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Wednesday 14 Nov 2018

फाजिल्का : बंगला से बॉर्डर तक

सरहदे कागज़ों पर पहले और लोगों के मन में आखिर में रचती है

उस रोज, पहली बार, लोगों ने अपने शहर पर आग के गोले गिरते देखे। सरहद पार के हमले के लिए यहां के लोग कहाँ तैयार थे? भारतीय सेना ने तुरंत बॉर्डर के गांवों को खाली करवाया। गांव के लोग, अपनी जान बचाकर, शहर की ओर भागे। फजिल्का शहर में भी अब तक ब्लैकआउट हो चुका था। पाकिस्तानी एयक्राफ्टों के द्वारा शहर में कई जगह बम गिराए जा रहे थे और रात के घुप अँधेरे में गोलियां चलने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। कुछ ही देर में लोग अपने ज़रूरी सामान के साथ, रेल या सड़क के रास्ते, फाजिल्का छोड़कर चल दिए। आधी रात तक लगभग सारे गाँव और फाजिल्का शहर खाली हो चुका था।

1965 के इस युद्ध से इस क्षेत्र में वो बदलाव उभरे, जो गढ़े तो1947 में गए थे, पर लोगों की नजऱ में अभी तक धुंधले ही थे। अभी तक बॉर्डर उनके लिए एक पिकनिक स्पॉट के जैसा था जहाँ लोग जीप, ट्रेक्टर ट्रॉली या फिर टेम्पो में बैठकर सैर करने जाते थे। उस समय रीट्रीटिंग सेरेमनी भी नहीं होती थी। वहां दोनों तरफ पड़ती एक  झील में बोटिंग करते समय जब कभी बॉर्डर पार हो जाता तो दोनों तरफ  के सैनिक आराम से वापिसी करवाते थे। साँझा रहने की आदत भी बरकरार थी,  सो लोग अक्सर इधर से केले की टोकरियाँ और उधर से किशमिश की छोटी-छोटी थैलियां आपस में बांटा करते थे। कहते हैं बॉर्डर के सटे गांव के लोग तो शादी ब्याह में भी शरीक हो आते थे। साफ ही था, जमीन पर कुछ लकीरें खींचने से बुनियादें कहाँ गिरती हैं? इस एक युद्ध के बाद भी कुछ हद तक यह सिलसिला चला पर 1971 के युद्ध के बाद तो लोगों को सरहदे साफ दिखने लगी थीं। अब फाजिल्का की पहचान बॉर्डर पर पडऩे वाले संवेदनशील इलाके के तौर हो चुकी थी।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले यह कोई गुमनाम शहर था। जिसके उभरने से यहां के लोगों को यह पहचान मिली हो। बल्कि ठीक इससे उलट फाजिल्का शहर धीरे-धीरे अपनी समृद्ध छवि खो रहा था। फाजि़ल वट्टू नाम के व्यक्ति के नाम पर इस शहर का नाम फाजिल्का1844 में पड़ा। अंग्रेजी हुकूमत के समय यह शहर, पंजाब प्रान्त का, एक प्रमुख व्यापार बाजार था। ब्रिटिश राज में यहां भारत की सबसे बड़ी ऊन मार्किट थी। ऊन के 8.10 बड़े कारखाने थे। आज भी यहाँ इस नाम का बाजार तो है पर ना ऊन है, ना वो कारखाने। क्यूंकि भेड़ चराने वाले  चरवाहे तो उस ओर चले गए। ज़मीनी पानी यहां खूब था जो धाई (धान) की खेती की लिए पर्याप्त था। तकरीबन हर घर में कुँए थे जो बरसात के मौसम में ऊपर तक भर जाते थे। नरमे (कपास) के लिए भी यह क्षेत्र शुरू से ही अनुकूल रहा है। घरों के बाहर गलियां, नरमे की गठरियों से भर जाती और बच्चों का मनपसंद खेल था घर की छतों से उन पर छलांग लगाना ।

इतना व्यापारिक मुनाफा देखते हुए उस समय सरकार ने,  ब्रिटिश अफसरों के ठहरने के लिए, एक विशाल भवन तैयार करवाया जिसे स्थानीय लोगों ने बंगला का नाम दिया। तब से ही इस शहर का नाम बंगला पड़ गया। आज भी कई बुजुर्ग फाजिल्का नहीं बंगला ही कहते हैं। बस स्टैंड पर, कई बारस कंडक्टर भी यही  नाम लेते हंै। इन बातों में जहाँ एक तरफ रोमांच है वहींदूसरी तरफ लोगों की तकलीफ भी छुपी है। यह तकलीफ यहाँ बसी हर पीढ़ी के हिस्से में आयी है। परिवार टूटे, व्यापार छूटे, दरिया सूखे और दो बार सियासत के नफे में नुकसान झेलते यहां के लोगों में, फिर भी, गज़ब का धैर्य है। दोनों बार लड़ाई में इनके घर लूटे गए यहां तक कि दरवाजों की चौखटे भी उखाड़ ली गईं, पेड़ काट कर ले गए पर फिर भी ये लोग वही बसे हंै। आज भी बॉर्डर पर कई परिवार ऐसे मिल जाते हैं जो उस तरफ  के अपने रिश्तेदार को देखने भर आते हैं। यहां की मशहूर  मिठाई की दुकान का नाम पाकपट्टनियाँ इसलिए है क्यूंकि इस दुकान के मालिक उस पाकपट्टन शहर से हंै जो बंटवारे के बाद सरहद पार का हिस्सा बन गया। बंटवारे के समय जो प्रसिद्ध घंटाघर उधर छूट गया वैसा ही दोबारा बनवाया गया और जिसकी तस्वीर आपको हर फाजिल्का निवासी के घर पर आसानी से मिल जाएगी ।

यहाँ के लोग, बहुत खूबसूरती से, अपने अतीत और वर्तमान में तालमेल  बनाकर चलते है । इस बात का एक प्रमाण है आसफवाला वार मेमोरियल  जो  जाबांज शहीदों का यादगार  समारक है । यहां के निवासियों ने यह समारक 1971  के शहीद  सिपाहियों की याद में बनवाया है।

आज भी यहां के लोगों की जुबां पर  वो किस्सा है  जब पाकिस्तान के बेहद मजबूत पैटन टैंक्स पर हर गोला बेअसर था तब हमारे सिपाहियों ने अपने शरीर से माइन्स बांधकर पैटन टैंक्स को ध्वस्त किया था। इन सिपाहियों के लिए पूरे देश का मन श्रद्धा से भरा है और यहां के लोगों के जीवन पर इनकी अमिट छाप नजर आती है। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा 16 दिसंबर, विजय दिवस सबके लिए खास है। सबकी आँखों में सम्मान का भाव बिलकुल  स्पष्ट तौर पे देखा जा सकता है। और आज भी, बिना किसी डर के, अपनी जमीन से जुड़े हैं। 

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