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Wednesday 19 Sep 2018

त्रिलोचन के काव्य में प्रगतिशील चिंतन

प्रगतिशील कवियों में अगर मुक्तिबोध के बाद कोई सबसे ज्यादा उपेक्षित रहा, तो वह है कवि त्रिलोचन। जिस तरह से मुक्तिबोध के काव्यों की तासीर को हम उनके मृत्यु के बाद ही समझ पाये, ठीक उसी तरह त्रिलोचन को भी बहुत बाद में समझा गया - व्यक्तित्व की दृष्टि से भी और कवित्व की दृष्टि से भी -

              प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है

              उसमें कहीं त्रिलोचन का तो नाम नहीं था,

              आंखे फाड़ फाड़ कर देखा, दोष नहीं था

              पर आँखों का। सब कहते है कि प्रेस छली है,

              शुद्धिपत्र देखा, उसमें नामों की माला छोटी न थी।

              यहाँ भी देखा, कहीं त्रिलोचन नहींÓÓ1

शायद इसी कारण से यह कवि कविता के नये प्रतिमानों के केन्द्र में कभी नहीं रहे, या रखा ही नहीं गया ऐसा भी कहा जा सकता है।

प्रखर आलोचक नामवर सिंह के विचार इस बात को और अधिक पुष्ट करते हैं वे लिखते हैं- नई कविता के उत्कर्ष काल में भी प्रवाह-पतित होने का खतरा उठाकर एक कवि धारा के विरूद्ध वाक्य-विन्यास की रक्षा के लिए आवाज बुलन्द कर रहा, लेकिन उसकी आवाज न तब सुनी गई और न अब - वह कवि है धरती और दिगंत का रचनाकार त्रिलोचन। 2

लेकिन किसी केन्द्र की परिधि में स्थान पा जाने से ही कवि या काव्य का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। आज भी ऐसे अनेक कवि हंै जो अच्छा लिखते हुए भी गुमनामी के अंधेरो में खोए हुए है क्योंकि उन्हें केन्द्र में स्थान नहीं मिला। जहां तक त्रिलोचन की कविताओं की बात है, तो अभी तक ठीक से उनकी कविताओं को जाना व समझा नहीं गया  क्योंकि त्रिलोचन की कविता परम्परा के सम्बद्धता में नयी है। इनकी कविता कवि-दिमाग की कोरी उपज या आसमान से टपकी हुई नहीं है, बल्कि पीड़ाओं से उपजी हुई कविता है। यही वजह है कि वे अपने किसी भाव या विचार का आरोपण करने के बजाय उसे परिस्थिति मेें रूपायित होता हुआ दिखाते हैं। त्रिलोचन के भाव, विचार और कला परिस्थितिजन्य हैं, आरोपित नहीं और यही उनकी सिद्धहस्तता का सबसे बड़ा प्रमाण भी है। किसी भी कवि एवं उनके काव्य की विराटता को समझने के लिए इससे अच्छा प्रमाण और क्या हो सकता है। फणीश्वरनाथ रेणु के विचारों को रेखांकित करते हुए धु्रव शुक्ल लिखते है - रेणु की इच्छा त्रिलोचन हो जाने की रही है- कवि नहीं हो सका यह कसक सदा कलेजे को सालती रहेगी। और अगर कहीं कवि हो जाता तो, त्रिलोचन नहीं हो पाने का मलाल जीवन भर रहता।.. और मैं त्रिलोचन ही क्यों होना चाहता- पंत, नरेन्द्र, सुमन, बच्चन, महादेवी, दिनकर, नलिनविलोचन अथवा रेणु क्यों नहीं? यह सवाल मैं अपने आप से बार-बार पूछता रहता हूं। 3

रेणु जी के इस विचार से पूर्णत: स्पष्ट होता है, कि वे त्रिलोचन एवं उनके काव्य से कितने प्रभावित थे। उनके काव्यों की गहराइयों से भलीभांति परिचित थे। प्रगतिशील कवियों में त्रिलोचन शायद ऐसे अकेले कवि हैं जो अपनी अनुभूति और अभिव्यक्ति में सहज मानवतावादी कवियों के बहुत ही नजदीक पहुंच जाते हंै। उनकी सहज प्रगतिशीलता को उनके काव्यों में भली-भांति देखा और महसूस किया जा सकता है। त्रिलोचन छायावाद के बाद कविता परिसर में प्रविष्ट हुए। काल-परिवेश के सारे उतार-चढ़ाव देखे लेकिन नयी लीक की परवाह नहीं करते हुए उस परम्परा का विकास करने में संलग्न रहे जो रूढिय़ों का परित्याग करती हुई एक ऐसा रूप सँवारती है, जो दिखावटी तौर पर नया न होकर सही-मायने में वस्तुगत संदर्भो में नया होता है। स्पष्ट है कि उन्होंने लीक को छोड़ते हुए परम्परा का विकास किया। इनके दौर में जो नयी कविता की धारा चल पड़ी थी वो ऊपर से तो नयी सी लग रही थी लेकिन वो चल रही थी पुराने ही लीक में। त्रिलोचन नये को संपूर्णता में चरितार्थ करते हुए चल रहे थे।

प्रगतिशीलता की दृष्टि से त्रिलोचन के काव्यों का एक अलग ही मुकाम है- धरती, दिगन्त, गुलाब और बुलबुल आदि ऐसे काव्य संग्रह हैं जिसमें प्रगतिशीलता के विविध आयाम बिना किसी लाग-लपेट के देखने को मिलते हैं। धरती काव्य संग्रह की यह पंक्ति जो प्रेम की एक अलग ही मिसाल पेश करती है जिसमें ना वासना दिखाई देती है और ना ही भोग-विलासिता। एक स्वस्थ प्रेम का चित्रण यहाँ पर कवि ने किया है जो श्रम और सहभागिता पर आधारित है-

              है धूप कठिन सिर-ऊपर

              थम गयी हवा है जैसे

              दोनों दूबों के ऊपर

              रख पैर खींचते पानी

              उस मलिन हरी धरती पर

              मिल कर वे दोनों प्रानी

              दे रहे खेत में पानी4

और प्रेम के फलस्वरूप जब एक-दूसरे को स्मृति चिन्ह दिया जाता है वो कितनी अमूल्य होती है इसे कवि ने अपने शब्दों में ही कहा है

              ''है याद तुम्हें ?

              मैंने जोता तुमने बोया

              धीरे-धीरे अंकुर आये

              फिर और बढ़े

              हमने तुमने मिलकर सींचा

              उन परम सलोने पौधों को

              हम दोनों ने मिल बड़ा किया 5

त्रिलोचन की ये पंक्ति वर्तमानकालीन परिवेश में प्रेम की महत्ता को एक नये अर्थ में प्रस्तुत करती है, जो सच में उनके प्रगतिशील चिन्तन का ही परिणाम है।

इसी प्रकार जीवन के विभिन्न संदर्भो को लेकर त्रिलोचन की कविताएं चलीं। चाहे ग्रामीण जीवन का चित्रण हो, सामाजिक, राजनीतिक विसंगतियां हो या जीवन दर्शन, कोई भी पक्ष इनके कलम से अछूता नहीं रहा।

ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्रण उनके कविता संग्रह, सबका अपना आकाश में देखते ही बनता है-

ताल भरे हंै, खेत भरे हैं

नई-नई बालें लहराएं

झूम रहे हैं धान हरे हैं

झरती है झीनी मंजरियाँ

खेल रही हैं खेल लहरियाँ

 

गाता अलबेला चौराहा

चौपायों को साथ सँभाले

पार कर रहा है वह बाहा

घर घरनी परिवार है आँखों के आगे।6

जहाँ तक त्रिलोचन के काव्यों की बात है उनको व्यापक स्वीकृति आठवें दशक में ही मिली। छायावादोत्तर परिवेश में त्रिलोचन को रचनाकार तो माना गया, लेकिन ऐसे रचनाकार जो केन्द्रीय धारा में आते-जाते तो रहे किन्तु स्थापित नहीं हो पाये थे। पांचवें एवं छठवें दशक में नये जीवन-संदर्भो को लेकर आधुनिकतावाद को प्रगतिशील जनवाद की अपेक्षा अधिक महत्व दिया गया है। जिसके फलस्वरूप मौजूदा हालात में अनेक रचनाकार वर्तमान से मोहबद्ध होकर रचनाएँ करते रहे लेकिन त्रिलोचन ने समय की चाल को पहचानते हुए अपने आप को अलग रखा। इसी मोह का त्याग करते हुए राजनीति एवं राजनीतिज्ञों के संदर्भ में लिखते हंै -

कहाँ हैं वे लोग

जो सम्भाषिका में जोश से

बोला किये पर साल

और उनके बोल से जो छाँह

छा गई थी

सोचते थे तुम दुलारे

ताप के दिन गये

हाथ जितने हैं

आड़ करते रहेगे

कहाँ है वे लोग

जो सहयोग झोला में संभाले

यहाँ आये थे। 7

त्रिलोचन की कविताएँ दुनिया के हो के, दुनिया में रहने की कविता है उसे दुनियादारों की अपेक्षा दुनिया की परवाह कहीं अधिक है। यही कवि की विश्व दृष्टि है। इनकी कविताएँ, भावुकता एवं सहृदयता को साथ लेकर चली थी। इसी कारण नयी कविता के व्यक्तिवादी दौर में भी ये कविता को संपूर्णता में बचाने के प्रयासों में लगे रहे।

त्रिलोचन के 60 वें जन्मदिन पर कृति ओर के सम्पादकीय में विजेन्द्र ने सही लिखा है - त्रिलोचन ने अपना लेखन जिस प्रगतिशील काव्यांदोलन से किया वे उसकी मुख्यधारा से कभी इधर-उधर नहीं भटके। और इससे भी बड़ी बात यह है कि, उन्होंने कविता को कभी कला-स्तर से नीचे नहीं खिसकने दिया। अपने समाज की क्रूर असंगतियों से अविचलित होकर रचना की प्रतिष्ठा और कवि व्यक्तित्व की सार्थकता को बनाये रखना आज के लेखक की सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि आज सार्थक मूल्यों की न केवल उपेक्षा है, बल्कि उनका भारी दमन और हस भी है। और जो लेखक इतनी आत्मघाती विडम्बनाओं, अभावों और संकटों को झेलकर रचना को इसके विरोध में खड़ा कर सके यह आसान बात नहीं। त्रिलोचन ने रचना के साथ स्वयं को नष्ट किया। - इतना समर्पण, इतना त्याग, इतना धैर्य, और इतना चौड़ा सीना विरल है। लेखक को ही नहीं, किसी आदमी के लिए भी लगभग इस प्रक्रिया से गुजरना होगा यदि किन्हीं सार्थक मूल्यों का प्रतिबद्ध है। 8

विजेन्द्र के विचार यहाँ कितने सार्थक एवं सत्य हंै सचमुच इस कवि ने अपने आप को नष्ट करके ही कविता लिखी है। इसका प्रमाण इनकी कविताओं में सर्वत्र दिखाई देता है -

घोर निराशा में ही मुसकाकर बोला

कुछ बात नहीं है अभी तो कई

और तमाशे मैं देखूँगा। मेरी छाती

वज्र की बनी है, प्रहार हो, फिर प्रहार हो

बस न कहूँगा। 9

त्रिलोचन की कविताओं को अपने युग का दर्पण कहा जा सकता है। उस समय की जो जीवन-प्रक्रिया थी चाहे वो जीवन का कोई भी पक्ष हो स्पष्टत: देखने को मिलती है - यहाँ पर राजनीतिज्ञों की मनोदशा को भली-भाँति देखा जा सकता है - उस दौर में राजनीति और साहित्य के मायने एक से हो गये थे। त्रिलोचन अपने समय की राजनीतिक क्रियाओं से अच्छी तरह परिचित थे- राजनीति की आड़ में किस तरह स्वार्थ मीमांसा सक्रिय थी। राजनेताओं की मनोदशा कितनी गिरी हुई थी। इसी कारण से त्रिलोचन कभी राजनीतिक- साहित्यिक गोष्ठियों में शामिल नहीं होते थे - शायद वो इस बात को भली-भाँति जानते थे-

जब तक राजनीति है तब तक शस्त्र रहेंगे

और शाँति की वार्ता भी चलती जाएगी

देश-देश के कर्ता कोई बात कहेंगे

देश-देश की जनता उसको दोहरायेंगे। 10

त्रिलोचन सर्वहारा वर्ग के कवि रहे हंै, इसीलिए इनकी कविताओं में इस वर्ग के प्रति सहानुभूति, स्नेह और पीड़ा का भाव हमेशा ही रहा है।

त्रिलोचन की कविताएँ घोर निराशा में भी मुस्कुराकर चलने के लिए प्रेरित करती हंै। इनकी कविताएँ पुरानी परंपरा को साथ लेकर तो चलती ही है पर नयी अभिव्यंजना के साथ। इसी कारण से उनकी कविताओं में प्रगतिशीलता के विभिन्न आयाम सहज रूप से ही हमें देखने को मिलते हैं। भारतीय संस्कृति की रक्षा को लेकर भी वे काफी जागरूक रहे तथा हमेशा ही लोगों को जागरूक करते रहे- कि हमारी परंपरा ही हमारी पहचान है और आज के इस बदलते परिवेश में उनकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है-

गौरवमयी हमारी यह प्यारी परंपरा

इसी तरह क्या हाय लुप्त हो जाने को है।

शीतल अंधकार वह जिसकी मोहक ममता

अब भी स्मृति में है, क्या उसके बिना यह धरा

कभी सुखी होगी। कैसा दिन आने को है

जिसमें हम न रहेंगे कैसी होगी समता 12

त्रिलोचन की यह पंक्ति, परंपरा में मंडराने वाले संकट के प्रति हमें आगाह करती है और पाश्चात्य परंपरा के जो दुष्प्रभाव आज हमारी भारतीय परंपरा में पड़ रहे हैं उससे हमें अवगत कराती है। इसीलिए इनकी कविताएँ आधुनिकता से दूर परंपरा एवं पुरानी संस्कृति को साथ लेकर चलती हैं -

       धु्रव शुक्ल लिखते है - त्रिलोचन आर्थिक रूप से भले ही विपन्न रहे हों पर उनकी कविता भारतीय परंपरा सम्मत काव्य विवेक से इतनी समृद्ध है कि उन्हें किसी मतवाद के साँचे में ढालना हमेशा मुश्किल रहा है। वे मानव के इतिहास पर नहीं उसकी माया पर मुग्ध कवि हैं। 13

धु्रव शुक्ल ने जिस तरह से त्रिलोचन के जीवन एवं उनके काव्यों को हमारे समक्ष रखा है, हमें निराला जी के काव्य एवं उनके व्यक्तित्व का स्मरण हो आता है- वो भी इसी तरह फक्कड़, बेपरवाह थे। विपन्नता उन्होंंने भी झेली थी, अत: मुझे यहाँ त्रिलोचन और निराला में कुछ विशेष असमानता नहीं दिखती ना काव्य की दृष्टि से, ना ही विचारों की दृष्टि से और ना ही व्यक्तित्व की दृष्टि से।

त्रिलोचन की कविताओं की अतल गहराइयों में जब हम उतरते हंै, तो पाते हैं इनकी कविताएँ किसी बँधी-बँधाई परिपाटी में कभी नहीं चली। जीवन की विभिन्न विषमताएँ चाहे वो किसी भी रूप में हों, हमें सहजता से दिखाई दे जाती हंै। उस समय समाज में जो अवसरवादिता की प्रवृत्ति थी उनका चित्रण उन्होंने बड़ी ही निर्भीकता के साथ किया है -

देसी और विदेसी लादी ढोते-ढोते

जिनकी पीठ कट गई थी वे गधे शान से

घोड़े कहलाते फिरते हैं।

आन-बान से

कहते हैं कि इन्द्र के घोड़े जैसे होते

हंै वैसे ही हम हैं।

 

साम्यवाद के पथ में लीद किया करते हैं,

मानवता का पोस्टर देखा, लगे रेंकने

क्या प्रतीक है और तथ्य क्या, दूर दूर हैं,

समझ बड़ी भोली है, व्यस्त जिया करते हंै।

संस्कृति की हरियाली देखी, लगे छेंकने,

अपनी दुलत्तियों के मद में सदा चूर हैं। 14

इन पंक्तियों में कवि ने भोगे हुए यथार्थ को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। तात्कालीन समय में जो समाज एवं समाज के लोगों की स्थिति थी, उसका वास्तविक स्वरूप यहाँ हमें स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।

त्रिलोचन की कविताओं का मूल स्वर समाज की ऐसी स्थापना को लेकर उठा, जिसमें विषमता का कहीं कोई नाम न रहे। न तो कोई शोषक हो और न कोई शोषित अर्थात वसुधैव कुटुम्बकम की भावना उनके काव्यों में मूल रूप से दिखाई देती है।

       महल खड़ा करने की इच्छा है शब्दों का

       जिसमें सब रह सके रम सके....

       .... सबके लिए निमंत्रण है अपना जन जानें

       और पधारे इसको अपना ही घर मानें 15

त्रिलोचन के काव्य में जीवन की अभिव्यक्ति को भी बड़ी सहजता से देखा जा सकता है। इनकी कविताओं में दुख-पीड़ा का ताना-बाना बड़ी ही मार्मिकता के साथ गुँथा हुआ दिखाई देता है -

पीड़ा के नीचे भाषा अब दबी पड़ी है,

आँखों, साँसों, मुख रेखाओं में गहराई

उतर चली है। स्वर के यन्त्रों पर लहराई

अवरोह की निरन्तरता। कौन सी घड़ी है

जब जीवन सेना विनाश से नहीं लड़ी है। 16

त्रिलोचन जी की यह पंक्ति जीवन में सुख-दुख, एवं पीड़ाओं की वास्तविकता एवं अनिवार्यता को हमारे सामने प्रस्तुत करती है, और यह सीख देती है, कि दुख-पीड़ा जीवन का एक अनिवार्य अंग है। जिसे सहजता से वहन करना चाहिए। यहाँ कवि हमें एक दार्शनिक के रूप में दिखाई देते हैं।

कहो मत, रहो मौन दिन रात

सहो जीवन के संचित भोग

भाग कर यहाँ बचा है कौन

अटल है कर्मों के संयोग

यही है जीवन का इतिहास 17

इस तरह जब हम त्रिलोचन के समग्र काव्य का अध्ययन करते हंै, तो पाते हंै उनकी कविताओं में प्रगतिशीलता के विभिन्न आयाम एक चरम उत्कर्ष को स्पर्श करते हंै। जीवन के हर एक पहलू से होकर इनकी कविताएं गुजरी हंै। ऐसा लगता है कवि ने कविता को लिखा ही नहीं है बल्कि संपूर्णता के साथ जिया भी है। लेकिन जब कोई आलोचक किसी रचना की परख केवल विचार तथा सामाजिक जीवन के ज्ञानात्मक स्तर के आधार पर ही करता है, तो वह पूर्णत: अधूरी होती है।

 त्रिलोचन की कविता का जीवन क्या है। उसके पीछे कोई दृष्टि है, या नहीं। जो जीवन स्थितियाँ, वस्तुएँ, चरित्र, प्रकृति-चित्र उन्होंने रचे हैं, उनके संदर्भ में सवाल होता है कि क्या वे बिना किसी दृष्टि के रचे जा सकते हैं। नदी, कामधेनु, सहस्र कमल, हम साथी, अन्तर, नगई महरा आदि अनेक ऐसे कविताएँ हैं जिन्हें क्या केवल चित्र-निर्माण या अनुभव तक ही सीमित किया जा सकता है? नहीं, कोई कवि वस्तु और परिस्थितियों के चित्र देने से चित्रवादी नहीं हो जाता। त्रिलोचन ने जिस जीवन दृष्टि को अपने कविताओं में अभिव्यक्त किया है उसे समझने के लिए आलोचक को भी उसी जीवन दृष्टि से आलोचना करनी चाहिए तभी, वह उस कवि के काव्य के साथ न्याय कर पायेगा और ऐसे भी विचार सबके अलग-अलग होते हैं। विचार को थोपने मात्र से वास्तविकता नहीं बदल जाती। त्रिलोचन को समझना है, यदि उनकी प्रगतिशीलता को समझना है, तो उनके कविताओं के केन्द्रीय भाव को समझना आवश्यक है।

आदमी हम ऐसे हों

कि जिनके बीच रहते हैं

वे भी हमें आदमी कहें

और यों ही सदा जानते रहें

प्रभाकर श्रोत्रिय लिखते हैं - त्रिलोचन की कविताओं को अलग तरह से करने और पाठक तक पहुंचाने की जरूरत है, क्योंकि वे हमारी भाषा के सही मायने में उदात्त मेधा और अनूठी प्रतिभा के मेहनतकश कवि हैं। उन्होंने अलग तरह से अपना एक कवि-मुहावरा रचा है जिसकी कद-काठी, दृढ़ चरण, सादा लिबास हमारी जाति धरोहर है। वह हमारी कविता का शास्त्रीय आस्वादन - परम्परा और हमारे अभ्यास से भले ही कम मिलता हो, पर हमारी किसानी, मजदूरी का संतोष और सहने की दर्शन - परम्परा से मिलती है, जिसकी बानगी संतों की बानी में है। जहां भीतर ज्वाला धधकती है, लेकिन बाहर केवल एक शांत तप झलकता है।18

त्रिलोचन की कविताएं भी अंदर से धधकती हैं जबकि बाहर एक शांति झलकती सी दिखाई देती है।

 

संदर्भ सूची

 

1.     शुक्ल, धु्रव, त्रिलोचन संचयिता, पृष्ठ - 90 वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली प्रथम संस्करण - 2002

2.     सिंह, नामवर, कविता के नए प्रतिमान, पृ.-127 राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली

चौथी आवृत्ति - 1999

3.     शुक्ल, धु्रव, त्रिलोचन संचयिताÓÓ पृष्ठ - 30 वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002

4.     वही, पृष्ठ - 183

5.     वही, पृष्ठ - 184

6.     त्रिलोचन, सबका अपना आकाश, पृष्ठ - 17 राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1987

7.     वही, पृष्ठ - 17

8.     सिंह, डॉ. जीवन, कविता की लोक प्रकृति, पृष्ठ - 114 अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1990

9.     शुक्ल, धु्रव, त्रिलोचन संचयिता, पृष्ठ - 83 वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002

10.    वही, पृष्ठ - 235

12.    त्रिलोचन, फूल नाम है एक, पृष्ठ - 27 राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली प्रथम संस्करण - 1985

13.    शुक्ल, धु्रव, त्रिलोचन संचयिता, पृष्ठ - 12 वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002

14.    त्रिलोचन, फूल नाम है एक, पृष्ठ- 21 राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली प्रथम संस्करण - 1985

15.    शुक्ल, धु्रव, त्रिलोचन संचयिता, पृष्ठ - 85 वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002

16.    वही, पृष्ठ - 89

17.    त्रिलोचन, सबका अपना आकाश, पृष्ठ - 19 राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1987

18.    श्रोत्रिय, प्रभाकर, कवि परम्परा तुलसी से त्रिलोचन, पृष्ठ - 258 भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, चौथा संस्करण - 2013