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Wednesday 21 Aug 2019

दफैरून की कविताएं थूक

दफैरून की कविताएं

थूक

 

पहले आदमी ने

दूसरे आदमी पर थूका

दूसरे ने पहले पर

 

फिर तो ऐसा चला खेल

बह गया थूक ही थूक

बह गये दोनों ।

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कितना खऱाब दौर है

 

कोई आया और

मेरे हाथ लेकर भाग गया

 

कोई आया और

मेरे पांव लेकर भाग गया

 

कोई आया और

मेरी आंखें लेकर भाग गया

 

कोई आया और

मेरा दिमाग़ लेकर भाग गया

 

कर्महीन कर दिया गया मैं

क्रियाहीन कर दिया गया मैं

दृष्टिहीन कर दिया गया मैं

विचारहीन कर दिया गया मैं

 

कितना खऱाब दौर है ये

कितने खऱाब दौर से गुजऱ रहा हूं मैं ।

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चलना

 

चलना

कहीं न कहीं पहुंचना है ।

बस ,

हमें सोचना है

कहां पहुंचना है ।

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संशय की लपट

 

मैं ने रखे दाने

रखा पानी

 

चिडिय़ा आई

देखा दानों की तरफ़

देखा पानी की तरफ़

देखा फिर मेरी तरफ़

 

कुछ था मेरे और चिडिय़ा के बीच

जो उठ रहा था, गिर रहा था

 

चिडिय़ा ने देखा

उसकी तरफ़

फिर मेरी तरफ़

और फुर्र से उड़ गई ।

 

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नमक इश्क का

 

 

एक के बाद एक

सारी नदियां

अकेली या एक दूसरे का

हाथ थामे

दौड़ी चली जा रही हैं

समुद्र की ओर

 

फिज़़ाओं में गूंज रहा है

रेखा भारद्वाज का गीत

जुबां पे लागा, लागा रे

नमक इश्क़ का ।

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उन्हें मालूम है

 

 

उन्हें मालूम है

हम कहीं नहीं जायेंगे

हम कहां जाएंगे

 

उन्हें मालूम है

हम घर से निकलेंगे तो ज़रूर

लेकिन किसी रेस्तरां में

दोस्तों के साथ रुक जायेंगे

चाय या कॉफी पिएंगे

गपशप करेंगे

 

उन्हें मालूम है

हम रेस्तरां से निकल कर कहां जाएंगे

कुछ देर फ्लाईओवर पर खड़े होंगे

और नीचे झांकते हुए

एक डरी हुई टिप्पणी करेंगे

या पार्क में जा कर

पार्क के तालाब में तैरती

बतखों से खेलेंगे

 

उन्हें मालूम है

हम कहीं नहीं जायेंगे

 

उन्हें मालूम है

हम घर से निकलेंगे तो ज़रूर

लेकिन बाज़ार में

किसी रेस्तरां में चाय या कॉफी पी कर

फ्लाईओवर से होते हुए

या पार्क में पार्क की बतखों से खेलते हुए

वापस लौट आएंगे

 

उन्हें मालूम है

और अच्छी तरह मालूम है

हम कहीं नहीं जाएंगे

हम कहां जाएंगे ।

 

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लगातार

 

लगातार बढ़ते जा रहे हैं दुश्मन

दोस्त कम होते जा रहे हैं लगातार

लगातार मुझे अकेला करती जा रही है

सच बोलने की आदत ।  1