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Friday 06 Dec 2019

संस्कृति समाचार

सप्तपर्णी पुरस्कार पर दिया गया वक्तव्य

तेजिन्दर

आज ईश्वर प्रसाद मिश्र स्मृति सप्तपर्णी सम्मान, स्वीकार करते हुए मुझे एक तरह की आंतरिक और सृजनात्मक तृप्ति का एहसास हो रहा है। मैं इस तथ्य से बिल्कुल भी अनभिज्ञ नहीं हूं कि हम एक मनुष्य विरोधी समय में जी रहे हैं। एक ऐसे समाज में जिस में मनुष्य को मनुष्य का दर्जा हासिल करने के लिए सतत् संघर्ष करना पड़ रहा है, और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा लगातार मंडरा रहा है । तुर्की के प्रख्यात उपन्यास लेखक ओरहान पामुक ने कहा था - '' विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनुष्य के मूल अधिकार हैं । इन की स्वतंत्रता पर राष्ट्रीयता, नैतिकता अथवा सब से भयावह स्थितियों में भी व्यावसायिक या सेना के हितों की रक्षा के लिये अंकुश नहीं लगाया जा सकता।''

मित्रो, यह वह समय है जब मोहन दास करमचंद गांधी के विचार को हमारे जीवन से खारिज करने की कोशिशें की जा रही है और पंडित जवाहर लाल नेहरू को एक खलनायक के रूप में दिखाने की मुहिम चल पड़ी है। यहां तक कि मुक्तिबोध की विचार धारा और उन की कविता पर भी सवाल उठाये जाने लगे हैं। पिछले दिनों रज़ा फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका के संपादक ने मुक्तिबोध की बौद्धिकता पर कुछ ऐसे ही प्रश्न उठाये हैं । ''पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या हैÓÓ, इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर हमें अभी तक नहीं मिला है मेरा यह मानना है कि एक संवेदनशील और विचार शून्य समय को संवेदना और विचार के साथ ही भरा जा सकता है । इन का कोई विकल्प नहीं हो सकता। राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और मीडिया द्वारा फैलाये गये धर्म और भ्रम के जाल से मुक्ति का रास्ता हमें सिर्फ लिखा हुआ शब्द दिखा सकता है, यह मेरी दृढ़ मान्यता है ।

मैं इस अवसर पर अपने सभी सहकर्मी लेखक मित्रों से अपील करता हूं कि आइए, हम अपने विचार की प्रतिबद्धता के साथ, मनुष्यता के पक्ष में उस सपने को साकार करने के काम में जुट जायें जो सपना गांधी ने देखा था ।

मैं छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन, श्री ललित सुरजन और जूरी के माननीय सदस्यों श्री गोरेलाल चंदेल, श्रीमती संतोष झांझी और श्री रवि श्रीवास्तव के प्रति आभार प्रगट करता हूं ।

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मार्च अंक में नयनाभिराम आवरण, रेखाचित्रों के लिए बंशीलाल परमार को साधुवाद। ललितजी ने इस बार प्रस्तावना में एक नितांत नवीन मुद्दे पर बड़ी ही ज्ञानवद्र्धक सामग्री प्रस्तुत की है। साहित्यिक क्षेत्र में जाने-अनजाने होने वाली तस्करी, चौरकर्म पर आपने व्यापक चिंतन प्रस्तुत किया है। जीवनलाल वर्मा बनाम नागार्जुन के हवाले से आपने देश-विदेश में हो रही हिन्दीतर भाषाओं की तस्करी को भी बेनकाब किया है। आज के डिजीटल युग में इस अनपेक्षित विद्रूपता से बचने के लिए इस दिशा में देश के प्रबुद्धजनों को सतर्कतापूर्वक सोचना होगा, सक्रिय होना होगा।

सर्वमित्राजी ने न्यू इंडिया की त्रासदी शीर्षक उपसंहार में 2013 और 2018 की दो दुर्घटनाओं के हवाले से बेहद अफसोस के साथ बताया है कि बिहार में गरीब बच्चों की जान की कीमत बीते 5 सालों में दोगुनी हो गई है। किंतु फिर भी हमारा संवेदनहीन प्रशासन बेजान पत्थरों की तरह खामोश है।

प्रस्तुत अंक में कविताएं, गज़़लों पर हावी हैं। विजय पर्व (प्रभा मुजुमदार) खुशबू (देवेन्द्र आर्य), तिलचट्टे (निर्मल गुप्त) और ताले (राजेन्द्र उपाध्याय) इस अंक की प्रभावी कविताएं हैं। चंद्रसेन विराट के मुक्तक भी प्रशंसनीय हैं। साक्षात्कार के तहत डा.गंगाप्रसाद विमल से भूपेन्द्र हरदेनिया की बातचीत भी सहज, सुबोध एवं विचारोत्तेजक है।

प्रो. भगवानदास जैन, अहमदाबाद

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जनवरी 18 का मुखपृष्ठ आकर्षक है। मक्सिम गोर्की : व्यक्ति और लेखक, अपनी जगह, त्यौहार, चकमक क्लब पठनीय है। कविताएं सुंदर हैं। पत्रिका के आलेख पठनीय हैं। खासकर शून्य होती संवेदनाओं के तमस में मूल्यों के रोशनदान।

वी. एस.शांताबाई, बेंगलुरू

 

मई अंक की प्रस्तावना, आश्रमों में मासूमों का शिकार तथा अन्य सामग्री उत्तम है, परंतु देखा जाए तो मधुरेश जी का आलेख अंक की जान है। इतना श्रम, इतनी याददाश्त को बार-बार नमन।

हरदर्शन सहगल, बीकानेर

 

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फरवरी अंक में आपने युद्धरत आम आदमी की संपादक रमणिका जी के ओडिय़ा विशेषांक की चर्चा कर यादों के कई झरोखे खोल दिए। आपके इस कथन से सहमत हूं कि पहले हिंदी की लोकप्रिय पत्रिकाएं विभिन्न भारतीय भाषाओं की रचनाओं को रूपातंरित कर प्रकाशित करती थींऔर पारिवारिक सदस्य जिन्हें मनोयोग से पढ़ते-सराहते थे। मुझे सारिका दिसंबर 1971 का डोगरी कहानी विशेषांक याद आता है। साथ ही उन्नयन का पंजाबी कविता विशेषांक भी। युद्धरत आम आदमी का ओडिया भाषा की स्त्री कथाकारों पर विशेषांक भी काफी चर्चित और सराहनीय रहा है। इसी संदर्भ में कहना चाहूंगा लंबे अर्से से उपेक्षित रहने से कोई भाषा मर जाती है। लेकिन ओडिय़ा भाषा तमाम उपेक्षाओं के बावजूद न केवल आज जीवंत है, वरन नई संभावनाओं, अपेक्षाओं और उपलब्धियों के साथ अधिक समृद्ध होती जा रही है। तपती रेत पर हरसिंगार की कविताएं (आप द्वारा उल्लिखत) इसका बेहतर साक्ष्य होगा। आभा दुबे की कविताएं नएपन के साथ नारी मन की बारीक शिकन की पहचान कराती हैं। सुषमा मुनीन्द्र की कहानी उम्दा है। कहानी का अंत एक सुलगन छोड़ जाता है। अनिल गंगल द्वारा अनूदित चीनी कहानी एक याद रह जाने वाली कहानी है। अनुवाद बेहतर है और पाठक को अंत तक बांधे रहता है। भीष्म  साहनी पर विजय गुप्त का संस्मरण प्रलेसं के अधिवेशनों में भीष्म जी की सहज शिरकत और आम रचनाकारों से मिल बैठ कर उनका निर्देशन और खैर-खबर, सवाल-जवाब को आत्मीयता से व्यवहार करते हुए देना, बार-बार स्मरण आता है। विजय गुप्त के संस्मरण ने वह सारा परिदृश्य जगा दिया। यह अंक को कीमती और संग्रहणीय बनाता है। निक्की कुमारी का शोध आलेख-मात्र देह नहींहै औरत, परिश्रम से लिखा गया है, अपेक्षा है आगे भी अक्षरपर्व इसी तरह के शोधपरक लेख प्रकाशित करता रहेगा। आशुतोष तिवारी, गुणसागर सत्यार्थी, प्रभाकर चौबे के महत्वपूर्ण लेख हैं। सर्वमित्रा सुरजन ने गांधी की प्रासंगिकता को संक्षेप में रेखांकित किया है। दुख इस बात का है कि भारत में कतिपय छद्म देशभक्त नहींचाहते कि आम लोगों तक गांधी की विचारधारा और व्यक्तित्व की विराटता पहुंचे। गांधी और माक्र्स आज भारत के लिए बहुत जरूरी हैं- खासकर इस पूंजीवादी सर्वग्रासी मार्चपास्ट और राष्ट्रवाद के कट्टर उद्घोष के समय। इस बार का मुखपृष्ठ-टेसू से लदा शाखविहीन दरख्त फागुनी बहार में हमारी उत्सवधर्मिता और सामूहिकता के निरंतर कटते जाने, क्षरण होते जाने की टीस लिए हुए लगा। फिर भी शानदार। छायाकार को आदाब।

गफूर तायर, दमोह

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सभी शास्त्र, सभी धर्म, सभी गुरू, सभी प्रबुद्ध एक मत है कि हमारा जीवन एक खुली पुस्तक होना चाहिये। पारदर्शिता अनिवार्य है। मैं लेखिका सर्वमित्रा सुरजन के अप्रैल अंक के उपसंहार - ''क्या अपने ही ठगेंगें हमको से पूर्णतया सहमत नहीं हूं कि कोई हमारी गोपनीयता का हनन करे।

फेसबुक या किसी ओर चैनल पर निजी प्रथम जानकारियां स्वयं दी जाती हैं। आप एक सार्वजनिक मंच पर स्वयं अपनी इच्छा से आते हंै। यदि लोकप्रियता अर्जित करनी है, अपने सभी मित्रो के साथ सुगम संबंध बनाये रखना है तो जीवन को पारदर्शक अनिवार्य रूप से रखना ही पड़ेगा। हम चाहें कि तलाब में कूदे भी और गीले भी ना हो, यह संभव न हो सकेगा। हमारे भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्री चरणसिंह ने लाल किले के प्राचीर से कहा था, ''यदि आप सार्वजनिक जीवन जी रहे हैं तो आप को दोहरा चाल चलन बन्द करना होगा।'' यदि आप कमल है तो कीचड़ से नहीं डरेंगे। लोग बात करते हैं गैरों की हमने अपने आजमाये हैं। लोग बचाते है कांटो से दामन, हमने फूलोंसे जख्म खाये है। हमें हर परम्परा को पूर्णतया स्वीकार करना होगा। यदि विज्ञान हमें भयानक अस्त्र शस्त्र दे रहा है वहां पर वही विज्ञान हमें चिकित्सा प्रणाली में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है। यदि महायुद्धों से दो वर्ष औसत आयु कम हो रही है तो चिकित्सा द्वारा औसत आयु 1927 की 30 वर्ष से अब बढ़कर 62 वर्ष हो गई।

लेख से जो बहस छिड़ी है मैं उसका स्वागत करता हूॅ।

सतीश कुमार बत्रा

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मार्च की प्रस्तावना में आपने एक रोचक प्रसंग की चर्चा की है। जिसमें फेसबुक पर जीवनलाल वर्मा विद्रोही की कविता को नागार्जुन की कविता कहा गया और विवाद हुआ। ऐसा पहली बार नहींयदा-कदा होता रहता है। अपने आप तो किसी बहाने प्रस्तुत करने तथा लाइक, शेयर, कमेंट की चाह में ऐसे प्रसंग घटित होते रहते हैं। कभी किसी जानकार की जागरूकता से सच्चाई सामने आ जाती है और कभी वह भी नहीं।

उपसंहार में आज की अराजक राजनीति का रेखांकन है। मुआवजे की घोषणा तो तुरंत हो जाती है, पर मिलता जल्दी नहींहै उसके लिए सैकड़ों पापड़ बेलने पड़ते हैं।

सेराज खान बातिश की गज़़लें अपने समय का बयान हैं और अंक का हासिल भी।

शिवकुमार अर्चन, भोपाल