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Monday 26 Aug 2019

पूरनी

जहाँ पहले बस्तियाँ थी, वहां तक शहर ने पाँव पसार लिये हंै और जहाँ जंगल थे वहाँ बस्तियाँ आबाद हो गईं। ठन्डे जल के सोते बदबूदार नालों में तब्दील हो गए हैं। नदियों के पाट को घेर कर उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया है। हवाएं  दिशाशूल का शिकार हो रही हैं।  सरलता और निष्कपटता की नदी सूख रही है। जमीन गर्म तवे की तरह तप रही है एवं बाजारवाद उस पर अपनी रोटी सेंक रहा है। आसमान में टंगे, अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोग मग्न हैं टीवी पर धार्मिक ठेकेदारों की बहस देखने में। भूख प्यास से व्यथित एवं क्लांत जंगली जानवर जिधर नजर डालते हैं उधर ही दीखते हैं जाल लिए आदमी। कभी भय से तो कभी क्रोध से वे घुस जा रहे हैं इंसानों द्वारा आबाद बस्तियों में जो बसाई गयी हैं, जंगलों को कब्जा कर। जल, जंगल एवं जमीन से जुड़े लोग छटपटा रहे हैं प्यासी चिडिय़ा की तरह।

कुछ वर्षों पूर्व तक रांची शहर से बाहर निकलते ही जंगल शुरू हो जाते थे। पर अब धीरे-धीरे जंगल पीछे हट रहे हैं। मानो जंगल और शहर में एक अघोषित युद्ध चल रहा है और युद्ध में हारे हुए सैनिक की तरह जंगल पीछे हटता चला जा रहा है। इस युद्ध में कभी भी सीजफायर नहीं होता, कोई शांति का समझौता नहीं होता। यह एकतरफा युद्ध है जो आरोपित है तथाकथित सभ्यता के द्वारा जंगलों के विरुद्ध। जिसमें जंगल कभी हमलावर नहीं होता। कहीं-कहीं तो जब पीछे हटने की भी जगह नहीं बचती है तो जंगल गायब हो जाता है। जैसे मेले में खेल दिखाता जादूगर पलक झपकते चीजों को गायब कर देता है, वैसे ही फारेस्ट के अधिकारी और ठेकेदार मिलकर जंगल को गायब कर देते हैं। किसी को पता भी नहीं चलता है कि जंगल गायब हो गया है।

वनों में तैनात वनरक्षी व्यस्त हैं कटाई के लिए पट्टा हासिल किये ठेकेदारों को मदद करने में ताकि वे पेड़ों की सुरक्षित कटाई कर सकेें। ठेकेदार बीस एकड़ का पट्टा लेकर आते हैं पर जंगल दो सौ एकड़ से गायब हो जाता है। वनरक्षी बीच-बीच में चूल्हे के लिए लकडिय़ाँ बीनती औरतों को पकड़ कर अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं एवं बड़े साहब फाइलों में इसकी एक बड़ी रिपोर्ट बनाकर पेश करते हैं कि कैसे वन संरक्षण का वृहत कार्य किया जा रहा है।

जंगलों में आबाद बस्तियां अनावृत्त हो रही हैं,  मानो किसी घर से छत हटा दी गयी हो और वह आसमान को मुँह बाएं ताकता हुआ खड़ा हो। जंगल की प्रवृति होती है कि वह शीघ्र ही अपने आस-पास के इलाके को भी जंगल बना लेता है। लेकिन यहाँ मनुष्य के आगे जंगल समर्पण करता हुआ प्रतीत होता है।

जंगल से बाहर निकल आई ये बस्तियाँ बाह्य रूप से तो किसी अन्य गाँव की ही भांति  दिखती हैं पर भीतर से इनकी पीड़ा परिलक्षित होती है,  ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे किसी आदमी को निर्वस्त्र करके उसे सरेबाजार खड़ा कर दिया गया है एवं वह लाज से गड़ा जा रहा है,  वह सर उठाकर खड़े होने की स्थिति में नहीं है। वनोपजों पर आश्रित समाज वनों से दूर होकर शिकारी के द्वारा पीछा किये जा रहे हिरण की भांति भयभीत और परेशान हैं। गाँव में भयानक बेरोजगारी है। जीविका के लिए मुख्यत: जंगल पर निर्भर रहने वाली जातियां किसी तरह खेती या इधर-उधर छुट्टा मजूरी करके काम चलाती हैं। बच्चे गाँव में आवारा फिरते हैं। लोग दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के संघर्ष में कब बूढ़े होकर मर जाते हैं उन्हें पता ही नहीं चलता है। इनकी व्यथा वैसी है जैसे छांव में रहने वाले पौधे को कड़ी धूप में रख कर पानी से वंचित कर दिया गया हो।

गाँव के पार एक पहाड़ है एवं उसके पहले है एक बरसाती नदी। पहाड़ पर जंगल अभी भी शेष था। पहाड़ पर जंगल के बचे रहने के भी अपने कारण है। पहाड़ तक अभी सड़क नहीं बनी है, इसलिए वहाँ से कटे पेड़ों को लाना बहुत मुश्किल काम है। जहाँ सड़क नहीं बनी वहाँ जंगल बचे हैं। उसी पहाड़ के जंगल में महुआ के अनेक पेड़ हैं एवं गांव की लड़कियां वहां  महुआ चुनने जाती हैं। महुआ परिवार के लिए नगद फसल की तरह है, जिसे बेचकर नगद पैसे हाथ में आते थे।

नदी में दिन रात बालू उठाई का काम होता था। चौबीसों घंटे ट्रेक्टर लगे रहते जेसीबी मशीनों से बालू निकाला जाता है। बालू को शहर में ले जाकर बेचा जाता है। शहर में भवन निर्माण एक सतत प्रक्रिया है, जिसके लिए बालू, पत्थर, लकड़ी एवं ईंटों की आपूर्ति हेतु नदियों, पहाड़ों एवं जंगलों का भयानक दोहन दिया जा रहा है। शहर दानवी विस्तार पा रहे हैं एवं गाँव बेजान हो रहे हैं। नदियाँ मर रही हैं, पहाड़ रो रहे हैं, जंगल विलाप कर रहे हैं। बालू की ठेकेदारी बाहरी दबंग ठेकेदारों के हाथों में है, जो कभी-कभी किसी-किसी ग्रामीण को मुफ्त की दारू देकर अपनी ओर मिलाकर रखता है।

रांची से तीस-पैंतीस किलोमीटर दूर ऐसे ही एक गांव में रहती थी पूरनी। पूरनी के घर की भी वही कहानी थी। चार बहनों एवं दो भाइयों में सबसे बड़ी पूरनी गांव के अन्य बच्चों की ही तरह पढ़ाई-लिखाई छोड़ चुकी थी। गाँव की अन्य लड़कियों की तरह ही वह भी अपने माँ की मदद घरेलू छोटे-मोटे कामों में करती या गोटी खेलती।

परन्तु गाँव में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और अनेक तरह की परेशानियों के बावजूद, सुकून और शांति थी। बसंत के आने के बाद चारों ओर कोयल की कूक से वातावरण संगीतमय हो जाता था उस पर से बीच-बीच में अन्य पंछियों की आवाज़ से जो ध्वनि मिश्रण होता उससे लगता मानो प्रकृति कोई ऑर्केस्ट्रा बजा रही हो। इसी मौसम में महुआ के पेड़ से फूल गिरते थे। महुआ की खुशबू से समूचा वातावरण मस्त हो जाता था। पूरनी भी गांव की अन्य लड़कियों के साथ सुबह सबेरे उठकर पहाड़ पर महुआ चुनने जाती थी। रास्ते भर लड़कियाँ गीत गाते जाती- 

चल गे धनि महुआ बिछे

भइ गेलव विहान गे

घारे तोहिं देर करभीं

चोराय लेतव कोई आन गे

भुरुकवा उगलव, सतखटिया डुबलव

मुरूगवा देलकव बांग गे

चल गे धनि महुआ बिछे भइ गेलव विहान गे

(यानि सखियों महुआ चुनने चलो, सुबह हो गयी है। अगर तुम लोग घर में देर कर दोगी तो कोई और महुआ चुरा कर ले जाएगा। सूरज उग चुका है एवं तारों का समूह सप्तऋषि डूब चूका है। मुर्गे ने भी बांग दे दी है। सखियों महुआ चुनने चलो सुबह हो गयी है।)

पूरनी के गाँव की कई लड़कियां राँची में दाई का काम करती थीं। कुछ तो काम के सिलसिले में दिल्ली भी चली गयी थीं। पूरनी  जब चौदह वर्ष की हुई तो उसकी माँ ने यह तय किया कि उसे भी गाँव से बाहर भेज दिया जाये। लड़कियों के बाहर जाकर काम करने की एक वजह भूख और गरीबी तो थी ही इसकी एक और वजह थी। बीच-बीच में गाँव में उग्रवादियों का दस्ता आकर रुकता रहता था और नए लड़के-लड़कियों को अपने साथ ले जाता था। जो लड़कियां ले जाई गयी थीं, शुरू में तो उनसे खाना बनवाने या सामान ढुलवाने का काम किया गया परन्तु धीरे-धीरे उनका शारीरिक शोषण शुरू हो गया। गाँव वाले भी इस बात से अनजान नहीं रहे। अत: वे हमेशा इस बात से डरे रहते थे। वे बड़े होते बच्चों को बाहर भेजने लगे। 

हालांकि ऐसा नहीं है कि गाँव के बच्चे कमाने के लिए बाहर नहीं जाते थे। बच्चे पहले भी बाहर जाते थे। बाहर जाने वाले बच्चे  कमाकर अपना पेट तो भरते ही  थे, माँ-बाप की आर्थिक सहायता भी करते थे। लेकिन हाल के वर्षों में बच्चों खासकर लड़कियों के बाहर भेजने  की प्रक्रिया तेज हो गयी थी। बड़ी होती लड़कियों को कोई गाँव में रखना नहीं चाहता था।

पूरनी की फुआ राँची में रहती थी, जिसका पति वहाँ ड्राइवर का काम करता था। पूरनी अपनी फुआ के यहाँ रांची आ गयी। शीघ्र ही पूरनी को एक घर में काम पर रखवा दिया गया। वह दिन भर वहां काम करती और शाम में फुआ के घर आ जाती। यहाँ भी पूरनी को आराम नहीं था। फुआ के बच्चे संभालना, घर की सफाई करना और जूठे बर्तन मांजना उसी के जिम्मे का काम था। दिन यूँ ही गुजरते रहे। पूरनी को तीन हजार रुपये मिलते थे। इसमें से कुछ काट कर उसकी फुआ उसकी माँ को दे देती थी, जो महीने में एक बार रांची आती थी। उसी दिन वह पूरनी से भी मिलती थी और अपने पैसे लेकर चली जाती थी।

इस बीच जब कहीं से सौ,  दो सौ रुपये ज्यादा का ऑफर मिला तो उसकी फुआ ने पुराने जगह से काम छुड़वा कर उसे नए जगह पर लगवा दिया। इस तरह दो साल में पूरनी ने रांची में चार जगहों पर काम किया। सब जगह एक तरह के ही काम थे; सुबह पहुँच कर झाड़ू-पोंछा करना, बर्तन साफ करना, कपड़े धोना, रसोई के काम में हाथ बंटाना, खाने के बाद जूठे बर्तन उठाना। पूरनी यूं तो प्राथमिक विद्यालय गयी थी पर बहुत कोशिश करके एक दो शब्द पढ़ पाती थी, लेकिन थी होशियार और स्वभाव  की भी अच्छी इसलिए उससे काम कराने वाले हमेशा खुश रहते थे।

एक बार पूरनी के गाँव में रोजलिन नाम की एक औरत आई, जो वहीं पड़ोस के गाँव की थी। वह दिल्ली में रहती थी। वह पूरनी की माँ से मिली और उससे पूरनी के बाबत पूछा।

पूरनी की माँ ने उसे बताया कि वह रांची में काम करती है और  खिला-पिला के उसे दो हजार रुपये मिल जाते हैं।

दो हजार बस ! रोजलिन ने बुरा सा मुंह बनाया।

दिल्ली में तो लोग रोज का दो हजार कमाते हैं।

रोज का दो हजार! पूरनी की माँ ने आश्चर्य से कहा।

तो! वहां दो हज़ार महीना में कौन काम करता है? मैंने तो कितने लोगों को वहाँ काम पर रखवाया है। तुम पता कर लो और उसने अड़ोस पड़ोस के गाँव के एक दर्जन से ज्यादा लोगों के नाम बता दिए। पूरनी की माँ उनमें से किसी को नहीं जानती थी।

तुम चाहो तो पूरनी को भी दिल्ली में काम लगवा दें। कम से कम दस हजार रुपये महीने के तो मिल ही जायेंगे। ऊपर से अच्छा खाएगी, पहनेगी, दिल्ली में सिनेमा देखेगी, घूमेगी सो अलग। तुम नहीं जानती वहां पंजाबी लोग दिन भर में एक पाव मक्खन खा जाते हैं। जब वे खायेंगे तो तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी बेटी को नहीं देंगे क्या?

एक पाव मक्खन, अरे बाप रे पूरनी की माँ की आंखे फटी रह गयीं।

तो और क्या, कभी किसी पंजाबी को दुबला पतला देखा है? रोजलिन ने कहा।

सच तो यही था कि पूरनी की माँ को पंजाबी क्या होता है यही पता नहीं था, फिर भी उसने सहमति  में सिर  हिलाया।

हमारी पूरनी को दस हजार महीना मिल जायेगा? उसने पूछा , पूरनी की माँ ने ध्यान नहीं दिया कि दो हजार रुपये रोज का दावा करने वाली रोजलिन दस हजार महीना पर आ गयी थी।

हाँ मिल जायेगा, नहीं तो मैं क्या झूठ बोलती हूँ? तुम पूछ लो किसी से जिनको मैंने वहां लगवाया है। वह फिर से एक सिरे से नाम गिनवाने लगी, जिनमें से किसी को पूरनी की माँ नहीं जानती थी।  

दो महीने का एडवांस तो मैं तुम्हें अभी के अभी दे दूँगी और उसने अपने हैण्डबैग से पैसे निकाले और गिनकर बीस हजार रुपये उसके हाथ में रख दिए। पूरनी की माँ की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने इतने सारे पैसे एक साथ कभी नहीं देखे थे। उसने रोजलिन के सामने हाथ जोड़ दिए। वह समझ नहीं पा रही थी वह इस अचानक से आये फरिश्ते के प्रति कैसे अपनी कृतज्ञता अर्पित करे। गरीब आदमी को जब पैसे मिलते हैं तो उसको आगे-पीछे देखने की दृष्टि कम हो जाती है। इसी बीच पूरनी का बाप आ गया। उसने रुपये देखे तो उसमें से अपना हिस्सा मांगने लगा। किसी तरह पाँच सौ रुपये देकर पूरनी की माँ ने उससे पिंड छुड़ाया और वह दारू पीने चला गया।

पूरनी को किसी बहाने से उसकी माँ राँची से काम छुड़ा कर ले आई। पूरनी दस हजार रुपये महीना कमाएगी तो घर का सारा दारिद्रय दूर हो जाएगा। एक बार पूरनी जम गयी तो फिर धीरे-धीरे उससे  छोटी वाली को भी दिल्ली ही भेज देंगे। वह सोच रही थी। कोई राँची में भला क्यों काम करे, जब दिल्ली में दस हजार रुपये मिलते हैं। वहां अच्छा खाएगी पहनेगी तो देह में भी लगेगा। राँची में तो खाली ठगी है ठगी। पूरनी की माँ सोचने लगी।

एक दिन पूरनी को लेकर रोजलिन राँची चली गयी। राँची में पूरनी ने देखा कि स्टेशन पर उसके जैसी कई और लड़कियां हैं जिसे रोजलिन दिल्ली ले जाकर काम दिलाने वाली है। पूरनी को संबल मिला कि वह अकेले दिल्ली नहीं जा रही है।

रांची स्टेशन के एक कोने पर सभी लड़कियों को एक फुट ओवर ब्रिज के नीचे बैठा दिया गया। वहां सब गुमसुम बैठी रहीं, कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। मानो सबको हिदायत दी गयी थी कि किसी से बात नहीं करना। पूरनी को भी रोजलिन ने समझाया था कि किसी से बात नहीं करना। नहीं तो तुम्हारी वाली अच्छी नौकरी सब मांगने लगेंगे। थोड़ी देर में एक लड़का जिसका नाम सुखदेव था सबके लिए पाव रोटी और चाय लेकर आया। इसी बीच एक सिपाही वहां आया और उनसे पूछताछ करने लगा कि वे कहाँ से आई हैं और उन्हें कहाँ जाना है। लड़कियां डरी हुए चूहों की तरह चुपचाप एक दूसरे से सटकर बैठी रहीं। किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया। वहीं थोड़ी दूर खड़े सुखदेव ने मोबाइल से रोजलिन को खबर किया और रोजलिन दौड़ती हुई आई। वह सिपाही को एक ओर ले गयी। अपने हैण्डबैग में हाथ डाला, कुछ निकालकर सिपाही को पकड़ाया और सिपाही खुशी-खुशी मुस्कुराता हुआ वहां से चला गया।

दिल्ली पहुँचने के बाद लड़कियों को तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में बाँट दिया गया। स्टेशन के बाहर कुछ लड़के खड़े थे जिनके जिम्मे एक-एक टोली की लड़कियां कर दी गयीं।

पूरनी की टोली जिस लड़के के साथ गयी उसका नाम जगजीत था। वह हट्टा-कट्टा नौजवान था एवं उसने बड़े ही स्टाइल में अपने बाल कटाए हुए थे। उसके बाल छोटे-छोटे थे। कान के पास से बाल गायब थे और बीच-बीच में लकीरें बनी हुई थी। जगजीत, पूरनी और उसके साथ की लड़कियों को अपनी कार में बिठाकर वहां से पंजाबी बाग ले गया। पंजाबी बाग में जिस जगह उसने अपनी गाड़ी रोकी वह एक दफ्तर था। जिस पर बोर्ड लगा हुआ था जगजीत मानव सेवा केंद्र। पूरनी ने अटक अटक के किसी तरह इतना पढ़ा।

अहा! इस बड़े शहर के लोग कितने अच्छे हैं, सेवा करने के लिए ऑफिस खोला है। पूरनी ने सोचा।

उस ऑफिस में एक मेज, एक बेंच और कुछ कुर्सियां लगी थीं। उसी ऑफिस से सटा एक कमरा था, जिसमें जमीन पर गद्दे लगे थे और उसमें एक अटैच्ड बाथरूम भी था। उसी ऑफिस में पूरनी और उसकी टोली की तीन अन्य लड़कियों को ठहराया गया।

जगजीत ने लड़कियों को ढाबा से लाकर खाना खिलाया और ऑफिस को बंद करके कहीं चला गया। लड़कियां भी वहीं नहा-धोकर कमरे में सोई रहीं।

अगले दिन सभी लड़कियों को बाहर वाले कमरे में जिसमें ऑफिस था बिठा दिया गया। उन्हें बताया गया कि जैसे-जैसे इंतजाम होगा उनको नौकरी पर भेज दिया जाएगा? जब तक नौकरी का इंतजाम नहीं होता है वे शांति से रहे। जगजीत ढाबे से खाना लाता और उन्हें खाने को देता।

इसी बीच एक दिन जब सभी लोग बाहर वाले कमरे में बैठे थे, जगजीत एक लड़की को जो उनमें सबसे छोटी थी अन्दर वाले कमरे में ले गया और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। अन्दर से लड़की के चीखने की आवाजें आने लगीं। कुछ देर आवाजें आती रही फिर खामोश हो गईं। जैसे काटे जाने के पूर्व बकरा जोर से मिमियाता और छूरी चल जाने के बाद हाथ-पैर पटक कर शांत हो जाता है। थोड़ी देर में जगजीत कमरे से अपनी पैंट ठीक करता हुआ निकला। उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। लड़की अन्दर ही गद्दे पर बैठकर रोती रही। थोड़ी देर बाद सुखदेव आया। वह भी अन्दर गया और दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया। लड़की के चीखने की आवाज आई लेकिन इस बार आवाज धीमी थी। कुछ देर बाद एक-एक कर दो और लोग आये जिन्हें जगजीत ने अपना दोस्त बताया। वे भी बारी-बारी से कमरे के अन्दर गए। अब चीखने चिल्लाने की कोई आवाज नहीं आई। जब वे बाहर निकलते थे तो लड़की के दर्द से कराहने भर की आवाज आती।

बाहर बैठीं लड़कियां समझ रही थीं कि अन्दर क्या हो रहा है, पर उनकी हालत वैसी थी, जैसी उन बकरों की होती है जो कसाई की दूकान के बाहर बंधे होते हैं और उनकी आँखों के सामने ही किसी बकरे का कत्ल किया जाता है। एक अजीब सी लाचारगी थी। पाशविक आचरण कर रहे लोगों के लिए मानो वह रोज का काम हो और उन्हें मालूम हो कि कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं होने वाली है।  शाम में उस लड़की को नौकरी पर भेज दिया गया।  किसी को कुछ पता नहीं चला कि लड़की कहाँ और क्या काम करने गयी है।

अगले दिन फिर वही कहानी दूसरी लड़की के साथ दुहराई गयी। पहले जगजीत ढाबे से खाना लेकर आया। खाना खा लेने के बाद वह एक लड़की को लेकर अन्दर चला गया। इस बार लेकिन उसके दो दूसरे दोस्त आये। शाम में वह लड़की भी नौकरी पर चली गयी।

इस तरह से तीन लड़कियों के चले जाने के बाद चौथी रात को पूरनी अकेले वहां बच  गयी। वह कमरे में अकेली थी, जब जगजीत उसके लिए ढाबे से खाना लेकर आया। उसको आता देख पूरनी घबरा गयी एवं एक कोने में सिकुडऩे लगी। उसे लगा वह खरहा बन गयी है। जब वह छोटी थी और उसका बाप एक बार जंगल से उसके लिए एक खरहा लेकर आया था। वह उसके साथ खेलना चाहती थी पर डरा हुआ खरहा कोने में हाथ-पैर सिकोड़ कर दुबक गया था। उसे तब समझ नहीं आया था कि वह तो खरहा के साथ खेलना चाहती है फिर भी खरहा डर क्यों रहा है।

डरती क्यों है पगली, मैं बाघ नहीं हूँ कि तुम्हें खा जाऊंगा? जगजीत ने  कहा।

हम बाघ से नहीं डरते हैं बाबू, आपके जैसा आदमी से डरते हैं। पूरनी ने कहा।

जगजीत इस पर ठठा कर हँस  दिया।

अरे मैं तो तेरे से प्यार करने वाला हूँ। चल जल्दी से खाना खा ले और आज मुझे खुश कर दे कल तुम्हें नौकरी पे जाना है।

प्यार करने वाले तो शादी करते हैं, पूरनी ने प्रतिवाद किया।

शादी !! हा हा हा ..... इस तरह से तो रोज मुझे शादी करनी पड़ेगी पगली, पूरा झारखण्ड मेरा ससुराल हो जाएगा। वह फूहड़ तरीके से हँस दिया।

जल्दी से खाना खतम कर, कहकर उसने अपनी जेब से शराब की एक बोतल निकाली एवं गिलास में डालकर पीने लगा।

पूरनी ने जब उसे पहली बार देखा था तो वह उसे बहुत अच्छा लगा था। वह मन ही मन उसे प्यार करने लगी थी। लेकिन इन दो-तीन दिनों में उसने जो उसका वीभत्स रूप देखा था उससे उसे घृणा हो गयी थी। वह राँची में दो सालों तक विभिन्न घरों में काम करती रही थी पर उसे ऐसी कोई समस्या नहीं हुई थी। दिल्ली में आते के साथ उसे दानवी अनुभवों से गुजरना पड़ रहा था। लेकिन अब क्या किया जा सकता है? यहाँ से वापस जाना भी तो संभव नहीं है। न उसके पास पैसे हैं और न उसे पता है कि यहाँ से कैसे जाया जाए।

जगजीत ने अपनी शराब खत्म की और पूरनी को चूमने की कोशिश करने लगा। पूरनी ने उसे दूर धकेल दिया। जगजीत एक तरफ गिर गया। लेकिन वह एक मजबूत आदमी था। वह तुरंत बाज की तरह पलटा और पूरनी को पटक कर उसके ऊपर सवार हो गया। पूरनी छटपटाती रह गयी। वह दोनों हाथों से उसकी छातियों को भम्भोरने  लगा। पूरनी ने उठने की कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ। वह दुबली-पतली सी लड़की थी और यह एक पहलवान जैसा आदमी। थोड़ी देर में वह पस्त हो गयी। पूरनी को दर्द हो रहा था। दो बूँद आंसू उसकी आँखों से लुढ़क गए पर वह असहाय थी एवं कुछ कर नहीं पा रही थी। जगजीत ने कहा कि चुपचाप पड़ी रहे वरना उसका गला दबा देगा। पूरनी अब वहाँ अकेली बच गयी थी। वह बेतरह डर गयी।

थोड़ी देर में जगजीत उससे निबट कर बाहर निकल गया। पूरनी वहीं वैसे ही लाश की तरह पड़ी रोती रही। वह अभी एक छोटी बच्ची ही तो थी। अभी उसकी उम्र ही क्या हुई थी मात्र सोलह साल। उसे याद  है कि उसके उम्र की उसकी पहली मालकिन की बेटी कैसे अपने माता पिता से लाड़ करती रहती थी। उसके माँ-बाप उसे बस स्टॉप तक छोडऩे व लाने जाते थे।

अगले दिन पूरनी के साथ भी वही कथा दुहराई गयी। सुखदेव आया, जगजीत आया और उसके दो नए दोस्त आये। पूरनी लाश की तरह पड़ी रही। उसका अंग-अंग घाव की तरह दुख रहा था। शाम में जगजीत उसे उसकी नौकरी पर ले गया।

नौकरी क्या थी,  एक घर में दाई का काम था। पूरनी ने पहले सोचा था कि किसी दफ्तर या फैक्ट्री में कोई काम मिलेगा। यह एक  मेहरा साहब का घर था जहाँ साफ-सफाई, कपड़ा, बासन और खाना बनाने का काम करना था। मेहरा साहब और उसकी पत्नी दोनों नौकरी करते थे। पूरनी को सारा काम अच्छे से समझा दिया गया एवं उसी दिन से काम में लगा दिया गया।

पूरनी को सुबह पाँच बजे उठ जाना पड़ जाता था और उसके बाद वह जो काम में जुटती थी तो देर रात ही उसे छुट्टी मिलती थी।

पूरनी अपने गाँव के दिनों को याद करती तो उसे लगता कि वे कितने सुखकारी दिन थे। कितना अच्छा होता अगर वह अपने गाँव में ही रह पाती। धान काटना हो या कोई अन्य सामूहिक कार्य सभी कामों के लिए गीत बने हुए थे। सरहुल और करमा आता था तो लगता था कि पूरा वातावरण उल्लासमय हो गया है। पूरनी सरहुल में खूब नाच करती थी। वहां गरीबी थी लेकिन जीवन आनंद से भरा था।

मेहरा दम्पति जब काम पर चले जाते थे तो पूरनी को घर में बंद कर दिया जाता। उसे अकेले में टीवी देखने की भी इजाजत नहीं थी। टीवी के रिमोट को बाकायदा छुपा दिया जाता था।

काम के अत्यधिक दवाब एवं घुटन भरे माहौल के कारण पूरनी शीघ्र ही वहाँ ऊब गयी। वह अपने घर वापस जाना चाहती थी। एक दिन उसने हिम्मत करके अपनी मालकिन मिसेज मेहरा को कहा कि वह वापस जाना चाहती है। जिस पर मिसेज मेहरा ने कहा कि उसका एक साल का वेतन एक लाख रुपये जो उसने एजेंसी वाले जगजीत को एडवांस दिया है वह वापस करो फिर जाओ।

एक लाख रुपये, एक साल का एडवांस! पूरनी को तो ये सब  कुछ भी पता नहीं था। वह कहाँ से लाएगी एक लाख रुपये? उसे तो किसी ने यह नहीं बताया। वह जगजीत से इस सम्बन्ध में बात करना चाहती थी पर यहाँ छोडऩे के बाद जगजीत कभी उससे मिलने नहीं आया। मिलने भी क्यों आता उसका तो यह धंधा है। रोज ऐसी लड़कियों को किसी मेहरा, मल्होत्रा के यहाँ पहुंचाता रहता है। रोजलिन तो जो स्टेशन से गायब हुई उसका इसने फिर कभी नाम भी नहीं सुना।

पूरनी जाल में फँसे हिरन की भांति छटपटा कर रह गयी।

धीरे-धीरे एक साल बीतने को आया। इस दौरान उसे एक भी पैसा नहीं दिया गया। पूरनी की माँ को भी इस दौरान एक भी पैसा हाथ नहीं लगा। जो बीस हजार रुपये शुरू में मिले थे, वह अभी तक उसी पर संतोष कर रही थी। रोजलिन  का कहीं कोई अता पता नहीं था। वह इधर-उधर पता करने की कोशिश करती पर असफलता ही हाथ लगी। पूरनी की भी उसे कोई खोज खबर नहीं थी।

एक दिन मेहरा साहब घर जल्दी लौट आये, तबियत खराब होने का बहाना लेकर। घर में पूरनी और मेहरा साहब के अलावा कोई नहीं था।  मेहरा साहब ने पूरनी को सर दबाने के लिए कहा। पूरनी उनका सर दबाने लगी और मौका पाकर मेहरा साहब ने उसे दबोच लिया। पूरनी एक बार फिर दिल्ली की दरिंदगी की शिकार हो गयी। जिसके बाद मेहरा साहब ने एक पाँच सौ रुपये का नोट पूरनी को देकर चुप रहने की सख्त हिदायत दी। 

पूरनी ने उस पाँच सौ रुपये के नोट को बहुत सम्हाल कर रख लिया। पूरनी को लगता दिल्ली दरिंदों का शहर है। वह अब किसी भी कीमत पर वहां से भाग जाना चाहती थी। लेकिन उसमें  अकेले जाने की हिम्मत नहीं थी। उसे पता नहीं था कि मेहरा के घर से निकल कर वह राँची कैसे पहुँच सकती है। इस एक साल के दौरान वह एक बार भी मेहरा के घर से बाहर नहीं निकली थी। उसकी जिंदगी मेहरा के घर की चारदिवारियों में कैद रह गयी थी। उसे हमेशा ताला बंद करके रखा जाता था।

  इस घटना के बाद से उसे मेहरा से घिन आने लगी थी। अभी तक उसने ईमानदारीपूर्वक काम किया था और अब जब एक साल हो गए थे तो वह इस भार से भी मुक्त थी कि उसे काम करके एक लाख रुपये चुकाने थे।

एक दिन पूरनी काम खत्म करके घर में अकेले चुपचाप उदास बैठी थी। मेहरा और उसकी पत्नी कार्यालय जा चुके थे। उसी बीच मेहरा का ड्राइवर बबलू वापस घर आया। मेहरा अपना टिफिन घर में भूल आया था और उसने बबलू को चाभी देकर टिफिन लाने के लिए भेजा था।

बबलू ने घर का दरवाजा खोला और पूरनी से टिफिन माँगा। पूरनी ने बबलू से कहा कि वह यहाँ से भाग जाना चाहती है और वह उसकी  मदद करे। पूरनी ने पिछले दिनों महसूस किया था कि बबलू उसे तिरछी नजऱों से ताड़ता रहता है। उसने बबलू का हाथ पकड़ लिया और बहुत प्यार से पूछा क्या तुम मेरे लिए इतना नहीं करोगे। बबलू बीस इक्कीस साल का लड़का था। वह अचानक से सकपका गया। फिर सम्हल कर पूछा कि वह भागना क्यों चाहती है। पूरनी ने उसे मेहरा द्वारा की गयी हरकत के बारे में बताया और कहा मेरे पास पाँच सौ रुपये हैं वह तुम चाहो तो ले लो लेकिन तुम्हें मुझे रांची जाने वाली ट्रेन में बैठाना होगा। पूरनी ने कहा

बबलू हँस पड़ा, पाँच सौ रुपये मैं ले लूँगा तो तुम ट्रेन की टिकट कहां से खरीदोगी?

तो तुम्हें क्या चाहिए? पूरनी ने पूछा।

तुम्हारे पास क्या है बबलू ने हँसते हुए कहा।

मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। पूरनी ने कहा।

तुम्हारे पास तो बहुत कुछ है, कहते हुए बबलू ने पूरनी को बांहों में भर लिया। पूरनी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। जिस दिल्ली में वह कई बार दरिंदगी का शिकार हुई थी वहां एक बार और सही। बबलू को तो वह पसंद भी करती थी।

अच्छा चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ पर पहले मैं टिफिन साहब को पहुँचा दूंगा और तब फिर तुम्हें छोड़ दूंगा।

बबलू ने पूरनी को आनंद विहार स्टेशन पर छोड़ दिया। उसने रांची जाने वाली ट्रेन का एक टिकट खरीद दिया। पर दिक्कत यह थी कि राँची की ट्रेन रात में खुलती थी और अभी दोपहर ही थी। बबलू ने पता किया कि रांची जाने वाली ट्रेन किस प्लेटफार्म से खुलती है और उसने पूरनी को उसी प्लेटफार्म पर बिठा दिया। प्लेटफार्म पर पूरनी डरी-सहमी बैठी रही। इस बीच कुछ आवारा किस्म के लड़के उसके इर्द-गिर्द मंडराने लगे। एक ने पूछा कि वह कहाँ जाएगी? इसके बाद वह और भी घबरा गयी। दिल्ली का भय उस पर छाने लगा। वह वहां से उठकर उस तरफ चली गयी जहाँ कुछ लोग बैठे हुए थे और उनसे सट कर बैठ गयी।

ये ... क्या कर रही है? उधर बैठो, उसमें से एक औरत ने कहा।

कहाँ जाना है तुमको? औरत ने उसे डरी हुई देखकर पूछा। उसने बताया कि उसे रांची जाना है। संयोग से वह परिवार जिसमें दो औरतें एवं तीन पुरुष शामिल थे रांची ही जा रहा था।

उन्हें समझते देर नहीं लगी कि लड़की किसी परेशानी में है। उन्होंने उसे आश्वासन दिया और कहा कि वे उनके साथ ही बैठें। उनके साथ बैठने के बाद पूरनी जरा आश्वस्त हो गयी तो धीरे-धीरे उसने उन्हें अपने साथ घटी सारी घटनाओं की जानकारी दी।

नियत समय पर रांची जाने वाली ट्रेन आई और पूरनी डरते-डरते उसमें सवार हो गयी। राँची जाने वाले परिवार ने जिसके मुखिया एक वकील थे, उसे अपनी बोगी में साथ में बिठा लिया। अब पूरनी को लगने लगा था कि वह राँची पहुँच जाएगी।

ट्रेन के खुलने के थोड़ी देर बाद  पूरनी ने देखा कि रोजलिन जो उसे दिल्ली लेकर आई थी वह भी उसी बोगी में है। रोजलिन की नजर भी उस पर पड़ गयी। पूरनी उसे देखकर घबरा गई।

उसे देखते ही रोजलिन की आँखों में चमक आ गयी। वह तुरंत ही उसके पास आ गयी। उसका हाल-चाल पूछने लगी। उसने पूछा कि वह कहाँ जा रही है?

रोजलिन ने उसे फिर से झांसे में लेने की कोशिश की। उसने कहा कि वह अगर इस बार उसके साथ दिल्ली चले तो उसे बहुत बढिय़ा बंगले में काम दिलवाएगी, जहाँ उसे पंद्रह हजार रुपये महीना मिलेगा।

रोजलिन के वहां से हटते ही वकील साहब ने पूरनी से उसके बारे में पूछा। पूरनी ने वकील साहब को डरते-डरते बता दिया कि यही वह औरत थी जो उसे दिल्ली लेकर आई थी। वकील साहब ने उसे निश्चिंत होकर बैठने के लिए कहा।

ट्रेन जैसे ही रांची पहुंची कुछ सिपाहियों के साथ एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग के सदस्य बोगी में पहुँच गए एवं उन्होंने रोजलिन को पकड़ लिया। वकील साहब ने रास्ते से ही उन्हें फोन करके इसकी सूचना दे दी थी कि लड़कियों की ट्रैफिकिंग में संलिप्त एक औरत ट्रेन में सफर कर रही है. जिस पर उन्होंने त्वरित कारवाई की।

जब पूरनी अपने गाँव वापस पहुंची तो वह चैत का महीना था। सुबह सुबह उसकी नींद लड़कियों के इस गीत से टूटी-

चल गे धनि महुआ बिछे

 भइ गेलव विहान गे

घारे तोहिं देर करभीं

 चोराय लेतव कोई आन गे

 भुरुकवा उगलव, सतखटिया डुबलव

मुरूगवा देलकव बांग गे

चल गे धनि महुआ बिछे भइ गेलव विहान गे

एक खांची उठाकर पूरनी भी उनके साथ साथ चल दी। सुबह-सुबह गाँव की ताज़ा हवा उसके शरीर में प्राण का संचार कर रही थी। उसने निश्चय किया कि वह अब रोजलिन जैसी औरतों से गाँव की लड़कियों को बचाएगी।  

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