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Friday 16 Nov 2018

संपत्ति

अनु.: इंदुप्रकाश कानूनगो

282 रोहित नगर (प्रथम)

गुलमोहर भोपाल 462039

मो. 9981014157

मैं कैफे रॉयल में मैक्स पेश्किन-यहाँ उसे इसी नाम से पुकारूँगा-के साथ बैठा था। मैं हाल ही पोलैंड से आया आया युवा ही था, जबकि वह भूतपूर्व एनार्किस्ट रहा आया कि जिसके तीन ग्रन्थों में रचे जीवन-वृत्तांत उन्हीं दिनों प्रकाशित हुए थे। एनार्किज़्म, चौथे दशक के दौरान, अमेरिका में पहले ही से 'घिस पिट गया था' (यह पेश्किन ही की उक्ति थी), फिर भी, पुराने गु्रप के अवशेष बचे थे, और वे यिद्दिश में कोई पत्रिका प्रकाशित करते थे। मैक्स पेश्किन ने लंच साथ करने की दावत दी थी, वहीं वह अपनी किताबें मुझे भेंट देने लाया था। उस नाटे शख्स का सिर दूधिया सफेद होगा, और लाल चेहरा गोल, और आँखें ऐसी कि अभी तक भी थकी नहीं लग रही थीं।

हमने खटमीठी क्रीम लगी प्याज भरी टिकियाएँ खायीं, गिलासों में काफी पी, तब पेश्किन बोला:-इतना कुछ यहाँ होता आया, पूछो मत- अब सब खत्म है। सोशलिस्ट तो पूरे घुटने टेक दिये। पुराने मुहावरे इस्तेमाल में लेते तो हैं, सारा जोश लेकिन खत्म है। उधर, कम्युनिस्ट, प्रतिदिन हर सुबह लाल कागज पढ़ते हैं और गॉस्पेल की तरह दोहराते रहते हैं: कल तक बुखारिन कोई महान नेता रहा आया, आज वह देशद्रोही है। अगर उनका अखबार स्टाालिन को जनता का दुश्मन और पागल कुत्ता करार दे तो वे उसको भी दोहराते रहेंगे। जबकि अनार्किस्ट बिल्कुल भिन्न रहे आये। अनार्किज़्म ने वैयक्तिकता के जरिये लोगों को आकर्षित किया-यहाँ तक कि अनजान को भी किसी न किसी किस्म की स्वतंत्रता थी। जब मैं दसवें दशक के आरंभ में अमेरिका आया, सक्रिय एनार्किज़्म पहले से ही पतन की ओर अग्रसर था, यद्यपि वे शिकागो के हे-मार्केट पर हो रही प्रोटेस्ट मीटिंग बाबत, और चार व्यक्तियों: स्पाइज़, पारर्सन्स, फिशर, तथा एंजल: बाबत बातें करते गये। माक्र्सिस्टों के लिए रास्ता साफ हो गया। हालाँकि, लोवर ईस्ट साइड की यिद्दिश बस्तियों में अनार्किज़्म फिर भी पनपता रहा। पूँजी के संघनन तक, और, काउत्स्की या डी. लिऑन के संकेत- कि क्रांति का क्षण आ गया- मिलने तक, हम सभी इतने उतावले थे कि इंतजार ना कर सके। वाकई, न्यूयार्क में हमारे कोई महत्वपूर्ण चिंतक या नेता नहीं थे, लेकिन लंदन से साहित्य मिलता, जहाँ क्रोपोतकिन बादशाह था। और फिर, रूस तथा जर्मनी से अतिथि आते-यदा कदा स्पेन से भी। हमारी सभाएँ प्राय: भीड़ भरी होती। अधिकांश रूसी प्रतिनिधि यिद्दिश बोलते। हम इतनी अहमन्यता से भरे थे कि ऐसा यकीन करते कि अगर दो-एक बम गिरा दें तो लोग एक हो उठ खड़े होंगे और सारी सरकारें गिरा देंगे।

- इतना तो तुम समझते होगे कि अनार्किज़्म अनेक भिन्न विचारधाराओं और आंदोलनों का नाम रहा आया है। प्रूधान और बाखुनिन के बीच बहुत बड़ा फर्क है। जहाँ तक स्टर्नर का सवाल है वह तो स्वयंमेव ही कोई किताब है। अमेरिका आने के पहले मैं विद्यार्थी था। इन विचारकों को मैं-पहले रूस फिर इंग्लैंड मेें पढ़ चुका था। लेकिन लोवर ईस्ट साइड में आ बसे हमारे कई-एक लोग एक-दूसरे को नहीं जानते थे। वे भावुक किस्म के अनार्किस्ट थे। कहा करते, 'पहले हमें जालिमों से मुक्ति पाना होगा, तभी कुछ संभव होगा।' एलेक्ज़ेन्डर बर्कमन जेल में डाल दिया गया, बाद में, उसे प्राय: भुला दिया गया, लेकिन एम्मा गोल्डमन और मुक्त प्रेम बाबत उसके कथनों का विशेषतया स्त्रियों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा।

-मेरे जीवन वृत्तान्तों के अंतर्गत, तुम्हें, मॉरिस और लिब्बी के नाम मिलेंगे। मैं उन दोनों बाबत् सारे तथ्य नहीं बता सकता, क्योंकि उन्हें जानते लोग अभी भी जीवित हैं और-अगर नाम भी बदल दूँ तो भी- भाँप जायेंगे मैं किनका जिक्र कर रहा हूँ। और फिर, इसलिए भी, कि स्वैरकल्पना का कोई लेखक अपनी मर्जी से कोई उड़ान भरना चाहे तो भर ले। सोचता हूँ तुम इसमें दिलचस्पी लोगे। समय हो और ज्यादा बेहतर कुछ करना ना हो तो तुम्हें सुना सकता हूँ।-

मेरे पास वक्त है और मुझे कोई ज्यादा जरूरी काम नहीं है, मैंने उसे आश्वस्त किया।

 -ठीक। हो सकता है कि इन पचास वर्षों में इसकी कोई स्मृति शेष न रहेगी। क्या उम्र है? पैंतीस? मेरे ख्याल से कुछ ज्यादा के होगे।-

इस जुलाई तैंतीस पूरे करूँगा।

- नू ! तुम तो अभी बच्चे ही हो। उस मॉरिस के साथ अठ्ठारह सौ तिर्यानवे, चौरानवे-पिंचानवे तक भी परिचित रहा। यहाँ, अमेरिका में एनार्किस्ट बस बातें ही कर रहे होंगे, जबकि रूस में वे उत्साह से उफन रहे थे। कई एक-प्राय: दर्जन भर-गु्रप होंगे, मसलन: दि शियेरनोये जाँमिया (काला ध्वज), स्लेबोवोल्तसी (रोटी की माँग), दि बेज़ाँतशाल्तसी (सरकार के बगैर)। सर्वाधिक उल्लेखनीय बेजमोतिविंकी (उद्देश्यहीन) थे। उनका चिंतन था कि आदमी को हत्या, लूट, और आगजनी- महज सत्ता की भत्र्सना के लिए- किसी भी अभिप्राय के बिना, करने की इज़ाजत होनी चाहिए। ठीक याद नहीं कब, लेकिन उन्होंने वारसा में होटल ब्रिस्टल पर एक बम फेंका था। तब शायद तुम पैदा भी नहीं हुए होगे। ओडेसा में, उन्होंने किसी जहाज को उड़ा दिया था। बियालिस्टाक में, उनके किसी बम ने बौद्ध नेता, ईस्थर रिस्किन, के प्राण हर लिए थे। बाद में पता चला कतिपय एनार्किस्ट छोटे मोटे डाकू बन गये थे- आरंभ करने में उन्हें ऐसा होना ही था।

- नाटे से शख्स मॉरिस की आँखे स्याह और लंबे-लंबे केश घुंघराले थे। उसने दाढ़ी (छोटी सी दाढ़ी) भी रखी हुई थी। वह हमारी सभाओं में भाषण देता था। मैं बड़ी शर्मिन्दगी के साथ स्वीकार करूँगा कि हमारी समस्त गतिविधियों के अनन्तर हमारे कुख्यात योम किप्पर बॉल सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहे आये। योम किप्पर पर किसी बॉल का नाच नास्तिक मित्ज़वाह कहलाता, या यों माना जाता जैसे अ-पवित्र आहार (सूअर का गोश्त) खाना हो, ताकि सर्वशक्तिमान ईश्वर के कोप का भाजन बनें। मॉरिस इन उद्यमों का-किसी डाँसर के नहीं बल्कि किसी प्रचारक के रूप में- केन्द्र बिंदु रहा आया। अपनी रोजी-रोटी के लिए वह कुछ नहीं करता। वाकई कुछ नहीं! पत्नी, लिब्बी, सारा बंदोबस्त करती। दुकानों के लिए लेडिज ब्लाउज़ सिलती। मेरे ख्याल से जेन्ट्स शर्टस् भी बनाती।

- यद्यपि मैं नौसिखुआ ही होगा, अंग्रेज विदेशियों को एजुकेशनल अलायन्स पर अंग्रेजी पढ़ाता। मैं किराये के किसी कमरे की तलाश में था। जहाँ शुरू में डेरा डाला वह भयानक गन्दी जगह थी। खाना इतना घटिया क्या बताऊँ। किसी ने बताया मॉरिस किराये पर कमर देना चाहता है। वह बड़ा विचित्र शख्स था। अक्सर  पेलेराइन (एक तरह का ओवरकोट), चौड़ी किनार की कोई काली हैट, और एक लहराती टाई पहने होता। यों नाटा और नाजुक, तथापि तूफानी भाषण देता, आमतौर से उसका स्वर कोमल होता, तथापि कैपिटलिज़्म के विषय पर पलटते बड़ा तीखा हो जाता। उन एनार्किस्टों पर भभकता जो महज प्रोपेगन्डा पर निर्भर रहते। वह सिर्फ दहशत फैलाने में ही यकीन रखता। उसकी बीवी उसे सुनने आती, लेकिन मुझे यों लगा कि वह उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देती। उससे थोड़ा बहुत ऊँची थी-साँवली, आकर्षक। केश लम्बे रखती, जिन्हें किसी जूड़े में गुँथती-यद्यपि किसी एनार्किस्ट स्त्री के बाल, अमूमन छोटे कटे होते। जब कभी मुस्कुराती बायें गाल में गड्ढा पड़ता। चुन्नटदार लहँगा और ऊँचे गिरेबान की कुर्ती पहनती। मॉरिस जब कभी रॉकफेलर के खिलाफ गुस्सा उगलता, वह किसी बेंच पर पीठ टिकाये जँभाई लेती। यदा-कदा स्वेटर बुनती रहती।

- किसी शाम उसके भाषण के बाद निकट पहुँच पुष्टि करना चाहा कि उसके पास किराये से उठाने को कमरा खाली है। खुश हो उसने लिब्बी को पुकारा। उन्होंने कहा एॅटार्नी स्ट्रीट पर अपने बड़े से अपार्टमेंट में ग्रुप के ही किसी व्यक्ति को किरायेदार रखने में खुशी होगी। उन दिनों मेेरे लिए जगह बदलना आसान था। बस बैग बाँधा और रेविंगटन स्ट्रीट से एटार्नीस्ट्रीट चल दिया। जिस घर वे रहते वह इलाका आज कोई स्लम कहलायेगा-अपार्टमेन्ट तीसरी मंजिल पर था। प्रसाधन हॉल ही में था, नहाना हो तो बार्बर के पास जाना होता! बार्बर बाथ अटेन्डेन्ट भी था। मुझे दिया गया कमरा छोटा था, खिड़की सड़क के आमुख थी, उपस्कर बस एक ऑयरन कॉट। मुझे और क्या चाहिए था? अभी तक तो, एक पर एक बने तीन तख्तों पर सोये लोगों के अनंतर बीच में मैं सोता आया।

- अपार्टमेंट की बैठक के दरवाजे पर टँगे बोर्ड पर लिखा था: संपत्ति का मतलब चोरी: यह प्रूधान की किसी रचना में से उद्धृत वाक्याँश था। गॉडविन, पू्रधान, बाखुनिन, क्रोपोतकिन, जोहान्न मोस्ट के चित्र दीवारों पर टँगे थे, और हाँ, शिकागो के शहीदों के भी। मॉरिस ने स्टर्नर को छोडऩा नहीं चाहा होगा, लेकिन उसका कोई चित्र उपलब्ध नहीं रहा आया। मैंने स्टर्नर ही को नहीं फियूरबाख़-कि जो रिबेलियन होने के पूर्व स्टर्नर का गुरू रहा होगा- को भी ध्यान से पढ़ा था। दरअसल, मेरे स्वयं का आदर्श कोई 'अहम्मन्यवादियों का समुदाय' रहा आया। 'परिपूर्ण अहम्मन्य'- यूँ कहूँ तो ठीक होगा- 'ऐसा विश्व इतिहास, कि जो स्वयं की, और वह सब कुछ जो मेरा हो उसकी' सेवा में तत्पर हो। ये स्टर्नर ही के कथन थे। प्रूधान की दृष्टि में संपत्ति बुराई थी, जबकि स्टर्नर संपत्ति को मानवता का सार मानता रहा आया। सच्चा धैर्य क्या हो, यह हममें से कोई नहीं जानता था। द्वार पर टँगे नारे से मेरा इत्तिफाक़ नहीं था, तत्क्षण मॉरिस से जा उलझा। यही वह चाहता था। तकरार के लिए घोड़े-पर-सवार। मैं स्टर्नर के उद्धरण पर उद्धरण देता गया, वह प्रूधान के। मैंने सिर्फ  कमरा किराये से लिया था- खाना शामिल नहीं था-तथापि लिब्बी ने मेरा खाना बनाया। मेज पर बैठे हम तीनों के बीच मॉरिस संपत्ति और उससे संबंधित हर बात के खिलाफ चीखता ही गया। उसका अंदाज था कि क्रांति के बाद 'मेरा' और 'तेरा' जैसे शब्द कोश से हट जायेंगे। मैंने पूछा, 'किसी आदमी को कैसे खबर दोगे कि बीबी ने पुत्र को जन्म दिया है?' तब मॉरिस चिल्लाया, 'विवाह की समूची संस्था लोप हो जायेगी! वह गुलामी के आधार पर खड़ी है। किसी शख्स को दूसरे को वश में रखने का क्या अधिकार है?' वह इतना उत्तेजित हो गया कि मेज धमकाने लगा। लिब्बी बोल पड़ी, 'तुम्हारी तश्तरी- मेरा मतलब हमारी तश्तरियाँ नीचे गिर जायेंगी और पेट खाली रह जायेंगे। हमारे कपड़ों पर भी दाग लग जायेंगे।' मैं हँसा, पत्नी वाक्पटु है। लेकिन नितांत गंभीर बना हुआ मॉरिस गुर्राया, मजाक उड़ा रही हो, हें? सारी नाइंसाफी और कू्ररता संपत्ति ही से उत्पन्न होती है। साम्राज्यवादी क्यों एक दूसरे के गले काटने पर उतारू हैं? सारे शोषण का क्या कारण है?' रोष के अनन्तर, स्टर्नर पर भी भिड़ पड़ा, 'वाह, क्या कहना, 'अहमन्यवादियों का समुदाय।' मैंने पूछा, 'प्रेम का क्या होगा? कोई आदमी किसी स्त्री से प्रेम करे, तो वह उसी के लिए होगी ना, दूसरों के लिए तो नहीं। मॉरिस ने जवाब दिया, 'द्वेष कोई प्राकृतिक भावना नहीं है। वह सामंतवाद और पूँजीवाद का उत्पादन है। पुरातन काल में लोग समुदायों में रहते आये, सारे बच्चों की जिम्मेदारी समुदाय की होती।' लिब्बी बीच में बोल पड़ी, तुम्हें कैसे मालूम? तुम वहाँ थे? मॉरिस बोला, यह बिल्कुल प्रामाणिक तथ्य है। उसने बकल और अन्य इतिहासकारों का हवाला दिया। हम रात एक बजे तक बहस में भिड़े रहे। इस बीच लिब्बी ने बर्तन साफ किए। रसोई से दरवाजा खोल बोली, 'मैं थक कर चूर हो गई हूँ। अपनी बहस कल तक मुल्तवी कर दो। वह बासी नहीं होगी। चर्चा की उत्तेजना से भरे मॉरिस ने उसे कान तक नहीं दिया। वह बोल पड़ी, तो फिर, मैं सोने जाती हूँ। फिर मेरी जानिब घूम बोली, तुम्हारा-मतलब कि हमारा बिछौना लग गया है।

यानी, वह तुमसे उलझ गयी? मैंने पूछा।

मैक्स पेश्किन की भौंह तनी-वाह, तुम तो अंतर्यामी हो। अलबत्ता हड़बड़ाओ मत। धीरज रखो।

- मैं थोड़ा बताना चूक गया कि खाना खाने के बाद मेरी लिब्बी से थोड़ी बहुत झड़प हो गयी थी। मैंने खाने का दाम पूछ लिया तो बड़ा बुरा मान गयी। मैं तुम्हारी रसोइया नहीं हूँ। दोस्त की तरह आमंत्रित हो। लेकिन जब उसने सुबह नाश्ता दिया तो मैं बोला, एक आध बार चल सकता है, लेकिन, लगातार मुफ्त खाना तो अनुचित होगा। मुझे पाँच डालर हर हफ्ता मिलता जो पर्याप्त आमदनी थी। मैंने बोल दिया खाने का दाम तय कर दो नहीं तो मैं यहां नहीं खाऊंगा। थोड़ी आनाकानी के बाद तय हुआ कि वह खाने के दाम ले लेगी। कुछ दिनों पश्चात् हम घनिष्ट मित्रों समान हो गये। आर्चार्ड स्ट्रीट जा मैं उसके लिए सौदा ले आता। जिन-जिन दुकानों के लिए वह काम करती वहाँ तक मैं उसके बंडल ढोता लाता। उसे रूसी और पोलिश तो अच्छी आती पर अंग्रेजी में लडख़ड़ाती, मैंने उसे सिखाने की पेशकश कर दी। अब उसने कहा कि इसका मुझे पैसा देगी। फिर खूब आनाकानी हुई। हम हर तरह से युवा तो थे लेकिन उसका हमें एहसास नहीं था।

- चूँकि स्वभाववश ही मैं ईर्षालु आदमी रहा आया, सो, ऐसा सोच मन में बसा ही नहीं कि अन्य कोई वैसा नहीं होगा। अत: खूब सचेत रहा मॉरिस के मन में जरा सी भी डाह उत्पन्न नहीं होने दूँ। लेकिन लिब्बी और मेरे बीच गहराती नजदीकी से तो वह प्रसन्नचित्त ही नजर आया। एक दफा मैंने बाहर घूमने की मंशा दर्शायी तो फौरन बोल पड़ा लिब्बी को साथ ले जाओ। लिब्बी लजाती उफन पड़ी, क्यों बेकार अडंग़ा डालते हो। वह शायद अकेला रहना चाह रहा है। तत्काल उछल पड़ा, बकवास, किसी का सान्निध्य तो मनहर होता ही है। अन्य किसी मौके कि जब मेरे पास यिद्दिश थियेटर के दो टिकिट थे उसने झट सुझाया लिब्बी को साथ ले जाओ। सारे दिन कपड़े सीने की मशीन घुमाती रहती है। थोड़ा मन बहल जायेगा। हमने मंच पर-गोर्डिन रत किसी मेलोड्रामा में- जेकब एडलर को देखा, वह दि ग्रेट ईगल के नाम से ख्यात था। बाहर निकल ग्रेंड स्ट्रीट पर क्निशेस (पकवान) खाये। ठसाठस अटी पड़ी गलियों में लोग ताजा यिद्दिश अखबार खरीद रहे थे, वे संपादकीय लेखों के साथ-साथ सैकंड एवेन्यू नाटकों पर भी चर्चा कर रहे थे। हम देर रात घर लौटे, अत्यंत आनंद-मग्न मॉरिस मुक्त समाज में उत्पादनों के विनिमय बाबत कोई भाषण सिरज रहा था। सोने जाने के पूर्व लिब्बी ने शाम गुजारने का आभार माना। इतना भर पर्याप्त नहीं है, मॉरिस बोल पड़ा। तो क्या उसके पैर पडूँ? लिब्बी चिल्लायी। मारिस ने कहा, उसकी मेहनत की कीमत कम से कम एक चुम्बन तो है ना। पल भर थम वह बोली, अपने पालन-पोषण के अनंतर किसी पराये को चूमने का प्रशिक्षण मुझे नहीं मिला है, लेकिन चूँकि तुम्हारा आदेश है तो करती हूँ। मेरी ओर घूम, दोनों हथेलियों से मेरे गालों को दबा उसने मेरे ओठ चूम लिये। तुम्हें क्या बताऊँ, उस क्षण तक मैं बिल्कुल कुँवारा  था। कुछ एक चक्कर चले थे मगर वे सिरे से रोमेंटिक क्या अफलातूनी ही थे। हमारे घर से तनिक ही दूर एक कोठा था लेकिन उन स्त्रियों को देख घिन होती। और फिर, मुझ जैसा आदर्शवादी किसी गोरी गुलाम-फरोशी का इस्तेमाल कैसे करता? वह तो कोई पूँजीवादी संस्था है, मार्गन एण्ड कंपनी के लिए कोई मनोरंजन!

- उस रात खूब थका मॉरिस उसी क्षण सो गया कि जब लिब्बी सोयी। मेरे कमरे में एक गैस लैंप जलता। कुछ एक बार ऐसा होता कि लैंप बुझाये बगैर मुझे नींद लग जाती। सहसा दरवाजा खुला कि जिसमें से स्लिपर्स पहनी नाइटगाउन में लिपटी लिब्बी भीतर दाखिल हुई। और कुछ नहीं पढऩा हो तो लैंप बुझा देती हूँ। व्यर्थ गैस क्यों जलायी जाये। आँख मारती मुस्कुरायी भी।

- उस शाम के बीते चालीस से अधिक वर्ष बीत चुके होंगे, तथापि कल ही का वाकया मालूम देता है। उन दिनों सिरहाने माथा रखा कि नींद लग जाती। लेकिन उस रात मैं बेहद बेचैन था। लिब्बी के चुम्बन ने मुझे उत्तेजना से भर दिया था- चुम्बन ने उतना नहीं कि जितना मेरे गाल दबाने के उसके अंदाज ने। उसका स्पर्श भावुक ही नहीं बेहद सरगर्म था।

- तथापि, पल बीते, मैं वाकई सो गया। जाड़े के दिन थे, कि जब रातें लंबी होती हैं। नींद टूटी, पता नहीं चला दो कि छह घंटे बीते। कमरा स्याह अंधेरे में नहीं, स्ट्रीट लैंप की धुुंधली रोशनी में निमग्न था। सहसा लिब्बी दीख पड़ी। मेरे पलंग से सटी खड़ी। स्वयं को मैं भले मुक्तचिंतक मानता होगा, लेकिन पल भर लगा कोई डाकिन है- लिलिथ जाति की कोई चुड़ैल जो येशिवा छात्रों को पाप करने की जानिब लुभाने आती है। मैंने धीमे से उच्चारा, लिब्बी? नीचे झुकी उसकी फुसफुसाहट में आवेग और बनावटी भाव का संयोग था: मुझे निकट सुला लो, बेहद ठंड लग रही है। मैं भय से काँप गया, दाँत किटकिटाने लगे। मॉरिस कहाँ है? मैंने पूछा। उसने मुझे इज़ाजत दे रखी है,  वह बोली, 'वह मुझे अपनी संपत्ति नहीं मानता है।

- अगर ऐसा कुछ आज हो, तब तो समझो धड़कन उसी क्षण बंद हो जाये, लेकिन तेईस ही का होगा, सो, खून गर्मा गया। सारी वर्जनाएँ भूल गया। कभी पढ़ा याद आया: किसी को चालीस दिनों भूखा रहने बाध्य किया गया, वह किसी चूहे को पकड़ खा गया। किसी न किसी किस्म का जोखिम होता है जो अन्य सारी भावनाओं को निष्प्रभ कर देता है। आधा घंटा बीते उसके जाने बाद ही महसूस हुआ हमने कितना गलत किया। लेकिन, बेतहाशा थका अधिक जागा नहीं रह पाया।

- अगली सुबह हम तीनों ने किचिन में सामान्यतया नाश्ता किया, मॉरिस गंभीर क्या प्राय: प्रसन्नचित्त लगा। वह बोला, किसी एक तरह का आचरण करूँ और किसी दूसरी तरह का उपदेश दूँ ऐसा नहीं कर सकता। हमारे बीच भ्रातृभाव है। उन दिनों वह सब नहीं जानते जो आज जानते है। हालाँकि मैंने फोरेल को, या शायद क्राफ्ट-एबिंग को (ठीक से याद नहीं किसे) पढ़ रखा था, सो यह समझता था ये सब कुछ परोपकारिता (आलट्रूइज़्म) नहीं है। ऐसे पुरुष, स्त्रियाँ भी हैं कि जिनमें साझेदारी की ललक, प्रवृत्ति, उत्तेजना का प्रवाह पाया जाता है। मेरी किस्मत वरदानी होगी, सब कुछ एक साथ: कमरा, खाना, प्रेमिका। मॉरिस बेहद दोस्ताना जा बना। मेरी बेइंतिहा तारीफ करता। उसने मुझे गले लगाया। जब भाषण दिया, मुझे अगली पंक्ति में लिब्बी के निकट बैठना पड़ा। तकरीर के दौरान कोई न कोई सिरा ढूँढ़ मेरा हवाला देता। मेरी प्राय: सारी बातों की ताईद करता, सिर्फ  स्टर्नर को तरजीह नहीं देता। बल्कि बड़ी बेरहमी से उसकी निंदा करता। उस वक्त स्र्टनर का यिद्दिश में अनुवाद उपलब्ध नहीं होने की वजह हमारे साथी उसके बारे में अल्पज्ञ थे। तथापि मॉरिस हर मौके उसकी खाल खींचता। दरअसल, उसी के कारण स्टर्नर का नाम लोअर ईस्ट साइड में प्रचलित हुआ।

-दो वर्ष बीते, और वे शायद मेरे जीवन के सर्वाधिक सुखी दिन रहे होंगे। कुछ दिनों बाद मैं अपनी तनख्वाह-यानी, पेड़ी , जैसा कि हम उसे अमेरिकियाई यिद्दिश में कहते- लिब्बी के हाथों रखने लगा। उन पाँच डालरों के बदले वह मेरे लिए ढेर सारा काम करती। शायद मुझे कुछ ज्यादा भी मिलने लगा होगा। मुझे खाना खिलाती, मेरे लिए कपड़े ले आती और मुझसे बेहद प्यार तो करती ही। ये सब कहीं से भी गोपनीय नहीं था। लोअर ईस्ट साइड तो एकदम गाँव ही है। अलावा इसके, मॉरिस ही हमारे चक्कर को जरा नहीं ढाँकता। बल्कि, ऐसी बात से इतराता। हमारे साथी घटना पर बहस करते। सभी के समक्ष एक सवाल उभरता: बच्चा होने पर क्या होगा? लेकिन न हो, इस बाबत हम सावधान रहे।- कुछ अर्सा बीते सब कुछ रोजमर्रा हो गया, और मुझे ऐसा लगा कि लिब्बी ही में उत्साह घट गया। एटार्नी स्ट्रीट के लोग बैरी हो गये। लिब्बी का ग्राम्यघर था, लोगों ने ग्रामीण परदेश में उसके रिश्तेदारों को हमारे घृणास्पद संबंधों बाबत लिखा। कुछेक ने बस्ती से बाहर भगाने की धमकी दी। हमने वेस्ट में जा बसने का मन बनाया। आरेगाँ में, कहीं न कहीं, सोशलिस्टों और यूरोपिआइयों द्वारा स्थापित मूल कम्यून-बस्तियों के अवशेष कायम थे। वे बुरी तरह बिखर रहे थे क्योंकि मानवजाति की स्वतंत्रता बाबत ही नहीं सूखी घास इक_ा करने और दूध दुहने बाबत भी हर सदस्य की अपनी राय दूसरे किसी से मेल नहीं खाती थी। कई एक सदस्य काहिल हो गये, वे मेहनत से कतराने लगे। कुछ उन्माद से जा भरे। ऐसे सिलसिले के अनंतर सहसा कोई सनसनी आ फैली - साइबेरिया में बीस साल की सख्त सजा पाया हुआ कोई रूसी क्रांतिकारी वहाँ से भाग निकल, कई हफ्तों-महीनों जंगलों और टुंड्रा प्रदेशों में भटकते अमेरिका चला आया। प्रशांत सागर के तट, सानफ्रांसिस्को जा रहे किसी मालवाही पोत में सामानों बीच जा छिप भाग आया। तुम यकीन करो न करो मगर उसका नाम मैं भूल गया, शायद बारुशिन? नहीं। कालुशिन? ये भी नहीं । वृद्धावस्था का दुख- नाम याद नहीं रहते। चाहे जो नाम बना याद रखता हूँ। बाद में पता चला कहीं से भी क्रांतिकारी नहीं था बल्कि कोई झूठा अपराधी क्या धूर्त था। उसे कोई बम फैंकने की एवज में जरा नहीं वरन, जैसा समय बीते ज्ञात हुआ, डकैती के लिए सजा मिली थी। हालाँकि यह घोड़े के आगे गाड़ी करना हुआ। हमने तो यही माना कि कोई क्रांतिकारी न्यूयार्क आया है, कि वह अपना सच्चा नाम इसलिए छिपा रहा क्योंकि रूस लौट जाने की योजना है। यिद्दिश प्रेस से विज्ञप्ति जारी हुई कि डाउनटाऊन के किसी विशाल हाल में उसकी तकरीर होना है। यह भी अफवाह उड़ी कि वह रूसी रईसजादों में से किसी की विप्लवी संतान है। सब झूठ। बस इतना भर सच-वह कोई बड़ा रूसी था, यहूदी नहीं- विशालकाय बंदा, सिर पर भूरे बाल, आँखें नीलीं, और वह खरी रूसी बोल रहा था। ये बातें हमारे साथियों को उसकी शान में इजाफा करती लग रही थीं। रूस से आये अनेक मेहमान-नाटे और स्याह-हमारे ही बंधु थे, वे सब जोर लगा रूसी बोलते। उसका इतना प्रचार हुआ कि सैकड़ों की तादाद में सुनने आये वफादार साथियों को हाल में जगह नहीं मिली। वे बाहर ही खड़े रहे, उनमें- देर से आने के कारण- मैं भी था। मॉरिस को उसका परिचय देना था, लिब्बी सबसे आगे की सीट पर बैठी थी। बेशक, मॉरिस की आवाज तो नहीं सुन पाया लेकिन मास्कोवासी शेर सा दहाड़ा। उसके बोलते दस मिनिट बीते निकट खड़े किसी साथी से मैंने कहा, पूरा का पूरा क्रांतिकारी है, ठीक वैसा कि जैसा मैं तार्तार हूँ।

- इस पर तो तुम खासा उपन्यास लिख सकते हो, खैर आँखों देखा सुनाता हूँ: लिब्बी उससे प्रेम करने लगी। ऐसा उसने बाद में मुझे बताया, एक ही बार उसकी आँखों में आँखें डाली, और तय हो गया।

- कितना विचित्र। मुझे खूब याद हमारा चक्कर कैसे चला, लेकिन कतई याद नहीं वह खत्म कैसे हुआ। ऐसा कुछ भान कि उस रात मॉरिस के घर नहीं सोया। बहुत कर यों घटा होगा- सभा खत्म होते उस मास्कोवासी को मॉरिस अपने घर ले आया और मुझे कहीं अन्य जगह जाना पड़ा। सब कुछ इतना एकाएक हो गया। किसी दिन मॉरिस के घर मुझे सब कुछ मिला- जबकि दूसरे किसी दिन बोरिया बिस्तर उठा चले जाना पड़ा। वे दोनों ही- मॉरिस और लिब्बी- उससे सम्मोहित हो गये होंगे, मॉरिस लिब्बी की बनिस्बत ज्यादा ही। अब तो फ्राइड को याद किया जाता है, ऐसे चालचलन की तस्दीक के लिए ऐसे नाम याद आ जाते हैं।  ऐसा कोई आदमी है कि उसके ऐसे चालढाल की सिद्धि अगर किसी से हो तब तो बात प्रहेलिका नहीं रह जाती। लेकिन तब ऐसा कोई नाम नहीं था, और होगा भी तो मुझे नहीं मालूम। इतना भर याद कि अपना बैग उठाया मैं ईस्ट ब्राडने पर चलते-चलते हर तीसेक कदम ठहर इधर उधर देखता। मैं, नितांत निरपराध, जन्नत के बाहर धकेल दिया गया था।

- कतिपय महीनों बाद, इस ढोंगी का पर्दाफाश हो गया। रूस से आयी कई चि_ियों ने उसकी सारी पोल खोल दी। लेकिन तब तक मेरी समझ में बात आ गयी कि मॉरिस जैसे लोग हीरो-वरशिपर है। उसके संग रहती आयी लिब्बी भी वैसी ही हो गयी है। मैंने समझ लिया जब किसी अन्य से मेरी अदला-बदली इतनी आसानी से वे कर सकते हैं, तब तो, वहाँ दोबारा जा नया सिरा बनाने में कोई मतलब नहीं। किसी विचित्र दिमाग से ग्रस्त दम्पत्ति के बीच मुझ जैसे युवा आदमी को कुछ नहीं मिलेगा। थोड़ा ही वक्त बीते मिली एक स्त्री मेरी पत्नी बनी, उससे मेरे बच्चे हुए। अभी-अभी ही उसका देहांत हुआ है।

- लिब्बी और मॉरिस का क्या हुआ? -उनका तलाक हो गया। धरती ही कुछ ऐसा खेल रचती होगी कि ऐसी बातें ज्यादा नहीं टिकतीं। लिब्बी ने किसी वयोवृद्ध आदमी-अत्तार-से शादी कर ली। मॉरिस, मुझे ऐसा याद आता है, वह अरेगाँ जा वहाँ पूरी बस्ती के उजड़ जाने के दिनों तक बसा रहा। स्वयं से बड़ी किसी कुरूपा संग लौटा। लिब्बी ने भी उसने भी सारे आंदोलन से हाथ हटा लिये। वर्षों बाद मुझे मियामी बीच पर मिला। अपने लिए किसी कामकाजी अपार्टमेंट की तलाश के अवांतर, मेरिडिअन् एवेन्यू पर एक इमारत में पूछताछ करने का सुझाव मिला। लाबी में पहुँचा कि मॉरिस मिला- वो ही भवन-मालिक था। भाड़े से रह रही कोई स्त्री-गरम पानी न मिलने के कारण- उससे झगड़ रही थी। वह मोटा क्या थुलथुल हो गया था, मियामी बीच के फैशन की निकर और गुलाबी फूल कढ़ा शर्ट पहना था। गंजा भी हो गया था।

- बातें सुनता कुछ पल नहीं खड़ा रहा, फिर निकट जा बोला, प्रिय मित्र मॉरिस, संपत्ति चोरी है- प्रापर्टी इज़ थेफ्ट।

- मेरी ओर घूम बच्चे समान चीखा। अपनी दूसरी पत्नी से तलाक लिया वह फिर शादीशुदा था। उसने मुझे एक गाना गाने भर ही की कीमत पर अपार्टमेंट देना चाहा। उसकी स्त्री इतराती बोली कि उसके क्रेपलेश (टिकिया) सारी दुनिया में विख्यात हैं। लेकिन मैं किसी भी तरह की ऊलजलूली के मूड में नहीं था। और फिर, उसकी तीसरी बीबी दूसरी से कहीं ज्यादा ही कुरूप थी। पिछली दोनों मर चुकीं थीं।

-लिब्बी का क्या हुआ?..............मैंने पूछा।

- मैक्स पेश्किन ने आंखें मूंदी, वह भी वहीं चली गयी, वहीं कि जहाँ हम सभी को जाना है- सबसे बढिय़़ा जगह।