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Tuesday 20 Aug 2019

सोच के समय में

अंकल, आपका फोन बज रहा है, शोभा ने रसोईघर से थोड़ी तेज आवाज में कहा।

उसका ध्यान चौंकने सा टूटा। वह अभी भी नाश्ते के टेबल पर था, हालाँकि नाश्ता और चाय दोनों वह काफी देर पहले से ले चुका था। सामने रखे सेलफोन को उठा कर जवाब देने से पहले, उसकी निगाह उस किताब पर पड़ी, जिसे खोजते हुए, वह सुबह से तनाव में आ गया था। उड़ती निगाह से किताब का कवर देखकर उसे लगा, कि पश्चिम ओडि़शा के आदिवासी जोड़े का कोई चित्र है। गोल चेहरों वाले पति पत्नी को देखकर ही लगता था, जैसे उनकी मासूमियत उनकी आँखों से ही झलक रही है। यह बस्तर से सटे कोरापुट के आदिवासियों की तस्वीर थी। शायद काल्पनिक तस्वीर ही थी, जो उनके किसी विशेष पर्व के अवसर को सूचित करने के लिए, प्रकाशक ने खासतौर पर बनवायी थी। यह बालीजगार का त्यौहार है, सोचते हुए उसने फोन करने वाले के नम्बर पर निगाह डाली।

कलकत्ते के अखबार का फोन था। उधर से तकाज़ा आया। उसने फोन पकड़ते ही बिन सोचे तपाक से कहा, ÓÓमैं अभी दो दिनों से अस्पताल में पड़ा हूँ।ÓÓ उधर वाले ने गेट वेल सून जैसा कुछ कह कर फोन बन्द कर दिया। पर समीर सोचने लगा, कि आखिर इतनी देर से किताब खोजते रहने और लिखने की सोचते रहने के बावजूद, उसने अचानक यह झूठा बहाना क्यों बना दिया, कि वह बीमार है। समीर खुद नहीं जानता था, कि उसने इस तरह का गैरजरूरी झूठ क्यों कहा ? शायद उसके मन में कहीं गहरे में यह बात रही होगी, कि आज जबकि उसे तीन बजे की गाड़ी से राउरकेला जाना है, तो शायद जल्दी में वह यह काम नहीं कर पायेगा, हालाँकि अभी भी जब वह किताब के मुखपृष्ठ पर छपी, संबलपुरी से लगते आदिवासियों के जोड़े को गौर से देख रहा था, तो उसकी आँखों से परे, उसके मन के कोने में यह खयाल भी घुमड़ता सा लग रहा था, कि आज राउरकेला की टिकट भी उसे कैंसल करवा लेनी चाहिए, पर खुद के इस निर्णय का कोई औचित्य वह नहीं तलाश पा रहा था। लेकिन बार बार उसके मन में यह बात भी आ रही थी, कि उसने कलकत्ते के अखबार वाले को झूठ क्यों कहा ?

सच तो यह है, कि ऐसे अचानक अकारण झूठ वह कई बार बोलता है, पर इस तरह उस पर सोचता नहीं, जैसे अभी सोच रहा था। अभी वह सिर्फ  यही नहीं सोच रहा था, बल्कि यह भी सोच रहा था, कि अगर सचमुच राउरकेला नहीं जाने का निर्णय उसने कर ही लिया है, तो उसे हरमीत को खबर कर देनी चाहिए। इसके अलावा उसी पल उसके दिमाग में यह बात भी आयी, कि कमरे में चलकर पहले टिकट कैंसिल करा लेनी चाहिए और फिर उसके बाद यह बात सोचकर वह मुस्कराया, कि इस टिकट वापसी का कोई ज्यादा मतलब नहीं है, क्योंकि यह उसी दिन की टिकट थी, जिस दिन वह कैंसिल कराने की सोच रहा था। एक तो यह टिकट थोड़ी पेचीदा प्रक्रिया से कैंसिल होती थी, दूसरे वापसी में पैसे भी इतने कम मिलते थे, कि कई बार अपनी अलाली में वह टिकट कैंसल ही नहीं कराता था, सोचते हुए उसे अभी दसेक दिन पहले रायपुर की टिकट कैंसिलेशन की बात याद आयी और इसी स्मृति के संग संग माँ की।

उस दिन माँ अचानक ही एकदम सीरियस हो गयी थी। यों तो पिछले चार पांच सालों से उसकी तबीयत महीने पन्द्रह दिनों में गड़बड़ा ही रही है, पर आमतौर पर अब उस तरह की गड़बड़ी को वह शरीर की तकलीफ  से ही पहचान जाती है। अक्सर तो यह सोडियम की कमी या पोटेशियम के ज्यादा हो जाने की वजह से, शरीर में आए असंतुलन की बेचैनी ही होती है, पर इधर कुछ महीनों से उसके पैरों में ऐसी भयंकर पीड़ा होने लगी है, जिसके लिए दर्द की गोलियों से ही काम नहीं चलता, बल्कि इंजेक्शन तक लगाना होता है। उस दिन दर्द के अलावा भी उसे ऐसा कुछ लग रहा था, जिसे वह बता नहीं पा रही थी। दूसरी बात यह भी थी, कि दीदी उस समय क्लिनिक में थी। कल शाम से ही माँ की तकलीफ शुरू हो गयी थी और तभी दीदी ने उसे दवा भी दी थी। पर सुबह से उसे अपने पूजापाठ में लगे देखकर दीदी को लगा था, कि शायद वह ठीक है। सुबह घूम कर आने के बाद उसने खुद भी माँ के कमरे में जाकर देखा था। वह साढ़े पांच बजे से ही उठ गयी थी। उसी के उठने की हलचल से एक पल को दीदी की आँख भी खुली थी। पर आलस की वजह से वह खाट से उठी नहीं थी। शोभा माँ से पहले उठकर रसोईघर में पहुँच चुकी थी।

       उसने माँ को चाय बनाकर दी थी। उसके बाद सवेरे के काम को बिना किसी सहारे के पूरा करने के बाद, वह आकर पूजापाठ में बैठ गयी थी। दीदी ने उठते ही उसे पूजा मुद्रा में ही देखा था, जब वह झुक कर देवी देवताओं की पीतल की मूर्तियों पर फूल चढ़ा रही थी। उसके बाद खाट से उठने के बजाय, उसने एक हल्की झपकी और ले ली थी। लेकिन तैयार होकर क्लिनिक जाने के पहले उसने माँ और बाबू दोनों से पूछा था, कि आज वह क्लिनिक जाए या नहीं, हालाँकि माँ की गतिशीलता देखकर उसे लग रहा था, कि वह ठीक है। मां ने भी कहा था, कि उसे बिलकुल ठीक लग रहा है। समीर को दोपहर तीन बजे की गाड़ी से रायपुर जाना था। कल शाम से उसके दिमाग में अपशकुन की तरह यह बात आ रही थी, कि पता नहीं वह जा पायेगा भी या नहीं। माँ की तबीयत उस वक्त तो थोड़ी खराब ही थी। सुबह उसे ठीक देखकर, वह भी थोड़ा निश्चिंत हो गया था। पर दुपहर एक बजे के आसपास, बाथरूम जाते हुए मां पैरों के दर्द से चीख पड़ी। शोभा सहारा देकर उसे पलंग तक लायी। समीर को आशंका हुई, कि शायद माँ की तबीयत फिर बिगड़ गयी है। कमरे में आते ही उसने मां के झुर्रियों भरे चेहरे को पल भर ताका। पैर मोड़कर करवट में सोयी माँ के चेहरे को देखकर ही लगता था, कि उसे भीषण तकलीफ हो रही थी। शोभा ने दर्द की दवा दे दी थी। पर माँ को देखकर लगता था, जैसे उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। कभी वह बांयी करवट लेकर उकियाने या उल्टी करने जैसा करती और कभी चित लेटी लेटी, अचानक आधी उठ जाती। तब उसकी सांस धौंकनी की तरह चलती थी। उसने माँ से पूछा भी था, कि उसे कैसा लग रहा है। उसने कहा, कि वह बता नहीं सकती। पैर में दर्द तो है, पर उसे घबराहट भी लग रही है। सोडियम की कमी या ब्लड प्रेशर से होने वाली तकलीफ  यह नहीं थी।

       बाबू याने समीर, वहीं उसके पास इसी कुर्सी पर बैठा, उसे ताक रहा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था, कि वह दीदी को फोन करे या नहीं ? उसे लग रहा था, कि दीदी बस आ ही रही होगी और बुई याने सविता, आ ही गयी थी। शोभा ने कार की आवाज सुन कर राहत के स्वर में कहा था, आण्टी आ गयी है।

       आते ही माँ को देख कर उसने बिना कपड़े बदले ही ब्लडप्रेशर का यंत्र निकाला था। स्टीथो लगा कर बी.पी. लेने के बाद दीदी के चेहरे पर राहत के निशानात देखकर समीर थोड़ा आश्वस्त हुआ था। लेकिन दीदी ने उसे देखते ही कहा था, मेरा खयाल है, आज रायपुर जाना कैंसिल कर दो।

       कहते हुए दीदी के चेहरे या आवाज में कहीं किसी तरह की आशंका उसे महसूस नहीं हुई थी, पर फिर भी एक बार अपशकुन की लहर में सिहरते हुए उसने पूछा था, क्यों ? क्या बी.पी. बहुत बढ़ गया है ?

       ना, बी.पी. तो ठीक है, बल्कि थोड़ा लो ही है, पर मां को सांस लेने में थोड़ी तकलीफ हो रही है, लेकिन ...... लेकिन...... क्या तुम्हें रायपुर में कोई जरूरी काम है।

       दीदी जानती थी, कि उस जैसे निठल्ले और सदाबेकार आदमी को कभी कोई जरूरी काम नहीं हो सकता, हालाँकि वह यह नहीं जानती थी, कि जिस बिना काम के काम में उसने रायपुर जाने की सोची थी, वह उसका इतना गुप्त काम था, जिसके बारे में न तो दीदी को कुछ पता था और न ही उसके किसी मित्र को। पर निश्चय ही हल्की सी भावुकता जगाने वाली जिस पुरानी स्मृति को रूबरू देखने के अकस्मात इरादे में, उसके एक दिन पहले ही, सिर्फ दिन भर के लिए रायपुर जाने का निश्चय किया था, उसे किसी भी अर्थ में जरूरी काम की तरह नहीं लिया जा सकता था और माँ की इस हालत में तो रायपुर जाना क्या, किसी भी कार्यक्रम को तुरत फुरत रद्द किया जा सकता था।

       ना, काम तो कुछ भी नहीं है, उसने लगभग बुदबुदाने के स्वर में कहा था। दीदी, माँ की छाती में स्टीथो लगाकर जानने की कोशिश में लगी थी। दो मिनट बाद उसने कहा,  लगता है, कि अन्दर इन्फेक्शन जरूर है। सुबह सुबह माँ खाँस भी रही थी। एण्टी बायोटिक तो शुरू कर ही देते हैं।

       वह विशेषज्ञ नहीं था। इस बारे में उसकी राय लेते हुए दीदी ने उसकी तरफ नहीं देखा था। उसकी जगह अगर शोभा भी वहाँ होती, तो वह उससे भी वही कह रही होती, जो अभी समीर की तरफ  देखते हुए अपने आप से कह रही थी। दरअसल पिछले डेढ़ दो बरसों से माँ की तबीयत थोड़ी भी बिगडऩे पर वह अन्दर से बेचैन हो जाती थी। वह खुद भी हो जाता था। पर शायद दोनों यह भी जानते थे, कि माँ अब उम्र के जिस मुकाम पर पहुँच चुकी है, वहाँ किसी भी वक्त कुछ भी हो सकता है, लेकिन फिर भी, इस कुछ भी हो जाने की बात पर दोनों अन्दर से काँप जाते थे। उन्हें यह कल्पना भी असंभव लगती थी, कि एक दिन ऐसा भी आयेगा कि माँ नहीं रहेगी। वे जानते थे, कि एक दिन वे खुद भी नहीं रहेंगे, पर साठ की सीढ़ी पार करने के बाद भी, माँ के नहीं होने की बात पर, दोनों को लगता था, कि वे अनाथ, असहाय बचपन की उस उम्र पर पहुँच गए हैं, जब एक दिन इसी तरह पिता उन्हें छोड़कर चले गए थे।

       मैं सोचती हूँ, कि प्रकाश को फोन कर देना चाहिए, कि एक बार फुर्सत के वक्त घर आकर देख ले। दीदी ने उसी तरह आत्मालाप के से स्वर में कहा।

       उसका ध्यान टूटा। माँ की बीमारी के उन पलों में वह कहाँ से कहाँ पहुँच गया था। जैसे अपने से कुल तीन बरस बड़ी, दीदी के किशोर हाथों की उंगली पकड़कर, अपने घर से अपनी बुआ के घर जाते हुए, किसी मस्ताए साँड की क्रुद्ध दौड़ से बचने के लिए, दीदी से चिपक गया हो। पर उस दिन, उस बचपन की याद करते हुए भी, वह यह अच्छे से जानता था, कि वह  खुद भी बूढ़ा हो चुका है। भावुकता और भय की अजीब सी अनुभूति में दीदी की तरफ देखते हुए उसे लगा था, कि सोच विचार की इतनी दूरी के बावजूद, उनके रिश्तों की प्रगाढ़ अन्तरंगता के पीछे माँ ही है। पर यह भी, भावुक खयाल जैसी बात ही थी।

       पल भर में ही जैसे वस्तुस्थिति में वापस आते हुए उसने कहा था, हो सके तो उसे अभी आने के लिए कह दो।

       ना, ऐसी कोई सीरियस बात नहीं है। बी.पी.पल्स तो ठीक है। सोडियम, पोटेशियम तो कल ही कराया था। शायद रेस्पीरेटरी ट्रैक में, लंग्स में कोई इन्फेक्शन है। एण्टीबायोटिक तो चालू कर ही दिया है। डेरीफायलिन भी दे दिया है। दीदी ने उसे बुदबुदाते हुए कहा। फिर उसने देखा, कि माँ कराह भरी आवाज में कुछ कह रही थी। वह ठीक से सुन नहीं पायी थी। अभी भी, माँ के श्वास की तकलीफ  के संभावित कारण को डॉक्टर की तरह सोच रही थी, लेकिन माँ को देखते ही फिर वह सोचने लगती थी, कि प्रकाश को खबर कर देनी चाहिए। और फिर तब उसे लगता था, कि वह एक व्यस्त डॉक्टर है। खासकर जब से उसने एक बड़ा सर्वसुविधासंपन्न अस्पताल शुरू कर दिया है, उसे दम मारने की फुर्सत नहीं है। अलावा इसके वह महीने पन्द्रह दिन में कहीं न कहीं, दो एक दिन के दौरे पर भी रहता है। पढ़ाई के सिलसिले में कई बरसों से बाहर रह रही अपनी बेटियों से मिलने या उनके भविष्य की पढ़ाई के सिलसिले में भी, उसे बाहर जाना पड़ता है। एक डॉक्टर की तरह वह यह भी जानती थी, कि मामला एकदम सीरियस तो नहीं लगता। शायद उम्र के कारण बढ़ी कमजोरी के चलते माँ के शरीर के अंगों की ताकत छीज रही थी। यह छीजना उसके चेहरे, उसकी आँखों, उसकी लिथड़ती त्वचा, उसके हडिय़ाते शरीर के हर हिस्से में उजागर था, लेकिन वैसी ही उजागर थी, उसकी नियमबद्ध धार्मिकता से जुड़ी सहज आस्तिकता। वह होने को ईश्वर की कृपा के रूप में ही जानती थी और शरीर की इस हालत में भी, सुबह का कष्टसाध्य कर्मकाण्ड, स्वयँ अपने हाथों से करने की जिद करती थी। पर पिछले हफ्ते भर से उसे सुबह की पूजा का कर्मकाण्ड त्यागना पड़ा था। वह बिस्तर पर पड़ी पड़ी, देवी देवताओं की मूर्तियों को चुपचाप ताकती, और अपनी डॉक्टर बेटी को पूजा करती देखती, मन ही मन कौन सी प्रार्थना करती थी, यह तो वही जानती थी, पर ऐसी हालत में उसे देखकर, समीर बहुत घबरा जाता था, जबकि दीदी बड़े धीरज के साथ, भयों, आशंकाओं को अपनी सहज आस्तिकता से परे रखती, अपने काम में लगी रहती थी।

       उस दिन भी यही हुआ थ। उसने रायपुर की टिकट कैंसल करा दी थी और बुरबक की तरह माँ को ताकता, बाजू की कुर्सी पर बैठा था, देव मूर्तियों की ओर पीठ किए। आखिर प्रकाश को बुलाना ही पड़ा था। आते ही, बी.पी. चेक करने के बाद, प्रकाश ने कोई इंजेक्शन मंगवाया था। फिर उसने खुद इंजेक्शन लगाते हुए कहा था, कि वह कोई दो साल बाद किसी मरीज को इंजेक्शन लगा रहा था। फिर दीदी और प्रकाश के बीच जो बातचीत हुई थी, उसके स्वर से ही उसने राहत महसूस की थी।

       लेकिन आज। याने अभी। बाबू को कोई काम नहीं था। वह स्वस्थ और बिलकुल नार्मल था। माँ, खाट पर तकिये में टिकी, बड़े ध्यान से रामचरित मानस का ओडिय़ा अनुवाद पढ़ रही थी। बेशक, सुबह की पूजा के विस्तृत कार्यक्रम निपटाने की बरसों की उसकी आदत पर जो रोक लगा दी गयी थी, वह अभी भी जारी थी। याने समीर के घर में अभी सब कुछ सामान्य था। फिर भी अपनी बीमारी का झूठा बहाना बनाकर न सिर्फ कलकत्ते के अखबार वाले काम को उसने टाला था, बल्कि आज तीन बजे की गाड़ी से, राउरकेला जाने का कार्यक्रम भी वह लगभग फायनली रद्द कर चुका था।

       अपनी अथिरता के बारे में सोच कर वह मुस्कुराया। सामने टेबल पर पड़ी, पुरुषोत्तम रथ की किताब के कवर के जोड़े पर उसकी नजर पड़ी और सामने की सीड़ भरी सौ बरस पुरानी दीवार पर रेंगती छिपकली को शिकार के ध्यान में एकाग्र देखने के बाद, किताब हाथ में लेकर वह कुर्सी से उठा ही था, कि शोभा ने बाजू के रसोईघर से फिर एक नयी सूचना दी,  आज कुन्ती के पति का दसनहान है।

       सुनते ही वह उठ गया। सीढिय़ाँ चढ़ते हुए उसकी सोच में उभरते दिवास्वप्न जैसी स्मृति की दिशा और दशा दोनों बदल गयी थी, लेकिन थोड़ा अन्दरुनी जोर लगाकर, वह उससे परे होने की कोशिश कर रहा था। पर इतनी आसानी से सोच से छुटकारा मिलता नहीं है। इसलिए कुछ सोचते हुए, कुछ और करने की कोशिश में, उसने लैपटॉप चालू किया। रेल्वे के अपने खाते में जाकर उसने, रिजर्वेशन की हिस्ट्री निकाली। एक बार पढ़ते हुए उसके मन में फिर खयाल आया, कि राउरकेला चले जाने में आखिर हर्ज क्या है, लेकिन कुन्ती के पति के दसनहान की बात, जैसे कुन्ती को साक्षात देखने की तरह उसके सामने आ गयी। उसने सपाटे से टिकट कैंसल कर दिया। कपड़े पहनकर जब वह कुन्ती के घर के लिए निकल रहा था, तो उसे एक साथ कितनी सारी बातें उसी तरह दिखने सी याद आने लगीं, जैसे अभी थोड़ी देर पहले आ रही थीं।

       और मन फिर भटकने लगा था। सबसे पहले जिस बात ने उसकी सोच में अपशकुन की तरह दखल दी थी, वह थी कुन्ती के पति की मौत की खबर। यह उसे तब मिली थी, जब वह अपने एक मित्र के साथ दीदी की गाड़ी में शहर के अपेक्षाकृत संपन्न लोगों के श्मशान में जा रहा था। यह उम्र में उससे बड़े, पर उसके काफी करीब के एक मित्र की शवयात्रा थी। ऐन शवयात्रा की शुरुआत के पहले, वह उस बुजुर्ग मित्र के घर भी पहुँचा था। शव दर्शन करने के तुरंत बाद ही अर्थी उठा ली गयी थी। उसके तीन बेटे और एक नाती कंधा देकर तेज चाल में जब आगे बढ़े थे, तो उसने देखा था, कि थोड़ी दूर पर ही एक खुली गाड़ी शवयात्रा के लिए ही खड़ी थी। पर उन लोगों ने शव गाड़ी में नहीं रखा। गाड़ी आगे बढ़ गयी। उसके पीछे पीछे शव कंधे में लिए लोग, उसी गति से चल रहे थे। वह अपने मित्र के साथ थोड़ी देर के लिए वहीं रुक गया। अभी इतना लम्बा रास्ता पैदल तय करने का उसका मन नहीं था। उसने देखा भी था, कि बहुत से लोग थे, जो गाड़ी में ही धीमी चाल से शव के पीछे पीछे चल रहे थे। तभी उसकी अपनी गाड़ी लेकर बल्लू वहाँ पहुँचा। मित्र के साथ बैठते ही बल्लू ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए उसे खबर दी, कि उनके अपने मुहल्ले के करीब ही किसी और की मृत्यु भी कल रात ही हो गयी थी। बल्लू ने मरने वाले का नाम भी बताया था, पर उसकी धीमी आवाज वह ठीक से सुन नहीं सका था। उसके दुबारा पूछने पर बल्लू ने उसकी तरफ सेलफोन बढ़ा दिया था। धोबी पारा में किसी चालीस वर्षीय किशन के मरने की खबर थी। यह उनके बाजू का ही मुहल्ला था। उसके बचपन के कई दोस्त उसी मुहल्ले के थे, पर आज की तारीख में एक भी जीवित नहीं था। चालीस की उम्र के इस किशन के बारे में सोचने की कोशिश में, वह बहुत पहले चले गए अपने कई सहपाठियों के चेहरे याद करने लगा था। इसी कोशिश के दौरान उसकी आँखों के सामने कई चेहरे उभरे थे। और भागते दिमाग के इन अजीबोगरीब रास्तों ने, उसे सिर्फ धोबी पारा के उस बेपहचान नाम की ही नहीं, आसपास के ऐसे कई नामों की याद दिलायी थी, जो अभी पिछले हफ्ते भर में ही संसार छोड़ चुके थे। इनमें से दो तो उसके अपने मुहल्ले, बल्कि बिलकुल पड़ोस के लोग थे। यह भी एक अजीब बात थी, कि हाल ही में मरने वाली मुहल्ले की ये दोनों औरतें बूढ़ी थीं, जबकि सरसराती स्मृति में, जिन और जा चुके लोगों के चेहरे थोड़े सपाटे से उभर रहे थे, वे सब अधेड़ ही कहे जा सकते हैं। इस अर्थ में, इन लोगों की मृत्यु, अकाल मृत्यु ही थी। पास की जो औरतें अभी हाल गुजरी थीं, वे अपनी उमर पूरी कर चुकी थीं, मगर उससे भी रोचक बात यह, कि दोनों बहनें थी। जब बड़ी बहन कोई तीनेक महीने की लंबी बीमारी के बाद गयी, तो छोटी उसकी शवयात्रा के पहले, उसके घर गयी थी। जब शव, बाहर रखी अरथी में रखा जा रहा था, तब समीर भी वहीं था। सधवा मरने के कारण शव की मांग पर सिन्दूर चमक रहा था और वहीं थोड़े ऊँचे बने पेंवठे पर बैठी उसकी छोटी बहन उसे एकटक ताक रही थी। समीर, उन दोनों को एक साथ देखता, कुछ न सोचने सा कई बातें सोच रहा था, पर उसकी छोटी बहन, जो कुछ नहीं तो अस्सी की हो चुकी थी, को देखकर उसने जरा भी नहीं सोचा था, कि तीन दिनों के भीतर ही यह इतनी धड़ल्ले से चली जाएगी। उसका नाम बूंदी था। समीर के अपने परिवार से, खासकर मां से और दीदी और उससे भी, इस बूंदी का बड़ा ही स्नेहिल रिश्ता था। झुकी कमर और शांत चेहरे वाली यह बूंदी, रथयात्रा के दिन आज की तारीख में भी, पांच दस रूपये उसे उसी तरह देती थी, जैसे अपने बच्चों को देती थी। हालांकि अपने पति के जाने और बहुओं के आने के बाद, उसके हाथ में इतने पैसे कभी नहीं होते थे, कि परब त्यौहार में नेग व्यवहार निभा सके। यही बूंदी, अपनी बड़ी बहन के जाने के बाद जब अचानक ही चली गयी, तो वह विश्वास नहीं कर सका था, कि ऐसा भी हो सकता है। इस विस्मय का एक वैज्ञानिक कारण भी था। मरने के कोई दस मिनट पहले उसके छोटे बेटे ने दीदी को फोन किया था। दीदी तब अपने क्लिनिक से लौट रही थी। समीर बेकली से भोजन के लिए उसका इन्तजार कर रहा था। उसकी भूख तेज होने लगी, तो उसने शोभा से थाली लगाने को कहा। उसके खाना खतम करने तक भी, दीदी तो नहीं पहुँची, पर बल्लू आया और उसने बताया, कि वह सामने के घर में है। समीर को लगा कि बूंदी की तबीयत ज्यादा ही खराब है, उसने कविता को आवाज दी, जो उसके अपने कमरे में नेट पर कोई काम कर रही थी। वह तुरत भागी। तभी दीदी घर में घुसी। उसने बताया, कि गुड्डू से किसी विशेषज्ञ डॉक्टर को बुलाने के लिए कह दिया है, अभी तो बी.पी. और पल्स ठीकठाक ही है। सुनकर वह सीधे उनके घर पहुँचा। बूंदी, एक पलंग पर निश्चल पड़ी थी। कविता उसकी मां और बहनें, सब उसे घेरे, उसका हाथ पैर दबाते बैठे थे। दीदी को फिर बुलाया गया। उसने आते ही, फिर एक बार पल्स और हार्ट बीट देख कर कहा, कि रिश्तेदारों को खबर करें। सुनते ही पूरा कमरा दहाड़ मारकर रोने और चीखने से भर गया। पर दीदी बोली अभी कुछ ही मिनट पहले, ऐसा कोई लक्षण नहीं था। उसके स्वर में भी, इस अचानक मौत के रहस्य पर, एक साधारण विस्मय था और अपने ज्ञान की सीमा का एहसास।

       बूंदी की इसी मौत के तीन दिन बाद हुई अपने बुजुर्ग दोस्त की मौत की शवयात्रा के दौरान ही, श्मशान पहुँचने के बाद उसे यह सूचना मिली थी, कि मुहल्ले में ही पिछली रात किशन नाम का कोई व्यक्ति मर गया था। यह सूचना ही उसके लिए परेशान सोच का कारण बन गयी थी। उसने कोशिश की थी, कि अगर इस नाम से उसे किसी परिचित चेहरे की याद नहीं आ रही, तो वह उसे दिमाग से हटा दे, लेकिन उसके दिमाग से यह बात हट नहीं रही थी। वह लगभग उसी तरह उस नाम के सहारे चेहरे को याद करने की सोच में लगा था, जैसे कई बार किसी व्यक्ति को देखकर, उसके नाम को याद करने के पीछे पड़ा रहता है और तब नाम याद नहीं आता।

       मजे की बात यह है, कि श्मशान पहुँचने के बाद, अपने मित्र के साथ लम्बे चौड़े पक्के शेड की बेंच में, एक बड़ी भीड़ के बीच बैठे रहने के बावजूद, उसका ध्यान, सोच से बाहर की किसी बात में नहीं लग पा रहा था। उसके साथ बैठे मित्र ने कोशिश की थी, यह पूछ कर, कि जिस व्यक्ति की मौत के चलते वह यहाँ बैठा हुआ था, वह उससे कितना बड़ा था। पर समीर ने उसके प्रश्न का जवाब दोटूक ढंग से दे दिया था। उस समय कुछ पलों के लिए उसके मन में सरसराती स्मृति के दौरान, कुछ ऐसे चेहरे भी उभरे थे, जो पिछले दो ही महीनों के भीतर मरे थे। इनमें से पहला चेहरा तो, उस कुन्दन प्रसाद का था, जो उसके एक सहपाठी का छोटा भाई था। मुहल्ले के चौराहे में उसकी पान की दूकान थी। उस वक्त उसे याद करते हुए लगभग अनायास ही उसे यह बात याद आयी थी, कि उसके मरने के एक दिन पहले समीर खुद उसे लेकर डॉक्टर के पास गया था। डॉक्टर की लिखी दवाएँ खरीदने के लिए भी, दवा की दूकान तक वे साथ-साथ गए थे। उस समय उसके पास पैसे नहीं थे, सो समीर ने ही पर्स से नोट निकालकर, दूकानदार को पैसे दिए थे। बेशक कुन्दन ने उसी रात उसे उसके पैसे वापस कर दिए थे। नोट गिनने के बाद समीर ने उससे कहा भी था, कि उसने बीस रूपये ज्यादा दे दिए हैं, पर समीर के पास उस वक्त चिल्हर नहीं था। कोई बात नहीं, कुन्दन ने कहा था, वह कल ले लेगा। लेकिन आने वाले उस कल की सुबह ही उसे खबर मिली थी, कि कुन्दन गया। खबर से उसे दहशत सी हो गयी थी। उसका डरपोक दिमाग अनापशनाप सोचने लगा था।

       जैसे अभी सोच रहा था, तो मुहल्ले में हुई हालिया मौतों का सिलसिला थम ही नहीं रहा था। कुन्दन की स्मृति ने उसे तत्काल अपने एक कजिन की मौत की याद दिलायी थी। यह इसलिए, कि कजिन का घर भी उसी मुहल्ले में था, याने उसी गली में, जिसमें कुन्दन का पुश्तैनी मकान था। शायद इसलिए भी, उसकी याद स्वाभाविक रूप से आयी थी, कि ये दोनों धुर पियक्कड़ थे। चौबीसों घण्टे रुक-रुक कर पीने वाले, ये दोनों एक ही गली के समवयस्क पियक्कड़, एक दूसरे को जानते तो थे, पर दोनों में कोई बातचीत नहीं थी। लेकिन कुन्दन के बाद जब पन्द्रह दिन में ही यह हरीश भी चला गया, तो मुहल्ले के सारे लोगों ने उन दोनों की मौत की याद साथ-साथ की थी। यह कहते हुए, कि एक ही गली के दो लोग, लगभग एक ही उम्र में, दारु के चलते ही खतम हो गए। समीर को, यही जुमला याद आया और उसी के साथ इनसे कुछ ही दिन पहले, उसी धोबी पारा में खतम हुए, विष्णु साव की याद आयी, क्योंकि यह भी, दारू के चलते ही मरा था, हालाँकि मौत का तात्कालिक कारण तो कुछ भी हो सकता है। लेकिन उसी धोबी पारा में यह किशन नाम का चालीस साल का व्यक्ति कौन है, जिसकी मौत की खबर वार्ड मेम्बर ने बल्लू की मोबाइल पर दी है ? इसका कोई सुराग दिमाग ने नहीं दिया, लेकिन दिमाग, अपनी कोशिश से हटता भी नजर नहीं आया। धोबीपारा, समीर के घर से बमुश्किल पचास मीटर की दूरी पर था। घर से निकलो, बायें मुड़ो, तो नाले से सटकर बने इस मुहल्ले में धोबी, उसकी पैदाइश से पहले रहते आये थे और उसी रास्ते होकर आज भी वह, या तो वैष्णव भोजनालय जाता था, या अपने कजिन के घर। श्मशान में बैठा बैठा, इधर उधर की बातचीत को न समझते हुए, सुनता हुआ, वह उस मुहल्ले के परिचित लोगों की याद करने की कोशिश में लगा हुआ था। बेशक बीच-बीच में अन्दरूनी झल्लाहट के साथ, वह अपनी इस फिजूल सोच को परे ठेलने की कोशिश भी करता रहता था। साथ बैठे मित्र से किसी भी विषय में किसी भी बात की शुरुआत कर, वह सोचता कि शायद उसका दिमाग दूसरे रस्ते पर चल पड़ा है, पर कुछ ही पलों में वह फिर उस मुहल्ले के चारों ओर के लोगों को इतनी गौर से अपनी कल्पना में देखने लगता था, जैसे वे जीते जागते सामने खड़े हों। जैसे अभी वह मुकुन्द अग्रवाल को देख रहा था। धोबी पारा में ही, पिछले पन्द्रह बरसों से रहने वाला यह आदमी, उस मुहल्ले का एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जो धोबी नहीं था। बेशक जिस जगह पर उसने उस मुहल्ले में, एक पक्का दुमंजिला मकान बनवाया है, वह पहले एक धोबी का मकान ही था। उसका नाम था तीरथराम। उसे सब तिरथो कहते थे। इस तिरथो ने, अपना मकान गिरवी रख कर मुकुन्द से दो तीन हजार कर्ज लिए थे। वह ब्याज चुकाते चुकाते ही अधमरा हो गया था, हालाँकि मरा था वह, इस ब्याज की वजह से नहीं, बल्कि दारु की वजह से। अपनी मौत के एक दो बरस पहले, उसने अपने मकान का आधा हिस्सा बेच दिया था। उसी आधे हिस्से में मुकुन्द ने यह पक्का हिस्सा बनवाया था, पर किस्मत का खेल, कि अपने बेटे की शादी के दो तीन बरस बाद ही, याने आज से कोई महीने भर पहले, यह भी अपनी पियक्कड़ी के चलते, दिल्ली से इलाज कराके आने के बावजूद, खतम हो गया था।

       सोचते हुए समीर को अचानक फिर लगा, कि चाहे कोई भी हो यह किशन, मरा यह दारु के चलते ही होगा। सिर्फ धोबी पारा में नहीं, आसपास के सभी जात के मुहल्लों में दारु की लत एक आम बात हो चुकी थी। अधिकांश लोग ब्रह्म मुहूर्त से ही शुरु हो जाते थे। समीर मॉर्निंग वॉक में जाते हुए ऐसे कई युवकों, अधेड़ों से रोजाना टकराता था, जो दारु के अवैध अड्डे से आ रहे होते थे या जा रहे होते थे और इसी सरसराती स्मृति की कौंध में उसे याद आया, कि बीते कल की सुबह ही उसने कुन्ती के पति के साथ, एक अजनबी को देखा था। और दूसरे पल उसे यह भी याद आ गया, कि उसका नाम भी तो किशन ही है, तो फिर क्या यह वही किशन है......? उसने थोड़ी विकलता में सोचा था और गुस्से में एकाधिक बार कही गयी कुन्ती की बात भी उसे याद आयी थी, मरता भी तो नहीं कमबख्त। वह तात्कालिक गुस्सा व्यक्त करने के लिए ही ऐसा कहती थी, पर जिस रफ्तार से वह दारु पी रहा था, उसे देखते, उसका आनन फानन चल बसना, अप्रत्याशित तो कतई नहीं था। वहाँ श्मशान में मित्र के जलते शव पर पँचलकरी डालते, वह मन ही मन प्रार्थना सा कर रहा था, कि हे भगवान यह कुन्ती का किशन न हो।

पर घर पहुँचते ही शोभा ने उसे बहुत ही भीगी आवाज में, यही खबर सुनाई थी कि कुन्ती का पति कल घर वापस आते समय, घर से कुल पचास कदम की दूरी पर, राम मंदिर के बगल से, किसी के पेंवठे में बैठे बैठे मर गया।

क्या? उसने लगभग चीखते स्वर में पूछा था। उसका मन शायद इस तरह एक सुघड़ सलोनी स्त्री के संसार के आनन फानन उजड़ जाने की खबर पर विश्वास नहीं करना चाहता था। लेकिन यह सच्चाई थी। दूसरे दिन ही वह, दीदी के साथ कुन्ती के घर गया था। उस समय उसके घर में उसकी बड़ी दीदी और उसकी दो लड़कियाँ आ चुकी थीं। बड़ी दीदी का दामाद भी वहीं था। एक कमरे और एक बरामदे का वह घर, गली के भीतर की एक गली में बने पाँच छै कुठरिया टाइप मकानों में एक था। जब वह दीदी के साथ वहां पहुँचा, तो कुन्ती ने उन्हें देखते ही रोना शुरू कर दिया। साथ में गायत्री भी रोने लगी। उसे अजीब सा लग रहा था। इस तरह की परिस्थिति उसे अजीबोगरीब ढंग से नाटकीय लगती है और ऐसे मौकों पर कुछ कहने के लिए शब्द भी नहीं सूझते। यह तो खैर घर में काम करने वाली नौकरानी के पियक्कड़ पति की मौत का मामला था। वह श्योर था, कि दीदी अपनी सहानुभूति के भीतर यही सोच रही होगी, कि चलो बेचारी को मुक्ति मिली। कुन्ती के पति की आदतों से वह परिचित थी। उसे पता था, कि यह अपनी सारी कमाई दारु में बहा देता है। घर के खर्चे के लिए भूल कर भी कभी एक पैसा तक नहीं देता, उल्टे कुन्ती की कमाई पर भी अपना पति परमेश्वरी हक जताता ही रहता है। पर समीर को लग रहा था, कि चाहे कुछ भी हो, यह आदमी उसके साथ, उसके घर में ही रह रहा था। अभी कुन्ती के अश्रुस्नात चेहरे को देखते, उसे यह बात भी याद आ रही थी, कि कुन्ती ने इसके साथ भाग कर शादी की थी। वह जात की धोबिन नहीं, तेलिन थी। किशन के घर के ठीक पीछे की गली में, वह तेलियों के मुहल्ले में ही रहती थी। उन दिनों यह किशन किसी सिक्युरिटी कंपनी में काम करता था। वह अक्सर स्कूल जाते हुए उसे देखती थी। वह भी उसे देखता था। इसी देखादेखी में सोलह साल की उमर में ही, उसने जात पाँत की चिन्ता किए बगैर, अपनी मैट्रिक की पढ़ाई छोड़कर उससे शादी कर ली थी। और शादी के  बाद, किशन को दारु की ऐसी लत गयी थी, कि कुन्ती ने कपड़े धोने के पुश्तैनी पेशे के साथ, जो कि खुद उसका जातपेशा नहीं था, लोगों के घरों में नौकरानी का काम करना भी शुरु कर दिया था। वह समझ चुकी थी, कि उसे अपनी जिन्दगी भी, अपने ही हाथों की मेहनत से चलानी होगी। सिनेमा के गानों से सीखी गयी मुहब्बत की असलियत, दो बरस बाद ही जाहिर हो गयी थी। अठारह की उमर में ही सुन्दरी कुन्ती ने, जिन्दगी की बदसूरती को बहुत करीब से जान लिया था। लेकिन क्या, किशन के इस तरह बिलकुल अचानक और अप्रत्याशित चले जाने पर, कुन्ती को धक्का नहीं लगा होगा। समीर ने सोचा।

कुन्ती और गायत्री का रोना थम चुका था। गायत्री पूरे विवरण के साथ किशन की मृत्यु के बारे में, पूरी नाटकीयता के साथ, किस्सा सुनाने जैसा बता रही थी। यह वही गायत्री थी, जो पिछले कई वर्षों से लोगों के यहाँ बर्तन माँजने और कपड़ा धोने का काम करती है। शोभा के यहाँ आने के पहले उसने कुछेक दिन के लिए, घर की रसोई का काम भी सम्हाला था। समीर उसके तेज वाल्यूम में आती सूचनाओं पर, विशेष ध्यान नहीं दे रहा था। दीदी भी शायद उसके विस्तृत वर्णन से ऊब रही थी। समीर नजरें चुरा कर, बार बार कुन्ती की ओर ताक रहा था। उसका अश्रुस्नात चेहरा, बड़ी बड़ी आँखें, सघन केशराशि से बना उसका यूँ ही सा जूड़ा। कुन्ती सचमुच सुन्दर है, उसने सोचा।

दरअस्ल आज से पाँच साल पहले जब उसकी एक परिचित कामगार लड़की से उसने घर में काम करने वाली, किसी को ढूँढऩे को कहा था, तो उसने तत्क्षतणात् उनके बाजू से गुजरती एक सुघड़ कद काठी वाली का नाम लेकर उसे पुकारा था, कुन्ती।

युवती तब तक कुछ आगे बढ़ चुकी थी। वह पलटी। उनकी तरफ बढ़ी। सामने आकर खड़ी हो गयी। उसने एक मधुर मुस्कान के साथ समीर को नमस्ते किया। मुस्कराती आँखों वाली करीब से और भी सुन्दरी लगी। फिर उस परिचित लड़की ने, उससे सीधे सीधे सवाल किया, इनके यहाँ काम करेगी ?

क्या काम? उसने सहज भाव से पूछा था और शायद मार्क कर लिया था, कि समीर उसे घूरने सा देख रहा था। उसी तरह मुस्कराते हुए उसने लगभग सहज भाव से समीर की ओर देखा था। वह अपने पूरे व्यक्तित्व में कहीं से भी, धोबी पारा या पास पड़ोस में रहने वाली लड़कियों की तरह नहीं लग रही थी। उसकी देह में कहीं भी चर्बी नजर नहीं आती थी। पूरी देह गठी हुई लगती थी। उसे अपनी तरफ  इस तरह ताकती देख, समीर ने खुद नजरें झुका ली थी।

झाड़ू पोंछा। परिचिता निशा ने कहा था। थोड़े नानुकूर के बाद उसने आखिरी सवाल पूछा था, डॉक्टर मैडम के घर में? हाँ, समीर ने उत्साहित होकर कहा था और बात बन गयी थी। यह कोई पाँच साल पहले की बात थी। तब उसकी शादी को दो साल हुए थे। उन्हीं दिनों उसके पति की नौकरी छूटी थी। दारु की वजह से ही।

और आज दारु की वजह से ही वह हमेशा के लिए यह संसार छोड़ चुका था।

परसों रात जब वह दारु पीकर पीकर लौट रहा था, तो राम मंदिर की चढ़ाई चढ़ते समय, उसके सीने में भीषण दर्द हुआ। वह गली के बाजू में बने माटी के मकान के पेंवठे पर ईंट के चौकोर खम्बे पर टिककर बैठ गया और वहीं बैठे बैठे खतम। गायत्री ने मृत्यु कथा का समापन किया।

बैठे-बैठे? दीदी ने विस्मय से पूछा।

हाँ, बैठे बैठे दीदी, जब मुहल्ले के लोग गए तो वह आँखें मूँदे इस तरह बैठा था, जैसे सो रहा हो।

बैठे बैठे, समीर ने सोचा, कितनी सुखद मृत्यु है, और कुन्ती की तरफ देखा। उसकी बड़ी बड़ी आँखें डबडबा गयी थीं। वह डबडब आँखों से एकटक ताक रही थी, सामने की दीवार पर फ्रेम में जड़े, अपने ब्याह के बाद की फोटो की ओर।