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Tuesday 15 Oct 2019

स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के आइने में स्वयं प्रकाश की कहानियां

स्वयं प्रकाश यथार्थ के लेखक हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ हमें 'स्पेस' में ले जाकर कल्पना लोक की सैर नहीं कराती बल्कि जमीन पर लाकर 'पटक' देती हैं। ऐसा भी नहीं है कि उनकी कहानियाँ धक्का देकर एकदम गिरा देती हैं, परन्तु तन्द्रा को भंग न कर सके ऐसा भी नहीं है। स्वयं प्रकाश के अधिकतर पात्र और कहानियाँ उनके जीवन के प्रसंगों से उपजे हंै। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ स्वयं पाठक से बात करती हंै और एक 'प्रश्न' के सामने लाकर उसे खड़ा कर देती हंै। वे स्वयं लिखते हैं- ''आज इस मौके पर उन मित्रों की याद आ रही है, जो भिन्न-भिन्न कारणों से मेरी कहानियों के निमित्त और कारण बने और यदा-कदा अच्छे-बुरे पात्र भी।'' स्वयं प्रकाश की कहानियाँ इसी प्रकार जीवन से गहरे स्तर पर जुड़ी हंै। इसी वातावरण में उपजी उनकी स्त्री जीवन से संबंधित कहानियाँ महत्वपूर्ण हंै।

वस्तुत: स्वयं प्रकाश की कहानियों में स्त्री जीवन की जो विवशता और पीड़ा देखने को मिलती है, उसी को तोड़ कर एक समतामूलक समाज की स्थापना ही उनकी कहानियों का लक्ष्य है। स्त्री को आश्रिता, अबला जैसे संज्ञाओं से संज्ञायित करना छोड़ जब हम उसे प्रथम दर्जे के नागरिक के रूप में देखने समझने में सहज हो जाए, वही वस्तुत: स्त्री-सशक्तिकरण होगा। स्वयं प्रकाश के स्त्री पात्रों पर टिप्पणी करते हुए पल्लव लिखते हैं- ''दरअसल स्वयं प्रकाश स्त्री पुरुष सम्बन्धों में वह आधुनिकता चाहते हैं जो व्यक्तित्व चेतना से पूर्ण हो और जहां से जीवन का पूर्ण विकास दिखाई दे।'' इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने 'अशोक और रेनु की असली कहानी', 'मंजू फालतू', 'अगले जनम', 'आयाचित', 'पाँच दिन और औरत' और लड़कियाँ क्या बातें कर रही थीं, आदि कहानियों के माध्यम से स्त्री 'मन' और 'जीवन' की सच्चाइयों को उजागर किया है।

स्वयं प्रकाश समाज और यथार्थ को बारीकी से देखने वाले कथाकार हंै। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ सामान्य विषयों से उपजती हंै। एक स्त्री का अपने पति के प्रति प्रेम और समर्पण दाम्पत्य जीवन का मूल है परन्तु व्यक्तित्व 'विलोपन' चिंता का विषय है। यही प्रश्न उनके 'स्त्री-विषयक' कहानियों के मूल में है। 'लड़कियाँ क्या बातें कर रही थी? एक ऐसी कहानी है जिसमें दाम्पत्य जीवन में कदम रखने से पूर्व लड़कियों द्वारा झेले जा रहे समाज और पारिवारिक दबाव के बीच शिक्षा, रोजगार, प्रेम और विवाह के तनाव से उपजी समस्याएँ हंै। जीवन में आचार संहिता जरूरी है परन्तु यदि आचार संहिता मात्र एक वर्ग पर ही लागू हो तो उसे 'गुलामी की जंजीर' समझा जाएगा। इसी आचार संहिता रुपी जंजीर से जकड़ी किशोरियाँ शादी के बाद रेनु, मंजू हो जाती हैं और नहीं चाहती कि अगले जनम मनुष्य योनि मिले और यदि मिले भी तो 'स्त्री' जीवन न मिले। दासता के बंधन से उपजी निराशा ही इस कथन में व्यक्त हुई है- ''हाँ भाई अभी तो बीसवीं सदी ही बीती है। पच्चीसवीं सदी खत्म होने तक शायद आप लोग अपनी मर्जी से खा-पहन सको।'' औरत होना जो कि सृष्टि की सर्जना की सबसे अमूल्य निधि है यदि अभिशाप समझा जाए तो यह मानवता पर कलंक है। 'मानवाधिकार' और समतामूलक समाज की स्थापना की बातें बड़ी खोखली लगती हैं जब आज भी खाने और पहनने की स्वतंत्रता पर विवाद होता है। स्त्री मुक्ति संगठनों का अपने मूल पथ से भटकना और राजनीति तथा सत्ता के गलियारों में मत्था टेकना किसी से छिपा नहीं है। पथ से विचलन की ही कहानी है 'पाँच दिन और औरत' जिसमें एक साथ कई लोगों के जीवन के विविध अंश को स्थान दिया गया। भारत में जाति की समस्या ने किस प्रकार विवाह संस्था की अर्थवत्ता को प्रश्नांकित किया है इसका पता चलता है जब अपने प्रेमी के साथ भागकर शादी करने वाली लड़की की माँ छोटी बेटी के लिए कहती है- ''अधेड़ और दुहेजू है तो क्या हुआ, अपनी जाति का तो है, बिरादरी वाले थू-थू तो नहीं करेंगे, वरना कहीं ये भी खूंटा तुड़ाकर भाग गई तो...।'' इस प्रकार 'बिरादरी' की सीमा ने किस प्रकार दहेज, अनमेल विवाह की समस्या को पैदा किया है वह यहाँ उद्घाटित किया गया है। स्थिति यह है कि यहां यह कथन लड़की की माँ कह रही जो स्वयं स्त्री है। इस प्रकार जब कोई समाज स्वयं के शोषण को सहर्ष स्वीकार कर ले और खुद उसमें भागीदार बने तो समझना चाहिए कि शोषणकारी अपनी साजिश में सफल हुआ और उसका षड्यंत्र अब संस्था बन चुका है। जिसे आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। स्त्री को स्त्री के विरुद्ध खड़ा करना पितृसत्ता का सबसे सफल प्रयोग रहा है।

इसका सबसे विद्रूप स्वरूप वहाँ देखने को मिलता है जब 'आयाचित' कहानी में स्वयं के जीवन में भागकर शादी करने वाली लड़की, वह भी अन्तर्जातीय विवाह जैसा क्रांतिकारी कदम उठाने वाली लड़की माँ के रूप में अपनी बेटी की शादी नाबालिग अवस्था में ही बिना उसकी मर्जी कर देती है। समाज की रूढिय़ों को तोड़कर पुन: उसकी तरफ लौटना रूढिय़ों के विजय का सूचक है जो 'आयाचित' कहानी का मूल कथ्य है। इस प्रकार 'प्रेमिका' की भूमिका से 'अभिभाव' की भूमिका में आते ही समाज की सभी रूढिय़ों को ओढ़ लेने वाला भारतीय अभिवावक आने वाली पीढिय़ों को जीवन के जिस चक्रव्यूह में छोड़ रहा है वहाँ पीड़ा, घुटन और निराशा ही है। यही नहीं स्त्री संगठनों की भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए 'पाँच दिन और औरत' में स्वयं प्रकाश दिखाते हैं कि विक्षिप्त महिला किस प्रकार सड़क पर पाँच दिन नंगी हालात में रहकर मर जाती है परन्तु कोई सामने नहीं आता। कहानी के अन्त में जादुई यथार्थवाद का सहारा लेकर उस महिला का विजय दिखा दिया गया, जब महिला संगठन के नेता दिल्ली जा रहे थे तब प्रेत आत्माएँ बनकर दो पीडि़त महिलाएँ उन्हें जलाकर मार देती हंै।

सवाल यह है कि क्या इस तरह जादुई यथार्थ का सहारा लेना हमारी विवशता है या फिर वास्तव में आग लगाकर ऐसे नेताओं को मार देने से ही समस्या का समाधान निकलेगा? यहाँ दोनों कटघरे में खड़े सवाल हैं। वस्तुत: समाज के ही उत्पाद संगठन होते हैं समाज की मानसिकता बदले बिना संगठनों की अर्थवत्ता हम नहीं बढ़ा सकते। संगठन में रहने वाले लोग किस वर्ग के हंै, उनकी पृष्ठभूमि क्या है? और उनकी संवेदनशीलता ही उसकी उपयोगिता तय करती है।

इस लिए जब तक 'अशोक और रेनु' की असली कहानी की रेनु अपनी स्वायत्तता को बनाकर रखना नहीं सीखेगी तब तक स्त्री की स्थिति शोषित की ही बनी रहेगी। अशोक और रेनु पति-पत्नी हैं। अशोक चाहता है कि उसकी पत्नी उसकी दोस्त बनकर रहे परन्तु रेनु सशंकित है। वह स्वयं को भारतीय पत्नी के 'प्रेमÓ के आदर्श के अनुरूप अपने को ढालना चाहती है। वह अपने व्यक्तित्व को विलोपित कर देती है। इस पर अशोक इस द्वन्द्व में जीने लगता है कि कहीं वह इसका दोषी तो नहीं। वह स्वयं से प्रश्न करता है- 'क्या वह लड़की लड़ नहीं सकती? अपने घर में अपनी मर्जी नहीं चला सकती? यह पढ़ी-लिखी लड़की कहाँ से पढ़ी-लिखी है?ÓÓ वस्तुत: यह प्रश्न उस भारतीय संस्कार पर है जो इतने गहरे स्तर तक हममें समाहित है कि विचार और संस्कार के द्वन्द्व में हमेशा 'संस्कार' ही विजय पाता है जो 'रेनु' का निर्माण करता है। यहीं कारण है कि रेनु पति के नापंसद की चीज अब घर में नहीं बनाती। वह स्वयं को अशोक के अनुकूल ढालना चाहती है। मित्रता से 'मालिक-दासी' के सम्बंधों में बदल रही यह कहानी भारतीय परम्परागत नारी के निर्माण की अन्तरकथा है। जिसमें यह प्रश्न आज भी विद्यमान है- ''क्या चाहती है रेनु ? समानता नहीं चाहती? मुक्ति और विस्तार नहीं चाहती? फिर क्या चाहती है? सुरक्षा? समृद्धि? प्रजनन! एकदम औरत ही है क्या?''

इस प्रकार यह कहानी उस सदियों के संस्कार, परम्पराओं और व्यवस्थाओं की निर्मिति को हमारे सामने लाती है। जहाँ स्त्री स्वयं के लिए बनाए गए मानदण्डों को ही सर्वाधिक उपयुक्त समझती है। उसके बाहर आने पर या लाए जाने पर उसे असुरक्षा की भावना घेरने लगती है। इस भावना से निकालना ही आज विमर्शों का उद्देश्य होना चाहिए। स्वयं स्त्री में जब तक खुद की स्वायत्तता और अर्थवत्ता पर विश्वास नहीं जगेगा तब तक बाकी प्रश्न अनावश्यक ही साबित होते रहेंगे। नारी का नारीत्व के प्रति मोह स्वाभाविक है, वह उसकी कोमलता का एक सुनहरा पक्ष भी है परन्तु यह उसकी दुर्बलता और व्यक्तित्व विभाजन का कारण बने तो जो यथेष्ट है उसे ही चुनना होगा। वरन 'रेनु' ही आने वाले समय में 'मंजू' से 'मंजू फालतू' बन जाएगी। 'मंजू फालतू' एक ऐसे ही युवती ही कहानी है जो स्वयं के समकक्ष लड़के से शादी करती है। परन्तु 'माँ' बनने के बाद उसे नौकरी छोडऩी पड़ती है। बच्चों को पालने और घर के काम में लिए उसे नौकरी छोडऩा पड़ी। दो बच्चों की माँ मंजू अब दिन भर मातृत्व कर्तव्य को निभाने में स्वयं के कैरियर की 'बलि' देती है । ''जिसने तब कम्प्यूटर सीखा था जब अधिकांश लोग कंप्यूटर को केलकुलेटर का ही बड़ा भाई मानते थे। जिसने निरंतर साधना से अपने लिए छोटी ही सही पर मुकम्मल जगह बनायी थी।'' स्वयं प्रकाश का यह कथन उसके संघर्ष को दिखाता है जिसकी अंतिम परिणति है उसका 'फालतू' हो जाना। न केवल बाजारवादी व्यवस्था में या तथाकथित मानव संसाधन के रूप में बल्कि अपने बेटियों और पति के नजर में भी फालतू हो गयी। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और पूंजीवाद लगातार तकनीक और कार्यशैली में बदलाव की माँग करता है जिसमें पुराने लोग 'फिट' नहीं बैठते तो वे भी फालतू हो जाते हैं। मंजू परिवार से ऊबकर जब 'जॉब' की खोज में निकली जो उसे यथार्थ स्थिति का बोध हुआ। अन्तत: वह थक गयी। स्वयं प्रकाश लिखते हैं- ''मंजू को लगा वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही है। समय उसके पक्ष में नहीं है। उम्र शत्रु बन गयी है।... उसे निकम्मा और निठल्ला होकर जीना मंजूर नहीं था। वह अपने ही घर में अपने ही पति और बच्चों की उपेक्षा, दया और उपहास का पात्र नहीं बनना चाहती थी। वह चीजें रखकर भूलने लगी, सनकने लगी, घुटने लगी, टूटने लगी।'' और अंतत: उसने अपना सरनेम 'फालूत' लगा लिया। इस प्रकार जीवन की शुरुआत इतनी ऊर्जा से करने वाली 'मंजू' की नियति इस बाजारवादी और पितृसत्तात्मक समाज में 'मंजू फालतू' बनना ही है।

स्त्री-जीवन की पीड़ा, पुत्र चाह की उत्कटता और प्रसव पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति की कहानी है 'अगले जनम'। जिसमें प्रमुख पात्र सुमि है। सुमि 'रेनु' के विपरीत चरित्र है। वह नहीं चाहती अभी माँ बनना। परन्तु भारतीय परिवारों में आज भी 'कोख' पर स्त्री का नहीं बल्कि पति और सास-ससुर का अधिकार है। इसी पीड़ा को व्यक्त करते हुए स्वयं प्रकाश लिखते हैं- ''असल में पूछा जाए तो सुमि माँ बनना ही नहीं चाहती थी। '' वे लिखते हैं- ''सास को पोता चाहिए था और पोते से कम कुछ नहीं। एक सुंदर-सुशील सुशिक्षित पुत्रवधु से उसे तसल्ली नहीं था।.. ससुर को भी पोता ही चाहिए था। उनके लड़के ही हुए, इस बात का उन्हें गर्व जैसे था। कहते थे- हमारे खानदान में बारातें आती नहीं, बारातें जाती हंै।'' सुमि और मंजू दोनों पात्र दो जगह हैं परन्तु दोनों की स्थितियाँ एक जैसी हैं। स्वयं प्रकाश सुमि के बारे में लिखते हैं- ''सुमि कुछ उत्साही देशभक्त छात्रों के सम्पर्क में आई और महत्वाकांक्षी होने लगी। जीवन में कुछ कहना है। कुछ बनकर दिखलाना है। औसत जिंदगी जीकर मर नहीं जाना है।''

परन्तु सुमि की सारी महत्वकांक्षा शादी के बाद तिरोहित करा दी जाती है। ससुराल के लिए उसकी अर्थवत्ता मात्र 'पुत्र' की माँ बनने और सास-ससुर को पोता देने में रह गयी। भारतीय समाज में पुत्र मोह की यह अभिलाषा कितनी त्रासद है इसका जिक्र तो कई जगहों पर है परन्तु नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत सरकार ने आर्थिक समीक्षा 2017-18 में पुत्र की इस चाहत को रेखांकित करते हुए कहा भारत में अवांछित बालिकाओं की संख्या 21 मिलियन है। यानी ऐसी संतान जिसके माता-पिता पुत्र चाहते थे, लेकिन पुत्री का जन्म हो गया।

स्पष्ट है कि अवांछित पुत्रियों के शिक्षा, विकास और पालन-पोषण पर बहुत संभावना है उस स्तर से ध्यान न दिया जाए जैसा पुत्रों के लिए किया जाता। विषमता का यह पैमाना ठीक किए बगैर आधुनिक भारत की संकल्पना नहीं की जा सकती। नर्स जब सुमि को बेटी लाकर देती है तो उसके मुँह से मात्र एक शब्द निकलता हैं- 'मर जा' और फिर आँसू की धार बहने लगती है। इस प्रकार प्रसव की अथाह पीड़ा के बाद बहने वाले एक माँ के आंसू उसकी बेबसी से पैदा हुए हैं। इस बेबसी का कारण है समाज का दकियानूसी होना जहाँ 'बेटी' को दोयम दर्जे का समझा जाता है। स्वयं प्रकाश यहाँ भी यह दिखाने से नहीं चूकते कि 'बेटी' होने पर सर्वाधिक अवहेलना 'सास' के द्वारा ही झेलना पड़ी जो स्वयं एक स्त्री हैं। इस प्रकार जिसकी चर्चा इस लेख के शुरूआत में की गयी थी कि सत्ता 'शेषितों' को भी धीरे-धीरे अपने अनुसार ढाल लेती है यह सास भी उसी सत्ता की उपज है। जब तक स्त्री को उसकी अन्त: प्रेरणा को जागृत कर स्वयं के महत्व और अर्थवत्ता के लिए जागरूक नहीं किया जाएगा तब तक स्थिति यही बनी रहेगी। कभी 'रेनु' बनकर स्वयं 'टिपिकल' पत्नी होना चाहेगी तो कहीं बेटी के रूप में अपनी माँ 'मंजू' को फालतू समझेगी तो कभी 'सास' के रूप में बहू के बेटी पैदा करने पर उसे अपमानित और तिरस्कृत करेगी। इस प्रकार स्वयं के खिलाफ साजिश करने वाले इन पात्रों को अपने समाज में आसानी से देखा जा सकता है। जो स्वयं प्रकाश की कहानियों में कभी युवा, कभी पत्नी तो कभी सास के रूप में आए हैं। यह अलग बात है कि ये सारे पात्र अलग-अलग कहानियों के पात्र हंै परन्तु ध्यान से देखें तो एक ही 'स्त्री' अपने जीवन के विविध पहलुओं में अपनी भूमिका अदा करती है। वह नहीं बदल पाती रूढि़वादी भारतीय समाज के संस्कारों से निर्मित अपने व्यक्तित्व को। यही कारण है कि स्वयं भागकर अन्र्तजातीय विवाह करने वाली प्रेमिका जब 'माँ' बनती है जो अपनी ही नाबालिग बेटी की शादी बिना उसकी मर्जी करती है। क्या यह भारतीय 'माँ' होने की उसकी मजबूरी है? यदि हाँ, तो इसे बदलना ही पड़ेगा।