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Wednesday 19 Sep 2018

बिना खांचे का बचपन

बिना खांचे का बचपन

 

बचपन का कोई मजहब नहीं होता

उसके कोई रीति-रिवाज नहीं हैं

वो बेखौफ विचरता है

सारी दुनियावी जंजीरों को किनारे रखकर

 

बचपन की नस्लें जरूर होती हैं

पर उसकी हरकतें एक जैसी।

अलग अलग जीवों के बच्चे

जीते हैं अपना बचपन

अपनी नस्ल के भीतर एक जैसे

 

हर जीव के बच्चे

अपना बचपन पूरा करने के बाद भी

अपनी नस्ल के ही रह जाते हैं

उनके बीच भेद नहीं होता

पर इंसान का बच्चा

जैसे-जैसे बड़ा होगा

उसमें तमाम भेद भर जाएंगे

ऐसा कब तलक होता रहेगा

कि वे बचपन में जिये सौहार्द को

बड़े होने पर खत्म होता हुआ पाएंगे

कब तक ऐसा होगा कि एक जैसी किलकारियां

अलग-अलग खांचों की भाषा बोलेंगी

कोई हिन्दू हो जाएगा

कोई मुस्लिम

कोई सवर्ण कहलायेगा

कोई नीच

 

बचपन के बाद का जीवन

क्यों इतना अलग हो जाता है....