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Tuesday 20 Aug 2019

खूंँटी पर टंगा नीला कोट

मेरा घर गाँव के एक बाहरी किनारे पर था, घर पुराना था और बड़ा भी। घर में हमारा और चाचा का परिवार इक_ा ही रहता था, घर के एक तरफ  बड़ी बैठक थी और उसके सामने बड़ा बरामदा। घर में आने-जाने वाले बाहरी व्यक्ति या मेहमान इसी बैठक में बैठते थे, बैठक से लगते ही जानवरों की कुढ़ थी जिसमें चारा काटने के लिए मशीन व खेत में काम आने वाला आलतू-फालतू सामान पड़ा रहता था। बैठक से लगा हुआ घर का दूसरा हिस्सा था जिसमें हमारा व चाचा का परिवार एक साथ रहता था। बैठक के बरामदे के बाहर का हिस्सा घर के मुख्य आंगन की तरह था यहीं से घर में आना-जाना होता था। बैठक के बरामदे में दरवाजे से हटकर दादा जी का तख्त बिछा रहता था। घर में आने-जाने वालों पर उनकी निगाहें रहती थी, दादा जी के तख्त के ठीक सिरहाने लोहे की एक मजबूत खूंँटी पर दादाजी का कोट टंगा रहता था। मैं उस समय कक्षा पाँच में था और लगभग नौ वर्ष का रहा होउंगा, दादाजी के इस कोट के बारे में घर के हर व्यक्ति की कुछ अलग-अलग राय थी। पिताजी एक बात बताते थे तो माँ कुछ और। चाचा और बुआ कुछ अलग ही बताती रही थी। बात चाहे जो भी रही हो पर उस उमर तक आते-आते मुझे इतना तो याद है कि खूंटी पर टंगे दादाजी के इस कोट को उनके अलावा घर का कोई और व्यक्तिछेड़ नहीं सकता था ना दादाजी उसे कभी धुलवाते थे और न ही कभी झाड़तेे-पोंछते थे। जहाँ तक मुझे याद है साल में दो-चार बार ही दादाजी उस कोट के अन्दर लगी हुई जेबों को टटोलते थे और वे भी तब जब बैठक के आस-पास कोई ना हो। कोट बहुत भारी-भरकम व सुन्दर था, उसका रंग चमकदार था। कोट में सुन्दर जेबें लगी थी और जितनी जेबें बाहर थी, शायद उससे ज्यादा जेबें कोट के अन्दर थी। यह इस कोट की करामात ही थी कि घर में पिताजी को छोडकर सभी को एक या दो बार दादाजी की छड़ी की मार खानी पड़ी होगी। जब भी दादाजी को लगता कि कोई कोट को छेडऩे की कोशिश में है या फिर कोई घर की महिला साफ-सफाई करते हुए कोट को छू गई हो तो बिना पूछताछ किये दादाजी उसे अपनी छड़ी से मारकर मजा चखाते और फिर मुस्कराते हुए अपनी घनी सफेद रौबदार मूंछों से ढंके होंठों को अंगूठे से सहलाते हुए उसे हिदायत देते-''तुझे दिखता नी मेरा कोट गिराके ही दम लोगेÓÓ।

घर में दादाजी का पूरा रौब था व सम्मान भी, घर का कोई भी सदस्य उनकी बात के खिलाफ  बोलने या जाने की हिम्मत नहीं कर पाता था। पिताजी की भी दादाजी से ज्यादा बात नहीं होती थी किसी बात या सलाह-मशवरे पर दोनों में 'हूँÓ, 'हाँÓ से ज्यादा कुछ नहीं होता था, इसलिए दादाजी के गुस्से का शिकार चाहे कोई भी बना हो उसे लेकर घर में न शिकायत होती थी न बहस। कई बार तो इसे लेकर दादाजी ने मुझे व चाचाजी के बच्चों को भी छड़ी से डराकर दूर तक दौड़ाया और एक-दो बार तो मार भी खानी पड़ी, पर माँँ व चाची ने सिर्फ  इतना ही समझाया कि कोट के आस-पास उछल-कूद मत किया करो। दादाजी का कीमती कोट खराब हो जायेगा। जब भी बड़ी बुआ हमारे घर आया करती थी तो वे अकसर दादा-दादी की बातें किया करती थी। बुआ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं, वे दादा-दादी के झगड़ों के बड़े रोचक किस्से सुनाया करती थी। दादाजी की एक आदत थी कि वे घर से बाहर रूकना पसन्द नहीं करते थे और जब कभी शहर सेे घर वापस लौटते तो दादी को पता रहता था कि दादाजी काफी लेट होने पर भी लौटकर घर ही आयेंगे। बुआ बताया करती थी कि सर्दियों की रातों में दादी देर रात तक चूल्हे में आग जलाकर अकेले बैठी-बैठी दादा जी के आने का इन्तजार करती रहती थी और घर से रसोई के बीच आते-जाते दादा जी की चिन्ता में न जाने कितनी आशंकाएँ व्यक्त करती थी। रास्ते में जंगल पड़ता था जिसमें कभी-कभी लुटेरे भी आने-जाने वालों के साथ मारपीट करते थे और जंगल से बच गए तो नदी के रास्ते श्मशान पड़ता था जिसमें आने-जाने वाले अकसर भूत-प्रेत की अलग-अलग किस्से-कहानियाँ सुनाया करते थे। ये सब जानते हुए भी दादा जी डर के मारे घर आने से कभी नहीं रूके। दादी ने भी कई बार आग्रह किया कि ''देर मत किया करोÓÓ। दादा जी 'हूँँ, 'हाँÓ करके बात टाल जाया करते थे और दादी हमेशा चिन्ता में डूबकर चूल्हे के आगेे बैठी देर रात तक दादा जी का इन्तजार करती रहती थी और जब दादा जी देर रात में घर आते थे तो किसी न किसी बात पर दादी को डाँट-फटकार किया करते थे। दादा जी की आवाज सुनकर सब लोग जाग जाते और तब  दादी दुखी होकर दादा को कोसती ''तुम्हें कोई भूतड़ी नी मिलती रास्ते में जो तुम्हारे गुस्से को उतार देÓÓ। बिस्तरे में दुबके सब भाई-बहन मन ही मन दादी पर खिझते कि ''क्यों वह इतनी रात तक बैठ-बैठकर दादा जी की चिन्ता करती है और दादा जी हैं कि आते ही दादी पर चिढऩे लगते हैंÓÓ। और इस तरह लड़ते-झगड़ते दादी अचानक बीमारी की वजह से युवावस्था में ही दादा जी को छोड़कर चली गई।

दादाजी के सामने उनके कोट के बारे में कोई कुछ बात नहीं करता था, परन्तु विभिन्न अवसरों पर इधर-उधर दादा जी के कोट के बारे में जब भी कोई बात होती तो हम सब बच्चे उसे खास रूचि लेकर सुनते थे। इधर-उधर सुनी गई तमाम कडिय़ों को जोड़कर उस समय दादाजी के कोट के बारे में मेरे पास दो-तीन किस्से थे।

पिताजी बताया करते थे कि एक बार कोई अंग्रेज अफसर जंगल में शिकार खेलने आया था, इस काम के लिए गाँव से हरकारों की जरूरत थी दादाजी को भी हरकारों की टीम में शामिल किया गया था। शिकार के दौरान  दादा जी ने अपनी जान पर खेलकर बड़ी बहादुरी से अंग्रेज अफसर को बचा लिया था तब उसने इनाम के तौर पर दादाजी को अपना यह कीमती कोट दिया था।

इसके उलट माँ कुछ और ही कहानी बताया करती थी कि दादाजी सात कोस पैदल चलकर रोज सुबह कन्धे पर बहंगी में दूध रखकर रूड़की छावनी में देने जाया करते थे। दादाजी एक अंग्रेज अफसर के बंगले पर भी दूध दिया करते थे। दादाजी ने कई सालों तक उन्हें खरा दूध दिया था, मेमसाहब दादाजी से बहुत खुश थीं और जब वे छावनी छोड़कर गये तो उन्होंने खुश होकर यह कोट दादाजी को दिया था।

चाचा और बुआ बताते थे कि गाँव में रांघड़ों का डेरा था जहाँ गाँव के लोगों से अंग्रेज लगान वसूल कराते थे जब अंग्रेज अफसर आते थे तो वे लम्बी-चौड़ी कद काठी के दादाजी को अपनी सेवा में बुलवाया करते थे। दादाजी पहलवानी का शौक भी रखते थे। एक बार गाँव में ताजिये के मेले में दादाजी ने ऐसे पहलवान को पटकनी दी थी जिसने गाँव के पूरे मेले में अपना लंगोट घुमा दिया था। दादाजी की वाह-वाही की खबर अंग्रेज अफसर को भी मिली तो उसने इनाम के तौर पर दादाजी को यह कोट दिया था।

कोट के बारे में सबकी अलग-अलग कहानियाँ क्यों थी, तब मैं यह तो नहीं जान सका पर इतना जरूर पता चला कि दादाजी को यह कोट इनाम के तौर पर किसी अंग्रेज अफसर से मिला है और यह वही समय था जब नौ साल के मेरे बाल मन में दादाजी के कोट के अन्दर लगी जेबें देखने की उत्कंठा प्रबल होने लगी। मैं कोट को पहनकर सामने लगी दोनों जेबों में हाथ डालकर देखने के लिए सपने देखने लगा। मैं मन ही मन बिस्तर पर लेटे या घुमते-फिरते छुपकर दादाजी का कोट पहनकर देखने की योजनाएँ बनाने लगा। अक्सर तो दादा ज्यादा समय बरामदे में ही बैठे रहते थे और उनके पास तख्त पर उनकी छड़ी रखी रहती थी जिसे देखकर डर के मारे कोट देखने की इच्छा मन मेें ही दब जाती। अगर थोड़ी देर के लिए दादा दिशा फरागत के लिए जंगल जाते तो उस समय घर में कोई न कोई जरूर रहता। दिन में स्कूल जाना रहता था इसलिए लम्बे समय तक कोट देखने के लिए कोई भी योजना कारगर साबित न हुई।

लम्बा समय गुजर गया था मैं कोट देख न सका। एक दिन मैंने अपने मन की योजना अपनी ही उम्र के पड़ोस के एक लड़के से साझा की जो मेरा ही सहपाठी था। एक दिन जब दादाजी घर के पिछवाड़े खलिहान में गये, मैंने मौका देखकर कोट देेखने की योजना बनाई। मैंने अपने सहपाठी को चौकन्ना रहकर घर में आते-जाते लोगों पर नजर रखनेे के लिए कहा और खुद दबे पाँव तख्त पर चढ़ गया, मैं पहली बार कोट को समीप से घूर कर देख रहा था कि तभी उसने दादाजी के आने की सूचना दी, मैं कोट को छू भी नहीं पाया था और दादाजी मेरी नादानी को भाँप चुके थे। दादाजी ने सहपाठी की तरफ  अपनी मोटी-मोटी आँखें फाड़कर छड़ी घुमायी तो वह इतना डर गया कि उसने बिना कुछ पूछे दादाजी को साफ-साफ  कोट देखने की मेरी योजना के बारे में बता दिया। वह तो भाग निकला लेकिन मेरे भागते-भागते भी दादाजी ने छड़ी मेरी टांग पर दूर से फेंक कर मारी, मैं उलझकर गिर गया था फिर हबड़-तबड़ उठकर भागा, डर के मारे मैं उस दिन पड़ोस में ही देर तक बैठा रहा, घर लौटने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। शाम के धुंधलके में जब मैं छुपता-छुपाता घर की रसोई में पहुंचा तो मैं आशंकित था कि जरूर दादाजी ने यह बात घर में बताई होगी और घर जाते ही मेरी पिटाई होगी पर घर गया तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। माँ ने प्यार से पूछा-''इतनी देर तक क्यों खेलते रहे? चलो हाथ धोकर खाना खालोÓÓ। घर में यह देखकर कि सब कुछ सामान्य है मेरी जान में जान आई। पर इस घटना से मैं बहुत दिनों तक कोट देखने की अपनी योजना निरस्त कर चुका था। लगभग डेढ़ वर्ष बाद एक शाम को दादाजी की तबियत ज्यादा खराब हो गई। शाम को ही घर के सब लोगों ने तय किया कि अगले दिन सुबह दादाजी को शहर के डॉक्टर के पास ले जायेंगे। मैं सुबह जान-बूझकर देर से उठा और उस दिन स्कूल न जाने के लिए बहाना रात को ही सोच लिया था, मैंने माँ के सामने दो-तीन बार करवट बदली औेर ऊँ ऊँ करके जोर से पेेट को हाथ सेे दबाया, स्कूल जाने के लिए माँ के पूछने पर मैंने बहाना बनाया कि मेरे पेट में मरोड़ उठ रहा है इसलिए मैं आज स्कूल नहीं जाऊंगा। मैं देर से उठा तब तक पिताजी दादाजी को लेकर जा चुके थे, मैं जाकर दादाजी के तख्त पर लेट गया। आज माँ घर ही थी और वह किसी न किसी काम से बरामदे के आस-पास ही घूम रही थी, बीच-बीच में मुझे पूछ रही थी कि अजवायन से पेट का दर्द कम हुआ या नहीं। मैं बहाना बनाकर मुँह ढककर लेट गया और सोने का उपक्रम करने लगा परन्तु आज माँ बरामदे के सामने ही कोई न कोई लम्बा काम लेकर बैठ गई पहले देर तक छाज से गेहूं पछोड़ती रही फिर बरामदे में रखी चक्की में हल्दी पीसती रही। दोपहर तक मुझे कोट देखने का कोई मौका नहीं मिला और मैं दुखी मन से उठकर गाँव की तरफ  चला गया, मैंने स्कूल की तरफ जाने का मन बनाया पर यह सोचकर रूक गया कि गुरूजी स्कूल नहीं आने का कारण जरूर पूछेंगे। पास के खेत में करतार चाचा बैलों को जोतकर मैढ़ा दे रहा था उसने मुझे आवाज देकर मैढ़े पर बैठा लिया। थोड़ी देर तक मैं रस्सा हाथ में पकड़कर मैढ़े पर झूलने का आनन्द लेता रहा और मैढ़े के आगे-पीछे उठती-बैठती चिडिय़ों का खेल देखता रहा। अब यह काम भी खतम हो गया था मैं लौटकर घर आ गया अब मेरे पास कोट देखनेे के लिए ज्यादा समय नहीं बचा था क्योंकि थोड़ी देर में छोटे भाई-बहन भी स्कूल से लौटनेे वाले थे। चाची रसोई में थी और माँ नहाने चली गई थी। मैं खूंटी के पास तख्त पर बैठ गया और दाँये-बाँये देखकर तख्त पर चढ़ गया, कोट के बाहर की जेबें बड़ी सुन्दर थी, मैंने बाहर की जेब में जैसेे ही हाथ लगाने को  बढ़ाया चाची रसोई सेे बाहर निकल चुकी थी और मैं तख्त से कूदकर झट से अन्दर बैठक में चला गया। बैठक के दरवाजे से मुझे दूर रास्ते में पिताजी और दादाजी आते दिखाई पड़े, मैं चोर कदमों से निकलकर चुपचाप गाँव में खेलने चला गया। अब मैं कक्षा आठ में आ गया था, दादाजी मुझे काफी अच्छा मानने लगे थे और मुझे समझदार कहकर अकसर दूसरों के सामने मेरी तारीफ  भी करने लगे थे। दादाजी की इस तारीफ  के बोझ से कोट देखने की अपनी प्रबल इच्छा में अब मुझे कमी करनी पड़ी, पर अधूरी इच्छा जितनी दबाओ उतनी ही ज्यादा उमडऩे लगती है। एक दिन पड़ोस के एक घर में सगाई का कार्यक्रम था, सगाई मेें जो मेहमान आए हुए थे वे हमारे ही रिश्तेदार थे तथा वे जोर करके दादाजी को अपने साथ पड़ोस में ले गये थे, घर में सिर्फ माँ रूकी थी बाकी सब लोग भी सगाई के कार्यक्रम में शामिल होने गए हुए थे मैैं भाई-बहनों को सगाई में छोड़कर चुपके से घर लौट आया मैंने घर में झांककर देखा मां चारपाई पर लेटी हुई थी मुझे लगा माँ सो रही है, मैं झट से लौटकर बरामदे में आया और तख्त पर चढ़ गया, आज मैं बिना समय गवाएँ हर हालत में कोट देखने के लिए आतुर था।

इस उम्र तक आते-आते मैंने गाँव में बड़ी चपलता से पेड़ों पर चढ़कर आम व अमरूद खाने की दक्षता प्राप्त कर ली थी। लचकती जामुन की टहनियों के सिरों से जामुन तोड़कर खाने के आनन्द में टूटती शाखाओं से गिरकर बचने का कौशल सीख लिया था पर अब अपने ऊपर आत्मग्लानि होने लगी थी कि खूंटी पर टंगे दादाजी के कोट को अभी तक क्यों नहीं देख पा रहा हूँ जो कि अपने ही घर के बरामदेे में टंगा हुआ है, जहाँँ मैं दिन-रात रहता हूँ मैंने आव देखा न ताव दोनों हाथों से दादाजी के कोट को खूंटी से उतार लिया। सहसा मुझे एक परछाई का आभास हुआ, मैंने पलटकर देखा, माँ घर से बरामदे की ओर आ रही थी, कोट मेरे हाथों से छूटकर तख्त पर गिर गया था, माँ ने मुझे देख लिया था मैंने कोट को उठाकर वापस ज्यों का त्यों खूंटी पर टांग दिया। जाने क्यों आज माँ नाराज नहीं थी पर वह दार्शनिक जैसे भाव में मुझेे देख रही थी। इससे पहले कि मैं कुछ बोलता माँ ने मुझे पकड़कर प्यार से अपने पास बैठा लिया और कहने लगी-''मेरे इस घर मेें आने से पहले तुम्हारे दादा का सामान सारे घर में फैला हुआ था, मेरे आने के बाद उनका घर में आना-जाना कम हो गया उन्होंने अपनी दुनिया बैठक के इस बरामदे तक समेट ली। बड़े-बूढ़ों की भावनाएँ कभी-कभी एक चीज में सिमट जाती हैं और उनकी इच्छा के खिलाफ  उसके साथ छेड़छाड़ करना उनके दिल को चोट पंहुचाता है इसलिए बेटा दादाजी के कोट को मत छेडऩाÓÓ। माँ की इस बात को मैं कई दिन तक सोचता रहा और माँ के इस भावनात्मक आदेश से मन को कुछ विरक्ति सी हो गई, मैंने दादाजी के कोट की तरफ  से अपना ध्यान हटा लिया।

थोड़े दिन बाद आठवीं पास करके मैं हाईस्कूल करने के लिए देहरादून चला आया। बीच-बीच में मिलने के लिए घर भी जाता था तो माँ की बात याद आ जाती थी और मैंने कोट को देखने का विचार मन से निकाल दिया। धीरे-धीरे चार साल गुजर गये और मैं इण्टर पास करके यहीं से बीएससी कर रहा था। एक दिन घर से खबर आई कि दादाजी की तबियत बहुत खराब है और मुझे तुरन्त घर बुलाया गया था जब तक मैं घर पंहुचा दादाजी हमें छोड़कर इस दुनिया सेे विदा हो चुके थे।

दादाजी की अन्तिम यात्रा के लिए सभी लोग इक_े हो चुके थे अर्थी तैयार हो चुकी थी और अन्तिम यात्रा के लिए दादाजी को स्नान कराके नए कपड़े पहना दिए गए थे। दादाजी को अर्थी पर लिटाकर उनके ऊपर चादरें डाली जा रही थी। माँ ने मुझे एक तरफ बुलाया और दादाजी का बिस्तर व कपड़े एक चादर में बांध कर लाने के लिए कहा, ये कपड़े भी दादाजी के साथ श्मशान में ही ले जाने थे, मैंने थोड़ा अचकचाते हुए माँ से पूछ ही लिया कि दादाजी का कोट.....? माँ ने कहा-''उसे भी कपड़ों के साथ बांध देनाÓÓ।

बैठक में जाकर मैंने दादाजी की एक चादर बिछाई और उसमें दादाजी का बिस्तर व सारे धोती, कुर्तेे रख दिए। मैं इतना भावुक हो गया था कि आज खूंटी से दादाजी का कोट उतारने का मेरा मन नहीं हो रहा था मुझे लगा जैसे कोट के साथ दादाजी का वजूद ही उतर रहा है, थोड़ा ठहरकर कोट की तरफ  हिम्मत से मैंने हाथ बढ़ाया और दादाजी के कोट को उतारकर भावुकता में कोट से अपनी आंखों को ढंक लिया, अन्दर की एक जेब में मुझे कुछ रखा हुआ महसूस हुआ मैंने उसे निकालकर देखा उसमें एक रूमाल था जिस पर रंगीन धागे से दादाजी का नाम काढ़ा हुआ था और एक जोड़ी चांदी की पाजेब उसमें लिपटी हुई थी, मैं बहुत कुछ समझ चुका था, मैंने जल्दी से उन्हें छुपाकर अपनी पैंट की जेब में रख लिया और कोट को दादाजी के कपड़ों के साथ बांधकर उन्हें ले जाने के लिए बाहर रख दिया।

चादरों से ढंकी अर्थी को रस्सी से बांध दिया गया था। अर्थी को उठाने के लिए चार आदमी खड़े हो गए थे, मैं सबसे बड़ा पोता था इसलिए दादा जी का क्रियाक्रम मुझे ही करने के लिए कहा गया। घर से श्मशान की दूरी करीब दो किमी रही होगी, मैं तमाम रास्ते जेब में रखे रूमाल और पाजेब के बारे में ही सोचता रहा। श्मशान में अर्थी के लिए लकडिय़ां लगायी जा चुकी थी अर्थी की रस्सी को काटकर दादाजी को लकडिय़ों पर लिटाया गया। दादा जी के ऊपर अब सिर्फ  एक शॉल रखा गया था  बाकी सब चादरें उतार दी गयी थी, मैं जेब से रूमाल व पाजेब को निकालकर मु_ी में छिपाये हुए अन्तिम बार दादा को गले मिलने के लिए झुका और इसी बीच इन्हें दादा के कुर्ते के ऊपर वाली जेब में सबसे छुपाकर रख दिया, शॉल को मुँह के ऊपर तक ढंक दिया और इस तरह मैंने दादाजी का दाह संस्कार पूर्ण कर दिया।

 देहरादून लौटकर मैं सोच रहा था कि कि घरेलू नोक-झोंक के बीच भी हमारे बुजुर्ग प्यार को कितनी शिद्दत से बचा कर रखते हैं। मेरे हाथ में जूही का दिया हुआ लॉकेट था जिसके जरा सा कोण बदलते ही ''आई लव यूÓÓ का सतरंगी रंग भी बदल रहा था। बहुत दिनों बाद मैं उससे मिलने का मन बना रहा था।