष्ण काव्य परंपरा में सूरदास का अवदान, सूर की भक्ति भावना, सूर के वात्सल्य रस रूप वर्णन, भ्रमर गीत की दार्शनिकता आदि से भलीभांति परिचित हो जाएगा। पुस्तक में सूरसागर के लोकतत्व पर विचार करते हुए लेखक लिखते हैं लोकतत्व का संबंध आम आदमी के जीवन मूल्यों से है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारतीय जीवन में उदार मानवतावाद के प्रवेश के साथ साहित्य में जनसामान्य का वर्णन आरंभ हुआ। किन्तु आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व सूरदास ने सूरसागर में ब्रज के जनसामान्य के जीवन तत्वों का चित्रण कर लोक संस्कृति के वर्णन की आधारशिला रखी थी। यही कारण है कि भागवत से भिन्न कृष्ण के अलौकिक रूप के स्थान पर उनकी लौकिक लीलाओं के चित्रण में कवि का मन अधिक रमा है (वही पृष्ठ 80)। सूर के काव्य में लोक सर्वत्र विद्यमान है। लोक की परिकल्पना सूर के काव्य के बिना संभव नहीं हो सकती है। इसे लेखक श्री राय ने बखूबी स्पष्ट किया है ।

सूरदास के साहित्य को समझने एवं उन पर नई दृष्टि डालने वाली यह पुस्तक काफी महत्वपूर्ण एवं संग्रहणीय है ।