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Friday 16 Nov 2018

कुछ भी लिखिए छपेगा...

दोनों रात पूरा परिवार छत पर सोया। बारह बजे रात तक वे

पालम आनेजाने वाले प्रत्येक प्लेन के बारे में बताते रहे कि

यह इस वक्त कहां से आ रहा है या कहां जाएगा।

तदभव  10. पृ0 152

क्या आप जानते हैं या अनुमान कर सकते हैं कि यह किसने किसके विषय में लिखा है। इतना तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में यह कहा गया है वह निश्चय ही हवाई जहाजों (प्लेन) का विशेषज्ञ होगा या फिर उसकी सारी जिन्दगी हवाई जहाज में यात्रा करते या हवाई जहाज चलाते बीती होगी। इसके बावजूद मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भले ही किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में उपरोक्त बातें सही हों, फिर भी वह या हवाई जहाजों के सम्बन्ध में अच्छी से अच्छी जानकारी रखनेवाला व्यक्ति भी रात में पालम या दुनिया के किसी भी हवाई अड्डे पर  आने-जाने वाले विमानों के सम्बन्ध में नहीं बतला सकता है कि वह कहां जा रहा है या कहां से आ रहा है। यदि किसी व्यक्ति ने पालम आने-जाने वाले हवाई जहाजों का टाइम टेबिल (और ऐसे टाइम टेबिल भी कोई एक नहीं वरन एक दर्जन से अधिक ही होंगे क्योंकि प्रत्येक एअरलाइन का अलग टाइम टेबिल होता है और सभी टाइम टेबिल साल में दो बार बदलते हैं) रट भी लिया हो तो भी इस बात में सन्देह है कि वह अपने घर की छत पर रात में बैठे पालम आने-जाने वाले हवाई जहाजों के विषय में इस प्रकार की बातें बतला सके भले ही उसकी स्मरण शक्ति या दृष्टि कितनी ही तीव्र क्यों न हो।

तब फिर क्या कारण है कि काशीनाथ सिंह अपने अग्रज नामवर सिंह के विषय में ऐसी बेतुकी बात लिख सके और 'तद्भवÓ सम्पादक ने उसे ब्रह्मवाक्य मानकर ज्यों का त्यों छाप दिया। नामवर सिंह ने भी इसे जरूर पढ़ा होगा फिर भी इसका प्रतिवाद नहीं किया। इससे क्या यह समझा जाए कि उनके हवाई जहाजों के ज्ञान के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा गया है, वह सही है। मैं नहीं जानता कि नामवर सिंह ने कितनी बार कितनी एअरलाइनों के विमान से यात्रा की है. फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि वे स्वयं इस बात का दावा नहीं कर सकते कि काशीनाथ सिंह ने उनके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह सच है। अपने 86 वर्ष के जीवन में मैंने ज्यादा नहीं तो कम से कम 100 बार तो अवश्य ही विविध एअरलाइनों के लगभग सभी प्रकार के विमानों से यात्रा की होगी फिर भी मैं जेट, बोइंग और 707 विमानों में अन्तर नहीं बतला सकता और न ही विमान पर एअरलाइन का नाम पढ़े बिना बतला सकता हूं  कि कोई विमान किस एअरलाइन का है। और यह भी मानी हुई बात है कि शहरी क्षेत्र में भी विमान इतनी ऊंचाई पर उड़ता है कि रात के अंधेरे में तो क्या, दिन के उजाले में भी किसी उड़ते हुए विमान पर एअरलाइन का नाम सामान्यत: नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि सभी कंपनियों के हवाई जहाजोंं पर एअरलाइन का नाम जहाज के नीचे नहीं वरन जहाज के ऊपर दोनों ओर लिखा रहता है जो रात के अंधेरे में तो क्या दिन के उजाले में भी नीचे जमीन पर रहने वाले पढ़ नहीं सकते। तब फिर काशीनाथ सिंह ने नामवर सिंह के सम्बन्ध में ऐसा क्यों औैर कैसे लिख दिया, यह शायद सदा रहस्य ही बना रहेगा।

'माध्यम' के सहस्त्राब्दि प्रवेशांक में छपे यश मालवीय के लेख में कहा गया था कि उमाकान्त मालवीय का 'सुबह रक्त पलाश की' इसी कालावधि में  (साठ के दशक में) साहित्य के पाठकों के बीच चर्चित हुआ। पर जान पड़ता है कि लेखक यह भूल गया क्योंकि फिर उसके तुरन्त बाद आगे के पैराग्राफ मे लिखा गया इसी कठिन काल में (आपात स्थिति के दिन) प्रकाशित हुआ उमाकान्त मालवीय का नवगीत संग्रह 'सुबह रक्तपलाश की' लगभग अनदेखा रह गया है।

यहां प्रश्न होता है कि यदि कोई पुस्तक पहले चर्चित हो चुकी है तो क्या उसे बाद में 'लगभग अनदेखा' कहा जा सकता है। क्या 'साठ का दशक' और 'आपात काल' दोनों को एक ही समय माना जा सकता है। पर इसके लिए लेखक को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि प्राय: ही देखा गया है कि अच्छे प्रतिष्ठित लेखक  भी कभी-कभी झोंक मे इस प्रकार की विसंगत बातें लिख जाते हैं। लेकिन सोचने की बात यह है कि सम्पादकीय प्रक्रिया में भी लेखक द्वारा की गयी यह असावधानी या विसंगति 'लगभग' ही नहीं पूर्णत अनदेखी कैसे रह गयी।

इससे क्या पता चलता है ? यही न कि अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक (प्रतिष्ठित पत्रिकाएं भी इसका अपवाद नहीं हैं) सामान्यत: गुणवत्ता के आधार पर नहीं वरन लेखक के नाम के साथ ही रचनाओं के विषय के आधार पर और कभी-कभी पूरी रचना पढ़े बिना ही, रचना प्रकाशित करते हैं अन्यथा काशीनाथ सिंह के लेख में से यह अंश निश्चय ही निकाल दिया जाता और यश मालवीय के लेख में हुई विसंगति को ठीक कर दिया जाता।  

पर इसके लिए केवल 'तद्भव' और 'माध्यम' को ही क्यों दोष दिया जाए। रवीन्द्र कालिया के सम्पादन में निकले 'नया ज्ञानोदय' के प्रथम दो अंकों को देखें। जिस जोर-शोर से 'नया ज्ञानोदय' के अक्टूबर 2006 अंक में आगामी अंकों में 'नये कलेवर में विविध विषयों से सम्बन्धित अधुनातन जानकारी' देने का दावा किया गया था वह इन दो अंकों में दी गयी रचनाओं को देख कर पता चलता है कि झूठा था। नवम्बर 2006 अंक में अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश के साथ हुई गुफ्तगू में  'रहस्योद्घाटन' किया है  'उन्होंने आज तक कोई पुस्तक भी नहीं लिखी'  यद्यपि गुफ्तगू समाप्त होते-होते उन्हें याद आ गया कि '1970 में मेरी आलोचना की पुस्तक आई थी'। पर नहीं, यह तो आधी-अधूरी सूचना ही है। अशोक वाजपेयी को यह तो पता ही होगा कि  मार्च 2006 में गुवाहाटी में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 58वें अधिवेशन में अध्यक्ष पद से उन्होंने जो भाषण दिया था. वह अलग से बुकलेट के रूप में भी छापा गया था और सम्मेलन में उपस्थित लोगों को रेवडिय़ों की भांति वितरित किये जाने के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भी भेजा गया था। पर शायद उन्हें याद नहीं रहा कि इस बुकलेट में पीछे के कवर पर उनके परिचय में बतलाया गया है कि इस समय तक 'उनके बारह कविताा संग्रह और सात आलोचना पुस्तकें प्रकाशित हैं'। तो क्या ये सारी पुस्तकें उन्होंने छ: माह के अन्दर लिख डालीं  या किसी अन्य से लिखाकर अपने नाम से छपा लीं, या क्या इन पुस्तकों के लेखक वे नहीं वरन उन्हीं का नामधारी कोई दूसरा व्यक्ति है? कम-से-कम सम्पादक को तो इस पर विचार करना था।

अमरकान्त जी से एक मुलाकात के दौरान उन्होंने बतलाया था कि नवम्बर 2006 के 'नया ज्ञानोदय' में उनका जो साक्षात्कार छपा है, वह पूर्णत सही नहीं है। उनसे मैंने पूछा था कि इस साक्षात्कार में उन्होंने शिवदानसिंह चौहान, हजारीप्रसाद द्विवेदी, उपेन्द्रनाथ 'अश्क', मोहन राकेश और मुक्तिबोध के साथ अशोक वाजपेयी का नाम भी 'दिग्गजोंÓ में कैसे जोड़ दिया क्योंकि उस समय तो अशोक वाजपेयी मुश्किल से 16-17 या अधिक से अधिक 18 वर्ष के रहे होंगे और हाई स्कूल या इण्टरमीडियेट में पढ़ रहे होंगे। क्या उस समय इतनी कम अवस्था में वे इस प्रकार और इतना अधिक लिखने लगे थे या लिख चुके थे कि उन्हें  साहित्य जगत में 'दिग्गज' माना जाने लगा। इस पर अमरकान्त जी ने बतलाया कि उन्होंने अपने साक्षात्कार में उस सम्मेलन में अशोक वाजपेयी के केवल शामिल होने की बात कही थी। उन्हें दिग्गज नहीं कहा था।

ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि साक्षात्कार लेनेवाले प्रियम अंकित ने यदि भूलवश अशोक वाजपेयी को दिग्गजों की पांत में बिठाल दिया तो सम्पादकीय प्रक्रिया में तो इसे ठीक किया जा सकता था या इस बात पर प्रश्न चिह्न लगाया जा सकता था। पर नहीं बात इतनी सीधी सी नहीं है। यह साक्षात्कार प्रेस में जाने के पूर्व और शायद बाद में भी सम्पादकों ने संभवत: पढ़ा ही नहीं और केवल अमरकान्त जी का नाम देखकर उसे स्वीकृत कर ज्यों-का-त्यों छपने भेज दिया।

मेरी पत्नी डॉ0 उर्मिला जैन पिछले करीब 25-30 वर्षों से सामाजिक कार्यों, विशेषकर महिलाओं की समस्याओं से सम्बन्धित कार्यों, में सक्रिय हैं। इस सिलसिले में महिलाओं की समस्याओं से सम्बन्धित कोई भी लेख या पुस्तक यदि उनके ध्यान में आती है तो वे उसे किसी-न-किसी प्रकार प्राप्त कर अवश्य पढ़ती हैं। 'नया ज्ञानेदय' के दिसम्बर 2006 अंक में उन्होंने 'स्त्री विमर्श' सम्बन्धी एक लेख में पढ़ा कि '1946 में नारी की दशा पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक आयोग गठित किया'। संयोग से वे कुछ माह पहले जब लंदन में थीं तो वहां आयोजित महिलाओं की समस्याओं से सम्बन्धित एक सम्मेलन में भाग लेने का अवसर उन्हें मिला था। उन्होंने बतलाया कि उस सम्मेलन में संरा संघ द्वारा महिलाओं के सम्बन्ध में अब तक किये गये कार्यों पर भी चर्चा हुई थी और उन्हें अच्छी तरह याद है कि उस सम्मेलन में यह मुद्दा भी उठा था कि संरा संघ ने 1951 के पहले महिलाओं के सम्बन्ध में कुछ भी उल्लेखनीय कार्य नहीं किया।

'नया ज्ञानोदय' के दिसम्बर 2006 अंक में ही उस वर्ष के नोबेल पुरस्कार प्राप्त तुर्की लेखक ओरहान पामुक सम्बन्धी एक लेख में इस्ताम्बुल को तुर्की की राजधानी और  मिस्र को एशियाई देश बतलाने तथा पामुक को मिस्र के नजीब महफूज के बाद 'दूसरा एशियाई' नोबेल पुरस्कृत बतलाने में जो घपला हुआ, वह पाठकों को पता ही होगा। उसे यहां फिर लिखने की आवश्यकता नहीं है। पर 'नया ज्ञानोदय' के दिसम्बर 2007 के अंक में मिस्र के नोबेल पुरस्कृत उपन्यासकार को 'ईसाई ' बतलाना और नोबेल पुरस्कृत इजरायली यहूदी लेखक एग्नान को भी 'मुस्लिम जगत की रचनाशीलता' में शामिल कर उन्हें मुसलमान बनाया जाना देख कर कहना पड़ता है कि  'तद्भव' सम्पादक के समान 'नया ज्ञानोदय' के सम्पादक ने भी इन लेखों को संभवत पढ़ा ही न हो, अन्यथा इस प्रकार की भूलें नहीं हुई होती। 

माना कि सम्पादक 'सर्वज्ञ' नहीं होता, हो भी नहीं सकता और न सभी विषयों की जानकारी ही रख सकता है। पर वह इतना तो कर ही सकता है कि यदि किसी लेख में लिखी किसी बात के सम्बन्ध में उसे शंका हो या जिस विषय का उसे ज्ञान नहीं है, उस विषय का कोई लेख छापने से पहले उसे उस विषय के जानकार किसी व्यक्ति को दिखला कर उस पर उसकी राय ले ले। ऐसा करने में किसी प्रकार की हेठी नहीं है। पर जब उस विषय का जानकार व्यक्ति स्वयं इस प्रकार की बातें लिखे तो सम्पादक 'बेचारा' क्या कर सकता है।

'सण्डे मेल' के सम्पादक कन्हैयालाल नन्दन अपने अखबार में प्रति सप्ताह 'जरिया नजरिया' शीर्षक स्तंभ लिखते थे। अक्टूबर 1993 में वे विदेश में थे जब अमेरिकी लेखिका टोनी मोरीसन को नोबेल साहित्य पुरस्कार मिलने की सूचना उन्हें मिली और उन्होंने तुरन्त अपने स्तंभ में लिखा जैसे ही टोनी को नोबेल मिलने की घोषणा हुई, अकेले जर्मनी में कहते हैं - टोनी मोरीसन के उपन्यास 'जाज' की 3 लाख प्रतियां बिक गईं। यानी एक सप्ताह के अंदर इतनी प्रतियां बिक गयीं। कुछ इसी प्रकार की बात  बुकर पुरस्कार विजेता किरण देसाई के पुरस्कृत उपन्यास 'द इन्हेरिटेंस आफ लास' के सम्बन्ध में 'नया ज्ञानोदय' के सम्पादकीय में भी लिखी गयी थीं,  इस उपन्यास ने प्रकाशित होते ही कीर्तिमान स्थापित करने आरम्भ कर दिये थे। पर कैसे कीर्तिमान ? बुकर मिलने के पहले इस उपन्यास को क्या कोई अन्य पुरस्कार मिला था? क्या इस पुस्तक की बिक्री ने कोई रिकार्ड कायम किया था? क्या अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ था या क्या इसके फिल्मीकरण के अधिकार बेचे जा चुके थे या ऐसी ही किसी अन्य बात के सम्बन्ध में सम्पादकीय में कुछ बतलाया गया था। नहीं, सम्पादकीय में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया था।

लगभग उसी समय विदेश से लौटे एक साहित्यप्रेमी मित्र से दिल्ली में मिलना हुआ तो उन्होंने बतलाया कि बुकर पुरस्कार मिलने के पहले इस उपन्यास की 8-10 हजार प्रतियां भी नहीं बिकी थीं और लंदन के दैनिक समाचारपत्र में छपे एक साक्षात्कार में लेखिका ने स्वीकार किया था कि बुकर पुरस्कार की शार्ट लिस्ट में शामिल किये जाने के पूर्व तक वह एक प्रकार से अज्ञातवास में  ही थीं। अत: आश्चर्य होता है कि किरण देसाई के इस उपन्यास के सम्बन्ध में 'नया ज्ञानोदयÓ में इस प्रकार की बात कैसे लिख दी गयी। निश्चय ही सम्पादक को यह सूचना किसी सूत्र से मिली होगी। पर किस सूत्र से? यदि यह भी बतला दिया जाता तो इस सम्बन्ध में पाठकों को किसी प्रकार का भ्रम नहीं रहता।

किसी अन्य लेखक ने ऐसी कोई बात या इस प्रकार की बातें  लिखी होतीं तब तो माना जा सकता था कि सम्पादक ने अज्ञानतावश या लेखक के लिखे पर विश्वास कर यह बात छाप दी और इसके लिए सम्पाादक को दोष नहीं दिया जा सकता। पर जब स्वयं सम्पादक ऐसी कोई बात लिखकर अपने ही अखबार में छापता है तो यह माना जा सकता है कि उसने अपना दायित्व समझते हुए यह बात लिखी है और जो कुछ लिखा गया है सोच-समझकर सच ही लिखा है। पर नहीं, बात केवल इतनी ही नहीं है। नोबेल की सूचना मिलते ही एक सप्ताह के अन्दर टोनी मोरीसन के उपन्यास की  तीन लाख प्रतियां जर्मनी में बिकने की बात या किरण देसाई के उपन्यास के प्रकाशित होते ही उसके द्वारा कीर्तिमान स्थापित करने की बात, ये दोनों ही बातें पूर्णत निराधार एवं कपोलकल्पित हंै क्योंकि तथ्य यह है कि 'सण्डे मेल' में वह लेख लिखे जाने के बाद आज तक यानी 20वर्षों से अधिक समय में भी अकेले जर्मनी तो क्या दुनिया भर में किसी भी भाषा में टोनी मोरीसन के इस उपन्यास की तीन लाख प्रतियां नहीं बिकी हैं और किरन देसाई के उपन्यास के सम्बन्ध में सही स्थिति तो पहले ही बतलाई जा चुकी है। ।

चलते-चलते  एक और रोचक समाचार। 29 अक्तूबर 2006 के 'जनसत्ता' से पता चलता है कि अशोक वाजपेयी अक्टूबर  के दूसरे सप्ताह में यानी 9 अक्टूबर 2006 को इस्ताम्बुल पहुंचे। उसके दूसरे ही दिन तुर्की लेखक ओरहान पामुक को नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। अशोक वाजपेयी के अनुसार उनके इस्ताम्बुल जाने के पीछे एक अघोषित कारण यह था कि 'तुर्की कथाकार ओरहान पामुक के पक्ष में हम कुछ लेखक आवाज उठाएंगे और मं अलग से उन्हें अगला निर्मल वर्मा स्मृति व्याख्यान देने निजी रूप से आमंत्रित करूंगा'। इसके बाद अभी तक उन्होंने यह नहीं बतलाया (लिखा) कि वे और उनके 'तथाकथित' साथियों ने तुर्की में पामुक के पक्ष में आवाज उठाई या नहीं या वे स्वयं पामुक से मिले या नहीं और यदि मिले भी तो क्या उन्हें निर्मल वर्मा स्मृति व्याख्यान देने के लिए भारत आने के लिए आमंत्रित किया।

आश्चर्य तो मुझे यह जानकर होता है कि 'दुनिया भर के देशों की सैर किया हुआ' कोई व्यक्ति पामुक जैसे अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखक के पक्ष में आवाज उठाने और उसे भारत आने का निमन्त्रण देने एकाएक तुर्की कैसे पहुंच गया। क्या उन्होंने तुर्की के वीसा के लिए आवेदन करते समय अपने आवेदन पत्र में तुर्की जाने का यह उद्देश्य घोषित किया था।

अशोक वाजपेयी दिल्ली में रहते हैं। वे यदि दिल्ली में किसी से मिलने जाते हैं या मिलना चाहते हैं तो निश्चित है कि जाने के पहले वे (या कोई भी व्यक्ति) यह पता अवश्य लगा लेंगे कि जिससे मिलना है वह वहां है या नहीं। यही बात किसी दूसरे शहर में किसी से मिलने जाने के विषय में तो और भी आवश्यक कही जा सकती है। और यदि मामला किसी दूसरे देश का हो तब तो इसकी अनिवार्यता से किसी भी प्रकार इनकार नहीं किया जा सकता है। यदि मेरा ऐसा लिखना ठीक है तब फिर यह भी माना जा सकता है कि अशोक वाजपेयी ने तुर्की के लिए रवाना होने के पूर्व पामुक या उनके किसी एजेण्ट से सम्पर्क भी किया होगा या पता लगा लिया होगा कि पामुक इस्तांबुल में हैं औैर उनसे मिल सकेंगे।

पर नहीं. यहां भी बात इतनी सीधी नहीं है। अशोक वाजपेयी ने न तो पामुक या उनके किसी एजेण्ट से सम्पर्क किया ओैर न तुर्की जाने का उनका मकसद पामुक के पक्ष में आवाज उठाना या पामुक को भारत आने के लिए आमंत्रित करना था। न ही उन्होंने वहां पामुक के पक्ष में आवाज उठाई या पामुक को भारत आने का निमंत्रण दिया। वस्तुत: उन्होंने ऐसा लिख कर 'जनसत्ता' के पाठकों को भ्रमित करने और उन पर रौब झाडऩे की कोशिश कर बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की

 क्योंकि तथ्य यह है कि नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा के समय ही नहीं बल्कि उसके बहुत पहले से पामुक अमेरिका में थे जहां वे न्यू यार्क विश्वविद्यालय में फेलो हैं और नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा के  सात सप्ताह बाद पहली बार  यानी 1 दिसम्बर 2006 को वे अपने देश तुर्की लौटे।