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Wednesday 13 Nov 2019

मुर्दा ख़ामोशियों के बीच जि़ंदा आवाज़ों की कहानियां

विजय गुप्त

संपादक: साम्य, ब्रह्म रोड, अम्बिकापुर, जिला: सरगुजा (छत्तीसगढ़),

फिराक़ गोरखपुरी साहब का एक शेर है:

मौत का इलाज है शायद

जि़न्दगी का कोई इलाज नहीं

इसी लाइलाज जि़न्दगी के कलमकार हैं नेसार नाज़। उनकी कहानियों में कांटों से भरे फूल हैं, आंसुओं से भीगी हंसी है, दु:ख की दीवारों से घिरा हुआ सुख है, मुर्दा ख़ामोशियों के बीच जि़ंदा आवाज़ों के टुकड़े हैं, धूल और ग़्ाुबार भरे रास्तों में खोई हुई मंजि़लें हैं, और मौत के ख़ौफनाक अंधेरे में हांफती हुई जि़न्दगी है। उनके कथा संग्रह का उन्वान भी 'हांफता हुआ शोर’ है।

'हांफ़ता हुआ शोर’ की कहानियां जि़न्दगी में कुछ इस तरह से धंसी हुई हैं जैसे पेड़ की जड़ें। जड़ों की तरह ही कहानियां बेलिबास हैं। कोई रंग-रोगन और बनाव-सिंगार नहीं। अपनी सादगी में कलात्मक और हृदयस्पर्शी। यह सादगी नेसार ने अपनी जि़न्दगी से हासिल की है। कहानी गढऩे और कहने की कला भी अपने लोगों से सीखी है। उन्होंने आत्मकथ्य में लिखा है कि, '' शहर की भीड़-भाड़ से अलग जंगलों में आदिवासियों के बीच मुझे सुकून मिलता रहा। पेड़ों की भीड़, चलती हवाएं, उन हवाओं की ख़ुशबू में जीने की तलाश में निकला और उनके पसीने की महक मुझे हमेशा उनकी तरफ खींचती रही और मेरे फने-अफसानानिगरी को रोज़ाना नई शक्ल देती रही।‘’ उन्हें अपनी कहानियों के पात्र जनता के बीच से मिले। एक बार नेसार ने मुझसे बातचीत के दौरान कहा था कि, ''लोग जैसे महुआ बीनते हैं वैसे मैं कहानियां बीनता हूं।‘’

बीनने का यह हुनर ही उन्हें छूने, धरती और लोगों से जुडऩे का जादू सिखाता है। इस जादू से ही वह अपनी कहानियों का संसार रचते हैं। उनके पात्र हर हाल में अपने समय और समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। गांव और कस्बे की पूरी पृष्ठभूमि सजीवता के साथ उपस्थित होती है। पात्रों की स्थिति और नियति समाज के घात-प्रतिघात से ही परिचालित और अपने अंजाम तक पहुंचती है। नेसार पूरी विश्वसनीयता के साथ बाहर और भीतर की पोशीदा परतों को उजागर करते हैं। वह कभी भी समाज से विच्छिन्न होकर पात्रों की अंतरआत्मा को नहीं पकड़ते बल्कि बाहर और भीतर के सच को, उनके अंतर्विरोधों के साथ पाठकों के सामने रख देते हैं। ज़मीन से जुड़े हुए उनके पात्र अपने सामाजिक-राजनीतिक परिवेश के चक्रव्यूह में फंसकर टूटते, बिखरते और अकेले होते चले जाते हैं। यह अकेलापन और बेजारी उनके आपसी रिश्तों को ही तार-तार नहीं करता बल्कि उनकी आत्मा को भी लहूलुहान और क्षत-विक्षत कर देता है। घृणा, क्रोध, गरीबी, सामाजिक उपेक्षा और उनसे उपजी अनैतिकता अपने साथ सब कुछ बहा ले जाती है। 'असमाप्तÓ कहानी में पाठक जी के घर से रामा शॉल उठा ले लाता है। आगे का हाल-अहवाल ये संवाद बयां कर देते हैं:

''बोलता काहे नई है बे?’’ वह चीख़ा और क्रोध में लाल, भटिये से एक जलती लुकाठी उठाकर उसे बुरी तरह पीटने लगा। वह ग़्ाुस्से में जहां मिल रहा था - मुसलसल मारे जा रहा था।

रामा की पिटाई देखकर सभी सकते में आ गए थे। सन्नाटा छा गया था। रामा की अम्मां में जाने कहां से इतनी शक्ति आ गई थी कि वह उठ बैठी - ''जानवर सरीखे न मार रे...मार डाया रे मेरे बच्चन को दुष्ट....’’

''चुप्प साली... सब तेरे कारन होये रहा है?’’ वह चीख़ा -''लुट गए इनके खातिन... दर-दर भीखन की नऊबत आई अऊर तैं मोही दुष्ट कहती है रे... नीच हूं? मर जा, जिए के अधिकार तोही नई है। भूत चढ़ा है मोरे ऊपर... स्साले मार डाऊं जान...’’

अंतत: भूख, गरीबी और बीमारी से रामा की अम्मां मर जाती है। और कहानी की आखिऱी पंक्ति आपके सीने में तीर की तरह गड़ी रह जाती है, ''एक टुकड़े जि़न्दगी के कई टुकड़े हो गए थे।‘’

जि़न्दगी आखिऱ क्यों टुकड़े-टुकड़े हो जाती है? जीने की मामूली आशाएं भी क्यों पूरी नहीं होती और क्यों सपने का कोई मोल नहीं होता? जि़न्दगी रद्दी की टोकरी में क्यों फटे हुए कागज़ों की तरह समा जाती है? इन प्रश्नों के कारण और जवाब भी इन्हीं कहानियों में मिलते हैं। 'असमाप्त’ कहानी का दद्दा चाय की दुकान में बु़िद्धजीवियों की हस्बमामूल बहसें सुनता हुआ अपनी ही सोच में ही व्यंग्य करता है कि, ''अभी तो बस देस को चोर नेता खाय जा रहे हैं... जइसे इन्हींन को देस का जादा फिकिर है। रोजाना ओही बात... उबते भी नई हैं। गरीबन-हरीजन के साथ अनियाय होये जा रहा है तो कुछु बोलो सरकार से। गांड़ में दम हो तो कोई परबंध करा दो। चिल्लाने से कुकुर अस कछु थोरोन होत है। गरीब मजदूरन से हमदरदी है तो गरीब बनो पहिले। महल में सोए के गरीबन खातिन रोते हैं... सब दिखावा, इनकरे जईसन साहेब-सुहबान से तो भरसटाचार फईला है। अईसी हमदरदी का काम की? चार पईसा चाह के पटाये के दम नाहीं अऊर देस की पीरा देख य दुबर होये जा रहे हैं ससुरे...।‘’ दद्दा निष्क्रिय और बौद्धिक जुगाली करने वालों की पोल खोल कर रख देते हैं। मानो कह रहे हों कि, 'जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई?

दूसरों की पीड़ा को जानने-समझने और परहित को मनुष्य धर्म मानने के लिए जीवन और विचार के बीच जऱा भी फांक नहीं होनी चाहिए। जीवन से अलग-थलग होकर विचार बुझे हुए दिए की तरह होता है, वह अंधेरे को ही गाढ़ा और डरावना बनाता है। प्रकाश और ताप के लिए विचारों की आग ज़रूरी है, और विचारों की आग गतिशील जीवन से ही जागती और धधकती है। हर प्रकार की परतंत्रताओं और दु:खों से मुक्ति पाने के लिए जनता और जन संघर्ष से जुडऩा ज़रूरी है। महान् कवि गेटे ने भी कहा था कि, 'कनेक्ट आलवेज़ कनेक्ट।‘ जोड़ो, हमेशा जोड़ते रहो। दद्दा आमफहम ज़बान में जनता से बौद्धिक वर्ग के अलगाव और दुराव की धज्जियां उड़ा देते हैं।       इसी दुराव और जनता से अलगाव का फ़ायदा रूढि़वादी और अतीतवादी धर्म उठाता है; और धर्म को हथियार बनाकर राजनीति भी अपना चूल्हा जलाती है। जनता की दाल गले न गले लेकिन धर्म और राजनीति की रोटी सिंकती रहे। 'मरे हुए लोग’ कहानी का एक पात्र बीरन कहता है कि, ''न जी - घरभरन, हमरन घर कर डऊकी परानी दिन भेर जंगल-पहार मन में जी जान ला खपात रथें, अऊर का लानथें उहां ले? ऐही, लकरी झूरी, अंवरा, सरई, पान, मुखारी! अतना जी जराए के अंवरा ला उबाल के रुपिया किलो बेच-बिखन के नोन-माखुर कर जुगारा अऊर देख अतियाचार की सरकार भूखल-खखाल अपन आदमी मन ला छोड़े रथे।‘’  सरकार के आदमी ही सेठ, साहूकारों और व्यापारियों से सांठ-गांठ कर जंगल के जंगल काटते हैं और इस अपराध की सजा जंगल के सच्चे रखवालों को देते हैं। गंवइहों और आदिवासियों को बराबर लूटते और सताते हैं। जेलें ऐसे असंख्य निरपराध और निर्दोष लोगों से भरी हुई हैं। करे कौन और भरे कौन?

       जंगल दारोगा बीरन को डरा-धमका कर लूटता है। दारू, अंडा और रुपया खाता है और हड़का कर चला जाता है। बीरन अपने दोस्त घरभरन से ग़्ाुस्से में कहता है कि, ''हमरे बोट देहल सरकार हवे... ओकर आदमी भी हमर होना चाही न। अइसना का कि लूटे लंगारे वाला हमरन कर छाती में कोदो दरें... हमरन से पूछा कोन सहरी जंगल कटवाथे अऊर ओमन कर संगी कोन हवें... सहर कर बडख़ा-बडख़ा आरा मिल दार मन कर रवन्ना काटो...लाइसेन बनाव...।‘’ इतने पर ही बीरन नहीं रुकता वह अत्याचारियों को सरापता भी है कि, ''देखबे हराम कर खवइया मन के लरिका-छउवा मन लंगरा, खोरा अऊर कनवा जनमहीं...।‘’ 

            नेसार नाज़ गांव-जबार के अंधेरों और कोनो-अतरों में रेंगते और डसते विषधरों की पहचान करते हैं और साफ इशारा भी करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक बेईमानियों और छल-कपट का गणित भी पाठकों के सामने रख देते हैं। कहन की ख़ूबसूरती और ख़ूबी यह है कि वह अपनी ओर से कोई टिप्पणी नहीं करते। कपट और लूट का सारा खेल कहानी के पात्र ही बयान करते हैं। बीरन अपने अनुभवों से अत्याचारियों को पहचानता है और उन पर पलटवार करने के नुस्ख़े तक भी पहुंचता है। वह अपने आप से कहता है कि, ''घरभरन ठीके गोठियाथे - ए धार सरकार कर आदमी आहीं ता घरभरन से धरवाहूं हमरे गांव वाला मन एक जुटहा होए के कहब - गोरमिन्ट ला इहां बलाओ... तबे तोला छोड़ब। नई तो हमारा ठेपा अऊर बोट फिराए दो अऊर हमारा गांव कर बाहर राज करो। अइसन कहे में का गलती हवे। ओला घेर लेयब ता गौरमिन्ट दार नेता अइसने धोती छोएर के कूदत आही - तब हमरे कहब, लगवाओ इहां हथहा हेड पंप एक नईं तो बन्दूक-गोली तो तियारे हवे।‘ बीरन ने भी अपनी हथेली को बन्दूक बनाया और ज़ोर से चिल्लाया - ''ठांय!’’  बीरन का सपना सच नहीं होता। दारोगा के आते ही घरभरन घर में ही छुप जाता है और बीरन थक-हार कर जंगल के किसी कोने में समा जाता है। नेसार कहानी के आखिऱ में नोट करते हैं कि, ''हवा ख़ामोश थी। सरई के पेड़ गमग़ीन खड़े थे। चारों तरफ़  सन्नाटा पसर गया था। महसूस हो रहा था- गांव में कुछ जिन्दगियां थीं, जो मर गई थीं। इन्हीं मरी हुई जि़न्दगियों को नोचने आसमान में गिद्धों का कुनबा चक्कर मार रहा था।‘’

            गिद्धों का मांस-भोज आज भी बदस्तूर जारी है। बीरन और घरभरन देश के हर हिस्से में मिल जाएंगे। लुटे-पिटे और इंसाफ़  की तलाश में दर-दर भटकते। इंसाफ़ कहां है? कुछ है तो सिर्फ  गुनाह दर गुनाह। गुनाहों के बयान से 'हांफता हुआ शोर’ की कहानियां रक्त से भीगी हुई हैं। सांप्रदायिक सोच और दंगों को लेकर दो कहानियां दिल दहला देती हैं। एक 'अंधेरे की गवाही’ और दूसरी 'मीरबाज़ ख़ान’।

'अंधेरे की गवाही’ में दंगाइयों के हमले से बुरी तरह घायल एक बूढ़े को बचाने की कोशिश तब नाकाम हो जाती है जब घायल बूढ़ा और बचाने वाला नौजवान दोनों गश्ती पुलिस की गोली से मारे जाते हैं। जि़न्दगी की आखिऱी दो चीख़ें जिस सन्नाटे को जनमती हैं वह पूरे वजूद को हिला कर रख देता है। ''गश्ती दल की बंदूकों से सनसनाती चिनगारियां निकलीं और दो चीख़ों ने आकाश हिला दिया। सन्नाटा कई बार चीख़ा और गाढ़ा अंधेरा गवाह हो गया। उसने देखा - तड़पते हुए दो जिस्म ... दो इन्सान और दो कौमों का लहू एक होने लगा था।‘’

            आज इक्कीसवीं सदी में भी लहू पानी की तरह बहाया जा रहा है। विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के नये ज़माने में भी दिल-दिमाग को अज्ञान के भूत-पिशाचों ने, हिंसा के प्रेतों ने घेर कर रखा है। गाय अब गाय नहीं रही। दोस्ती अब दोस्ती नहीं रही। देश अब देश नहीं रहा। शब्दार्थों ने अपने मानी बदल लिये हैं। रंगों की पहचान बदल गई है। हरा हरा नहीं रहा और भगवा भगवा नहीं रहा। इन्सान अब लिबास, भाषा-बोली और धर्म का मोहताज हो गया। ''इन्सान झंडों के रंगों से पहचाना जाने लगा था। यह अनासिर कौन थे, जिन्होंने लोगों के दिलों में आपसी मुहब्बत, अख़लाक और भाईचारे को लहूलुहान कर दिया था?’’

'मीरबाज़ ख़ान’ कहानी में भी गाय है, दोस्त है, झंडा है, मक्कारी और विश्वासघात है। मीरबाज़ तो पागल सा हो जाता है जब वह अपने बचपन के दोस्त शंकर को दंगाइयों के जुलूस में शामिल पाता है। ''शंकर तो उसके अकेलेपन का साथी हुआ था, मगर आज वह उसका अज़ीज़ दोस्त नहीं - नीचे से ऊपर तक हिंदू लग रहा था।‘’ बचपन की दोस्ती के बीच अब शक-ओ-शुबहे की एक बहुत बड़ी खाई थी। 'एक आज़ाद मुल्क के सीने में एक लकीर खींचने की कोशिश या साजि़श कामयाब हो गई।‘’

            इस साजि़श के भयानक नतीजे हिन्दुस्तान भुगत रहा है। गाय, भाषा-बोली और धर्म के नाम पर जो ख़ूंरेज़ी हो रही है वह किसी सभ्य और सेहतमंद समाज और देश के लक्षण नहीं हैं। रोग-शोक से ग्रस्त लाचार और लस्त मीरबाज़ की आंखों के सामने से उसकी जान से प्यारी गाय श्यामा और उसके बेटे जैसे बछड़े को  उसके बचपन का दोस्त शंकर अपने संगी-साथियों के साथ जबर्दस्ती ले जाता है। यह कहते हुए कि, '' गौसेवा संस्थान में यह हिफ़ाज़त से रहेगी।‘’ गाय, बछड़े और सांस से ख़ाली घर में मीरबाज़ की लाश 'बंद घड़ी की तरह’ चारपाई पर पड़ी हुई है।

       बंद घड़ी को हिन्दुस्तान में अपशकुन माना जाता है। ज्ञान, तर्क, प्रेम, विश्वास और भरोसे की घड़ी कभी बंद नहीं होनी चाहिए। 'हांफता हुआ शोर’ की कहानियां घड़ी की टिक-टिक को, पल-छिन को, दिन-रात, सूरज-चांद को, दिल की धक-धक को बचाए रखने की कहानियां हैं। ये हर तरह की हिंसा और अन्याय के खि़लाफ़ इंसानियत के जद्दोजहद की कहानियां हैं। नेसार धरती के हर आशियाने को बचाए रखना चाहते हैं। चाहे घर हो, दिल हो या परिन्दों का घोसला ही क्यों न हो। किसी को उजाड़ा नहीं जाना चाहिए। 'तिनकों का घोंसला’ कहानी में जब रोशनदान में आबाद गौरैयों के घोंसले को उजाडऩे की बात आती है तो नायक प्रतिवाद करता है कि, ''अब्बा यह मासूम परिन्दों का घर है। वह कहीं भी जाते हैं, अपने घोंसले को देखने ज़रूर आते हैं।... इसे रहने दीजिए।‘’ 

            धरती पर इन्हीं घोंसलों और आशियानों को मिटाने का काम चल रहा है। जंगल में रहने वाले आदिवासी अपनी ज़मीनों से खदेड़े जा रहे हैं। रोजी-रोटी की तलाश में आए गांव-जबार के लोग शहरों में जगह और घर ढूंढ रहे हैं और जानवरों से भी बद्तर जि़न्दगी जी रहे हैं। गऱीब के घर का, उसके नक्शे का जायज़ा कीजिए, ''झाड़ी की टट्टर पर मिट्टी दाबकर एक कमरा जैसा बनाया गया था। फटे-पुराने, बोरी, फट्टे की आड़ बताते थे कि यहां परिवार भी है।‘’ टूटते-बिखरते परिवारों के कई रंग और कई शेड्स इन कहानियों में मिलेेंगे। सांवले, काले और घुप्प अंधेरे से भरे हुए कई बिम्ब नजऱ आएंगे। ''कहीं भी रद्दी टोकरी जैसी वह पड़ी रहती और ललुआ उसकी गोद में फटे कागज़ों सा।‘’  ''जहां मैं जलूंगा - जलकर अंगार का टुकड़ा बनूंगा और अंगार के बाद राख।‘’ ''आसमान भी रुआंसा होने को था।‘’

            नेसार नाज़ अपनी भाषा और उसकी रवानी को लेकर बहुत सजग हैं। उनकी भाषा में हिन्दी, उर्दू के साथ बोलियों की भी मिठास है। बोलियों के कई शब्द वाक्यों को नई अर्थदीप्ति और गति दे देते हैं। कुछ शब्द तो बहुत ही कम सुनने को मिलते हैं जैसे हींडऩा, सरापना, मुचमुचाना, सुकुर-सकुर, सुकुडदुम्म आदि। छोटे और नुकीले वाक्य भाव-व्यंजना को गहरा रंग दे देते हैं। वह हर शब्द और हर वाक्य को तब तक मांजते हैं, जब तक वह चमकने ना लगे। उर्दू के प्रसिद्ध समालोचक अनवर अज़ीम साहब कहानी से सिर्फ़  दो चीज़ की मांग करते हैं, ज़मीन की ख़ुशबू और जि़न्दगी का नमक। और बिला शक नेसार नाज़ की कहानियों में जि़न्दगी का नमक भी है और ज़मीन की ख़ुशबू भी।