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Monday 19 Nov 2018

प्रतिद्वंद्वी

रोज़ की तरह टैरेस गार्डेन पर बांस की बनी झोंपड़ी के एक कोने में फ्रेम पर लगे कैनवास पर मैं नई पेंटिंग का खाका खींचने की तैयारी कर रही थी। सड़क के अलकतरे पिघल-पिघल कर कई रूप-रंग बना रहे थे। फिर भी मेरे लिए यह जगह सबसे शांतिप्रिय और एकांत था जो सृजन के लिए अति आवश्यक होता है।

घर के व्यस्त वातावरण में यह कहां संभव है, यह गंभीर सृजन कर्म..? कॉल बेल और टेलीफोन की घंटी की ट्रिन-ट्रिन से सृजन कर्म में एकाग्र मन बिखर जाता है। यह खूबसूरत जगह उस शोर-शराबे वाले घर से बड़ा सुकून देने वाला था।

सुबह-सवेरे तकरीबन एक घंटे पेड़-पौधों को नहला-धुलाकर जो ताजग़ी तन-मन को मिलती, वह बड़ी सुकून देने वाली होती और दिन भर मन प्रसन्न रहता। इससे मेरे सृजन को बड़ा बल मिलता....।

जैसे ही स्केच बना कि मैं प्लेट में रंगों को तैयार करने लगी कि आजऱ दो कप चाय लिए बगल में अखबारों का पुलिंदा दबाए नज़दीक आ बैठे। चाय की चुस्कियां लेते हुए आदतन स्केच पर अपनी राय देने लगे-''यह औरत की कमोबेश एक ही तस्वीर की पुनरावृत्ति कर तुम क्या दिखलाना चाहती हो, बस यही एक छवि तुम्हारे मन-मानस में जैसे सवार हो गई है.....कितनी पेंटिंग बनाओगी, इस एक कल्पना की भित्ति पर.....''

''पता नहीं, शायद.....''

मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। इस विषय पर लंबी बातचीत हो सकती थी और वह हमेशा की तरह बहस में तब्दील हो सकती थी। लेकिन इस समय मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। इसलिए मैं अपने काम में व्यस्त हो गई। अचानक भन्न-भन्न करता हुआ एक श्यामल भ्रमर न जाने कहां से आ निकला। शायद वह कहीं से भटक कर आया था। रंग-बिरंगी तितलियां तो प्राय: आ जाया करती थीं और वातावरण में रंग बिखेरकर चुपचाप गायब हो जाया करती थीं। कभी-कभी कुछ यादें भी ताज़ा कर जाती थीं। लेकिन उस भंवरे की आवाज़ बहुत तेज़ थी जिससे एकाग्र मन बिखर गया था। चारों तरफ  जैसे शोर ही शोर फैल गया था। मैंने 'सी-सी' की आवाज़ कर हाथ के इशारे से उस शातिर भौंरे को भगाने की चेष्टा की। हाथ लहरा कर हुस्स-हुस्स भी किया। लेकिन वह नहीं भागा। पूरा टैरेस छोड़कर वह मेरे इर्द-गिर्द ही चक्कर लगाता रहा। आजऱ मुस्कुराते हुए उठकर चल दिए। मेरी शंाति भंग हो गई थी। एक-एक कर जोड़ी हुई सृजनात्मक सोच बिखर जाने से मेरा भी मूड खराब हो गया था। अत: रंगों को ऐसे ही छोड़कर कुछ देर के लिए उठ जाना ही ठीक समझा। लेकिन हैरत इस बात की हुई कि वह श्याम तन भंवरा अब अक्सर टैरेस पर आने लगा। टैरेस पर बहुत ही सुंदर-सुंदर फूल खिले थे। गुलाब की रंग-बिरंगी फूलों भरी शाखें, लहलहाती यौवन उगलती धूप की सुनहरी किरणों से नहाती हुई....। लेकिन इस भौंरे को उनमें कोई दिलचस्पी न होती और वह भिनभिनाता हुआ न जाने कहां से निकल आता, कई मिनटों तक गुन-गुन, भिन भिन कर नाचता रहता, फिर अचानक गायब हो जाता।

ऐसे ही एक सुबह उसकी भिनभिनाहट भरी आवाज़ और परिक्रमा से परेशान होकर पास रखे हुए अखबार से मैंने उस पर निशाना साधने की कोशिश की। वह गिरते-गिरते संभला, कुछ हड़बड़ाया और लडख़ड़ाया। इसी हड़बड़ाहट और लडख़ड़ाहट में वह मेरे होंठ से टकरा गया। उसका कर्कश पत्थर जैसा स्पर्श मेरे होंठ पर एक गहरा निशान छोड़ गया।

कई रोज़ तक निशान का वह विशेष स्थान सूजा रहा। सूजा हुआ होंठ देखकर आजऱ ने पूछा -'यह क्या हो गया...?' जब मंैने भंवरे को भगाने और होंठ से टकराने की कहानी सुनाई तो वह हंसे और मुस्कुराते हुए जुम्ला हांक दिए, ''ओ हो ! भंवरे मंडरा रहे हैं, हमारी बेगम पर.... उसकी इतनी हिम्मत की लब और खाख्सार तक आ पहुंचे....।''

''....जी जनाब, सोच लीजिए आपका प्रतिद्वंद्वी पैदा हो गया है....''

हम दोनों ही हंस पड़े। लेकिन वह फिर आया नहीं। या तो कहीं रास्ता भटक गया या शायद मेरी तरह उसके भी नाज़ुक जिस्म पर चोट लगी हो और वह जख्मी हो गया हो। मैं अपनी इस हरकत पर शर्मिंदा भी थी और पछता भी रही थी - मन में उसके प्रति कोमल भाव भी जगे थे। मुझे महसूस हुआ कि उसके न आने से मैं कुछ बेचैन हूं। उसकी गुनगुनाहट से परेशान पर अभ्यस्त मन कुछ खाली-खाली लग रहा था। मेरे कान उसके इंतज़ार में थे और नजऱें उसे तलाशती हुई....

कई दिन के बाद उसकी आवाज़ मेरे कानों से टकराई। मैंने गर्दन घुमाकर इधर-उधर देखा वह झोपड़ी की छत में चक्कर लगा रहा था। वह भला-चंगा था। उसकी उपस्थिति, कुछ देर ही सही, अच्छी लगी। जैसे किसी को याद किया जाए और वह हाजिर हो जाए...। मुझे उसके चरित्र, सोच और संवेदना को देखकर आश्चर्य हुआ। क्योंकि उस दिन की हरकत से अपने उपर होने वाले प्रहार से शायद वह आहत और शर्मिंदा था, इसलिए वह मेरे करीब नहीं आया, दूर से ही भनभनाता रहा। अब वह थोड़ी दूर पर आता तो उसकी गुनगुनाहट सुन कर मैं उसकी ओर देखने लगी। दूर से ही सही मैं उसकी उपस्थिति की आदी हो गई थी। अब वह जब आता मैं काम छोड़कर उसे ही देखती। अब वह मुझे बहुत ही करीब लगने लगा था। अब उसकी गुनगुनहट से मैं परेशान नहीं होती। उसका श्याम तन, चमकीला जिस्म मुझे बहुत आकर्षक लगता।  उसके श्याम रंग में नीला, पीला और हरा तथा सुनहरा रंग मुझे किरणों की भांति महसूस होते। उसके जिस्म से जैसे सूरज के सातों रंग फूटकर फिज़़ाओं में बिखर रहे होते....।

मैंने महसूस किया कि उसके शरीर की बनावट में मर्दानगी भरी गज़ब का खिंचाव था। अब उसकी गुनगुनाहट में काव्यात्मक ध्वनि का अहसास होता...। कभी-कभी मुझे लगता  कि वह मेरे ही घर में कहीं छुपकर अपना घोंसला तो नहीं बना लिया है और मेरी उपस्थिति का अहसास करते ही बाहर निकल आता है तथा कुछ दूर पर रक्स करता हुआ मुझे रिझाना चाहता है। अब वह मुझसे काफी घुलमिल गया था।

इत्तेफाकन मुझे किसी आवश्यक काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। वापस आई तो अपनी दिनचर्या में लग गई। रिंग पर लगी पेंटिंग को समाप्त करने के ख्याल से मैं टैरेस की ओर बढ़ चली। लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भंवरा नहीं आया, ''शायद उसने अपना घर बदल लिया हो - या अपने समय में परिवर्तन कर लिया हो। या कहीं व्यस्त हो या फिर किसी लंबी यात्रा पर हो....''

मैं ऐसा ही कुछ सोच रही थी। कई दिन की लगातार मेहनत और लगन के बाद यह पेंटिंग अब समापन के चरण में थी। आजऱ बड़े ध्यान से देख रहे थे। उनसे रहा न गया। आदतन उन्होंने अपनी राय देनी शुरू कर दी- ''इस रटी-रटायी कल्पना को तुमने जो आकार दिया है उसमें कुछ नया तो नहीं है... इस चेहरे पर तुमने आंख उकेर कर पेंटिंग अर्थात अपने ख्याल को और उंचाई दी है, बेहतर लग रहा है'' मैं हल्के से मुस्कुरा दी।

उस रोज़ मैं यूं ही आजऱ से मज़ाक करते हुए कहने लगी -''अब वह आपका प्रतिप्रेमी भौंरा, मेरा आशिक नहीं आता, न जाने कहां खो गया है...'' अखबार से नजऱें हटाकर वे बड़े इत्मिनान से बोले-''मैंने उसे मार दिया...।''

''...मार दिया...!''

''....मार दिया, मगर क्यों?''

मुुझे अपने जिस्म में हल्की-हल्की थर्थराहट महसूस होने लगी। मैं इस हत्या की खबर सुनकर बेहद सहमी और घबराई हुई थी। उसी दुख में मैंने आजऱ से सवाल किया-'' क्यों मार दिया भई...?'' ''अरे! मैं अखबार पढ़ रहा था। साले ने भिन्न-भिन्नकर नाक में दम कर रखा था। अखबार पढऩा मुश्किल कर दिया था। बेवक्त डिस्टर्ब करता रहता था....''

''बस इतनी सी बात....?''

मैं हक्का-बक्का आजऱ का मुंह ताकती रह गई थी। प्राय: हंसने मुस्कुराने वाले बुद्धिजीवी से लगने वाले आजऱ मुझे कुछ बीमार और गंभीर रूप से सनकी लगने लगे थे।

मेरी नजऱें कैनवास पर चलीं गई और मैं देखकर हैरान थी कि वह मेरी रटी-रटायी कल्पनाओं की सूरत स्वयं अपनी शक्ल बदल रही थी ......!