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Tuesday 15 Oct 2019

स्त्रीवाद के आईने में बिना दीवारों का घर

स्त्रीवाद एक आधुनिक विमर्श है। विमर्श ऐसे साधन हैं जो क्षेत्र विशेष अथवा विषय विशेष की सत्ता का प्रदर्शन करते हैं। उनकी परिभाषाएँ गढ़ते हैं। किसी को वैध और किसी को अवैध बनाते हैं। किसी को व्याख्येय और बोधगम्य बनाते हैं तो किसी को अव्याख्येय और दुर्बोध बनाते हैं। वे लिखित-अलिखित मान्यताओं का नियमन करते हैं। विमर्श एक तरफ  स्थापित सत्ता की वैधता पर सवाल उठाते हैं तो दूसरी तरफ  नयी सत्ता की परिकल्पना करते हैं और उनकी वैधता सिद्ध करते हैं। तात्पर्य यह कि किसी भी विषय पर गंभीरतापूर्वक विविध नजरिये से विचार विश्लेषण करते हुए उसकी सत्ता की स्थापना करना ही विमर्श है। इसमें वस्तुनिष्ठता और तर्क संगत विवेचन अपेक्षित रहता है। बौद्धिक और तार्किक युक्तियों के माध्यम से मूल्यांकन करने की कोशिश रहती है। परिणामस्वरूप विवेचित विषय के नये-नये आयाम खुलते हैं। उनसे जुड़ी नयी परिभाषाएँ नयी दृष्टियाँ निर्मित होती हैं।

स्त्रीवाद इसी तरह का एक विमर्श है जो सदियों से पुरुष निर्मित स्थापित सामाजिक संरचना पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता हुआ आधुनिक सामाजिक व्यवस्था के भीतर स्त्री अस्मिता की तलाश करता है और उन संस्थाओं को पुन:परिभाषित करने की कोशिश करता है जिनकी रूढि़बद्ध संरचना के भीतर स्त्री अस्मिता दम तोड़ती आई है। इस अर्थ में नारीवाद महिला उत्पीडऩ के विभिन्न पहलुओं को समझाने की दिशा में प्रयासरत एक गतिशील और निरंतर परिवर्तित होने वाली विचारधारा है, जिसमें व्यक्तिगत, राजनीतिक और दार्शनिक पहलू भी शामिल हैं, लेकिन जो एक विचार सभी नारीवादी दृष्टिकोणों में समान है, वह यह है कि यह सभी मौजूदा स्त्री पुरुष संबंधों को बदलने की दिशा में केन्द्रित है। दूसरे शब्दों में, ये सभी विचारधाराएँ इस तथ्य से पैदा होती हैं कि न्याय के लिए महिलाओं को स्वतंत्रता व समानता दी जानी चाहिए।

स्त्रीवाद के दावे और अपेक्षा को लेखकों ने भी अपनी रचना में प्रदर्शित करने की कोशिश की है, लेकिन जैसा कि महादेवी वर्मा ने लिखा है- पुरुष द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श हो सकता है परन्तु अधिक सत्य नहीं, विकृति के अधिक निकट पहुँच सकता है परन्तु यथार्थ के अधिक समीप नहीं। पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है, परन्तु नारी के लिए अनुभव। अत: अपने जीवन का जैसा सजीव चित्रण हम दे सकेंगी, वैसा पुरुष बहुत साधना के उपरान्त भी शायद ही दे सकेगा। इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत शोध आलेख में मन्नू भंडारी  द्वारा रचित नाटक बिना दीवारों के घर (1966) का विश्लेषण और मूल्यांकन अपेक्षित है।

हिंदी साहित्य जगत की यह एक बड़ी विडंबना है कि वह सैद्धांतिक तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी तमाम तरह की प्रतिबद्धता के  बावजूद व्यावहारिक रूप में कई तरह से उसकी उपेक्षा करता रहा है। यह बात तब समझ में आती है जब हम देखते हैं कि लगभग दो-चार वर्ष आगे-पीछे हिंदी की तीन रचनाएँ सामने आती हैं -बिना दीवारों के घर (1966) आधे-अधूरे (1969) और देवयानी का कहना है (1972)।  तीनों रचनाओं का केंद्र में स्त्री है। तीनों रचनाएँ परिवार नाम की संस्था के भीतर हो रहे उथल-पुथल को विषय बनाती हैं। इस विषय के आधार क्षेत्र में स्त्री का व्यक्तित्व, परिवार, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध तथा स्त्री अस्मिता के सवाल मुख्य रूप से विवेचित हैं। मोहन राकेश की रचना आधे-अधूरे में यह दिखाया गया है कि एकल परिवार के सभी सदस्य अपनी अंतहीन; और कभी-कभी आधारहीन महत्वाकांक्षा के कारण इस जीवन को उसकी  पूरी  विडंबना के  साथ जीने के लिए अभिशप्त हैं -इस अभिशप्त कुटुंब का हर एक  सदस्य एक दूसरे से कटा हुआ है। घर के त्रासदायक हवा से वे अपने और एक-दूसरे के लिए जहरीले हो रहे हैं। प्रसिद्ध रंग समीक्षक और नाट्यालोचक जयदेव तनेजा इस बात की सारी जिम्मेदारी स्त्री पर डाल देते हैं। उनके शब्दों में- यह आलेख एक  स्तर पर स्त्री.पुरुष के बीच के लगाव और तनाव का दस्तावेज है। महेन्द्रनाथ सावित्री से बहुत प्रेम करता है। सावित्री भी उसे चाहती रही होगी, लेकिन ब्याह के बाद महेन्द्रनाथ को बहुत निकट से जानने पर उसे  वितृष्णा होने लगी, क्योंकि जीवन से सावित्री की अपेक्षाएं बहुमुखी अनंत  हैं। अब  महेन्द्रनाथ की बेकारी की हालत में सावित्री बहुत कटु हो गयी है। एक ओर घर को चलाने का असह्य बोझ तो दूसरी ओर जिन्दगी में कुछ भी न कर पाने की तीखी कचोट। अपने बच्चों के बर्ताव से अत्यंत तिक्त हुई सावित्री बची-खुची जिन्दगी को ही एक पूरे, सम्पूर्ण पुरुष के साथ बिताने की आकांक्षा रखती है। पर यह आकांक्षा पूरी नहीं हो पाती, क्योंकि सम्पूर्ण की तलाश ही शायद वाजिब नहीं है। यानी पारिवारिक जीवन की सारी अव्यवस्था का केंद्र सावित्री की अंतहीन महत्वाकांक्षा है। महेन्द्रनाथ जो अपनी कम सूझबूझ और व्यापारिक व्यावहारिक समझ न रखने और मित्रों से धोखा खाने के बाद निष्क्रिय होकर घर बैठ जाता है, आलोचक के अनुसार वह सावित्री से प्रेम करता है और सावित्री भी शायद उसे चाहती रही होगी- कहीं से जिम्मेदार नहीं है। आलोचक का यह निष्कर्ष नाटक के पात्र पुरुष चार की तरह एक आरोपित निष्कर्ष है जब वह सावित्री से कहता है- क्योंकि तुम्हारे लिए जीने का मतलब रहा है कितना कुछ एक साथ होकर, कितना कुछ एक साथ पाकर और कितना कुछ एक साथ ओढ़कर जीना वह उतना कुछ तुम्हें किसी एक जगह न मिल पता इसीलिए जिस किसी के साथ भी जिन्दगी शुरू करती हमेशा इतनी ही खाली इतनी ही बेचैन बनी रहती।

इसी तरह रमेश बक्षी का नाटक देवयानी का कहना है, अपने बाहरी आवरण में एक बहुत क्रन्तिकारी नाटक है लेकिन सच्चाई यह है कि यह स्त्री को लेकर स्त्री के विरोध में एक बेहद प्रतिक्रियावादी नाटक है। इसमें देवयानी एक ऐसी अत्याधुनिक स्त्री चरित्र है जिसका प्यार, अपनत्व, पारिवारिक सम्बन्ध, माता-पिता, सामाजिक मान्यताएं तथा विवाह जैसी संस्था में कोई विश्वास नहीं है। उसके लिए विवाह नाम की संस्था मर चुकी है। उसका सम्पूर्ण जीवन प्रतिशोध से तय होता है। वह साधन बनर्जी से कहती है- यह सच है साधन, मुझ पर इतने सारे लोगों के इतने सारे वाक्य थोपे गए हैं कि मन में मैं उनसे बदला ले रही हूँ। उसके अनुसार जीवन में खुले असमान की तलाश करना कैद से बदला लेना है। यानी देवयानी का पूरा चरित्र एक लक्ष्यहीन प्रतिशोध है एक अतिवाद है। यह एक नाटकीय चरित्र है जिसका वास्तविक जीवन से इतना ही सम्बन्ध है कि वह एक प्रत्तिक्रियावादी पुरुष निर्मित अवास्तविक चरित्र है।  मन्नू भंडारी का नाटक इसी मायने में परिवार और स्त्री-पुरुष संबंध को एक भिन्न निगाह से देखने का प्रस्ताव करता है। इसे आज की भाषा में स्त्रीवादी दृष्टि के तौर पर देखा जा सकता है। वैसे यह बात स्पष्ट है कि हिंदी में जब बिना दीवारों के घर लिखा गया उस समय तक पारिभाषिक तौर पर स्त्रीवाद एक विमर्श के रूप में अस्तित्व नहीं रखता था लेकिन यह बात भी सच है कि स्वतंत्रता आन्दोलन ने भारतीय नागरिकों में न सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आक्रोश पैदा कर उन्हें देश की राजनीतिक अथवा बाहरी आजादी के लिए प्रेरणा दी बल्कि आतंरिक रूप से उसने अस्मिताओं के अन्दर भी  देश के भीतर मौजूद सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक जकड़बंदियों तथा शोषण और दमन के खिलाफ प्रतिरोधी संस्कृति का निर्माण किया। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण बात यह कि मन्नू भंडारी के नाटक में स्त्री अस्मिता की चिंता बिना किसी शोर-शराबे के व्यक्त होती है जो पितृसत्ता के मुकाबले किसी उच्छृंखल स्त्री सत्ता की बात नहीं करती।

 एक आरंभिक स्त्रीवाद के रूप में इसकी पहचान करते हुए हम देख सकते हैं कि यह नाटक स्त्री अस्मिता के मूल प्रश्न को उठाता है। वह मूल प्रश्न है परिवार की उस संरचना में बदलाव की मांग जिसके भीतर पितृसत्ता स्त्री जीवन की मजबूर दासता का निर्माण करता है, वह परिवार जिसे पुरुष अपनी निर्मिति मनाता है। जहाँ किसी भी पुरुष का कैसा भी चारित्रिक पतन हो जाए, उसका सामाजिक अधिकार नहीं छीना जा सकता, उसे गृह जीवन से निर्वासन नहीं किया जाता। धर्म से लेकर राजनीतिक सभी क्षेत्रों में ऊँचे-ऊँचे पदों तक पहुँचाने का मार्ग नहीं रुकता। साधारणत: महान दुराचारी पुरुष भी परम सती स्त्री के चरित्र का ही आलोचक ही नहीं, न्यायकर्ता भी बना रहता है। बल्कि स्वयं स्त्री का इस पारिवारिक संस्कृति के साथ इस तरह अनुकूलन कर दिया गया था कि धीरे-धीरे वह स्वयं अपने जख्मों को पहचानने से इंकार करने लगी थी। उसके बिना जाने ही उसका कर्तव्य पथ निश्चित हो चुका है जिस पर चलकर न उसे सफलता जनित गर्व का अनुभव होता है, न असफलता जनित ग्लानि का। वह अपनी सफलता या असफलता की छाया पुरुष की आत्मतुष्टि या असंतोष में देखने की कोशिश करती है, अपने हृदय में नहीं। बिना दीवारों के घर में मन्नू भंडारी ने इस जड़ पकड़ चुके पुरुषवादी परिवार से स्त्री की मुक्ति की बात उठाई है। आजादी के बाद से ही इस परिवार और विवाह नाम की संस्था को चुनौती मिलने लगी था। लेकिन स्त्री दृष्टि के आलोक में इसी बात को देखते हुए मन्नू भंडारी ने अलग तरह से प्रस्तुत किया। उनके नाटक की केंद्रीय चरित्र शोभा न तो परिवार के उसी घुटन भरे माहौल में खुद को कैद रखने के लिए विवश पाती है और न उसके विकल्प में किसी ऐसे जीवन की तरफ  देखती है जो मनुष्य के सामाजिक होने के किसी विकल्प को ही धत्ता बताते हुए भस्मासुर की तरह आत्मध्वंस का शिकार हो जाए, बल्कि शोभा पितृसत्तात्मक समाज की उस पुरुषवादी सोच का विरोध करती है जिसमें विवाह और परिवार नाम की संस्था स्त्री के लिए एक कैदखाने में बदलने लगता है। 1884 ई. में एंगेल्स ने परंपरागत परिवार नाम की संस्था की इसी विशेषता की ओर इंगित करते हुए लिखा था- दरअसल परिवार पुरुषों के लिए महिलाओं को समर्पित मशीन के रूप में तब्दील कर देता है और उन्हीं महिलाओं के बलिदान से पुरुषों का कीर्ति स्तम्भ खड़ा होता है। ऐसा परिवार कोई अनिवार्य या शाश्वत संस्था नहीं। बिना दीवारों के घर नाटक स्त्री द्वारा इसी तरह के घर को घर मानने से इंकार करता है।

इस नाटक में शोभा और अजित दो केंद्रीय चरित्र हैं। जयंत अजित का मित्र है। जीजी अजित की बड़ी बहन। अजित इस अर्थ में जागरुक है कि उसके मित्र जयंत की पत्नी अगर ग्रेजुएट है तो उसकी पत्नी को भी ग्रेजुएट होना चाहिए। लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए। उसकी पत्नी पढ़ लिख कर स्वावलंबी बनती है। नौकरी करने लगती है। ऐसे में पति पत्नी के बीच जिम्मेदारी बंट जानी चाहिए। अजित इससे खुश नहीं है। उसे लगता है कि वह नौकरी करता है इतना काफी है। उसकी पत्नी शोभा को परिवार के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी उठानी चाहिए दूसरे शब्दों में उसे घर बैठना चाहिए। उसकी कम पढ़ी-लिखी जीजी इस बात का प्रतिवाद करते हुए समझाती हैं। अब केवल नौकरी करने से घर नहीं चलताए समझे। वे जमाने गए अजित, जब आदमी ने नौकरी कर ली और औरत ने घर का सारा काम कर लिया। अब जब औरत भी नौकरी करने लगी है तो मर्द को भी घर के काम में हाथ बंटाना पड़ेगा। लेकिन एक पुरुष के रूप में अजित की साफ  और सपाट प्रतिक्रिया है- कौन कहता है औरत से कि नौकरी करे। छोड़ दे नौकरी। अब उसकी नौकरी के पीछे यह तो होगा नहीं कि पति, बच्चे, घर सब बेचारे मारे मारे फिरें। बदलते समय की यह मांग है कि स्त्री पुरुष मिलकर परिवार रूपी संस्था को संभाले। इसलिए नहीं कि औरत नौकरी करने लगी है बल्कि इसलिए कि स्त्री की वैयक्तिक, सामाजिक भूमिका बदल रही है। वह माँ होने से पहले एक स्त्री भी है। माँ या पत्नी होने को वह अपने व्यक्तित्व का एक मात्र पहलू नहीं मानना चाहती। मातृत्व उसके व्यक्तित्व के विस्तार की बाधा नहीं बन सकती।

समाज व्यवस्था में होने वाले तमाम परिवर्तनों के बावजूद आधुनिकता और लोकतांत्रिक समाज होने के सभी तरह के दावों के विपरीत अजित जैसे आधुनिक पढ़े-लिखे नौकरीपेशा पुरुष भी इस अहम से मुक्त नहीं हुए कि स्त्री उनकी निर्मिती है। वह अपनी जीजी से कहता है- शोभा को मैं खूब अच्छी तरह जानता हूँ। खूब अच्छी तरह। अरे, वह है ही -अजित मेड। अपनी बनाई चीज़ को भी नहीं पहचानूँगा भला। जीजी के बार-बार यह कहने और समझाने के बावजूद कि शोभा अब पढ़ लिख गयी है। स्वावलंबी है। उसके साथ तुम्हारा वही व्यवहार अब नहीं चलेगा जो दस साल पहले था। अजित पर जीजी के इन सुझावों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह कहता है- कैसी बातें करती हैं जीजी आप भी! व्यवहार तो मेरा वही रहेगा, चाहे वह मास्टरनी हो जाए, चाहे लाट साहब। सभी बातों को जानते समझते हुए भी अजित के व्यक्तित्व में मौजूद यह अकड़ सदियों से चले आ रहे पुरुष समाज का वह अडिय़ल व्यक्तित्व है जो यह मानता रहा है कि स्त्री पुरुष के सामने तुच्छ है। पुरुष के समानांतर कोई पुरुष तो हो सकता है स्त्री तो बिल्कुल नहीं।

पुरुष के रूप में अजित की घर की समझ अजीब है। वह जब भी घर का जिक्र करता है उसमें जीजी हैं, उसकी बेटी है और वह खुद है जिसका ख्याल उसकी पत्नी शोभा जैसी स्त्री नहीं रख पाती है। उसकी जुबान पर यह बात कभी ही नहीं आती कि उसी घर में शोभा भी है जिसकी अपनी कोई परेशानी हो सकती है। शोभा घर में सबका ख्याल रखे लेकिन शोभा का ख्याल कोई रख सकता है यह उसके लिए चिंता का विषय नहीं है। यहाँ शोभा के माध्यम से मन्नू भंडारी एक स्त्री और स्त्री लेखिका के रूप में आधुनिक भारतीय घर अथवा परिवार की परिकल्पना में इन सारी बातों को शामिल करने पर बल देती हैं। यह उनका स्त्रीवादी लेखकीय सरोकार है जो बार-बार परिवार की परंपरागत समझ के सामने अपनी आपत्ति दर्ज करता है।

वैसे तो समाज में सामान्य प्रचलित और आरोपित समझ यही है कि घर टूटने के पीछे स्त्रियों का हाथ होता है लेकिन इस नाटक में एक तरफ स्त्री पात्र हैं शोभा और जीजी, जो घर को घर बनाए रखना चाहती हैं और किसी भी बिंदु पर उसे बिखरने नहीं देना चाहतीं। दूसरी तरफ  पुरुष पात्र हैं-अजित और जयंत। जो अपने अहम के सामने आधुनिक घर होने के सारे तर्क को खारिज कर देते हैं। शोभा और जीजी की तमाम कोशिशों के बावजूद जब अजित अपने वहम और अहंकार से बाहर नहीं निकलता, शोभा के स्वाभिमान पर लगातार चोट करता ही रहता है, ऐसे में शोभा अपने स्त्री होने के स्वाभिमान की रक्षा करने को मजबूर होती है। एक सचेत लेखिका के रूप में मन्नू भंडारी ने न परंपरागत सोच को जगह दी और न मोहन राकेश और रमेश बक्षी की तरह क्रमश: यथास्थितिवाद और प्रतिक्रियावाद को महत्व दिया। उन्होंने प्रगतिशील सोच के तहत भविष्य की तरफ  देखा। स्त्री की उस रूढ़ छवि को भी बदल कर रख दिया जो मातृत्व की जंजीर में उलझ कर अपने अस्तित्व को ही समूल समर्पित कर देती थी। शोभा स्त्री अस्मिता को समूल निगल जाने वाली उस सोच समझ और मूल्य का प्रतिवाद करती है और अजित द्वारा अपने अहंकार से बुने हुए जाल को काटते हुए कहती है- ठीक है, तो मैं अकेली ही चली जाऊंगी। जहाँ मैंने अपने भीतर की पत्नी को मारा है। वहीं अपने भीतर की माँ को भी मार दूंगी। शोभा का यह संकल्प स्त्री का आत्म-संकल्प है जो परिवार और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की नयी संकल्पना करने पर बल देता है। यह स्त्री के खुद के होने की पहचान है। पहचानहीन स्त्री एक पहचानहीन स्त्री नागरिकता को ही जन्म दे सकती है जिसका भारत सदियों से शिकार रहा है। मन्नू भंडारी के अनुसार स्त्री की आत्मपहचान और खुद की अस्मिता के प्रति के सचेतन दृष्टि ही एक नए घर की नींव रख सकती है जिसमें झूठी रुढिय़ों, झूठे मूल्यों, मर्यादाओं और अहंकार रूपी दीवारें नहीं होंगी। हिंदी नाट्य आलोचना ने स्त्रीवादी सोच से युक्त इस नाट्य रचना को महत्व नहीं दिया। उसका मूल्यांकन विश्लेषण नहीं किया।

संदर्भ

जॉन स्टोरी एकल्चरल थियरीएंड पॉपुलर कल्चर, पृ 78,

विमर्श के बारे में कुछ बातें, वाक अंक.3, सं.सुधीश पचौरी पृ.229

क्रिस बार्कर ए कल्चरल स्टडीज: थियरीज एंड प्रैक्टिस ;पृ.101-102,

सुरंजिना रे, नारीवादी राजनीति, पृ. 49

निर्मला जैन, महादेवी साहित्य समग्र पृ.24

आधे-अधूरे की भूमिका से उद्धृत, मोहन राकेश, भूमिका लेखक-जयदेव तनेजा पृ.18

आधे-अधूरे मोहन राकेश, पृ.114

देवयानी का कहना है, रमेश बक्षी, पृ.126 

महादेवी साहित्य समग्र, निर्मला जैन, पृ .72

स्त्रीलिंग निर्माण, मल्लिका सेनगुप्त, पृ.69

बिना दीवारों के घर, मन्नू भण्डारी, पृ. 24

वही, पृ .25

वही, पृ.36

वही पृ.100