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Wednesday 17 Jul 2019

नर्मदा : कटता जंगल, घोर अमंगल

मांरेवा...तेरा पानी निर्मल...कल कल बहतो जाए रे...! इंडियन ओसियन का यह गाना सुनते ही रेवा की निर्मल और कल—कल धार मेरे भीतर बहने लगी है। रेवा यानी नर्मदा की यह धार असल में मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है, जो महाराष्ट्र, गुजरात से गुजरते हुए करोड़ों जन का भाग्य भी तय करती है। लेकिन, आज 20 मार्च, 2011 को जब मैं अकेले ही दिल्ली के लक्ष्मीनगर से ऑटो में निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन की ओर जा रहा हूं तो बीते आठ दिनों के शोध के बाद मेरे मन में अथाह पानी के भीतर सदियों से समाए काले पत्थर अपना पूरा पत्थरपन लिए उभर रहे हैं। दिल्ली से बहुत दूर जब अपनी जड़ों की ओर लौट रहा हूं तो सप्रयास इस गीत को गुनगुना रहा हूं और अपने बचपन की नदी के बारे में यह सोचकर डर भी रहा हूं कि नदी की यह निर्मल, कल—कल धार कहीं इन सुरों में ही दर्ज होकर न रह जाए!

सोच रहा हूं, वाशिंगटन डीसी के वल्र्ड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट पढऩे के बाद और दिमाग में चल भी क्या जा सकता है! यह रिपोर्ट नर्मदा को दुनिया की छह सबसे संकटग्रस्त नदियों में शामिल बता रही है। नर्मदा बनी ही जंगलों से है और यह अब तक बची भी रही है तो इसलिए कि एक ओर सतपुड़ा तो दूसरी ओर विंध्याचल की पर्वतमालाओं ने इसे काफी हद तक ढका हुआ था। लेकिन, आठ दिनों के भीतर मैंने जाना कि इन पर्वतमालाओं में जंगलों की लगातार कटाई ने नर्मदा के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जब कभी महीने भर बाद दिल्ली लौटता हूं तो शहर का नक्शा बदला हुआ लगता है। उधर, तो क्या बीस दशक में नर्मदा तट का भूगोल जितना नहीं बदला था उतना बीस साल में बदल गया है! फिर ऑटो के बाहर दिल्ली की सड़क देखता हूं, विकास मार्ग पर बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल के शोध का सार याद दिलाता है कि नर्मदा का तटीय इलाका कभी एक हजार मीटर तक चौड़ा हुआ करता था, जो घटकर किनारों से सट गया है। विकास का मार्ग यहां भी चौड़ा है और वहां भी। इतना चौड़ा है कि बड़े बांधों और खुदाई की बड़ी मशीनों ने नर्मदा का सैकड़ों मील लंबा तट लील लिया है। चौंसठ हजार साल में जितना जंगल नहीं कटा था उतना आजादी के चौंसठ साल में कट गया है। मैंने केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट हासिल की तो मालूम हुआ कि नर्मदा में उसकी क्षमता का आधा ही जलभराव हो पाता है और वह भी लगातार घटता जा रहा है।    

प्रगति मैदान पहुंचते ही तो मन में आया कि नर्मदा बहेगी तभी तो रहेगी! लेकिन पांच बड़े बांधों से इसका जल बहना बंद हो गया है। फिर भी यह जिंदा है, लेकिन मैंने सरकारी घोषणाओं से जाना कि सरकार जबलपुर से नरसिंहपुर के बीच किनारे-किनारे झुंड के झुंड कोयले वाले बिजलीघर बनाने जा रही है। लगा कि इसकी मौत तय है। बिजलीघर नदी को तो चूसेंगे ही, बदले में छोड़ी जाने वाली राख से उसे खाक भी कर देंगे। फिर जबलपुर के भूकंप केंद्र कोसमघाट से चालीस किलोमीटर दूर चुटका में बनने वाले परमाणु बिजलीघर ने मुझे कंपा दिया। यह कभी जापान जैसा हादसा न दोहराए तो भी अपने विकिरणयुक्त जल से नर्मदा में जहर तो भर ही सकता है!

इन आठ दिनों में मुझे पुणे विश्वविद्यालय का नौ साल पुराना अध्ययन हासिल हुआ है। इसने बताया कि व्यापक स्तर पर मौसम के बदलाव से नर्मदा घाटी की जल उपलब्धता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। इससे छोटे-छोटे अंतराल में कभी प्रलयकारी बाढ़ तो कभी भयावह सूखा पड़ेगा। गई शताब्दी के शुरूआती पचास साल के मुकाबले गुजरे साठ साल में विकराल बाढ़ की आवृत्ति में तेजी से बढ़ोतरी आई है। मैंने आईआईटी, नई दिल्ली का छह साल पुराना अध्ययन ढूंढ निकाला था। इसकी मानें तो ग्रीन हाऊस गैसों का प्रभाव बढऩे से बरसात और नर्मदा के जल की उपलब्धता में खासी कमी आएगी। भारतीय मानक संस्थान की रिपोर्ट हाथ लगी तो जाना कि नर्मदा का पीएच स्तर 9.02 हो गया है। आंकड़े के नंबरों से यही जोड़ लगा पाया हूं कि नर्मदा में प्रदूषण अपने खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। 

उफ! मथुरा रोड से होकर स्टेशन के बाहर उतरता हूं और ऑटो वाले को किराया देकर स्टेशन में दाखिल होता हूं। यहां बहुत सारी ट्रेनों और भीड़ को देख मेरे जेहन में अकेले इंदौर की आद्यौगिकपट्टी पर ही तेरह सौ से अधिक इकाइयों के प्रदूषण मानकों को धुएं में उड़ाने वाली तस्वीर आती है। फिर यह बात भी कि गंगा का जहरीलापन देखकर सरकार कह चुकी है वह गंगा के किनारों पर कोई उद्योग नहीं लगाएगी। नर्मदा के बारे में राज्य सरकार ऐसा क्यों नहीं सोचती है! क्या कुछ साल बाद गंगा प्रदूषण बोर्ड की तरह नर्मदा के लिए भी कोई प्रदूषण बोर्ड बनाने की योजना चल रही है?

मैं जब सीढिय़ों से नीचे प्लेटफार्म पहुंच चुका होता हूं तो मुझे चलती रेल की आवाजों में नर्मदा की चीत्कार सुनाई देती है, बोगियों में एक परिदृश्य दिखाई देता है जिसमें कुछ बच्चे ही अपनी मां की हत्या करने पर आमादा हैं। लेकिन, इस चीत्कार में भी मुसीबतों की फिक्र अधिक है, जो उसकी करोड़ों संतानों पर तब आ सकती है जब नर्मदा का ममतामयी आंचल उनके सिर पर न रहेगा। और फिर तेजी से गुजरती दो ट्रेनों के बीच एक अंतराल बाद मैं हूं...

—20 मार्च, 2011 को आज शाम छह बजे निजामुदृदीन—जबलपुर एक्सप्रेस से नर्मदा की यात्रा के पहले की यात्रा पर। साइट की लोअर सीट।

—समय कोई बीस दिन। लेकिन, वापसी का टिकट नहीं। इस दौरान नदी के कोई छह सौ किलोमीटर मार्ग से नदी के मुख्य स्थानों तक पहुंचने का लक्ष्य।

—जबलपुर के बाद की यात्रा की कोई तैयारी नहीं। कहीं रेल, बस, दो पहिया, चार पहिया, पैदल और नाव से जाना पड़ सकता है।

—यह मार्च के आखिरी दिनों का समय है तो धूप होगी ही। हैंडबेग में गमछा, तांबे की बोतल, मोबाइल—चार्जर, नर्मदा पर फैक्ट—शीट, अखबार की कतरनें, मिनी लैपटॉप और कपड़े वगैरह।

—साथ ही जबलपुर, अमरकंटक, डिडौंरी, मंडला, चुटका, नरसिंहपुर, पिपरिया, होशंगाबाद और केसला में परिचितों की संपर्क—सूची।

—सूची में आम लोग, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, अफसर, साहित्यकार, फोटोग्राफर, शोधकर्ता, अधिवक्ता, स्कूल के मित्र और रिश्तेदार आदि के नाम। यह जानते हुए कि इनमें से कुछ ही काम आएंगे।

दिल्ली से जबलपुर की यह पंद्रह घंटे लंबी मेरी पहली यात्रा है, लेकिन यात्राएं मेरे लिए दिनचर्या—सी हो गई हैं, इसलिए एक हजार किलोमीटर की दूरी भी नजदीक ही लग रही है। जबलपुर नर्मदा के किनारे का सबसे बड़ा शहर है, जो नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से कोई ढाई सौ किलामीटर दूर है।

एक वह दौर भी था जब बारहवीं पास होने तक मैंने जबलपुर देखा नहीं था और नेशनल हाइवे—बारह पर भोपाल के विपरीत मेरे गांव मदनपुर से सवा सौ किलोमीटर दूर होने के बावजूद जबलपुर मुझे एक दूसरी दुनिया की तरह बहुत दूर लगता था। लेकिन, उस समय दिल्ली से जबलपुर की ट्रेन पर सवार खटर, खटर, खटर, खटर के बीच मैं यात्रा में होकर भी यात्रा में शामिल महसूस नहीं कर पा रहा हूं। दरअसल, मुझे पता है कि मेरे भीतर की नदी जबलपुर आने के बाद ही हिलोरें मारना शुरू करेंगी और नर्मदा के प्रति मेरा पुराना राग जबलपुर पहुंचकर भेड़ाघाट का धुंआधार बन जाएगा। नर्मदा के कई घाट मेरे लिए अपरिचित जान पड़ रहे हैं, इसलिए देर रात नर्मदा नदी पर हर पड़ाव की कल्पना और अधिक आकर्षित करने लगी है।

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आज 21 मार्च, 2011 की सुबह आठ बजे जब जबलपुर रेल्वे—स्टेशन पहुंचा हूं तो ट्रेन से उतरने वाले हर यात्री की थकान अपने चेहरे पर महसूस कर रहा हूं। इस तरह कि सुबह ही पूरा जबलपुर शहर थका—थका लग रहा है। स्टेशन से नजदीक की ही सिविल लाइन स्थित एक होटल पहुंचने तक दिल्ली की दौड़—भाग दिमाग पर इस कदर हावी है कि ऑटो रिक्शा से शहर की सड़कों से गुजरते हुए सब शांत—शांत लग रहा है। यह एक बड़े शहर से छोटे शहर में आने का असर है। बचपन में मेरे लिए जो महज एक बड़ा शहर था, आज लौटा हूं तो यह रानी दुर्गावती, ओशो और हरिशंकर परसाई का कस्बाई—शहर लग रहा है। जबलपुर, जिसका इतिहास कितना ही लंबा क्यों न हो, पर मुख्यत: इस शहर पर राजगौड़, मराठा और ब्रिटिश राज की छाप दिखाई देती है। मध्य—भारत के इस शहर में इतिहास, साहित्य, संस्कृति, दर्शन और राजनीति आपस में गुत्थमगुत्था हैं तो कहीं—न—कहीं विस्थापन की टीस भी। वजह, नर्मदा नदी के किनारों से पहला विस्थापन सन बहत्तर में तब शुरू हुआ जब यहां बरगी में नर्मदा पर पहला बड़ा बांध बनाना तय हुआ।

जबलपुर में दो दिन रुकता हूं। दो दिन रुकने के दौरान यहां बरगी बांध विस्थापितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले राजकुमार सिन्हा, नर्मदा पर यात्रा वृत्तांत लिख रहे छायाकार रजनीकांत यादव, प्रस्तावित कोयला बिजलीघरों के कारण नर्मदापट्टी पर संकट के विरोध में आने वाले रजनीश दुबे, अधिवक्ता जयंत वर्मा और एक चैनल में संवाददाता मेरे दोस्त विश्वजीत से विस्तार से बातचीत हुई है। जबलुपर से निकलते समय राजकुमार सिन्हा और रजनीकांत यादव का एक सवाल कॉमन है, ज्ञानरंजन जी से मिले! साहित्यकार ज्ञानरंजन जी का नाम तो मैंने कई दफे सुना था, लेकिन साहित्य से अनजान था, इतना कि यही नहीं पता था उन्होंने लिखा क्या है! पिता, अनजान, यात्रा, फेंस के इधर—उधर और हास्यरस जैसी उनकी कहानियां बहुत बाद में पढ़ीं।

इन चार—पांच लोगों से अलग—अलग बातचीत के दौरान इस मुकाम पर पहुंचा हूं कि मुझे यात्रा और लिखने के दौरान फिर एक और पीड़ा और यातनाओं के दौर से गुजरना होगा। जाने वो कैसे लोग थे जिन्हें लिखते समय आनंद हासिल हुआ! खैर, जबलपुर से निकलने समय मेरे पास अलग—अलग जगहों पर मददगारों की पहले से बहुत लंबी सूची है और एक मोटा खाका भी। यह तो तय था ही कि नर्मदा को धर्म और आध्यात्म की नजर से हटकर देखूंगा, लेकिन यहां मेरे भीतर से नदी क्षेत्र को एक सामाजिक दृष्टिकोण से देखने की हूक उठी है। मैं समाज—वैज्ञानिक तो नहीं हूं, हां फिर भी नदी किनारे का आदमी तो हूं ही। मुझे अब यह भी समझ आ गया कि यदि मैं मेरे मैं और मेरी यात्रा से बाहर नहीं निकला तो नर्मदा की यात्रा अपना मकसद खो देगी।

इसके अलावा नर्मदा सिर्फ सौंदर्य का नाम नहीं है, घाट—दर—घाट, जंगल—दर—जंगल, गली—दर—गली, कूचे—दर—कूचे यहां आज कई तरह की विभिन्नताएं और समस्याएं हैं। इसलिए, यात्रा को तारीखों में बांधना ठीक न होगा। इसलिए, यात्रा को तारीखों की बजाय पड़ाव—दर—पड़ाव मुद्दा आधारित बना रहा हूं। जैसे- अमरकंटक— बाक्साइट खदानों में खनन और तापमान, डिंडौरी— जंगलों की अंधाधुंध कटाई और लकड़ी तस्करी,...

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अपने पैर न डालें, सिर्फ हाथों से आचमन ग्रहण करें। एक जल—कुंड के चारों तरफ बहुत सारे मंदिर बन गए हैं, जिनकी सफेद दीवारों पर एक जगह लाल अक्षरों से ऐसा लिखा है। मैंने जब पानी को हथेली में लिया तो मुझसे दूषित पानी पीते नहीं हुआ। यह कुंड है नर्मदा—कुंड और जगह है अमरकंटक।

जबलपुर से कोई ढाई सौ किलोमीटर दूर कुछ नामालूम—सी जगहों से होकर मैं एक सुपरफास्ट बस से अमरकंटक पहुंचा हूं, यहीं से नर्मदा निकलती है, यहां से करीब तेरह सौ किलोमीटर बहकर नर्मदा अरब सागर खंभात की खाड़ी में मिलती है।

अमरकंटक, समुद्रतल से हजार मीटर ऊंचाई पर स्थित एक पहाड़ी क्षेत्र है, जिसे नदियों का मायका कहा जा सकता है, क्योंकि नर्मदा के अलावा यह सोन और जोहिला जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है। अमरकंटक, मध्य—प्रदेश के अनूपपुर जिले का यह छोटा—सा कस्बाई क्षेत्र है, जहां पर्यटक नर्मदा—कुंड के अलावा नर्मदा के जलप्रपात कपिलधारा और दूधधारा तथा माई की बगिया वगैरह देखने आते हैं। लेकिन, आमतौर पर उनकी साधारण आंखें जो नहीं देख पाती हैं वह है पहाड़ी और नदी के बीच एक विशेष किस्म का रिश्ता। पहाड़ी के पत्थरों की विशेषता है कि ये स्पंज की तरह पानी सोखते हैं और उसी पानी को नदी-तंत्र में छोड़ते रहते हैं। लेकिन, अमरकंटक पहाड़ी क्षेत्र पर नर्मदा नदी का मैलापन बता रहा है कि पहाड़ी और नदी का यह रिश्ता टूट रहा है और नदी की सेहत बहुत नाजुक है। अमरकंटक में ही नर्मदा सबसे अधिक मैली हो चुकी है, यह कहना है मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का। बोर्ड का कहना है कि यहां बड़े पैमाने पर उत्खनन से निकले खनिजों ने नर्मदा में घुलकर इसका प्रदूषण इस हद तक बढ़ा दिया है कि यह जैविक तत्वों को पचा डालने की ताकत खो रही है।

23 मार्च, 2011 को एक भोजनालय में दोपहर का खाना खाने के बाद मैं नर्मदा कुंड के नजदीक हूं, दो बजे अमरकंटक का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस पार हो रहा है। मेरे पास अनूपपुर निवासी और वरिष्ठ पत्रकार अमन नम्र की एक ताजा रिपोर्ट है, जो यहां के तापमान में बढ़ोतरी को पहाड़ और जंगल के अनियंत्रित दोहन का परिणाम बता रही है। रिपोर्ट कहती है, साठ के दशक में शून्य से 10 डिग्री कम तापमान में ठिठुरने वाले अमरकंटक को अब मई—जून में 42 से 44 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी बर्दाश्त करनी पड़ रही है। यहां हर दशक में दो डिग्री तापमान बढ़ रहा है। सन् चौहत्तर तक यहां औसत सालाना बारिश 62 इंच थी, जो घटकर 44 इंच के नीचे पहुंच चुकी है।

मैंने यहां से मोबाइल पर भोपाल अमन नम्र से संपर्क साधा। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने बहुत पहले एक सर्वे कराया था। सर्वे में अमरकंटक में छह सौ से ज्यादा वनस्पतियां पाई गई थीं। दुर्लभ जड़ी—बूटियों और बाक्साइट की खदानों में अधिकतम उपभोग के कारण अमरकंटक की यह दुर्दशा हो गई है। सन् बासठ से बॉक्साइड की जो खदानें खुलीं उनमें एक हजार हेक्येटर से अधिक जमीन पर खुदाई का पट्टा दिया था। हालांकि, सरकार ने सन् नब्बे के बाद नई खदानों का पट्टा देने से इंकार कर दिया। लेकिन, अमरकंटक में बॉक्साइड की खदानों की खुदाई ने जलस्तर पांच सौ फीट नीचे पहुंचा दिया है।

यही वजह है कि अब नर्मदा—कुंड (जहां नर्मदा पहाड़ की कोख से निकलकर पहाड़ की गोद में आती है) और उससे एक किलोमीटर दूर माई की बगिया (जहां नर्मदा पहली बार दिखकर लोप होती है) के बीच का दलदल सख्त होता जा रहा है।

अमरकंटक में कई बाबाओं की धर्मशालाएं हैं। ऐसी ही एक धर्मशाला में रात बीतती है और फिर अलस्सुबह एक गिलास गर्म चाय पीकर डिंडोरी की ओर जाने से पहले रास्तेे में मेरी एक साधु महाराज से बातचीत होती है। मैंने नर्मदा की दुर्दशा के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब देने की बजाय नर्मदा की ऐसी महिमा बताई जो आमतौर पर नर्मदा किनारे के हर आदमी को पता होती है। वे बोले, एक बार गुस्से में आकर मैया लोप हो गईं, उन्हें लौटाने के लिए सभी पर्वतों से प्रार्थना की गई। सबने मना कर दिया। आखिर में विंध्य आगे आया। उसने अपनी मजबूत भुजाओं में नर्मदा की तेज धार को धारण किया। वह नर्मदा को वापस लाने में सफल हुआ। साधु महाराज यह महिमा सुनाकर आगे बढ़ गए। उनकी बताई कथा मिथक है। यदि मिथकों में सचमुच इतिहास के सूत्र होते हैं तो मैं देख रहा हूं कि अमरकंटक में इतिहास दोहराने लायक नहीं बचा है। वजह, बॉक्साइड की खदानों में लगातार खनन ने विंध्याचल पर्वत को इस हद तक खोखला बना दिया है कि भविष्य में वह किसी भी नदी की तेज धार को धारण नहीं कर सकेगा। विंध्याचल पर्वत ज्वालामुखी से निकले काले पत्थरों के कालांतर में बॉक्साइड और मुरूम में बदलने की विशेषता के चलते कई खनन ताकतों के लिए लूट की पहली पसंद बना।

चलते—चलते, अमरकंटक से सारतत्व यह है कि जिस नर्मदा के दोहन के लिए पूरी घाटी में परियोजनाओं का जाल बिछाया जा रहा है वह अपने उद्गम पर ही सूख रही है। अमरकंटक काल के कंठ में है...

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एक ओर, अमरकंटक के बाद जगह—जगह जंगल को घेरती और अपने में सहायक नदियों को समाती हुई नर्मदा आगे बढ़ जाती है। दूसरी ओर, मैं अमरकंटक से सड़क—मार्ग के जरिए नब्बे—सौ किलोमीटर डिंडोरी जिले की तरफ बढ़ रहा हूं। इससे पहले एमपी स्टेट हाइवे की इस सड़क से होकर मैं कभी नहीं गुजरा था। मुझे चलती टैक्सी और वृक्षों से होकर आती हवा के साथ घुली—मिली आवाजें एक छोर से दूसरे छोर ले जा रही हैं। चलती टैक्सी के साथ सूरज फिर मेरे माथे के बल चल रहा है और जब—तब पीछे मुड़कर देखता हूं तो सोचता हूं कि नदी के साथ चलना भर नदी की यात्रा नहीं होती है। नदी के समानान्तर इसके विशाल जंगल और समृद्ध जल—संग्रहण क्षेत्र को आत्मसात करते हुए आबाद छोटे गांवों को नापना भी नदी की यात्रा होती है। नर्मदा को जंगल से काटने के पहले बड़े दृश्य चटख धूप और खुले आकाश में बहुत साफ दिखाई दे रहे हैं। नर्मदा के उद्गम के साथ एक और धारा बह रही है। इसमें शामिल हैं हरियाली में सूखे के चिन्ह, सन्नाटे में खतरों के संकेत, सहज संसार में सरकारी दमनचक्र की मार, निश्चल भावनाओं के बीच घुसपैठिए, आधुनिकता और विध्वंस के बिम्ब तथा कुछ ध्वनियां।

नर्मदा जंगल से पैदा हुई नदी है। नर्मदा ग्लेशियर से निकली गंगा नहीं है कि बर्फ पिघली और पानी नदी की माफिक बहने लगा। इसलिए, नर्मदांचल में जंगल की सबसे बड़ी उपयोगिता नर्मदा का जल माना गया है। जंगल का हर वृक्ष यहां दोहरी भूमिका अदा करता है। अव्वल तो यह बादलों को वो ठंडक देता है, जिससे वे बरसने पर मजबूर हो जाते हैं। दूसरा, यह बरसात के पानी को चौतरफा फैली अपनी जड़ों से रोकता है। जड़ों में रुका हुआ यही पानी बारह महीने आहिस्ता—आहिस्ता नदी में रिसता रहता है। खास तौर से गर्मी के दिनों में। नर्मदा और उसकी सहायक नदियां बारहमासी यूं ही नहीं कहलाती हैं!

किंतु, आज बादलों को जो ठंडक चाहिए वह जंगल कटने से कम हो रही है। इस इलाके के जंगल टहनियों से जड़ों तक तेजी से साफ हो रहे हैं। इसलिए, शिखर से जड़ों, जड़ों से जमीन और फिर जमीन के भीतर से नदी में पानी ले जाने वाली लाइनें टूट रही हैं। इसलिए, नर्मदा की लय—ताल के साथ ही पूरे इलाके की लय—ताल टूट रही है।

उत्सुकताओं के सफर में मैं बार—बार पीछे देख रहा हूं। यह मेरी पुरानी आदत है। फिर भी मैं रास्ते में पीछे छूटे कुछ गांवों के नाम याद नहीं कर पा रहा हूं, कुछ नाम याद आते—आते फिसल रहे हैं, कुछ के नाम याद करने की कोशिश में बिगाड़ रहा हूं। बैगाचक यानी बैगा जनजाति बहुल इलाके से होकर बीच—बीच में घना जंगल और आदिवासी। इन्हें देख मेरे मन में नदी और जंगल से भी मजबूत दृढ़—संकल्प। इस भावना के साथ कि लाख उत्पीडऩ के बावजूद आदिवासी लोग कहीं तो अपनी जड़ों से अब तक जुड़े हुए हैं। लेकिन, अगले ही क्षण...

डिंडोरी से आगे मंडला जाते समय देखना नंगी पहाडयि़ां दिखाई देंगी! सेराझन गांव के धनसिंह पहले मुझे और फिर सूरज को ताकते हुए अपनी बात कहते हैं,- दसेक साल पहले तक जंगल इतना अधिक घना था कि यहां से सूरज दिखता भी नहीं था। हर जगह सूरज उम्मीद का प्रतीक होता है, लेकिन मेरे जेहन से इस भरी दोपहरी उम्मीद की जमीन फिर दरक गई। मैं सोच में पड़ गया कि जब कभी नर्मदा की तबाही की बात होती है तो इसके पीछे छिपे इसके सबसे बड़े कारणों में से एक जंगल की तबाही की बात क्यों नहीं होती है?

हां, तो भोग नहीं रहे न! करंजिया निवासी वीरसिंह ने यह बात इस तरह कही मानो इस दुष्परिणाम के पीछे उनका भी हाथ हो। उन्होंने बताया कोई पच्चीसेक साल पहले तक भी रिमझिम बारिश कई दिनों तक होती थी। पानी रुक—रुककर नहीं गिरता था। वह धीरे—धीरे धरती में नीचे बहुत गहरे तक धंसता जाता था। मूसलाधार बरसकर माटी नहीं बहा ले जाता था।

तो कौन खा रहा है यहां के इन जंगलों को और क्यों? लोग बताते हैं कि बैगाचक में पच्चीस—तीस पहले तक तरह—तरह के वृक्ष (मिश्रित जंगल) हुआ करते थे। फिर साल—बहुल जंगल घोषित करने के बाद यहां वन—विभाग की योजनाबद्ध कटाई ने साजा, धावड़ा, हलदू, तेंदू, गराड़ी जैसे कई वृक्षों को उजाड़ दिया। अब यहां अस्सी फीसदी साल के वृक्ष हैं। कहा जाता है कि साल में तनाछेदक नामक कीड़े लगने के कारण फैलने वाली महामारी ने नर्मदांचल के जंगलों को काफी नुकसान पहुंचाया है। और सफर में आगे बढ़ते हुए मैंने भोपाल वन—विभाग के पूर्व अधिकारियों से बात की। इस मौके पर बतौर पत्रकार मेरे संपर्क—सूत्र बहुत काम आए। पूर्व अधिकारियों ने बताया कि इस महामारी का पहला बड़ा अटैक सन् तेरासी में आया था। तब साल के अलावा वृक्षों की बाकी प्रजातियां भी बड़ी तादाद में थीं, इसलिए पूरे जंगल पर उसका ज्यादा असर नहीं हुआ। लेकिन, सन् पन्चानवे में जब दूसरी बार अटैक आया तो साल के अस्सी फीसदी वृक्ष प्रभावित हुए। वहीं, मोबाइल पर कुछ जानकारों से बात हुई तो वे बताते हैं कि साल बहुल जंगल बनाने के लिए वृक्षों की बाकी प्रजातियों को नहीं काटा जाता तो यहां की पहाडिय़ां ज्यादा हरी—भरी दिखाई देतीं।

मार्ग पर आगे समनापुर गांव के कुछ रहवासी एक अलग ही कहानी बता रहे हैं। इनका कहना है, महामारी का तो डर दिखाया गया बात कुछ और है। मेरा सवाल है, ऐसा कैसे? रहवासी बताते हैं,  जिससे महामारी की आड़ में साल के कई वृक्षों को काटा जा सके। फिर उनसे बातचीत करते हुए समझ आता है कि साल वृक्ष की लकडिय़ों की मांग सबसे अधिक होती है। इसलिए, रहवासियों को लगता है कि करोड़ों रुपए कमाने के लिए महामारी के नाम पर साल का जंगल काटा गया है। साल के एक वृक्ष से बहुत लकड़ी मिलती है। कितनी? इन्होंने हिसाब बताया और मैंने अनुमान लगाया, कोई चालीस वर्गफीट। इस तरह तो दो से चार वृक्षों से लाखों रुपए कमाए जा सकते हैं। यही कारण है कि साल की लकडयि़ों की तस्करी भी यहां जोरों पर होती रही है। लोगों ने मुझे यह भी बताया कि वृक्षों को सुखाने के लिए किस तरह से उनके तनों को छील लिया जाता है! और किस तरह कुछ ही दिनों में साल के विशाल वृक्ष खड़े—खड़े सूख जाते हैं!

बहरहाल, शाम होने को है और शाम से पहले मुझे रात ठहरने के लिए एक होटल की तलाश में समनापुर से कोई पंद्रह किलोमीटर दूर डिंडोरी शहर जाना है। जाते हुए मैं फिर पीछे की ओर देखता हूं तो एक कतार में महिलाएं कदमताल करती हुई जंगल के रास्ते घर लौट रही हैं। मानो काम से लौट रहीं ये महिलाएं उजाड़ के दौर में भी अपनी रचनात्मकता को दर्ज करा रही हों। मानो इस हाल में भी ये सुंदर, सच्ची और दमदार महिलाएं हारी न हों, वे अपने परिवार के लिए कुछ लेकर ही लौट रही हों।

और समनापुर, करंजिया जैसे जनजातीय गांवों की दुनिया से लौटकर डिंडोरी में एक होटल में रहने का बंदोबस्त किया। इसके बाद का यह समय है किसी जगह चाय पीने का, या आदत के अनुसार चाय के बहाने शहर के गली—कूचे और बाजार को देखने का। फिर पत्रकार लक्ष्मीनारायण अवधिया के कार्यालय में मुझे दूसरी चाय नसीब हुई, जहां अधिकारी और ठेकेदारों की सांठगांठ से जंगल की तबाही पर चर्चा का नया चैप्टर खुला है। खबरों की कतरनें बता रही हैं कि अधिकतम राजस्व वसूलने के लिए अधिकारी जंगलों की नीलामी करके उन्हें जबलपुर और बिलासपुर के ठेकेदारों को बेच रहे हैं। लक्ष्मीनारायण अवधिया बता रहे हैं कि जंगल में ठेकेदारों को कोई खास इंवेस्मेंट तो करना नहीं पड़ता है। इसलिए, ऐसे ठेकेदारों के लिए यहां के जंगल बड़ी कमाई का जरिया बन गए हैं। डिंडोरी से जबलपुर की लौटते हुए इस यात्रा का सारतत्व यह है कि जिस जंगल के बूते नर्मदा का अस्तित्व है उसे ही जड़ सहित खोदा जा रहा है... 

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