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Tuesday 20 Aug 2019

नहीं रहेगा यह भयावह समय

नहीं रहेगा यह भयावह समय

 

उफ्फ!

यह कैसा भयावह समय है

जिसमें लयताल के साथ

नंगा नाच नाचती हुई

पुष्यमित्री सभ्यता

अपने बाहुबल के घमंड में

मदमस्त हो

भुजाओं के पाश में बांध

जोरों से दबा

हमारी हड्डियां

चकनाचूर करने को बेताब है

 

समय का चक्र!

उल्टा नहीं घूमता,

यह जानकर भी तानाशाह

लगातार हवा भर

अपना सीना तान रहा है

उसके फेफड़ों में समाने हवा

कहाँ से आ रही है

गौर से देखो इस हवा का बहाव

जाँचो परखो इसे

अब यह तानाशाह

किन्हीं अकिंचित अवरोधों से

कतई नहीं रुकेगा

 

कब तक बहेगी यह हवा

इसे सिर्फ़ हम रोक सकते है

 

मजबूती से रोकना होगा इसे

या इसका रुख बदलना होगा

हमें ही

जान लो यह परम सत्य

कोई भी

कैसा भी

समय ज्यादा देर तक

भयावह हो स्थायी

भाव में नहीं रह सकता

 

समय ही अवसर

देने वाला है

थोड़े इंतजार के साथ

पहचानो उस समय को

तुम्हें माध्यम बना समय ही रोकेगा,

पलटाएगा इसका कयामत भरा बहाव।

*

 

अनुत्तरित प्रश्न

 

कोशिश करता हूँ

लिखने की तुम्हारे प्रश्नों पर

अपने प्रश्नों की कविता

 

कहाँ हो?

कैसे हो?

 

क्या कहूँ!

कि कैसा हूँ मैं

अब तक जिन्दा हूँ

क्या यही कम है ?

 

मौत पर भी

शीघ्र थम जाने के लिए

उठेंगे अनेक प्रश्न

कैसे, कहाँ, क्यों 

किस तरह मरा ?

 

तभी कोई आयेगा

चिता पर

थोपने अपने विचार

उसके बाद बचे रह जाएंगे

प्रश्न सारे

अनुत्तरित।

*

ढोंगी परम्पराओं के बीज

दहशतगर्द बोते है नफरतों के पेड़

उनके उगाये इन पेड़ों पर

फल-फूल नहीं लगते

फलते हैं केवल बबूल की मानिंद काँटे,

मौका पाकर वे बिखेरते है इन्हें

आम रास्तों में

पाँवों में चुभने

दिलों में गडऩे

ये काँटे चुभने में कभी

भेदभाव नहीं करते।

 

उफ्फ!

दहशतगर्दी के काँटे

चुभते हैं

क्षणभर महसूसे जाते हैं

समय बीतते-बीतते,

स्मृति में याद रखने

भूल जाता है आदमी

इनकी चुभन!

उसके भूलते ही

दहशतगर्द दोबारा सक्रिय हो जाते हैं

 

वह खुद भी इनके साथ शामिल हो

ढोंगी परम्पराओं के बीज बोने

नफरत फैलाते हुये

इंसानों में भेदभाव कर

हिजड़ों-सी ताली बजाता

भीड़ को खुदकशी की ओर ढकेलता गाने लगा है

धर्म-भीरुता के गीत,

उसके इस ढोंग को रोकने

सूरज के रथ का सातवां घोड़ा

लगाम तुड़ा

दक्खिन दिशा में

भाग रहा है सरपट

जहाँ आसमान में

घुमड़ते-बरसते बादल

इनकी दहशतगर्दी की गंदगी को धोने

मूसलाधार बरसने वाले है।

*

 

हमारे साहस की दरकार

 

गाँव का तालाब 

जिसमें स्याह पानी लबालब भरा हुआ

इसमें मछलियाँ नहीं, भैंसे तैरती हैं

मच्छर पनपते हैं

पूरे गाँव में डोलते हुए

मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया फैलाते हैं।

 

गाँव का तालाब

इसके किनारों पर

कच्चे-पक्के कई घाट बने हैं

बामनों का घाट

बनियों का घाट

ठाकुरों का घाट

सबके अलग-अलग घाट

अगड़ों के, पिछड़ों के

किन्तु पक्के व पास-पास जुड़े हुए हैं,

 

बस एक घाट अलग-थलग बना है

जिसकी जगह-जगह से उखड़ी हुई

सीढिय़ाँ बताती हैं

कि यह दलितों का घाट है जहाँ

गहरी हरी काई से पटा हुआ है स्याह पानी,

इसी घाट पर करना होता है

गाँव के दलितों को सारा निस्तार

वे भूल कर भी

अगड़ों के पक्के घाट पर नहीं जा सकते

लेकिन पानी में तैरती भैंसे स्वतंत्र हैं

कहीं भी, किसी भी घाट तक आ-जा सकती हैं

मच्छर उड़कर जा सकते हैं

आवारा कुत्तों के आने-जाने पर कोई रोक नहीं

लेकिन मजाल कि कोई दलित चला जाये,

गलती से किसी पक्के घाट पर

चला ही गया वह तो

गाँव की पंचायत बैठनी है

इस पंचायत से पहले और

इस पंचायत के दौरान

उसे सिर झुकाये हाथ जोड़े खड़े रहना है किनारे

पंचायत की जाजम पर बैठा

एक शातिर खड़ा हो जाएगा अनायास

खामखा अभियोजक बन

वह पूर्व से अधिरोपित आरोप सुनाएगा

कोई सफाई नहीं ली जाएगी आरोपी से

लामबद्ध हो पंचगण

सर्वसम्मति से सजा सुना देंगे

गांव की ठेठ पंचायत में

 

कमबख्त ऐसा तालाब भी क्या

जो जानवरों,मच्छरों, कुत्तों के लिए

सब तरफ से है खुला हुआ

किन्तु सिवाय एक कोने के

पंचायत की बाकी सारी जगह

बहुजनों के लिए बंद है

दलित दो पाया जानवर है यहाँ

उसे इंसान माना ही नहीं गया अब तक

कितनी सदियाँ और लगेंगी

उसे इंसान मानने में

पंचायत के किसी पंच को नहीं पता।

कब तक जानवर तैरते रहेंगे

गाँव के इस तालाब में

कैद रहेगी पंचायत

गाँव की गड़ी में

आजाद होने हाथ-पाँव मारती हुई

छटपटाती रहेगी समता

उसे मुक्त होने

केवल हमारे साहस की दरकार है। 1