Monthly Magzine
Friday 16 Nov 2018

कवि सम्मेलनों में ठेकेदार पैदा हो गये हैं

स्ट्रीट 2, चन्द्रविहार कॉलोनी, नगला डालचन्द क्वार्सी बाईपास, अलीगढ़-202001

 हिन्दी काव्य-मंच के वरिष्ठतम कवि पद्मभूषण नीरज से हिन्दी काव्य-मंच के अतीत और वर्तमान पर केन्द्रित, कवि अशोक 'अंजुम' द्वारा उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश -

प्र. - आप हिन्दी काव्य-मंचों से कब और किस उद्देश्य से जुड़े?

उ. - मैंने एक हिन्दी कवि गोष्ठी में सर्वप्रथम 1941 में एटा में काव्य-पाठ किया था। उस समय मेरा उद्देश्य भाषा का प्रचार-प्रसार और साथ ही साथ अच्छी से अच्छी कविता लिखना था।

प्र. -  आप इस बात से किस हद तक सहमत हैं कि पिछले दशकों की अपेक्षा आज के हिन्दी काव्य-मंचों की दशा और दिशा में भारी बदलाव आया है ?

उ. - आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व हिन्दी के कवि सम्मेलनों में हिन्दी के श्रेष्ठतम कवि और समालोचक अध्यक्षता करते थे और सुनने के लिए पढ़ा-लिखा, साहित्यप्रेमी, काव्यप्रेमी, बुद्धिजीवी वर्ग उपस्थित होता था। उस समय दद्दा मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृकृष्ण शर्मा नवीन, निराला जी, पंत जी, महादेवी जी, बच्चन जी आदि काव्य के पुरोधा अध्यक्षता करते थे और उस समय उसी कवि को मंच पर प्रवेश मिलता था जिसकी कविता उनके मानदण्डों के अनुसार सही होती थी या जिसकी कोई पुस्तक प्रकाशित हो चुकी होती थी। मेरा पहला काव्य-संग्रह 1954 में प्रकाशित हुआ। धीरे-धीरे कवि सम्मेलन जो विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, विद्यालयों में पढ़े-लिखे लोगों के बीच होते थे, वे वहाँ से निकलकर प्रदर्शनियों में, मेलों में, पशुमेलों में पहुँचने लगे और वहाँ शनै: शनै: बुद्धिजीवियों के स्थान पर नासमझ भीड़ का बहुमत हो गया और कवियों ने नीचे उतरकर उनके मनोरंजन को कविता का साधन मान लिया। कवि का धर्म होता है कि वो नीचे बैठे आदमी को ऊपर उठाए, इसके विपरीत काम कवियों ने किया। इस गिरने के पीछे यशलिप्सा और अर्थलिप्सा थी।

प्र. -  गीतों-गज़़लों और छन्दों के एकाधिपत्य को तोड़ते हुए, उसी के समानान्तर हास्य-व्यंग्यकारों की जिन रोचक रचनाओं के द्वारा हिन्दी काव्य-मंचों को व्यापक लोकप्रियता मिली, कालान्तर में उन्हीं हास्य-व्यंग्यकारों की अश्लील पैरोडियों, बासी चुटकुलों और भद्दे लतीफों पर रचित नितांत फूहड़ कविताओं और सम्प्रेषण शैली की हास्यास्पद भाव-भंगिमाओं के कारण हिन्दी काव्य-मंचों की लोकप्रियता में भारी गिरावट आयी है । आप इस बात से कहाँ तक सहमत हैं?

उ. - शुरू-शुरू में जब हास्य-व्यंग्य का प्रादुर्भाव मंच पर हुआ तब श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रचनाएँ लिखी गईं। इस दिशा में कवि अशोक चक्रधर, माणिक वर्मा, सुरेश उपाध्याय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहा, लेकिन धीरे-धीरे अर्थलिप्सा के कारण बहुत से अनाधिकारी व्यक्तियों ने मंच पर प्रवेश कर लिया, जो कविता के नाम पर चुटकले, मिमिक्री, अभिनय आदि लेकर आए, जिन्होंने हास्य-व्यंग्य की परम्परा को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। एक बार एक कवि मंच से चुटकले सुना रहा था, तो नीचे बैठे एक श्रोता ने कहा कि 'भाई कुछ कविता सुनाइये, चुटकले तो हमने बहुत सुने हैं।Ó'वह बोला कि 'भाई मैं तो आपको हँसाने आया हूँ , वही कर रहा हूँ ' वह जानता है कि भीड़ जितनी मेरी प्रस्तुति पर तालियाँ बजाएगी उतनी ही सफलता मिलेगी। इसमें मीडिया की भी गलत भूमिका रही, क्योंकि जो रिपोर्टर थे उनके पास कविता की समझ का अभाव था। काव्य मंच के पतन के पीछे बस दो ही कारण हैं, अर्थलिप्सा और यशेष्णा ।

प्र.-  मंचों से जुड़ी 'हास्य-व्यंग्य मंडली' के कुछ कवि कारीगरों, व्यावसायिक विदूषकों और आयोजनों द्वारा परस्पर आदान-प्रदान वाली अर्थात 'तू मुझे बुला, मैं तुझे बुलाऊँ' की एक नूतन संस्कृति को जन्म देने वाले धन्धेबाज संयोजकों के अनेक गुट अब काव्य-मंचों पर काबिज हो गये हैं, जिससे मंच की सारी मर्यादायें धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। फलस्वरूप अधिकांश काव्य-मंच अब राजकीय संस्थानों अथवा महानगरों के धनकुबेरों की मानसिक तुष्टि का साध्य बनकर सिमटता जा रहे हैं, और अधिकांश शालीन-शिष्ट मंच प्रतिष्ठापित कवि उससे कतराते जा रहे हैं। मंच की इन त्रासद स्थितियों के लिए आप किसे उत्तरदायी मानते हैं ?

उ. - सच ही है, आजकल का नियम यह बन गया है कि 'तू मुझे बुला मैं तुझे बुलाऊँ।' आजकल कवि संयोजक यह देखते हैं और उन लोगों को बुलाते हैं जो किसी क्षेत्र के संयोजक हों, और कार्यक्रम में दिखावे के लिए किसी एकाध स्थापित गीतकार को बुला लेते हैं। अब कवि सम्मेलनों के ठेकेदार पैदा हो गये हैं । दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, कोलकाता, मुम्बई आदि जगह ठेकेदारी की प्रथा हो गई है। लोग मिमिक्री करते हैं। कवि सम्मेलनों का मंच जितना पतित अब हुआ है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। कभी-कभी तो इनमें भाग लेने में शर्म आती है। अब तो मैं ये करता हूँ कि अधिकांश एकल काव्य-पाठ करता हूँ जिनमें 200 से 500 तक पढ़े-लिखे लोग आते हैं ।

प्र. - आप हिन्दी काव्य-मंचों के प्रादुर्भाव और उसकी अतीत-यात्राओं से जुड़े मंचों के आलोक-शिखर रूप में समादृत हैं। हिन्दी काव्य-मंचों पर आपके विराट-व्यक्तित्व की एक हनक भी है। उक्त स्थितियों में मंचों की विलुप्त होती स्वस्थ-परम्पराओं और टूटते नैतिक-मानदण्डों के प्रति आप की क्या भूमिका होनी चाहिए?

उ.-कवि गोष्ठियों का आयोजन किया जाए वह भी आमंत्रित श्रोताओं के मध्य, जिससे कविता की खोती हुई पहचान पुन: वापस लौटेगी। कविता को जो बुरी तरह से नकार रहे हैं, उसके नाम पर गंदगी फैला रहे हैं, उनके लिए चार पंक्तियां कहूँगा-

तू कवि है तो फिर काव्य को बदनाम न कर

जो मन में गंदगी है उसे आम न कर

कविता तू जिसे कहता वो बेटी है तेरी

चौराहे पर लाकर उसे नीलाम न कर

प्र. - और अंत में, हिन्दी काव्य-मंचों से जुड़े रचनाकारों और उसके संयोजकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

उ. - कवि सम्मेलनों का संयोजन पढ़े-लिखे सुधी लोगों के हाथ में होना चाहिये और संचालन करने वाले को पूरी साहित्यिक गरिमा और परम्परा का ज्ञान होना चाहिये।