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Wednesday 21 Aug 2019

नेह नाते

आठ नवम्बर दो हजार सोलह।

आज रात बारह बजे के उपरांत हजार और पॉंच सौ के नोट नहीं चलेंगे।

ज्योति का न बैंक खाता सम्पन्न है, न घर में नोटों के बंडल रखे हैं फिर भी टीवी पर आ रही अप्रत्याशित खबर ने उसे चिंतित कर दिया। उसकी चिंता चार बहनों के बाद बड़े अरमान से जन्मे भाई, चन्द्रमा को लेकर है। ज्योति फिर कीर्ति फिर प्रीति फिर नीति ......। बाबू को हर बार सदमा लगा, आजी ने हर बार एक दिन का अन्न त्याग किया, दिन भर रोने से अम्मा की ऑंखें फूल गईं। बिजावर के उस छोटे से घर को एक नर शिशु का इंतजार था। घर की प्रबल इच्छा शक्ति कहें या स्वाभाविक तौर पर चन्द्रमा का जन्म होना ही था। ज्योति अतिरेक से भर गई थी -

''कितना गोरा है। चंदा मामा की तरह।''

बाबू ने पहली बार प्रबलतम भाव से पितृत्व को महसूस किया ''तुम बहनों का चंदा मामा।  इसका नाम चंद्रमा होगा।''

चार पुत्रियों का जमावड़ा देख असहिष्णु हो चली अम्मा ने कुलीन स्त्री की तरह व्यवहार किया ''चंद्रमा अच्छा नाम है।''

बधाई गाती आजी ने अनुमोदन किया ''घर में उजियारा कर देगा।''

नोटबंदी का समाचार सुनकर ज्योति इसी चंद्रमा के लिये चिंतित है। आयकर अधिकारी है। बहनों के सम्मुख अपनी पूंजी का खुलासा नहीं करता लेकिन उसका रहन-सहन बताता है कितना सम्पन्न है। बिजावर के छोटे घर में रहते हुए चंद्रमा का स्तर बहनों से परिष्कृत रहता था। अब तो राजा और रंक जैसा फर्क आ गया है। पता नहीं कितना बैंक में रखे होगा, कितना घर में। नोटबंदी की खबर सुनकर बेचारे का रक्तचाप नीचे न सरक जाये। भंगिमा से ही नहीं, चेहरे से भी अमीर जान पड़ती उसकी पत्नी कामाक्षी, जिसका स्लोगन है - पैसा लड़ाई की जड़ होता है ......... अचेत हो गई होगी। ज्योति को चन्द्रमा से सेल फोन पर पूछताछ करने की व्याकुलता हुई पर वह खुलासा नहीं करेगा। सेल पर पूछताछ सुरक्षित भी नहीं। कामाक्षी जरूर कहेगी चंद्र मेरा इतना रुपिया चलन से बाहर हुआ जा रहा है। ज्योति जीजी मंगल मना रही है।

टीवी देख रहे कर्ण ने ज्योति की व्याकुलता को परखा -

''धन कुबेरों की टॉंय-टॉंय फिस्स। मॉं तुम्हारे पास हजार और पॉंच सौ के कितने नोट हैं?''

''दस-पन्द्रह होंगे। चंद्र की फिक्र हो रही है।''

''मामा जानें और सर्वश्रेष्ठ का गुमान रखने वाली मामी जानें।''

कामाक्षी को लेकर कर्ण की ही नहीं सभी की यही राय है। कामाक्षी ने पहले-दूसरे आगमन पर नम्रता दिखाई फिर संकेत दे दिया ऐसी दूरी बनाकर चलेगी जब सारे नेह -नाते स्वत: निरस्त हो जायेंगे।

चंद्रमा लड़कपन से घर में बादशाह बन कर रहा। अम्मा-बाबू के अतिरिक्त संरक्षण में मॅुंहजोर हो गया। बहनों का लिहाज करना या स्थिति पर कुछ सोचना उसे नहीं सिखाया गया। बहुत छोटी आय वाले बाबू उसे भरसक पैसा नहीं दे पाते थे लेकिन यथासम्भव देते थे। पैसे को लेकर उसके भीतर बेफिक्री रहती थी।  बहनों को उससे एक किस्म का भय लगता था लेकिन उसे ममता देती थीं। जानती थीं अम्मा-बाबू के अतिरिक्त संरक्षण का लाभ ले सबकी अवमानना करता है लेकिन यह उसका सिद्धांत या लक्ष्य नहीं है। ....... अब तो सम्पन्न ही नहीं सभ्य भी हो गया है। पैसे को लेकर बेफिक्री आज भी बनी हुई है। जब चंद्रमा की पोस्टिंग समीपवर्ती जनपद में हुई ज्योति को लगा था चंद्रमा को मुद्दत से नहीं देखा है। अपने नगर से कुल डेढ़ घण्टे की बस यात्रा कर ज्योति उससे उत्साहपूर्वक मिलने गई। चंद्रमा ने नम्र व्यवहार किया था जबकि कई अंगूठियों वाली उंगलियों को भाल पर रखकर कामाक्षी ने असहमति दिखाई -

''मैं इस इलाके में नहीं आना चाहती थी। चंद्रमा ने तबादला कैंसिल कराने की कोशिश नहीं की।''

ज्योति समझ गई कामाक्षी रिश्तों में ही नहीं इलाके में भी दूरी चाहती है।

''सुबह लौट जाऊंगी।''

कह कर ज्योति ने अपना गुनाह स्वीकार किया। प्रण किया दुबारा गुनाह नहीं करेगी। पर स्थितियां कई बार गुनाह को दोहराने के लिये विवश कर देती हैं। ज्योति के पति मंगलदीन नहीं रहे। ज्योति का सौतेला पुत्र जगत, मंगलदीन के सामने ही अलग हो गया था। निम्न औसत गृहस्थी का अल्प धन मंगलदीन की व्याधि और ज्योति की पुत्री के विवाह में लग गया। कर्ण को एमबीए के अच्छे संस्थान में प्रवेश मिल रहा था। फीस के लिये पूरा इंतजाम नहीं हो पा रहा था। कामचलाऊ गृहस्थी वाली बहनों से मॉंगना उन्हें दिक्कत में डालना था। बस द्वारा कुल डेढ़ घण्टे की दूरी पर पदस्थ चंद्रमा। अक्सर नहीं पर चंद्रमा से मोबाइल पर बात होती थी। कुशल क्षेम पूछना एक बात है, अपनी जरूरत बताना दूसरी बात। चंद्रमा से लगने वाला एक किस्म का भय ज्योति के भीतर अब भी था। पचास हजार मांगते हुए ज्योति का लहजा कॉंप रहा था। चंद्रमा ने पैसे को लेकर बेफिक्री दिखाई -

''आ जाओ जीजी। इतना पैसा मेरे पास हमेशा रहता है।''

कामाक्षी के दर पर जाते हुए ज्योति को हीनता का बोध हो रहा था। कामाक्षी ने उसे हीन की तरह ही देखा -

''हॉं, चंद्र ने बताया था आप आने वाली हैं। जीजी, अचानक कैसे ?''

प्रयोजन बताने के लिये ज्योति ने चंद्रमा को देखा। चंद्रमा नकार में शीश डुला रहा था। ज्योति को संकेत मिला -

''तुम लोगों को देखने आ गई कामाक्षी। कल सुबह लौट जाऊॅंगी।''

कामाक्षी ने आह भरी ''यह जगह मुझे बिल्कुल रास नहीं आ रही है। पता नहीं यहां कितने साल रहना पड़ेगा। वह तो अच्छा है जो यहॉं विन्ध्य क्लब है। थोड़ा मनोरंजन हो जाता है। आज क्लब में मीटिंग है। रविवार को आनंद मेला लगाना है। उसकी चर्चा होगी। जल्दी लौटने की कोशिश करूॅंगी।''

कामाक्षी के क्लब गमन को चंद्रमा ने सुविधा की तरह देखा। आलमारी से पचास हजार निकाल लाया -

''लो, जीजी। मेरी आलमारी में एक पुराना कोट टंगा है। उसकी अंदर वाली जेब में थोड़ा-बहुत रुपिया रखता हंू। समझ लो वह कोट नहीं मेरी ट्रेजरी है जिसका सुराग किसी को नहीं मिलता।'''

रुपिया लेते हुये ज्योति को लगा उसने अपनी हीनता बढ़ा ली है। बोली -बड़ी रकम है चंद्र। धीरे-धीरे लौटा दॅंूगी।''

चंद्रमा को ज्योति दयनीय लगी। कैसे होते हैं रक्त संबंध और कैसे बदल जाती है व्याख्या। एक घर के कितने घर हो जाते हैं, कितने परिवार बन जाते हैं, प्राथमिकताएं अलग हो जाती हैं। आय अलग हो जाती है। बहनें अधिकार नहीं उधार मांगती हैं।

''ऐसी बड़ी भी नहीं है जीजी। तुम कर्ण को एडमीशन दिलाओ।''

''कामाक्षी को मालूम है न ? कभी उसे पता चलेगा तो ..........

वे झूठ भरोसेमंद होते हैं जो अच्छी नीयत से बोले जाते हैं -

''मालूम है।''

''जल्दी लौटा दॅंूगी।''

थोड़ा-थोड़ा बचाने का ज्योति भरसक प्रयास कर रही थी पर एक मुश्त पचास हजार उसके लिये सचमुच बड़ी रकम थी। किश्तों में चुकाना उसे चंद्रमा की गरिमा के विपरीत लगता था। किश्तों में बार-बार पैसे देने जाये तो कामाक्षी कहेगी ज्योति जीजी डेढ़ घंटे की दूरी का बहुत फायदा उठा रही है। लेकिन सोच सकती है जीजी ने पैसे हड़प लिये। ज्योति पूरी तरह असमंजस में। कामाक्षी के सेल पर कॉंल किया - ''........... कामाक्षी, कर्ण की फीस ही इतनी है कि तुम्हारे पैसे नहीं लौटा पा रही हॅंू। एक एफडी मेच्यौर होने वाली है। जल्दी ही पैसे देने आऊॅंगी।''

कामाक्षी ने इस अनभिज्ञता का सामना चतुरता से किया ''हॉं, जीजी, चंद्र बता रहे थे आपको कर्ण की फीस के लिये पैसे दिये हैं।ÓÓ

ज्योति के सिर से भार उतरा। नहीं जानती थी खुलासा कर कामाक्षी के तेवर को तीर की तरह तराश दिया है। कामाक्षी ने चंद्रमा को अभियुक्त की तरह देखा - ''ज्योति जीजी को कितना रुपिया दिया है ?''

पैसे को लेकर बेफिक्री रखने वाले चंद्रमा को सहसा याद न आया ''ज्योति जीजी को?''

''तारीख बताऊॅं?''

''पहली बार दिया है।''

''कितना?''

''पचास हजार।''

''बाकी बहनों को कब और कितना दिया है ?''

''बहनें आती ही कब हैं जो दॅंूगा।''

''पैसा लड़ाई की जड़ होता है। मुझे रिश्तेदारी में लेन-देन पसंद नहीं है। जीजी को बोलो पैसा लौटाएं। मेरा पैसा किसी को हजम नहीं होगा।''

एफडी परिपक्व होने पर ज्योति आई -''कामाक्षी गिन लो।''

कामाक्षी दक्ष गणितज्ञ की भांति गिनने लगी। सुजान ननदिया ने भूल-चूक जैसी चतुरता दिखा कर हजार - दो हजार कम दिये हों तो चंद्रमा के समक्ष धूर्तता साबित हो जायेगी। चंद्रमा, कामाक्षी की गणना देख रहा था। पैंसठ हजार। कामाक्षी के मुख पर लाभ पाने की चमक। रुपिया रखने तेजी से शयन कक्ष में चली गई। चंद्रमा ने ज्योति की सदाशयता और कामाक्षी की धूर्तता देखी। ज्योति के सम्मुख कामाक्षी पर टिप्पणी करना उसे असभ्यता लग रही थी। कामाक्षी के जाते ही ज्योति से बोला - ''जीजी, सूद दे रही हो ? मैं तुम्हें सूदखोर लगता हूं?''

''चंद्र तुम मुझसे सोलह साल छोटे हो। मैंने तुम्हें कभी कुछ नहीं दिया। यह सूद नहीं है, छोटी सी भेंट है।''

''जीजी, मैं जानता हूं तुम्हारे लिये इतने रुपये इक_ा करना आसान नहीं रहा होगा। आता हूं।''

भीतर जाता चंद्रमा, ज्योति को विवश लगा। कामाक्षी रुपये सहेज कर इसी ओर चली आ रही थी - ''क्या है चंद्र ?''

''मैं देख रहा था तुम्हें गिनते हुए। जीजी को पन्द्रह हजार वापस करो।''

करतूत उजागर हो गई लेकिन कामाक्षी को नि:संकोच होकर यथार्थ का सामना करना आता है - ''पूरे वापस किये देती हूं। समझ लूंगी खैरात में दे दिये।''

''हम हर साल पच्चीस -पचास हजार अपने दोनों बच्चों की बर्थ डे पार्टी पर खर्च कर देते हैं। पन्द्रह हजार तुम्हारी दो या तीन साडिय़ों की कीमत होती है। उन साडिय़ों को तुम दो-चार बार से अधिक नहीं पहनती हो। जीजी से ब्याज ...........

''इसीलिये कहती हूं पैसा लड़ाई की जड़ होता है। लौटा देती हॅंू।''

''सिर्फ  पन्द्रह। जीजी पूरे नहीं लेंगी।''

कामाक्षी ने रुपये ज्योति के सामने रख दिये ''चंद्र मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं। मैं नहीं लूंगी।''

भीतर से आते अस्पष्ट मंद स्वर, चंद्रमा का व्यथित मुख, कामाक्षी की खलबली देख ज्योति समझ गई उसने पैसा लेकर गुनाह किया। सूद देकर एक और गुनाह कर डाला है -

''कामाक्षी ...........''

''जीजी, मैं जानती हूं पैसा लड़ाई की जड़ होता है। आप भी जान लीजिये।''

किंकर्तव्यविमूढ़ ज्योति। रात जबर गुजरी। सुबह चंद्रमा के जागने से पहले उसके बड़े बेटे को रुपये थमा कर ज्योति बस स्टैण्ड के लिये सरपट निकल गई। दिल भर आया। न बाबू रहे, न अम्मा। न बिजावर का वह छोटा मकान जो पहले घर फिर मायका कहलाता था। कामाक्षी ने उस घर को बेच कर मायका खत्म कर दिया। यह भाई का घर। क्या अख्तियार? बड़ा गुनाह हुआ।

स्मृतियां न होतीं तो अच्छा होता। न अम्मा याद आतीं, न बाबू, न बिजावर। अच्छी बात यह है स्मृतियां निर्दयी नहीं होतीं। जो घटित तकलीफ  देता था स्मृतियां उसमें भी अपनत्व और संतोष ढॅंूढ़ लेती हैं। बाबू वैसे असहिष्णु नहीं लगते जैसे थे। अम्मा वैसी पक्षपाती नहीं लगतीं जैसी थीं। वह घर भुलाये नहीं भूलता जहॉं चारों बहनों ने बचपन की अठखेलियॉं नहीं की। आसमान को भर नजर नहीं निहारा। धरती पर मजबूती से पैर नहीं रखे।  वक्त ने अच्छे दिन उनके खाते में नहीं डाले। विषमताओं से गुजरना उन्हें अजीब नहीं लगा। नहीं सोचा अजीब लगना चाहिये। एक-एक कर चारों ब्याह दी गईं। अपना भाग्य लेकर रुखसत हो गईं।

ज्योति ने जिस साल सोलह पूरे कर गृह विज्ञान विषय से ग्यारहवीं की परीक्षा दी थी, चंद्रमा का जन्म हुआ था। अम्मा, बाबू, आजी की तरह चारों बहनें डरी रहती थीं वंशधर न हुआ तो घर में तडि़त गिरेगा। बहनें हर कहीं से भाई होने का आश्वासन चाहती थीं। ज्योति को किसी ने बताया था छोटे बच्चे चॅंूकि शुद्ध आत्मा से बोलते हैं इसलिये कई बार उनका कहा भविष्यवाणी हो जाता है। ज्योति चार साल की नीति से पूछती -

''भाई होगा या बहन ?''

''बहन।''

ज्योति उसके गाल नोंच देती ''ठीक से बता।''

''भाई।''

ज्योति उसके गाल चूम लेती ''तुम्हारी पीठ पर भाई आयेगा। तुम्हें आजी भाग्यशाली कहेगी।''

भाई होगा या बहन सत्यापित करने के लिये ज्योति ने एक और नुस्खा आजमाया था। अपने छोटे मोहल्ले के छोटे पार्क से अनोखी किस्म की घास तोड़ लाई थी। यह घास अपनी जड़ों के पास गठीली होती है। गांठ से बहुत पतली, हरी, मुलायम लगभग एक फुट लम्बी दो-तीन ऊद्र्धगामी घास निकलती हैं जिनके सिरे पर एक छोटा गुच्छा होता है। ज्योति ने गुच्छे को घास से अलग कर घास का एक सिरा पकड़ दूसरा कीर्ति को पकड़ा दिया -

''बीच से फाड़ो।''

दोनों बहनों ने बड़ी हिफाजत से ध्यानपूर्वक अपने-अपने सिरे को दोमुंहा कर दोनों हाथों की चुटकी में एक-एक मॅुंह पकड़ कर फाडऩा शुरु किया। समानान्तर चीरते हुए दो भागों में विभक्त होने से पहले टूट जाये तो बहन होगी। विभक्त हो जाये तो भाई होगा। सम्पूर्ण विभक्त घास को शर्तिया संकेत मान कर ज्योति, अम्मा के लिये कोई मीठा व्यंजन बना देती -

''अम्मा, खाओ।''

जोड़-तोड़ वाली गृहस्थी से भिज्ञ अम्मा संकोच करतीं ''इतना घी, शक्कर बेकार कर दिया।''

''अम्मा, तुमको नहीं अपने भाई को खिला रही हूं। खायेगा तभी न चंदा मामा की तरह गोल मटोल, गोरा होगा।''

            चार पुत्रियों के जनक बन कर असहिष्णु हो चले बाबू उदारता दिखाते ''खाओ। घी, शक्कर ले आऊंगा।''

चंद्रमा के जन्म पर सचमुच बाबू खूब घी, गुड़, मेवा लाये थे। उनके प्रौढ़ मुख पर वांछित पा लेने का आल्हाद छा गया था। अम्मा के भाव में लाल जनने का गौरव। ऑंखें साध पूरी होने पर भी उसी तरह भर आती हैं जैसे पूरी न होने पर भरती हैं। आजी तृप्ति में भरकर उसी तरह रोने लगी थीं जिस तरह बहनों के होने पर अभाव में भर कर रोती थीं।

अम्मा-बाबू ने चंद्रमा को केन्द्र में रख कर चारों बहनों को अपने-आप बड़ी होने के लिये उपेक्षित छोड़ दिया। सबसे बड़ी होने का जुर्माना ज्योति को अधिक भरना पड़ा।

''ज्योति, पढ़ाई बहुत हो गई। अब अम्मा की मदद करो। उन्हें चंद्रमा की देख-रेख करनी है।''

            बाबू का आदेश सुन ज्योति ने फरियाद की ''बाबू, स्कूल से चार बजे आते ही मैं रसोई सम्भाल लेती थी कि दफ्तर से लौट कर तुम्हें चाय फिर खाना चाहिये। कॉंलेज से आकर पूरा काम कर लॅंूगी।''

            बाबू ने लड़कियों की जरूरी बात को संयम से सुनना कभी जरूरी नहीं माना  ''ज्योति मेरे पास इतना पैसा नहीं है जो तुम्हें कॉंलेज में पढ़ा सकॅंू।''

            बाबू दफ्तर से आते ही चंद्रमा को गोद में उठा लेते। लड़कियों की जरूरी बात न सुनने वाले बाबू, चंद्रमा से खूब संवाद करते। यद्यपि वह बातों को समझने योग्य नहीं हुआ था। उसके लिये छोटा हैट और जूते खरीदे। हैट और नये जूते पहना कर साइकिल के डण्डे में कसवा ली गई छोटी सीट पर उसे आरूढ़ कर सैर कराने ले जाते। ज्योति और कीर्ति रसोई सम्भालतीं। प्रीति और नीति चंद्रमा को मोहल्ले के छोटे पार्क में ले जातीं। वह गोद से न उतरता। दोनों शिथिल हो जातीं। अम्मा को बतातीं -

       ''अम्मा, चंद्र बहुत भारी है। इसे गोद में उठा कर हम दोनों थक जाते हैं। खेल नहीं पाते। नलिनी (नीति की सहेली) का भाई बहुत हल्का है। वह आराम से उसे लिये रहती है।''

            अम्मा को चंद्रमा फूल कुमार लगता था ''भारी है? नजर लगाओ।''

            बहनों की चोटी खींचते हुए, उनकी पीठ पर लटक कर उनका गला मसकते हुए, उन्हें घोड़ा बनाते हुये, पानी उलीच कर उन्हें गीला करते हुए तमाम उपद्रव करते हुए चंद्रमा, अम्मा-बाबू को दुर्लभ सुख दे रहा था। आजी के प्राण पखेरू उड़ गये थे अन्यथा वे भी सुख की भागी बनतीं। अधीन सी दिखती बहनों ने मान लिया उन्हें एक-दूसरे की संगति से ताकत पानी है। कॉंलेज में पढऩे की लालसा लिये ज्योति ने भरसक रसोई सम्भाल ली कि कीर्ति की पढ़ाई बाधित न हो। खाली वक्त में ऊन सलाई, क्रोशिये, सुई से कुछ बना-सिल कर अपने गृह विज्ञान को दोहरा लेती। उसने कॉंच की रंग-बिरंगी चूडिय़ों के डेढ़-दो इंच लम्बे टुकड़े तादाद में एकत्र कर रखे थे। दीप जला कर लौ में दो टुकड़ों के सिरों को गरम कर आपस मेें जोड़ते हुए, एक-दूसरे में टुकड़े फंसाते हुए लम्बी रंग बिरंगी माला बनाते हुए बहनों को डराती -

       ''देखो, दीये की पीली लौ, हरी हो रही है। हरी लौ के कारण मैं एक महीने के भीतर मर जाऊंगी।''

            कीर्ति कुम्हला जाती ''जीजी, मत मरना। बाबू मेरी पढ़ाई छुड़ा देंगे। मैं रसोई में पक जाऊंगी।''

            प्रीति पीली पड़ जाती ''जीजी, मत मरना। तुम अम्मा से हम लोगों के लिये थोड़ा-बहुत लड़ लेती हो। हमारी एक नहीं सुनतीं।''

            नीति निवेदन करती ''जीजी, मत मरना। मेरी इतनी अच्छी चोटी बना देती हो। अम्मा को चंद्र के तेल फुलेल से फुर्सत नहीं।''

ज्योति अभयदान देती -''तुम लोग कहती हो तो नहीं मरूॅंगी। वैसे अम्मा, बाबू से रोज कहती हैं लड़कियां पहाड़ सी बढ़ रही हैं। दो-तीन साल के अंतर में इनकी शादी करते रहो। बाबू मेरी शादी ढूंढ रहे हैं। कीर्ति तुम्हें रसोई में पकना पड़ेगा।''

ज्योति लम्बी और सुंदर थी। उन्नीस सौ पचहत्तर के दौर में, बिजावर जैसी छोटी जगह में अधिकतर लड़कियों को स्कूल के बाद नहीं पढ़ाया जाता था, उस लिहाज से अनपढ़ भी नहीं थी लेकिन तीन वर्षीय जगत के जनक, विधुर मंगलदीन से ज्योति का ब्याह कर बाबू ने संकेत दे दिया दो-तीन साल के अंतर पर लड़कियों को ठिकाने लगाते चलना कितना जरूरी है। ज्योति जानती थी बाबू उसकी याचना, संयम से नहीं सुनेंगे लेकिन की - ''बाबू, एक बच्चे के बाप से शादी नहीं करूॅंगी।''

बाबू ने उसके फेवरेट हीरो नवीन निश्छल को लपेटे में लिया ''तुम्हें नवीन निश्छल चाहिये। मैं दहेज कहॉं से लाऊॅं?''

ज्योति नहीं जानती अम्मा ने दिलासा दी या भत्र्सना की ''ज्योति, तुम सबसे बड़ी हो। हमारी हैसियत को नहीं समझोगी तो कैसे होगा?''

ज्योति समझ गई उसे एक अपकर्ष से दूसरे अपकर्ष की ओर गमन करना है।

तिलक चॅंूकि भाई चढ़ाता है, पॉंच साल का चंद्रमा, बाबू के साथ तिलक लेकर मंगलदीन के घर गया था। औरतों ने चंद्रमा से परिहास किया - ''चंद्रमा, तुम जगत के मामा हो।''

''मैं इसका मामा नहीं चंदा मामा हॅंू।''

औरतें ठिलठिलाने लगीं। चंद्रमा यॅंू रोया कि चौक में बैठकर तिलक चढ़ानेे को तैयार न हुआ। बाबू ने नेगचार किया।

बहनों को स्तब्ध छोड़कर विदा हुई ज्योति बिजावर कम ही आ पाती थी। जब भी आती चंद्रमा उसके साथ मिलनसार नहीं होता था। तीनों बहनों की तरह उसे धमकाता भी नहीं था। इतना छोटा था कि ज्योति उसे बहन नहीं ऐसी अतिथि लगती थी जिसके सामने संकोच या सभ्यता दिखानी चाहिये। ज्योति के समक्ष वह झिझका हुआ बच्चा बना रहता। बहनें गाथा बतातीं -

''जीजी, चंद्र दिन भर घर से बाहर भागता है। एक कटखना कुत्ता इसके पीछे पड़ गया था। हम तीनों ने इसे हाथों में लेकर खूब ऊपर उठा लिया वरना इसे काट लेता। देखो न प्रीति को कैसे काटा है। बेचारी के पेट में चौदह इंजेक्शन लगे। इतने पर भी अम्मा ताडऩा दे रही थी कुत्ता चंद्र को काट लेता तो मैं, तुम तीनों को घर में न घुसने देती।ÓÓ

''जीजी, बाबू खूब बीमार थे। डेढ़-दो महीने बिस्तर पकड़े रहे। अम्मा बोलीं बाबू की खूब सेवा करो। उन्हें कुछ हो न जाये। चंद्र अभी बहुत छोटा है। उसे बहुत पढऩा है।''

''जीजी, चंद्र बहुत लम्बा होता जा रहा है। मेरे और उसके पैरों का नाप एक जैसा हो गया है। बाबू उसके लिये नये जूते लाते रहते हैं। मैं उसके पुराने शूज पहन लेती हॅंू। नीति तो चंद्र की पुरानी टी शर्ट, जींस इतना पहनती है कि जनाने कपड़े पहनना भूलती जा रही है।''

''जीजी, हम लोग बाबू के सामने जोर से नहीं हॅंस सकते, देर तक बाहर नहीं रह सकते। सहेलियों को नहीं बुला सकते। इस घर में पैदा जरूर हुए हैं पर कुछ नहीं कर सकते।''

''जीजी, चंद्र को अपने दोस्तों को घर लाने में शर्म आती है। कहता है घर छोटा है। अम्मा बिल्कुल फैशन नहीं जानतीं। अम्मा से इसकी करतूत बताओ तो कहती हैं छोटा है। नासमझ है।''

स्थिति का लाभ ले चंद्रमा नासमझ बना रहा लेकिन पढ़ाई में श्रेष्ठ था। दूसरे प्रयास में डायरेक्ट आयकर अधिकारी बन कर उसने श्रेष्ठता सिद्ध की। एक धन कुबेर ने अपनी दर्शना दुहिता कामाक्षी के लिये उसे पंजीकृत कर लिया। पंजीकरण पर बाबू को चकाचौंध होना ही था - ''मेरा घर-दुआर मामूली है। यूं जानिये गुदड़ी में लाल पैदा हो गया है।'''

धन कुबेर संतुष्ट हुए - यही चाहिये। घर गुदड़ी, लड़का लाल हो। गुदड़ी को लेकर मैं चंद्रमा को इतना लज्जित कर दूंगा कि वह गुदड़ी में आने से कतरायेगा।

प्रत्यक्षत: बोले -''जी हां, जी हां। घर-द्वार महत्व नहीं रखता। आपने चंद्रमा को जो आचार-व्यवहार सिखाया है वह महत्वपूर्ण है।''

बाबू उत्कर्ष पर ''चंद्र इतना बड़ा आफिसर बना। जानिये उसकी बहनों, मां और मेरी प्रार्थना सफल हुई।''

-प्रार्थना सफल हुई पर मैं उसके और उसकी बहनों के असमान स्तर में इतनी असमानता ले आऊंगा कि वे चंद्रमा से दूरी बना लेंगी या अदब से बात करेंगी।

''जी हां, जी हां। सबके आशीर्वाद से ही कामयाबी मिलती है।''

बाबू ने समृद्ध दहेज लेने का मनोरथ बताया - ''मेरी बेटियों को चंद्र के विवाह का बड़ा उत्साह है। कहती हैं खूब नेग लेंगी।''

-एक बार ही तो देना है। दे दूंगा और चंद्रमा को हथिया लूंगा।

''जी हां, जी हां। यादगार शादी करूंगा।''

धन कुबेर की योजना सफल रही।

दमदार दहेज लेकर आई कामाक्षी पहले, दूसरे प्रवास में अदब दिखा कर बागडोर हथियाने में दत्त हो गई। सास की पेटी में आई सात कीमती साडिय़ां और भारी स्वर्ण जंजीर पर मुग्ध हुई अम्मा ने कामाक्षी को गृहलक्ष्मी की पदवी पर बैठा दिया। गर्भवती हुई कामाक्षी के मोबाइल पर अम्मा स्मरण करातीं भिगोये बादाम के साथ दूध का नित सेवन करे। लड़का होगा। सुंदर होगा। धन कुबेर के बेमिसाल घर में जन्मे पोते की सूचना पाकर अम्मा के बहू प्रेम ने काफी जोर मारा। चारों बहनों को फोन कॉंल कर खूब प्रचारित  किया -

''कामाक्षी ने कुल बदल दिया। आजी के पांच लड़कियों के बाद बाबू हुए। मेरे, तुम चारों के बाद चंद्र हुआ।ÓÓ

बाबू तत्पश्चात अम्मा के बैकुंठ जाते ही बागडोर कामाक्षी ने लपक ली। नीति स्कूल मास्टर पति के साथ बिजावर में रहती है। बाबू के न रहने पर अक्सर अम्मा के पास चली जाती। उनके जरूरी काम कर देती। अकेलापन बिता रही अम्मा को नीति इतनी अपनी लगने लगी जितनी कभी नहीं लगी। बहनों को वह छोटा घर अपना कभी नहीं लगा फिर भी चारों कंघी कर टूटे हुए बालों को समेट कर गॉंठ बॉंध कर फेंकती थीं कि अम्मा के मतानुसार बाल इधर-उधर उड़े तो मायका उड़ जाता है। मायका नहीं उड़ा। बिक गया। झिझक थी फिर भी नीति ने कहा - ''चंद्र क्यों बेचते हो? बाबू ने एक-एक पैसा जोड़कर यह मकान खरीदा था। मैं किराये के मकान में रहती हूं। यहां रहूं तो किराया बचेगा। बिजली, पानी का बिल जमा कर दंूगी। तुम या जीजी लोग कभी आयेंगी, घर साफ-सुथरा मिलेगा। रिटायर होकर आओगे तब तक में अपना छोटा-मोटा मकान बनवा लूंगी।''

पैसे की फिक्र न करने वाले चंद्रमा को प्रस्ताव अच्छा लगा ''ठीक तो है।''

लेकिन कामाक्षी लाभ-हानि को परखना जानती थी - ''नीति जीजी, अम्मा थीं इसलिये हम लोग आते थे। अब नहीं आयेंगे? चंद्र के रिटायरमेंट को अभी लम्बा समय है। वैसे भी बिजावर जैसी छोटी जगह में बसने का मतलब नहीं। भोपाल में बसेंगे। अच्छा खरीदार मिलते ही बेचना है।''

''मुझे दे दो। धीरे-धीरे पैसा चुका दूंगी।''

उस घर में नीति का जन्म सिद्ध पांचवा हिस्सा था। साल में एक बार चारों बहनें वहां एकत्र हो एक-दूसरे की कुशल क्षेम जान लेती थीं। अच्छे दिन नहीं बिताये पर जन्म स्थल से स्वाभाविक लगाव-जुड़ाव होता है। मकान बिक जायेगा जैसा ख्याल नीति को भावुक कर रहा था लेकिन कामाक्षी ने प्रमुखता नहीं दी - ''जीजी, पैसा लड़ाई की जड़ होता है। रिश्ते बिगड़ते हैं। आप कब तक पैसा चुकाओगी और मैं कब तक याद दिलाऊंगी। वैसे भी इस घर में है क्या? इतना कमजोर है कि किसी दिन धसक जायेगा''

''जैसा भी है हम बहनों का मायका है। बिक जायेगा तो मायका नहीं रहेगा।''

-यही चाहती हूं। न रहे।

''जीजी, आप इमोशनल हो रही हैं।''

मायका बिक गया। वह सूत्र खत्म हो गया जो बताता था वे लोग कभी एक-दूसरे के समीप थे। वह अवसर फिर नहीं आया जब सभी भाई-बहन एक छत के नीचे एकत्र हुए हों। अपने परिवार ... अपने घर ..... अपनी प्राथमिकताएं....। चंद्रमा समीपवर्ती जनपद में पदस्थ हुआ तब ज्योति को लगा उसे मुद्दत से नहीं देखा है। एक-दो बार उसके घर गई। फिर पैंसठ हजार रुपियों ने ऐसा व्यूह रच डाला कि उस तक पहुंचना दुश्कर हो गया।

अब यह नोटबंदी ..........

तीस दिसम्बर तक पुराने नोट अपने बैंक खाते में जमा किये जा सकते हैं। ढाई लाख तक जमा की गई राशि को लेकर पूछताछ नहीं होगी।

ज्योति को चंद्रमा की फिक्र है। उसने बहनों से बात की। सबसे पहले कीर्ति से की। कीर्ति ने बेरूखी दिखा दी -

''जीजी, चंद्र की क्या फिक्र करें ? वह बहुत बदल गया है।''

''कीर्ति, मुझे वह बदला हुआ नहीं मजबूर लगता है। बल्कि सताया हुआ लगता है। कामाक्षी के ठाट देख कर शुरू में उससे दब गया। कामाक्षी को उसको दबाने की दीवानगी हो गयी। और फिर वही नहीं बदला है। सब कुछ बदल गया है। हम भी बदले हैं। हम लोग अब वे बहनें नहीं हैं जो एक-दो रुपियों का आपस में हिसाब मांगती थीं। न देने पर लड़ती और धमकाती थीं। कामाक्षी पर उसका जोर नहीं चलता लेकिन दिल का अच्छा है। हमारा छोटा भाई है। उसकी फिक्र हमें करनी चाहिये।''

''ठीक है जीजी, तुम चंद्र से बात कर लो। जो बन पड़ेगा मदद करुंगी।''

कीर्ति और प्रीति ने सहायता का वचन दिया पर चंद्रमा के घर जाने को सहमत नहीं हुई लेकिन नीति, ज्योति के आग्रह को नहीं टाल पाई। उनका आना कामाक्षी को सामूहिक आक्रमण की तरह लग रहा था - ''लूटने आ रही हैं। कहा था चंद्र एक को उधार दोगे तो बाकी बहनों को हौसला मिलेगा। नीति जीजी, मकान पर कब्जा करना चाहती थीं। नहीं कर पाई। अब होड़ कर रही होंगी ज्योति जीजी को उधार मिल सकता है तो उन्हें क्यों नहीं ?''

दिनों बाद एक साथ दो बहनों का आना चंद्रमा को सांत्वना की तरह लग रहा था। उसने कामाक्षी की निंदा की -

''उधार लेती हैं तो तुम्हें सूद सहित वापस करती है।''

''अभी आई नहीं हैं लेकिन तुम मुझ पर इल्जाम लगाने लगे। इसीलिये मैं रिश्तेदारों से मेल-जोल नहीं रखती। मेरे घर की शांति चौपट हो जाती है।''

''नोटबंदी के कारण वैसे भी चौपट हो गई है। पता नहीं तुम्हें कितना पैसा चाहिये। तिजोरी में भरे नोटों के बंडलों को आग लगा दो या कुएं में फेंक दो। जो जी में आये करो।''

''तुम्हारी बहनें उधारी लेने आ रही हैं। उन्हें दे देना। अपना बैंक खाता भर लेंगी।''

दोनों बहनों को देख कर चंद्रमा ने शिथिलता को छिपाने की कोशिश की लेकिन ज्योति ने भांप लिया वह शिथिल है। ज्योति की समझ में न आता था अपने और नीति के आगमन का क्या कारण बताये। नीति कुछ बोलेगी नहीं। वह सहायक के तौर पर आई है। कारण ज्योति को ही बताना होगा। उसने एहतियात से बात शुरू की -

''चंद्र अचानक ये नोटबंदी ........।''

''हां, जीजी। समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं?''

''न्यूज सुन कर तुमसे बात करना चाहती थी पर फोन पर पूछना ठीक नहीं लगा। घर में बहुत पैसा तो नहीं रखे हो?''

''है। समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं?''

''इसीलिये आई हंू चंद्र। मैंने सभी बहनों से बात की है। तुम तो जानते हो हम लोगों के पास बहुत पैसा कभी नहीं रहा लेकिन हम बहनों के, बहनोइयों के, बच्चों के मिला कर बैंक खाते बहुत हैं। ठीक समझो तो हम लोग अपने-अपने खाते में थोड़ा-बहुत जमा कर देंगे। धीरे-धीरे निकाल कर नई करेन्सी तुम्हें लौटा देंगे।''

च्ंाद्रमा ने ज्योति को सम्बल की तरह देखा ''मेरे कारण तुम लोग रिस्क क्यों लोगी? बैंक में पूछताछ हो सकती है।''

''चंद्र, तुम मुझे आज भी वही छोटे बच्चे लगते हो जिसे हम बहनें अपने हिस्से की बर्फी या कुल्फी दे देते थे। तुम्हारी फिक्र होती है। लिमिट के भीतर ही जमा करेंगे। पूछा जायेगा तो हमारे पास कारण हैं। मैं कच्चे मकान को पक्का कराने के लिये पैसे जोड़ रही थी। नीति को मकान खरीदना है। कीर्ति की बेटी की शादी तय है। प्रीति के दो बेटे बाहर पढ़ रहे हैं। मैनेज हो जायेगा।''

''लेकिन जीजी ............

चंद्रमा झिझक रहा था।

कामाक्षी ने ज्योति और नीति को संदिग्ध की तरह देखा। खूब सुन रही है, नोटबंदी में लोग खूब लाभ कमा रहे हैं। बीस-पच्चीस प्रतिशत कमीशन पर सम्पन्न वर्ग के पैसे अपने विपन्न खातों में डाल रहे हैं। पांच सौ रुपिया दिहाड़ी पर मजदूर, सम्पन्न वर्ग के बड़े नोटों को नई मुद्रा में बदलने के लिये दिन भर बैंक के सामने कतार में लगे रहे कि मजदूरी करने पर तीन सौ रुपिया मिलता है, यहां पांच सौ मिल रहा है। जान पड़ता है चारों ननद रानियां रुपिया हड़प कर अपना दारिद्य खत्म करना चाहती हैं। लेकिन इन्हें नहीं देगी तो इतना रुपिया खोटा हो जायेगा। चंद्रमा की सरकारी नौकरी है। खाते में रकम डालने की निर्धारित सीमा है। जांच हो गई तो जीवन भर की अमीरी फना हो जायेगी। अब? ये दोनों पूरा न हड़प लें इस हेतु इन्हें कुछ प्रतिशत कमीशन का लोभ देना उचित होगा। चंद्रमा को तो बहनों की हिफाजत दिख रही है। उन्हें जोखिम में नहीं डालना चाहता। कुछ सोचना होगा।

कामाक्षी के भाव में अपने दुव्र्यवहार का प्रायश्चित नहीं था फिर भी वह नम्रता थी जो बिजावर में प्रारम्भिक दो विजिट पर दिखी थी -

''ज्योति जीजी, जानती हूं आप लोग हमारी फिक्र करती हैं। दस, बीस जो भी ठीक लगे अपना परसेन्टेज ले लेना।''

चंद्रमा ने कामाक्षी को देखा। यह तुच्छ बात ही करेगी। ज्योति जानती थी कामाक्षी से अच्छे व्यवहार की उम्मीद करना व्यर्थ है। अत: चुप रही। नीति ने प्रतिक्रिया दी -

''कामाक्षी, हम लोग ब्याज वसूलने (कमीशन को ब्याज कहा) नहीं, चंद्र की मदद करने आये हैं।''

कामाक्षी नहले पर दहला मारना चाहती थी कि ब्याज क्या मूल हजम कर लोगी पर मौका नाजुक था।

''नीति जीजी बुरा न मानें। मेरा यह मतलब नहीं है।  चंद्र तब से तनाव मेें हैं। आप लोग आई हैं इसलिये थोड़ा नारमल दिख रहे हैं .........बड़ी रकम लेकर बस से जाना सुरक्षित नहीं है। ड्राइवर आपको बिजावर छोड़ते हुये ज्योति जीजी को उनके घर पहुंचा आयेगा।''

और यह तारीख।

वक्त लगा लेकिन सभी बहनों ने खातों से थोड़ी-थोड़ी रकम निकाल कर चंद्रमा की कुल रकम को नयी मुद्रा में बदल दिया। पैसा ज्योति के पास एकत्र किया गया। ज्योति ने मोबाइल पर चंद्रमा को सूचित किया -

''काम हो गया। कब आ जाऊं?''

''जीजी जब आना चाहो आ जाओ''

मोबाइल कामाक्षी ने लगभग झपट लिया -

''जीजी, इतना पैसा लेकर बस में न आयें ......... ड्राइवर भेज रही हॅंू ... कल सुबह .।''