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Friday 16 Nov 2018

पुनर्जागरण से पुनर्मरण की ओर

14वींसे 17वींशताब्दी के बीच यूरोप में रेनेसां यानी पुनर्जागरण का दौर आया। रेनेसां का शब्दिक अर्थ तो पुनर्जन्म है, लेकिन इसके प्रभाव में पूरे यूरोप में ज्ञानार्जन की जो लहर चली, उसके कारण इसे पुनर्जागरण कहा गया। भारत या मिस्र की तरह फ्रांस, इटली जैसे देशों की सभ्यता बहुत प्राचीन नहींहै। लेकिन इन देशों में प्राचीन यूनानी और रोमन साहित्य का अध्ययन कर लोगों की संसार के चीजों की समझ में आमूल परिवर्तन आया। बौद्धिक जीवन में एक क्रांति पैदा की। रेनेसां में कला की विभिन्न विधाओं का विकास हुआ, तकनीकी, विज्ञान आदि में भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। इन सबके साथ मानववाद भी पनपा। मानववाद का सिद्धांत था कि लौकिक मानव के ऊपर अलौकिकता, धर्म और वैराग्य को महत्व नहीं मिलना चाहिए। कुल मिलाकर रेनेसां ने यूरोपीय समाज में ऐसा सकारात्मक परिवर्तन किया कि वहां एक नए बुद्धिजीवी वर्ग का जन्म हुआ, जिसने यूरोप के विकास को नए आयाम दिए। भारत में भी 19वींसदी में पुनर्जागरण का दौर आया। सुशिक्षित भारतीयों को यह बोध होने लगा था कि समाज में व्याप्त अंधश्रद्धा, कर्मकांड का प्रभाव, रूढिय़ों के प्रति दुराग्रह, जातिभेद, ऊँच-नीच का भेदभाव, वैज्ञानिक मानसिकता का अभाव जैसी बातों के कारण भारतीय समाज की उन्नति रूकगई है। देश मानसिक जड़ता के कारण गुलाम बना है। देश के विकास में बाधक बने तत्वों को दूर करने के लिए तत्कालीन बुद्धिजीवी विचार करने लगे। भारत को आधुनिक बनाने के संबंध में विचार प्रस्तुत किए जाने लगे। सती प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध का विरोध हुआ, स्त्रियों-दलितों की शिक्षा के लिए प्रयास हुए, जातिप्रथा को दूर करने का आह्वान हुआ। राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, ईश्वरचंद विद्यासागर, गोपाल गणेश आगरकर, स्वामी दयानंद सरस्वती, पेरियार रामस्वामी नायक्त, महर्षि धोंडो केशव कर्वे, स्वामी विवेकानंद ऐसे कई नाम भारतीय वैचारिक क्रांति यानी पुनर्जागरण के पुरोधा बने। ये महान बुद्धिजीवी आज होते तो इन्हें जान का खतरा होता। कम से कम भाजपा विधायक बासवन गौड़ा पाटिल के रहते तो मौत का डर बना ही रहता। इन महानुभाव ने पिछले दिनों कारगिल विजय दिवस पर कहा कि अगर वे गृहमंत्री होते तो बुद्धिजीवियों को गोली मारने का आदेश दे देते। बासवन गौड़ा के मुताबिक बुद्धिजीवी देश की सारी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं, जिसके लिए जनता टैक्स देती है और उसके बाद भारतीय सेना के खिलाफ ही नारेबाजी करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश को सबसे ज्यादा बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्षों से ही खतरा है। मोदीजी के शासन में अब भाजपा विधायकों, सांसदों, नेताओं के ऐसे बयान अचरज पैदा नहींकरते। बल्कि पिछले चार सालों में जनता लगातार इस तरह की हेट स्पीच ही अधिक सुन रही है। जिसका परिणाम भीड़ की हिंसा के रूप आज देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट तक ने इस हिंसा के खिलाफ चेताया है, लेकिन जब तक सरकार नहींचाहेगी, इस हिंसा पर लगाम नहींलगेगा। विधायक पाटिल ने जैसा बयान दिया है, वह भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने वाला ही है। वे गृहमंत्री नहींहैं, लेकिन जनप्रतिनिधि तो हैं ही और जब वे एक तबके विशेष के विरूद्ध घृणात्मक, हिंसात्मक बयान देंगे तो सामान्य जनता को प्रेम और सद्भाव के लिए प्रेरित नहींकिया जा सकता। भारत की बुनियाद उदारता, त्याग, सहनशीलता और नए विचारों को आत्मसात करने से ही मजबूत हुई है। जब मानसिक जड़ता इन गुणों पर हावी हुई, तो देश गुलाम बना और सदियों तक उसकी पीड़ा भुगती गई है। मोदी जी और उनके तमाम अनुयायी जब-तब प्राचीन भारतीय संस्कृति और ज्ञान का गौरवगान किया करते हैं। लेकिन देश का पतन करने वाले इन कारणों को सुविधापूर्वक बिसरा देते हैं, क्योंकिइससे उनके हिंदू राष्ट्र वाले एजेंडे में बाधा उत्पन्न होती है। यूरोप ने पुनर्जागरण से अपने विकास की राह तय किया। भारत में भी पुनर्जागरण के कारण ब्रिटिश गुलामी के साथ-साथ रूढिय़ों की गुलामी से मुक्ति में सहायता मिली। लेकिन अब जबकि बुद्धिजीवियों और उदार सोच की हत्या का विचार पनपाया जा रहा है, तो यह याद रखने की जरूरत है कि इनसे दो-चार लोगों की हत्या नहींहोगी, बल्कि भारत की हत्या होगी, ऐसी कट्टर सोच पुनर्मरण की ओर भारत को ले जाएगी। क्या राष्ट्रवादी लोग यही चाहते हैं?