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Monday 09 Dec 2019

ग़ज़ल

दौरे-खिजाँ   हो   या   कभी   दौरे-बहार   हो

इन्सां  वही  है  इनसे  न  जो   दरकिनार   हो

 

गुजरेगी  उसपे  क्या  कि वही  दे  दगा  उसे

जिसके लिए दिल  उसका  बहुत  बेकरार हो

 

चाहत वही है, दिल में बसा जो वो बस गया

क्या फर्क है, वो फूल हो या  कोई  खार  हो

 

बाला ए ताख रख दे जो आईनेमुल्क ही

इतना जुनून भी तो न सर पर सवार हो

 

ढाता है साद:लौहों पे जो नित नये सितम

काश! उनके हाथों ही वो कभी संगसार हो

 

हाकिम के दबदबे में रहे कोई कब तलक

अब उसके जब्र का कोई कब तक शिकार हो

 

हो  बन्दिशे-खयाल  से जेबा अगर  कलाम

दरवेश बोलता   हुआ  वो   शाहकार   हो

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बढ़ाओ न  तुम  इतनी  भी  दूरियाँ

कि चुभने लगें यादों की किरचियाँ

 

इधर हमने गुपचुप कोई बात की

उधर कान बनने लगीं खिड़कियाँ

 

बिलखते रहे हादिसों में अवाम

सियासत की बनती रहीं सुर्खियाँ

 

हुआ  है  हमेशा  महाभारत  एक

कोई द्रौपदी आयी जब दरमियाँ

 

सुनायी खरी-खोटी बेटे ने  जब

भिंची रह गयीं  बाप की मु_ियाँ

 

फलक पर कबूतर दिखे जब कभी

बहुत याद आयीं तेरी चि_ियाँ

 

डरो मत,  दुखों के पहाड़ों के बाद

सुखों की भी दरवेश हैं वादियाँ  1