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Wednesday 19 Sep 2018

चंद्रकांत देवताले : जनपद का एक आदिवासी

कि मैं जब भी जहां कहीं होऊं मेरे कवि होने की महक फैले और मेरे कांटे जिन्हें चुभना चाहिए, चुभें। नकाबपोश कवि  होना मुझे पसंद नहीं। मुझे बहुत संतोष है कि जब कभी आसपास के जन पूछ लेते हैं, क्या आप कवि हैं?

अपने संग्रह कवि ने कहा की भूमिका में कह रहे हैं देवताले जी,  देखा जाय तो आज की तारीख में यह एक असाधारण और दुस्साहसिक कथन है। यह कबीर की परम्परा में खड़े व्यक्ति का ही कथन हो सकता है, जो आज दुर्लभ है। अव्वल तो हम जिस समय में जी रहे हैं, और समय ने जैसा हमें गढ़ दिया है, उसके चलते आप किसी भी क्षेत्र के हों, हमारे भीतर तरह-तरह की समझौतापरस्ती हमेशा सक्रिय रहने लगी है। सुविधाओं और यश-लिप्सा के कूड़ा-करकट धीरे-धीरे जमा होते हुए कब हमें पूरी तरह बदल कर हमें नितांत व्यवसायी, चतुरसुजान बना देता है, जो सब कहीं फिट हो जाता है। वस्तुत: देवताले जी इस मैनेजमेंट के घोर विरोधी हैं जिसमें हम नकली तर्कों के सहारे सच के बजाय झूठ और छल और न्याय के बजाय अन्याय का परोक्ष समर्थन करने लगते हैं। हमें हमारे समय ने ऐसा ही गढ़ दिया है।

उन्होंने इस भूमिका में आगे लिखा है, जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि। मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी, जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण, विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी होती है।

देवताले जी के व्यक्तित्व और कविता को समझने के लिए ये जैसे बीज सूत्र हैं, उनकी कविताओं को समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं पड़ती।

उनके कुछ और कथन देखिये -

..कवि को पक्षधरता के संस्कार अपने समय की घटनाओं, परिस्थितियों और जीवन-संघर्षों से प्राप्त होते हैं।

 ..होगा जो कवि वही तो कहेगा। खटाक से खुलते चाकू की तरह।

देवताले जी के यहाँ आग उनकी कविता का एक बुनियादी बिम्ब है। यह कई तरह से उनके यहाँ आता है। उनके एक संग्रह का नाम ही है- आग हर चीज में बताई गई थी और यह भी यहाँ कह देना उचित ही होगा कि उनके यहाँ आग कविता के किसी लोकप्रिय उपकरण या फार्मूले के तहत नहीं है। ये आ रहें हैं तो कवि के अपने भीतर से फूटते जज्बे से। यही नहीं, जहाँ-तहाँ आपको चाकू के बिम्ब भी मिलेंगे।

मैं एक साथ चाकू और फूल आग का

आग की रोशनी और गंध में चमकता, महकता, विहँसता हुआ।

ज्ञानरंजन जी ने, इधर के रचनाकारों के लिए अपने एक लेख में कहा है कि हमने अपनी सर्जनात्मक हिंसा को त्याग दिया है। लेकिन देवताले जी के यहाँ यह आक्रामकता उनकी बुनियादी ताकत है। वे गुडी-गुडी विचारों, भावों से बहलने वालों में से नहीं हैं, बल्कि तथाकथित भले या अच्छे लोगों की गढ़ दी गई प्रवृत्ति से ही उन्हें इधर चिढ़ होने लगी है जब भलापन कोई विरोध न करके सबकी हां में हां मिलानेवालों में शामिल दिखाई पड़ता है। अपनी कविता क्या सिर्फ अच्छा होना काफी है, में वे इसी सवाल से टकराते हैं और एक तीखे खीज-झल्लाहट तक पहुँचते हैं।

 तभी नेपथ्य से चिल्लाया कोई

 अच्छे लोग गूंगों की तरह पड़े रहें

 अपने ही घरों के दड़बे में

भाड़ में जाये अच्छाई

और यह दुनिया इमान समेत

तथास्तु !

  दरअसल हमारे अच्छे होने की कसौटी एक सुविधाखोर मिडिल क्लास सोच के साँचे में कुछ इस तरह कस दी गयी है जिसमें असहमति, नाराजगी, गुस्से या विरोध को बुरे आचरण के खाते में डाल दिया गया है। इसीलिए इस कविता के आखिर में वे संदेही ही हैं-

 अच्छे लोगों की कमी नहीं

क्या इसे मान सकते

उम्मीद की चिंगारी

  यह बिल्कुल साफ है कि देवताले जी कबीर, निराला, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और पाश की धारा के कवि हैं, जिन्हें न्याय से कम कुछ भी मंजूर नहीं! जिनके लिए बीच का रास्ता नहीं होता। इसीलिए यह कवि इतना मुखर और दो टूक है, उसे कवि से ज्यादा इंसान होना ज्यादा जरूरी लगता है। इसलिए अपनी कविता के कविता होने की भी वे कोई खास परवाह नहीं करते। वे अपनी बेचैनी, चिंताओं को शेयर करने की ही कविता जीवन भर करते रहें हैं-

पानी, पत्थर, अन्न और घोड़ों तक में

अग्नि का वास बताया गया था

मनुष्यों में तो आग होती ही और होनी ही थी

पर आज आग का पता नहीं चल रहा है

जीवित आत्माएं बुझी हुई राख या भूसे की तरह नाटक देख रही हैं

आग हर चीज में बताई गयी थी

देवताले जी स्वभाव से लचीले, वाचाल, जिंदादिल थे, लेकिन अपने आक्रोश के बहुत सख्त! देश-दुनिया की बेहतरी के लिए हरदम बेचैन, इसीलिए न तो वे खुद पर रहम करते हैं ना ही मित्रों पर

मेरी कविता से

नहीं जान पाओगे

कि मिलावट कितनी

और कितने प्रतिशत इन्सानियत मुझमें

वे अपने उन कवि मित्रों को भी नहीं बख्शते जो भीषण अकाल के वक्त में भी कला-भवनों में संस्कृति-संस्कृति खेलने में मगन हैं-

और मेरे यार संस्कृति और लोक कलाओं के

आयात-निर्यात में इतने मुब्तिला थे

कि उन्होंने आकाश की तरफ  एक बार भी नहीं देखा

जबकि अगस्त दस्तक दे रहा था

  मुक्तिबोध उनके सबसे प्रिय कवि रहे हैं। उनके सरीखी ही तीखी आत्मालोचना, समझौताहीन तेवर इनकी कविताओं की भी बड़ी खासियत है और मध्यवर्गीय पढ़े-लिखे वर्ग से जैसी निराशा मुक्तिबोध को रही, कमोबेश वही इनके यहाँ भी है। निरंतर प्रखरता, सजगता, प्रश्नाकुलता और यथास्थिति के खिलाफ  विद्रोह। तभी तो वह कह पाते हैं..यह खुद पर निगरानी रखने का वक्त है। और अपने अंतिम कविता-संग्रह का शीर्षक भी उन्होंने यही दिया था..खुद पर निगरानी का वक्त, जो किस कदर प्रासंगिक है यह अलग से बताने की जरूरत नहीं। यह तो पहले ही कहा जा चुका है कि देवताले इस दौर के चुनिन्दा आक्रामक तेवर के कवियों में आते हैं, जिनके भीतर वर्तमान नीतियों, परिस्थितियों से असंतोष लगातार गहराता ही गया है। जबकि कवि और कविता को अपने मार्ग से विचलित करने, अपने अनुसार साध लेने के तमाम सरकारी-गैरसरकारी प्रलोभनों, तरह-तरह के पद, पीठ, पुरस्कारों, आयोजनों, लिट्-फेस्टिवल्स...की जोर आजमाइश आज पूरे शबाब पर है, जिसके जरिये कविता से विचारों को खत्म कर देने की दूरगामी तैयारी है। अपनी कविता खुद पर निगरानी का वक्त में वे कह रहे हैं..

पूँजी-मंडी में कैसे

मुस्काते फोटू खिंचवाते

नष्ट हो रहा विवेक

बिक रहा कौड़ी के भाव ईमान

और करोड़ों ने सार्वजानिक रूप से

जिन्हें बनाया था अपने

सुख-चैन के लिए सारथि

जनता-रथ छोड़ वो सब

हवाई जहाजों से कुनबे समेत

सौदा करने जा रहे विदेश

हाँफ  रही कविता

कितना कर सकती है छातिकुटटा

कह रही बार-बार निगरानी रखो

जैसी दुश्मन पर वैसी ही खुद पर

चुटकी भर अमरता खातिर

विश्वासघात न हो जाये

अपनी भाषा, धरती और लोगों के साथ

देवताले जी से रूबरू मैं सिर्फ  दो बार ही मिल पाया। पहली बार मार्च 1997 में, जब मुझे इंदौर में जनवादी लेखक संघ द्वारा आरम्भ किये गए प्रथम श्याम व्यास पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था और दूसरी बार रायपुर के आयोजन में। इंदौर पुरस्कार के सिलसिले में जाना हुआ था। यह मुझे किसी सभा-मंच में मिलनेवाला पहला पुरस्कार था। यों मुझे लिखते हुए 13-14 बरस हो चुके थे। मेरी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में छाप रही थीं और लोग जानने लगे थे। मुझे लगता है, तब भी मैं एक  नौसिखिया ही था और पुरस्कारीय लेखकीय विनम्रता और संकोच से कुछ ज्यादा ही भरा हुआ था। सच पूछिए तो अपने अनुभव और जोड़-तोड़ करके मैं कुछ कहानियां लिख ले रहा था और मेरा सौभाग्य कि उन्हें सराहा भी जा रहा था। अपने को मिलने वाले पुरस्कार के नाम पर मैं बुरी तरह रोमांचित था। भोपाल से मुझे इंदौर अग्रज रामप्रकाश त्रिपाठी, बलराम गुमास्ता और अनवारे इस्लाम कार से ले गए थे। इन तीनों महानुभावों से मैं पहली दफे मिल रहा था और भोपाली होना क्या होता है, इनकी गर्मजोशी, बेतकल्लुफी, अंतरंगता से परिचित होते हुए जान पा रहा था। तब देवताले जी से मेरा कोई सीधा परिचय नहीं था। वे प्रतिष्ठित कवि थे और भगवत रावत जी के गहरे मित्र भी, भगवत रावत दुर्ग आते रहते थे, बातचीत में उन्होंने ही बताया था, बस इतना ही जानता था। देवताले जी क्या हैं और कैसे कवि हैं यह तो बिलकुल नहीं जानता था। मैं यों भी कहानी की दुनिया का आदमी था इसलिए उन्हें और भी कम जानता था।

 अहिल्यादेवी विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित उस गरिमामयी कार्यक्रम में मैं अपने जोश में कुछ ज्यादा ही बोल रहा था, इतना कि सामने बैठे चित्रकार, कथाकार प्रभु जोशी जी को अपने हाथ उठाकर मुझे रुक जाने का इशारा करना पड़ा था। यहीं देवताले जी से मेरी पहली भेंट हुई।

कार्यक्रम के बाद सेलिब्रेशन का आयोजन देवताले जी के निवास में ही किया गया था। उनके आँगन में, यहीं उनसे ठीक से मिलना हुआ। इसी दौरान उन्होंने मुझसे कहा, तुम तो ऐसे बोल रहे थे जैसे तुमको नोबल मिल गया हो!

   मैं अवाक और अपने पर तत्काल बेहद शर्मिंदा भी कि पहली दफा कुछ बोलने की कोशिश की और इसकी ये गत! माइक से तब मैं बहुत ही भय खाता था। फिर उन्होंने धीरे से कहा, पुरस्कृत व्यक्ति को अधिक नहीं बोलना चाहिए। फिर उन्होंने राज्य शासन द्वारा कुछ समय पहले विनोद कुमार शुक्ल को मिले शिखर सम्मान का जिक्र किया था। राज्य का इतना बड़ा पुरस्कार विनोद जी को मिला और उन्होंने केवल धन्यवाद कहा।

   मैं उन्हें क्या कहता भला ! जिसे मंच पर ठीक से बोलना भी नहीं आता। हालांकि मैं आज इस बात का समर्थन नहीं करूँगा कि पुरस्कृत व्यक्ति को कम बोलना चाहिए। इसका कोई नियम नहीं। मर्जी हो बोलिए, चुप रहने की खातिर थोड़े न पुरस्कार ले रहे हैं। अलबत्ता मैं झेंपकर  ही रह गया था।

  कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे पूछा था, क्यों, प्रशस्ति कैसा लगा ?

  मुझे आज तो याद नहीं कि प्रशस्ति-पत्र का वाचन किसने किया तब, किसी महिला ने, या देवताले जी ने खुद, लेकिन मैं उससे अभिभूत था। इस स्तर की प्रशस्ति की मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था ! मैंने उनसे इतना ही पूछा था, आपने लिखी है?

   वे हाँ में सर हिलाके मुस्कुरा दिए थे।

   मैं भला इस पर क्या कहता? यों भी मैं इस सभा, सम्मान से मानो सातवें आसमान पर था। पर जितना अभिभूत इसे पहली बार सुनते हुए हुआ होऊंगा, उससे कई गुना ज्यादा बाद में इसे पढ़-पढ़कर होता रहा। अच्छा हुआ जो मुझे देवताले जी ने खुद बता दिया कि यह उन्होंने लिखी है, अन्यथा कभी नहीं जान पाता। आज वह मेरी धरोहर बन गई है। न सिर्फ इसलिए कि इसे उन्होंने लिखा है, बल्कि इसलिए कि यह आज 21 बरस बाद भी मुझे उतना ही प्रेरित करता है जैसा कि तब। साथ ही जब भी इसके विषय में सोचता हूँ, मैं उनके प्रति अत्यंत कृतज्ञता और आभार से भर जाता हूँ, कि उन्होंने मुझ जैसे गंवई लेखक के बारे में ऐसा लिखा, या मेरी संवेदना का इतना ऊंचा मूल्यांकन किया!

 उसका सबसे महत्वपूर्ण अंश मैं नीचे दे रहा हूँ, ताकि आप खुद ही इसकी गुणवत्ता जान लें..

छत्तीसगढ़ी धान के कटोरे की विपन्नता और इस्पात नगरी के औद्योगिक ताप के बीच मध्यवर्ग का संघर्ष और समाज जीवन की विसंगातियाँ गहरी स्थानिकता और संवेदनशीलता के साथ उनकी कहानियों में व्यक्त हुई है। मुक्तिबोध ने जिस रचनाकार वर्ग को जड़ीभूत सौन्दर्याभिरूचि  के विरूद्ध संघर्षचेता  कहा था, बनवासी सच्चे अर्थों में उसके प्रतिनिधि हैं।

इसके महत्व को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। जीवन में कुछ चीजें ऐसी ही होती हैं, अव्याख्येय। जहां शब्द काम नहीं देते। इसे आप सिर्फ  महसूस कर सकते हैं और खामोशी से उष्मित, उर्जित और समृद्ध हो सकते हैं।

 इसके बाद मेरा उनसे लम्बे समय तक कोई संपर्क नहीं रहा।

बाद के वर्षों में जब एक प्लास्टिक कुर्सी मुफ्त पाने के लालच में मैं एक दैनिक समाचारपत्र का ग्राहक बन गया, तब, मैं चौंका ही नहीं था बल्कि अत्यधिक सुखद भाव से भर गया था, जब देखा कि इसमें देवताले जी स्तम्भ लिख रहे हैं, साप्ताहिक। मेरे लिए यह खयाल करना थोड़ा मुश्किल ही था कि कोई कवि अखबार में स्तम्भ लिखे और सो भी कविता वगैरह के बारे में नहीं, बल्कि अपने समय की ज्वलंत समस्याओं के बारे में! गरीबी, भुखमरी, अकाल, नयी पीढ़ी या काम करते बच्चों के बारे में या किसी गरीब के साथ हुआ कोई अन्याय या शोषण। ऐसे ही उनके एक लेख से अत्यधिक प्रभावित होकर मैनें उन्हें एक पोस्टकार्ड लिखा था और मैं बहुत सुखद विस्मय से भर गया था जब इस पर उनका जवाबी पत्र आया था।

 उनका यह रूप मुझे ज्यादा चौंकाने वाला था, क्योंकि, एक कवि के रूप में मैं उन्हें उस तरह से अभी नहीं जानता था जितना हमारे समय के कुछ प्रसिद्ध कवियों को। अखबार में छपी इन टिप्पणियों से मुझे उनकी रेंज का वास्तविक पता चला था। इसके बाद ही शायद मुझे ठीक से समझ आया था, कि वे महज कविता करने वाले कवि भर नहीं हैं, इनका मिजाज, ताप, तेवर अपने समय के अधिकांश कवियों से बहुत भिन्न है। कि ये सीधे-सीधे बोलने वालों में से हैं। बिना किसी औपचारिकता के, लाग-लपेट के..लाभ हानि के गणित से दूर। जो मन में है वही कहना है। मुझे रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम की याद है, जिसमें दबाव किस तरह से काम करता है, यह देखने की बात थी। कहना न होगा कि सुर बदल गए थे वक्ताओं के। दोपहर में काफी देर बाद देवताले जी का नंबर लगा था और देवताले जी मंच से उन्हीं विषयों पर बोल रहे थे, बिलकुल सीधे-सीधे जिनसे बचने के लिए ही जैसे ये सारा उद्यम किया गया था।  उपस्थित लोगों ने इसे भरपूर सराहा था। यह आयोजन शुरू से ही विवादों में घिरा था और आखिर तक घिरा ही रहा। इस किस्म के तमाम सरकारी आयोजन या पिछले दरवाजे से आर्थिक सहयोग देने वाले आयोजनों में दरअसल लेखक-कवियों के पैनेपन को पद, पैसा, सत्ता, प्रभुत्व, वैभव ग्लैमर आदि माध्यम  से कुंद करने की कोशिश ही ज्यादा रहती है।

  इधर पत्रिका साक्षात्कार के नवम्बर 2003 अंक में उनका एक लम्बा साक्षात्कार का पढ़ रहा था। मराठी कवि प्रफुल्ल शिलेदार के द्वारा लिया गया। जिसमें देवताले जी कह रहे हैं, विचारधारा तो कवि के अन्दर एक वेंस (रक्त वाहिनियाँ) की तरह होती हैं, इसमें उचित-अनुचित का अनुपात का कोई प्रश्न नहीं होता। यह ठीक है कि विचारधारा कविता पर हावी नहीं होनी चाहिए, वो तो अन्दर करेंट जैसी रहती है। हर जगह प्रकट होती ही है। विचारधारा का स्विच तो पूरे जीवनभर आन ही रगता है, आप किसी से भी बात कर रहे हो, तो भी वे वो काम करते रहती है। (पृष्ठ 67)

उन्हें अपने नए संग्रह पत्थर फेंक रहा हूँ के लिए 2012 का साहित्य अकादमी अवार्ड दिए जाने की घोषणा हुई। यह सचमुच हिंदी जगत के लिए खुशी का अवसर था। अकादमी अवार्ड इधर लगातार विवादों में रहे हैं। उनके नाम की घोषणा से लगा, बेपटरी हुई जा रही अकादमी अवार्ड को मानो पटरी में लाने की कोशिश है। उन्हें बधाई देते हुए मैंने पत्र लिखा और पत्र के मिलते ही उन्होंने मुझे फोन किया। अपने उसी खुशमिजाज अंदाज में। वे हमेशा खुलकर ही बोलने वाले ठहरे। मैंने उन्हें फिर से बधाई और शुभकामनाएं दीं। इसी दौरान मैंने उनके सेहत के बारे में पूछा, तो थोड़ी नाराजगी से बोले थे, मैं दिन में किसी से सेहत के बारे में बात नहीं करता। मैं ठीक हूँ।

  मैं जान गया था, इन्हें अपने से सम्बंधित ऐसी किसी भी बात को चर्चा में लाने से सख्त परहेज है। इसे वे गैरजरूरी मानते हैं।

 उस साल सबसे महत्वपूर्ण संग्रह के रूप में उनके संग्रह की चर्चा थी और खूब थी। मैंने अब तक उनका संग्रह नहीं पढ़ा था। बल्कि उनका एक पिछला संग्रह उजाड़ में संग्रहालय मेरे पास पिछले 2-3 साल से रखा था और जाने क्यों मैं उससे जुड़ नहीं पाया था। इसलिए उनके नए संग्रह को लेकर मेरे भीतर वैसी कोई गजब की उत्सुकता नहीं थी। यह संग्रह 2016 में मैंने जिला ग्रंथालय में देखा तो पढऩे ले आया और जैसे-जैसे पढ़ता गया, कविताएं जैसे करेंट मारती रहीं। यों भी इस संग्रह का शीर्षक मुझे बहुत पसंद है-पत्थर फेंक रहा हूँ। व्यवस्था का सीधा विरोध। जैसे-जैसे पढ़ता गया, मैं अभिभूत, चमत्कृत, नए लड़ाकू जोश से भरता गया। क्या है यार ये आदमी! सत्तर साल की उम्र में भी जिनकी कविताओं में देश के किसी नौजवान से कहीं ज्यादा गुस्सा, क्षोभ, असंतोष और पीड़ा है। सच पूछिए तो मैं उनके कवि रूप को इस संग्रह के बाद ही कुछ-कुछ जान सका। ये कविताएँ अपने समय, उसकी चौतरफा पीड़ा, निराशा, गुस्से का सीधा प्रक्षेपण है। इस संग्रह में मैंने एक बात और जो नोटिस की वह थी इसकी भाषा। यह कोई जादू रचने वाली कवित्वमय भाषा नहीं, बल्कि पीड़ा को समूचा उड़ेल देने की भाषा लगी, जिसमें मराठी, मालवी, अंग्रेजी जहां जिसकी जरूरत हो, वैसी भाषा-लोक से गहन सम्बद्धता से उपजे मुहावरे, इन सबके ऊपर हमारे समय का जटिल हुआ यथार्थ तो है ही! मैं दादा की कविताई का कायल हो गया ! लगा, अपने समय के जिन कवियों को पढ़कर सबसे ज्यादा जाना जा सकता है, उनमें ये प्रमुख हैं। इस दौर में उनकी कविताएं जिस तरह से मेरे भीतर उर्जा का संचार कर रही थीं, वह इनकी ताकत है। लगा, विवेकसम्मत ढंग से एक कवि का ताप और आक्रोश, बेहद गहरी संवेदना के साथ इनके पास है। इसी के एकाध साल पहले प्रभात खबर के दीपावली विशेषांक में छपी उनकी एक कविता मेरे जेहन में घर कर गई थी, जिसमें वे खुद को अपने समय का एक डोंडी पीटने वाला घोषित करते हैं। मैं कम से कम अपने लिए तो यह कहूँगा ही कि इधर के जिन कविता संग्रहों ने मुझे बेहद प्रभावित किया है, उसमें सबसे ऊपर यही संग्रह है। मैंने उनकी कविता पढ़कर जागे उद्वेग में भरकर उन्हें पत्र लिखा, मुझे हमेशा फोन में कहने में थोड़ा संकोच होता है। और लगता है, लिखते हुए आप अपने मन की बात ज्यादा इत्मीनान से कर सकते हो, कुछ छूट जाये तो जोड़ा भी जा सकता है।

पत्र मिलते ही उनका फोन आया। वे वैसे ही थे..खुशमिजाज, जिंदादिल बतकही करते हुए। वे बातचीत करते हैं तो कभी भी खुद को अलग से कवि होने या दिखने-दिखाने की कोशिश नहीं करते थे। मस्तमौला सरीखे बात करने वाले। गलती से मैंने इस बार फिर उनसे पूछ लिया-सर आपकी तबीयत वगैरह तो ठीक है?

  उन्होंने छूटते ही कहा, मेरी तबीयत देश की तबीयत से ज्यादा अच्छी है और जब वह ऐसा कह रहे थे तो देश की लगातार बिगड़ती हालत के प्रति गहरा आक्रोश था, तंज था।

 उन्होंने मुझे अपना नया संग्रह खुद पर निगरानी का वक्त अपनी अस्वस्थता के बावजूद जिस आत्मीयता के साथ भेजा था वह मुझे कभी नहीं भूलेगा। देवताले जी बात करते हुए हमेशा खुशमिजाज और जिंदादिल रहते थे। वे बात करते-करते ही मजे के लिए कविताई करने लगते थे। मुझसे ठिठोली में कहते..अरे, तुम बनवासी हो तो मैं पर्वतवासी! मेरा बचपन सतपुड़ा में जो बीता है! अपना नया संग्रह भेजते हुए उन्होंने लिखा-

आत्मीय और सृजनशील स्मृतियों के साथ

प्रिय कैलाश बनवासी के लिए

चंद्रकांत देवताले

पर्वतवासी

    2.10.16

और जैसी अपनी ऊंची-नीची, घुमावदार लिखावट में उन्होंने लिखा है, देखकर लगता है मानो हिंदी के अक्षर आनंदमग्न होकर आदिवासियों की तरह नाच-गा रहे हैं!

      मूड में होने पर तुक मिलकर लगभग गाते हुए से, बड़े मनोरंजक ढंग से अपने बात करने को लेकर वे कहते कि भाई मैं तो कवि हूँ और इसी तरह बात करता हूँ। कविता अपने आप बनने लगती है ! उनकी इतनी बातों से यह तो जाहिर ही है कि उन्होंने खुद को कितना वर्ग-विरोहित कर लिया था। अपने नाम और प्रतिष्ठा को टैबू बनाकर चलने वाले कलाकार तो बहुत मिलेंगे, पर सबसे इतनी जल्दी आत्मीयता से घुल-मिल जाने वाले तो आज बिरले ही हैं।

अपने युवाओं से वो ऐसे ही हँसी-दिल्लगी करते रहते थे।

 कभी देवास के कवि मित्र बहादुर पटेल को खुद ही फोन करते, पूछते, हैलो, कौन बोल रहे हैं?

  बहादुर भाई जवाब देते, मैं बहादुर बोल रहा हूँ।

 तो वे कहते, तो मैं डरपोक बोल रहा हूँ! और ठठाकर हँस पड़ते।

कभी दुर्ग के कवि मित्र शरद कोकास को फोन करते। शरद पूछते, हैलो दादा कैसे हैं?

 वो कहते, कौन दादा? मैं कोई दादा-वादा नहीं हूँ। अरे मैं राधेश्याम उपाध्याय बोल रहा हूँ।

 शरद भाई हैरत में। लेकिन आपकी आवाज तो देवताले दादा जैसी है।

  अच्छा!

   और आपका फोन भी तो दादा के नंबर से आ रहा है।

अच्छा, जब आवाज भी देवताले की है, और नम्बर भी देवताले का है, तो मैं देवताले ही बोल रहा हूँ। वो हँस पड़ते अपनी निश्छल हँसी।

     मेरी उनसे अंतिम बात उनके अंतिम जन्मदिन 7.11.16 पर हुई थी। वे ऐसे कवि थे जिन्हें हमारे वक्त के युवा क्या लिख रहे हैं, पूरी खबर रहती थी। कई दफे वे उन्हें ही उनकी ही कविता पंक्तियाँ सुनाकर चकित कर देते थे।

उनकी बहुत सी कविताएं मुझे पसंद हैं, लेकिन मेरी नजर में उनकी यह लम्बी कविता जैसे उनकी ऊंचाई को अधिकतम बतानेवाली कविता है, जो मुझे एक क्लासिक लगती है। यह कविता है कठफोड़वा, हरसूद डूब का अंतिम दिन 30 जून 2004। यह कविता देश में विकास के नाम पर इस दौर में बड़ी तेजी से बहिष्कृत, विस्थापित किये जा रहे लोगों की पीड़ा और यातना का मार्मिक, हृदयभेदी और स्तब्धकारी आख्यान है और यह केवल लोगों के दु:ख को ही नहीं अभिव्यक्त करती, बल्कि डूबते गाँव की संस्कृति के भी लोप हो जाने की पीड़ा को भी बेहद शिद्दत से उभारती है, जो मुझे लगता है अपने समय से बहुत गहरे जुड़े हुए किसी कवि से ही संभव है। ऐसी कविताओं में उनके अखबारी हो जाने का भी जोखिम रहता है और शायद साहित्य ही है जो ऐसी दुर्घटनाओं के सारे सन्दर्भों- राजनैतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक.. को उसके समूचेपन में दर्ज कर सकता है। यह कविता हमारे वर्तमान विकास का न केवल असली चेहरा दिखाती है, बल्कि उसके कारकों को भी बेनकाब करती है, जो मीडिया नहीं दिखाता। सत्ता के विकास की परिभाषा और मायने बिलकुल दूसरे हैं जिसमें अपनी जड़ों से विस्थापित हो रहे पीडि़त लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक यातना का कोई मोल नहीं है। यह कविता जितने करीब से हमारे समय को दिखाती है उतने ही संयम से, तटस्थता से विश्लेषण भी साथ करते चलती है। देवताले जी ने यह कविता जैसे एक जुनून में लिखी है, या ये कहूं कि कविता ने खुद को लिखवा लिया है। किसी विद्वान की कही बात याद आ रही है कि  सिर्फ  कवि ही विषय को नहीं चुनता, बल्कि विषय भी कवि को चुनता है! विकास के नाम पर जल, जंगल, जमीन का जैसा अंधाधुंध दोहन हो रहा है और आदिवासियों का शोषण, यह कविता मानो उसका एक व्याकुल, हताश  शोकगीत है। मैंने अरुंधति राय का हरसूद डूबान पर बहुचर्चित लेख बहुजन हिताय भी पढ़ा है और मुझे यह उसकी तुलना में ज्यादा स्तब्धकारी, विचलनकारी और संवेदनशील लगा है। अधिग्रहण सिर्फ  गाँव, जगह या जमीन का ही नहीं होता, वहाँ की समूची संस्कृति बेदखल हो जाती है, हमेशा-हमेशा के लिए डूब जाती है। इसे पढऩे के बाद मुझे लगा कि इस कविता की चर्चा किये बगैर देवताले जी पर कोई भी बात जैसे अधूरी रहेगी। उन्होंने डूब की केवल जमीन को नहीं, वहां के डूबते जीवन को अपनी डबडब आँखों से दर्ज किया है। अमूमन कवि नदी के प्रति बहुत उदार और व्यापक दृष्टि से लिखते हैं, लेकिन यहाँ कवि ने डूबान के नदी को जैसा बिम्ब दिया है, वह एकदम जुदा है। यहाँ नदी गाँव को लीलती आ रही है, इसलिए ऐसी उपमा केवल पीडि़तों की ही हो सकती है

सूख चुके हैं झरने

चमड़े के मानिंद टंगा है अकड़ा हुआ पानी

यहाँ ये पंक्तियाँ

किन्तु आज जैसे अस्थि बटोरकर ले जाते हैं

नदी में सिराने

यहाँ जूझती-गाती-बजाती-हाँफती बस्तियों को

सुड़पने-डूबाने दूसरों के हुक्म पर पानी खुद हुमस रहा है

किसी जीवनदायिनी नदी के लिए इससे निर्दयी बिम्ब भला और कुछ हो सकता है?

 यहाँ के डूबते-मरते जीवन को उन्होंने जैसा मर्मान्तक और भयावह रूप से दर्ज किया है, वह दुर्लभ है-

भगदड़ में बदहवास हजारों मर्द,औरतें, बूढ़े, बच्चे

और भटके मुसाफिर की तरह इक्का-दुक्का परिंदे

हक्के-बक्के कुछ ढूँढ रहे हैं

क्योंकि अब किसी का घर नहीं है यहां

और छाया तक नहीं बचनी है किसी घर की

 

सातों आसमान और इतने ही समुन्दरों वाली

विशाल दुनिया के बीच

यह दृश्य एक कछुए के डूबने की तरह हो सकता था

पर यहाँ कई जागी रातों की आँखों के

वीरान मैदानों में जहाँ रोना सूख गया है

 यह आंसुओं के सूखे समुन्दर में दुनिया के डूबने की तरह है

 

धरती की असंख्य धड़कनों की सिवान उधेड़ी जा रही है

गूंजती थी यहाँ वाणी सिंगाजी की ओने-कोने तक में

पता नहीं होने के पहले ही कहाँ गुड़ीगप्प हो गये

सुन्न सिखर पर बैठे साई

काशी काका की अमराई में

जहां गोत करने, गाने गीत सावन के

जुड़ती थी गाँव भर की औरतें

कोहराम मचा है खलिहान के बाजू ध्वस्त मडिय़ा में छातीकुट्टा

सार्वजनिक मातम के बीच

 नए गाँव जाने के पहले

आसन्न प्रसूता ने दम तोड़ दिया है

यह बहुत उच्चतर संवेदना से ही संभव है कि बहुत साधारण लगने वाली चीजें भी संवेदना के आलोक में चमत्कारिक रूप से जीवित हो जाती हैं।

    धुल-धस्सड़ के बीच लटका हुआ दो फुटिया साइनबोर्ड

    टूटी तिपाई ट्यूब-टायर के टुकड़े जैसे अवशेष बता रहे

   यह साइकिल पंचर जोडऩे और हवा भरने का स्टेशन रहा

 

ऐसी उजड़ी में

मैं किरासिन की पिचकी हुई कुप्पी

 मिटटी के टूटे हुए दिए स्लेट पट्टी के टुकड़े

आम-जामुन की बदरंग गुठलियाँ, लकड़ी की कंघी

 और जगह छोड़ती छायाओं के साथ

 अँधेरे की नोक पर ठिठके हुए जनपद की

 बुझती रौशनी देख रहा हूँ

  और यह सभी जानते हैं, अपनी जड़ों से काटकर कहीं विस्थापित हो जाने की पीड़ा मनुष्य की जैसे कभी नहीं मिटने वाली पीड़ा होती है। हरदम हरा रहने वाला, जो रह-रह कर टीसता रहता है। आजादी के समय हुए बंटवारे का दंश आज भी लोगों के जेहन में वैसे ही ताजा है मानो कल की बात हो! इसे भूल पाना बहुत कठिन है। यह मनुष्य के पास स्मृति होने की भयावह त्रासदी है।

  इन हदय-विदारक त्रासदियों पर एक लेखक या कवि भला उसे बांटने, दुखों पर संवेदना के मरहम-पट्टी रखने  के अलावा और कर भी क्या सकता है? ऐसी त्रासदियों के पीछे की शैतानी ताकतों को वह जानता  है

भूकंप या युद्ध नहीं इस तबाही के पीछे

विशेषज्ञ इत्मिनान से बताते हैं

ऐसे ही आगे बढ़ती है दुनिया

 

और ऐसे ही विकास के भूमि-भंजन हत्यारे

दीप-दीपन में मगन देखो कितने खुश हैं

 यहाँ ध्यान दें - विशेषज्ञ इत्मीनान से बताते हैं, कहते हुए कवि व्यवस्था के, विकास के पैरोकारों की अंधी संवेदनहीन दृष्टि को उधेड़कर रख देता है। जिनके लिए ये महज कठपुतले हैं। इन्हें इनके जल, जंगल, जमीन के होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। व्यवस्था का यह रवैया स्तब्धकारी है।

मुझे लगता है इस कविता को देवताले जी ने इसे जैसे अपनी स्वाभाविक प्रकृति के विरूद्ध जाकर लिखा है। वे मुखर आक्रोश के कवि हैं। उनके यहाँ गुस्सा, बेचैनी प्राय: प्रत्यक्ष है। वे इसे छुपाते या रोकते नहीं। लेकिन इस कविता में वे अनेक हाहाकारी, ह्रदय-विदारक दृश्यों को देखते हुए तीव्र गहरे भावनात्मक उद्वेगों  से गुजरने के बावजूद न सिर्फ उनके स्तब्धकारी दुखों में गले-गले तक डूबे हैं,  इस पूरी पीड़ा और यातना के खिलाफ  विकट मर्मान्तक क्षोभ से भरे हैं, बल्कि व्यवस्था के निर्मम और जड़ रवैये की तीखी आलोचना कर रहे  हैं ..

   मैं असंख्य दरख्तों के शवों को देख रहा हूँ

    तमाम  सुभाषित औंधे मुँह पड़े हैं

बड़े धंधे, बड़ी रौशनी के लिए अपने यहाँ

    खामोश हो जाती है अदालत की घंटियाँ

    वर्तमान विकास के जन-विरोधी चेहरे और उससे उपजी पीड़ा का मानो एक जीवंत दस्तावेज है यह कविता, जो घट रहे यथार्थ को उसकी पूरी समग्रता में दर्ज करती है। जिसमें एक गहरी करुणा के साथ हताशा भी है, कुछ न बादल पाने की हताशा।

आवाजों की छायाओं और चुप्पी समेत

    बहुत कुछ छोड़कर अपना जा रहे हैं

अभिशप्त बनी आदम विदाई की रस्म जैसा कुछ नहीं

    सब कुछ फांसी के तख्ते बचने और

    काँजी हॉउस की तरफ  अपने को घसीटने की तरह है

 और कवि के लिए जीवन का अर्थ केवल मनुष्य मात्र नहीं है, उसके दायरे में यह पूरी विराट प्रकृति है इसमें निवसते कीड़े-मकोड़ों समेत।

  सोच रहा हूँ पानी का भयावह साम्राज्य हो जाने पर

   जीवित चीजों का क्या होगा?

चिउंटियों,कीड़े-मकोड़े जैसों का क्या होगा?

   ऐसी कविता केवल भाषा दक्षता, या सौंदर्यप्रेमी या महज विषय-ज्ञान हो जाने से नहीं लिखी जा सकती। यह कवि की विलक्षण दृष्टि, उसकी व्यापकता और गहरी संवेदनशीलता, यथार्थ की बेहद पैनी समझ के साथ-साथ लोगों से, जीवन से एक मेक हो जाने पर ही संभव है और यह कविता मुझे इधर की हिंदी कविता की एक बड़ी उपलब्धि लगती है।

   देवताले जी अपनी ऐसी कविताओं की बदौलत सालों-साल हमारे साथ बने रहेंगे।