Monthly Magzine
Monday 26 Aug 2019

एक अभागी स्त्री की कविता

एक अभागी स्त्री की कविता

 

 

एक पुरुष के कंधे पर टिका है

एक स्त्री का सिर

 

सदियों पुरानी असुरक्षा और निर्बलता में धँसी हैं

स्त्री की आँखों में ठहरे सपने की जड़ें

 

सपने में पड़ रही है

एक छोटे से सुखी घर की नींव

घर की तिखाल में उग रही है

सिन्दूर और मेंहदी की डिबिया

आले में प्रतिष्ठित है तमाम पापों और शापों से बचाने के लिए

एक अदद ईश्वर

और आँगन में लहलहा रहे हैं

पकी फसल की बालियों की तरह बच्चे

 

स्त्री के सिर से सटे पुरुष कंधे से

फूटता है जहर का अँखुआ

काँटेदार टहनियाँ और जड़ें फेंकने लगता है

एक जहरीला पेड़

 

अंधड़ में काँपती है घर की नींव

सपने की तिखाल से फिसल

धम्म से आ गिरती है सिन्दूर की डिबिया

आँखों में किरकिराने लगती है सुहाग की मेंहदी

 

खुद को बचाने की गुहार लगाते

पत्थर आँखों से ताकता है खंडित ईश्वर

सपने से निकल कर खुली आँखों के सच में

फैल कर बढऩे लगते हैं बच्चों के नाखून

पुरुष

और बच्चों के रक्तपायी होठों से

गिरता है टप-टप अभागी स्त्री का रक्त

 

पुरुष के कंधे पर उगे अंधकार के पेड़ से

सुनाई देता है एक थकी-हारी पराजित स्त्री का

करुण रुदन

-------

 

हमारे समय में प्रेम

 

यहाँ होना था उसे ही सबसे ज्यादा

इस बेहद कठिन समय में सबसे कम समझी गयी

उसी की जरुरत

 

यह चमत्कार ही था कि दूर-दूर तक

उसके कहीं मौजूद न होने के बावजूद

परदे पर वही सबसे ज्यादा बिकाऊ था

 

इतना मुनाफे का सौदा था वह

कि अनेक कम्पनियाँ उसे प्रायोजित करने के लिए तत्पर थीं

बहुत से आलू-प्याज के व्यापारी

व्यापार से होने वाले घाटे की भरपाई

उस पर दाँव लगा कर करना चाहते थे

बोरियों और बिस्तर की तहों में छिपा कर रखने के बावजूद

बहुत सा काला अभी भी बच गया था

जिसे सफेद में बदलने के लिए

वह एक सुरक्षित तिजोरी या गोदाम हो सकता था

 

सौंदर्य प्रसाधनों के विज्ञापनों में

इतनी इफरात में मौजूद था वह

कि द्रवित करने के बजाय अपच पैदा करता था

 

एक विज्ञापनी नाकनक्श और मर्दाना कद-काठी के बगैर

उसकी उपस्थिति थी असंभव

एक जीर्ण और बदरंग चेहरे में तो

वह हर्गिज हो ही नहीं सकता था

उसके होने के लिए कतई जरूरी नहीं माना गया

एक सीधा-सच्चा और सरल मनुष्य होना

 

जरूरी समझा गया था

कि उसके होने के लिए घटता हो आप पर

उत्तराधिकार कानून पूरे घनत्व के साथ

घिसी हुई चप्पलें न हों आपके पाँवों में

और पेट हो जरुरत से कुछ ज्यादा ही भरा

 

घड़ी के काँटों में कैद कर दिया गया था वह

जीवन की चक्की में आटे की तरह पिसने के दौर में

उसके बारे में सोच पाना भी

मध्ययुगीन भावुकता मान लिया जा सकता था

 

अखबारों के शीर्षकों से वह गुम था 

वहाँ सिर्फ खबरें थीं और सूचनाओं का घटाटोप था

उसके विचार को भी पास फटकने देने में

आय और उपभोग के कम हो जाने के खतरे निहित थे

 

एक मशीनी और पेंचदार जीवन में उसके बारे में

सिर्फ शेयर बाजार के चढ़ते-उतरते ग्राफ से ही

जाना जा सकता था  1