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Wednesday 23 Oct 2019

साहित्य की कसौटी पर हिन्दी सिनेमा के गीत

हिन्दी सिनेमा के गीत हिन्दी साहित्य और आलोचना की दुनिया में चिर वर्जित रहे हैं। इन गीतों की हिन्दी साहित्य के इतिहासों में एकाध अपवाद को छोड़ दें तो कहीं चर्चा तक नहीं मिलती है। मतलब साफ है कि सिनेमा के इन गीतों को साहित्य नहीं समझा जाता जबकि 'गीत’ साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है। यानी यह एक सामान्य समझ रही है कि यदि कोई गीत सिनेमा के लिए नहीं लिखा गया हो तो वह साहित्य है, लेकिन सिनेमा का हिस्सा बनते ही वह साहित्य नहीं रह जाता! यह एक अतार्किक और अवैज्ञानिक धारणा है। दरअसल हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक मूल्यांकन में यह बात बाधा नहीं बन सकती कि ये गीत किसी साहित्यिक पत्रिका या संकलन में प्रकाशित नहीं हुए हैं, बल्कि सिनेमा के लिए लिखे गये हैं।

रचनाओं के 'साहित्यिक महत्व’ पर विचार करने की एक सुदीर्घ आलोचकीय परंपरा रही है। किसी भी कृति के साहित्यिक महत्व के मानदंड क्या होने चाहिए इस पर भारतीय और पाश्चात्य, आधुनिक और प्राचीन विद्वानों ने गंभीरतापूर्वक विचार किया है। इन विचारों का अध्ययन विश्लेषण करते हुए इनमें निहित साहित्यिक मूल्यांकन के मानदंड चिह्नित किये जा सकते हैं।

भारतीय काव्यशास्त्र एवं सिनेमा के गीत

साहित्य को काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ आचार्यों ने विविध रूपों में परिभाषित किया है। भारतीय काव्यशास्त्र के पुरोधा माने जाने वाले भरतमुनि ने रस को ही काव्य की आत्मा कहा  है। अर्थात रस की प्रतीति ही काव्य का मूल ध्येय है। रस की इस कल्पना को इस तरह समझा जा सकता है कि यदि किसी नाटक के दौरान मंच पर प्रणय का दृश्य दिखाया जाए तो सहृदय के मन में संयोग श्रृंगार रस की उत्पति होगी, युद्ध का दृश्य दिखाया जाए तो रौद्र और वीर रस की उत्पत्ति होगी। भरतमुनि का यह रस सिद्धांत जिसे साहित्य की भी कसौटी माना जाता है, सिनेमा के गीतों पर भी लागू होता है। उदाहरण के लिए किसी प्रेम गीत को सुनते हुए जैसे -बड़े अच्छे लगते हैं ये धरती, ये नदिया ये रैना और तुम , किसी सहृदयश्रोता के मन में श्रृंगार रस की उत्त्पत्ति होगी।

वहीं किसी मार्मिक गीत, जैसे वहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहाँ ,को सुनकर करूण रस की उत्त्पत्ति होगी ।

इसी तरह संस्कृत काव्यशास्त्र के विभिन्न सम्प्रदायों (अलंकार, ध्वनि, रीति आदि) के विभिन्न आचार्यों के काव्य सम्बन्धी मतों और सिद्धांतों को कसौटी मानते हुए हम किसी भी कथित साहित्यिक रचना की तरह हिन्दी सिनेमा के गीतों की साहित्यिकता का भी परीक्षण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अलंकार सम्प्रदाय के आचार्य भामह के मत 'शब्दार्थो सहितौ काव्यं' अर्थात 'शब्द और अर्थ मिलकर काव्य होता है’ की कसौटी पर सिनेमा के किसी भी गीत को रखकर परखा जा सकता है। कुछ अपवादों को छोड़कर सिनेमा के गीतकारों ने हमेशा अपने शब्दों से अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति का ही प्रयास किया है। उदाहरण के लिए गीत तोरा मन दर्पण कहलाये, के शब्द और अर्थ मिलकर इतने प्रभावी हैं कि यह हमें आत्मालोचन की प्रेरणा देते हैं।

पाश्चात्य काव्यशास्त्र एवं सिनेमा के गीत

अरस्तु के अनुसार काव्य, भाषा के माध्यम से अनुभूति और कल्पना द्वारा जीवन का पुनर्सृजन है। यदि यह विशेषता काव्य में होती है, तो हिन्दी सिनेमा के गीतों में इसके नहीं होने के कोई कारण नहीं हैं। यदि जीवन के पुनर्सृजन का अर्थ जीवन के दृश्यों, घटनाओं आदि की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण किया जाए तो हिन्दी सिनेमा के गीतों से सैकड़ों उदाहरण मिल सकते हैं। उमराव जान फिल्म के एक गीत जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने, का उदाहरण लें, तो इस बात को समझा जा सकता है कि इस एक गीत में एक ऐसी स्त्री के जीवन की घटनाएँ और उसकी वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है, जिसे बचपन में ही एक कोठे पर पहुँचा दिया जाता है।

कालॅरिज ने 'कविता को उत्मोत्तम क्रम विधान’ कहा है। कारलायल ने 'कविता को संगीतमय विचार' घोषित किया है। हडसन ने कविता को परिभाषित करते हुए उसे कल्पना और भावना के द्वारा जीवन की व्याख्या करने वाली बताया है' शैली मानते हैं कि 'काव्य या साहित्य सर्वाधिक सुखी एवं श्रेष्ठतम हृदयों, श्रेष्ठतम क्षणों का लेखा-जोखा है' मिल्टन का कहना है- कविता को सदा प्रत्यक्षमूलक और रागात्मक होना चाहिए।

हिन्दी सिनेमा के गीतों को जब इन सभी कसौटियों पर कसा जाए तो वे खरे उतरते हैं। दरअसल साहित्य को लेकर भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र की जो अवधारणा है, वह शिल्प और कथ्य दोनों ही स्तरों पर हिन्दी सिनेमा के गीतों पर भी लागू होती है।

आधुनिक साहित्यिक आलोचना एवं सिनेमा के गीत

काव्य का स्वरुप आधुनिक युग तक आते-आते नए भावबोध और नए रूपाकार ग्रहण करने  लगा था। इससे काव्य की परिभाषा और उसके उद्देश्यों में भी परिवर्तन होने लगा था।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है- जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। शुक्ल जी की यह धारणा भी रस प्रतीति के विधान की ओर ही संकेत करती है, यानी कविता की ऐसी प्रभावी क्षमता की ओर जो हृदय को कम से कम कुछ क्षणों के लिए मुक्त कर रसग्राही बना दे, या सहृदय बना दे। 'नाम’ फिल्म के गीत 'चि_ी आयी है, वतन से चि_ी आयी है’ का जि़क्र इस रूप में भी होता है कि अधिकांश प्रवासी भारतीय इस गीत को सुनकर रो पड़ते हैं। इसी तरह का असर 'तीसरी क़सम’ के एक गीत- सजनवा बैरी हो गये हमार को सुनकर होता है। यह हृदय की उस मुक्तावस्था का ही प्रमाण है, जिसका शुक्ल जी ने उल्लेख किया है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कविता के विषय में विचार करते हुए लिखा है कि कविता उस आनंद का प्रकाश है जो प्रयोजन की संकीर्ण सीमा के अतिरिक्त होता है। वह प्रयोजन को छोड़कर नहीं रह सकता, पर प्रयोजन के अतिरिक्त है। इसका अर्थ यह हुआ कि कविता प्रयोजनविहीन नहीं होती, बल्कि वह सोद्देश्य होती है और कई बार इसका उद्देश्य इतना व्यापक और इतना उदात्त हो जाता है कि उसे किसी सीमा में बाँधना कठिन हो जाता है। यह गुण हिन्दी सिनेमा के गीतों में भी लक्षित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए फिल्म 'तीसरी कसम’ के एक गीत सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है का उल्लेख किया जा सकता है। इस गीत का पहला प्रयोजन इस रूप में लक्षित किया जा सकता है कि यह मनुष्यों के सही और ईमानदार आचरण की आवश्यकता पर बल देता है, जो कि इसका लौकिक पक्ष है। वहीं यह गीत तमाम सीमाओं से परे इस आचरण की उस अलौकिक परिणति की बात करता है, जो अज्ञात है ।

कविता के मूल्यांकन के मानदंड के विषय में अज्ञेय कहते हैं कि- कविता के मानदंड शाश्वत या आत्यंतिक नहीं हो सकते। नए समय की कविता को पहचानने के लिए नए मानदंड आवश्यक हैं और यह मानदंड समय विशेष की कविता में ही खोजे जा सकते हैं। क्योंकि कविता अपना मानदंड स्वयं होती है। प्रत्येक गीत अथवा कविता जो अभिव्यक्त करना चाह रहा है, वह कितना सफल और सार्थक है, किसी कविता के विश्लेषण का यह स्वयं ही मानदंड है। हिन्दी सिनेमा के गीतों से उदाहरण लें तो प्रेम को लेकर लिखे गये एक चलताऊ गीत जैसे- चलो इश्क लड़ाएं चलो इश्क लड़ाए के बरक्स प्रेम की अभिव्यक्ति के ही एक गीत- जिन्दगी की न टूटे लड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी को रख कर देखा जा सकता है। अभिव्यक्ति की सफलता और सार्थकता सिनेमा के गीतों के भी मूल्यांकन के आधार हैं और इस आधार पर इनका साहित्यिक मूल्यांकन किये जाने की आवश्यकता है।

नामवर सिंह ने अपनी किताब 'कविता के नये प्रतिमान’ में 'रस के प्रतिमान की प्रसंगानुकूलता’ शीर्षक लेख में लिखा है - माना कि काव्य में अनुभूति की प्रधानता होती है और काव्य सर्वप्रथम अनुभूति का ही विषय है, किंतु यह काव्यानुभूति यदि गूँगे का गुड़ नहीं है तो इसे विवक्षित करने के लिए शब्दार्थ-मीमांसा के 'बौद्धिक’ व्यापार के श्रमसाध्य पथ से गुजरना ही पड़ेगा। नामवर सिंह ने शब्दार्थ मीमांसा के जिस श्रमसाध्य पथ का उल्लेख किया है, हिन्दी सिनेमा के गीत उस पथ पर परीक्षा के लिए भी पूरी तरह उपयुक्तहैं। हिन्दी सिनेमा के कई गीतों की पहचान उनके गहन अर्थों के कारण ही बनी। उदाहरण के लिए 'मेरा नाम जोकर’ के एक गीत -जीना यहाँ मरना यहाँ/ इसके सिवा जाना कहाँ और  'अनोखी रात' के एक गीत-ओह रे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में / सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना सहित कई गीतों का उल्लेख किया जा सकता है ।

कुछ आलोचकों के मतों का उल्लेख और उनके आधार पर हिन्दी सिनेमा के कुछ गीतों का जो यहाँ परीक्षण किया गया है, उसे एक नमूने के बतौर ग्रहण किया जाना चाहिए। यह हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व के आंकलन की पद्धति की ओर संकेत मात्र है। विभिन्न आलोचकों के साहित्यिक मूल्यांकन सम्बंधी सभी मतों का इस लघु शोध आलेख में उल्लेख कर पाना संभव नहीं है। विश्वासपूर्वक यह ज़रूर कहा जा सकता है कि साहित्यिक मूल्यांकन सम्बंधी जितने भी तार्किक मत हैं, हिन्दी सिनेमा के गीतों का उस आधार पर मूल्यांकन करने की चेष्टा सकारात्मक परिणाम देने वाली ही होगी ।

प्रसंगवश यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि हिन्दी साहित्य और स्वाभाविक रूप से, हिन्दी कविता ने समय के साथ जिस तरह से अपना स्वरूप बदला है, हिन्दी सिनेमा और स्वाभाविक रूप से उसके गीतों में भी यह परिवर्तन साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि गुलज़ार के हिन्दी सिनेमा के लिए लिखे गीतों के समय के साथ बदलते स्वरूप पर विचार किया जाए, तो भी इस बात की पुष्टि हो सकती है। हिन्दी सिनेमा के अधिकांश नये गीतकार, नये भावबोध और नये शिल्प से लैस हैं और लगातार नये प्रयोग भी कर रहे हैं। इन गीतकारों में प्रसून जोशी, स्वानंद किरकिरे, वरुण ग्रोवर सहित कई नाम लिये जा सकते हैं।

हिन्दी सिनेमा के गीतों की साहित्यिक विशिष्टताएँ

सिनेमा के गीतों का केन्द्रीय विषय प्रेम रहा है। निस्संदेह प्रेम समाज की रूढि़वादी संरचना के प्रति विद्रोह है । तब जबकि इस दौर में भी प्रेम करना दुष्कर है, दशकों पूर्व हिन्दी सिनेमा के गीत प्रेम करने का साहस भरने का प्रयास कर रहे थे। इस तरह सिनेमा के गीत समय और समाज  के अवरोधों से जूझने का प्रयास कर रहे थे। संयोग और वियोग की स्थितियों पर जयदेव से लेकर विद्यापति, तुलसीदास, सूरदास, मीरा, रीतिकालीन कवियों ने पद्य रचनाएँ की हैं। आधुनिक कवियों महादेवी, निराला, प्रसाद, पन्त, बच्चन, अज्ञेय, नागार्जुन आदि की रचनाओं में भी प्रेम में मिलन और विरह की स्थितियों की मुखर उपस्थिति रही है। इन रचनाओं को तो उच्च कोटि के साहित्य का दर्जा दिया जाता है लेकिन अदम्य प्रेम की अभिव्यक्ति करते, शिल्प में भी बेजोड़ गीतों को तवज्जो नहीं दी जाती है। यह कहकर कि ऐसे गीत बाजार की मांग पर लिखे जाते हैं, इन गीतों के मूल्यांकन से नहीं बचा जा सकता। सिनेमा एक व्यावसायिक माध्यम है, और इसके बहुत सारे गीत केवल मनोरंजन और व्यावसायिक हितों को ध्यान में रख कर लिखे जाते हैं। लेकिन ऐसे गीतों की भी संख्या कम नहीं है, जिन गीतों ने जनता में वैचारिक उत्तेजना, संवेदनशीलता और जागरूकता का संचार करने का प्रयास किया है।

हिन्दी सिनेमा के गीतों को यह कहकर भी साहित्य की दुनिया में नकारा जाता रहा है कि ये गीत सिनेमा की किसी स्थिति विशेष के अनुकूल लिखे जाते हैं। यानी सिनेमा के गीतकारों को पर्याप्त रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं मिलती। आलोचक मैनेजर पांडेय ने भी ऐसी ही धारणा अपने एक साक्षात्कार में व्यक्त की है। हम जानते हैं कि तमाम रासो ग्रंथ राजाओं की प्रशस्तियों से भरे होते थे। यानी उनके समक्ष एक ही स्थिति थी, वह थी राजा की प्रशस्ति करने की स्थिति, जिसके लिए रचना उद्यम करना था। यद्यपि उनमें से बहुत से ग्रंथ अप्रामाणिक हैं, लेकिन फिर भी वे सब साहित्य की कोटि में आते हैं। इसी प्रकार अपवादों को छोड़कर संपूर्ण रीतिकालीन साहित्य भी आश्रयदाता राजाओं की अभिरूचियों को ही केंद्र में रखकर रचा गया है। भक्तिकालीन कवियों ने भी लोकमानस में बसी कथाओं को अपनी कल्पना से नवीन रूप दिया। तुलसीदास कृत रामचरितमानस हिन्दी साहित्य का प्रमुख महाकाव्य है, इसकी रचना भी तुलसीदास ने राम के जीवन को ही आधार बनाकर की। यानी राम और उनसे जुड़ी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ बहुत हद तक पहले से तय थी, शेष तुलसी का कौशल और उनकी कल्पना थी, जिसके कारण रामचरित मानस, वाल्मीकि के रामायण से अलग व्यक्तित्व रखता है। इस तरह हिन्दी सिनेमा के गीतकार भी तुलसी की परंपरा के माने जा सकते हैं। यहाँ इस बात का उल्लेख भी आवश्यक है कि हिन्दी सिनेमा ने गीतकारों की स्वतंत्र रचनाओं का भी प्रसंगानुकूल उपयोग किया है।

गीतों ने साम्प्रदायिकता, हिन्दी-उर्दू विवाद, वर्ण-व्यवस्था, जाति-प्रथा, स्त्री-पुरुष असमानता, सामाजिक कुरीतियों, व्यवस्था की खामियों आदि सभी को अपने दायरे में समेटते हुए विविधोन्मुखी विकास किया है। देश की शिक्षित-अशिक्षित जनता को प्रभावित करने का अभूतपूर्व कार्य किया है। सिनेमा के गीत जन-आंदोलनों का हिस्सा बने, हमारे उत्सवों-त्योहारों की शान बने, सभाओं-गोष्ठियों में गाये जाने लगे, प्रार्थना गीतों और भजनों का स्थान भी इन्हीं गीतों ने ले लिया। आज स्थिति यह है कि सिनेमा के यह गीत भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं, जिनके बिना भारतीय संस्कृति तथा समाज का अध्ययन भी संभव नहीं है।

हिन्दी सिनेमा के गीत उच्च कोटि की माने जाने वाली साहित्यिक रचनाओं की अपेक्षा लोगों के अधिक करीब हैं। अपने सुख, दुख, प्रेम जैसे भावों की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें सिनेमा के गीतों का सहारा लेना पसंद है। इन गीतों की सहज-सरल भाषा और भावों ने लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाया है। साहित्यिक रचनाओं पर कथित साहित्यिकता का दबाव उसे क्लिष्ट और जटिल बनाता रहा है, इसलिए ये रचनाएँ लोगों के दिलों में जगह बना पाने में प्राय: असफल रही हैं।

साहित्य की तरह सिनेमा भी अपनी प्राणशक्ति समाज से प्राप्त करता है। हिन्दी सिनेमा में समय और समाज की प्रभावी और सार्थक अभिव्यक्ति होती रही है। इसलिए स्वाभाविक है कि सिनेमा के गीत भी समाज को प्रतिबिंबित करते रहे हैं। फिल्म 'प्यासाÓ के एक गीत 'जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं’  में समाज के यथार्थ की इतनी मार्मिक और प्रभावी अभिव्यक्ति हुई है कि, वह किसी भी साहित्यकार के लिए काम्य होगा।

यह कहा जा सकता है कि साहित्य के वास्तविक उद्देश्य को गीतों ने तथाकथित साहित्यिक पद्य रचनाओं की अपेक्षा अधिक गंभीरता से ग्रहण किया है। सिनेमा के लिए बहुत से फूहड़ और अर्थहीन गीत भी लिखे जाते रहे हैं, लेकिन इन गीतों के आधार पर हिन्दी सिनेमा के गीतों की पूरी परंपरा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। बेहतर का अभाव प्राय: हर क्षेत्र में होता है।

हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्त्व को नकारने के पीछे समुचित तर्कों का अभाव रहा है। दरअसल साहित्य से जुड़े लोगों में सिनेमा के प्रति उपेक्षा का ही नहीं घृणा का भाव भी रहा है। सिनेमा और उससे सम्बद्ध लोगों को लेकर जो ग़लत धारणाएँ साहित्य से सम्बद्ध लोगों के मन में रहीं, उसका बहुत अधिक असर सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन पर पड़ता रहा है ।

हिन्दी साहित्य के आलोचकों का ध्यान यदि हिन्दी सिनेमा के बेहतर गीतों की तरफ जा पाए और वे साहित्य के प्रति शुद्धतावादी दृष्टिकोण को त्याग कर इस ओर भी ध्यान दे पाएँ, तो हिन्दी सिनेमा के गीत साहित्य की समृद्धि में ही सहायक होंगे। साहित्यिक आलोचना का विषय होने पर संभव है, कि इन गीतों का स्वरूप और अधिक निखरकर सामने आए।

संदर्भ सूची

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