Monthly Magzine
Friday 22 Nov 2019

'पीठ पर आँख’ जो देख लेती है सब

इंदुशेखर 'तत्पुरुष’ के  काव्य-संग्रह 'पीठ पर आँख’ का उल्लेख कहीं पढ़ा और मैं चौंक गई, याद आई अपनी लगभग चार दशक पुरानी कविता- जब से दो आँखें/ उग आई  हैं पीठ पर/ परेशानियाँ बढ़ गई हैं/ अब चेहरा न घुमाओ/ तब भी दिखाई देते हैं/ दबी हँसी हँसते हुए चेहरे। मैंने उनसे संपर्क किया और मेरे अनुरोध का मान रखते हुए इंदुशेखर जी ने अपनी पुस्तक बिना विलंब मुझे भेजी और इस तरह मेरे हाथ लगा ताजा हवा के झोंके-सा एक काव्य-संग्रह- पीठ पर आँख। संग्रह की लगभग सत्तर कविताओं में प्रेम भी है, प्रकृति भी; प्यास है तो तृप्ति भी; जितना पानी है उतनी आग भी; सिसकियाँ हैं तो संगीत भी;  और जितना खोया हुआ आकाश है उससे अधिक  बची हुई पृथ्वी है; जितनी अजनबियत है उससे अधिक अपनापन है।

'पीठ पर आँख’ की कविताएँ हमारे भीतर-बाहर की दुनिया को हमारे सामने रखती जाती हैं और लगता है यही तो है वह अवसाद जिससे कहीं न कहीं हम सब गुजर रहे हैं- अपनों से युद्ध अंतत:/ अपने आप से युद्ध होता है जिसमें/ तैयार करना होता है स्वयं को/ एक हृदयविदारक बँटवारे के लिए....('अपनों से युद्ध’ पृष्ठ 18) और साथ ही यह कोमल अभिव्यक्ति भी कि - अकेला मैं ही नहीं/ नहाया हूँ झील में/ हर छपाक पर उछलती/ नहायी है यह झील भी मुझ में ('यह झील भी’ 30)। यह जो एक 'छपाक’ है वह हम सबको नास्टेल्जिक करने के लिए पर्याप्त है। संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे  बचपन में हर साल अपने गाँव सनावद में कार्तिक के मेले में देखे उस केलिडोस्कोप की याद आई जिसे हम बड़ी तन्मयता से देखते थे, केलिडोस्कोप को थोड़ा-सा घुमा दिया कि खन्न की आवाज़ के साथ चित्र बदला, आकृति भी और रंग भी। वह एक छोटी-सी दुनिया हुआ करती थी, रंग-बिरंगी चूडिय़ों के टुकड़ों की वह खनक भी भाती थी और आकृतियाँ भी लुभातीं। इन कविताओं में भी बहुत कुछ वैसा ही है। आप एक-एक पन्ना पलटते जाइए और आने वाली हर कविता अपना एक नया रंग, नया भाव, नया कथ्य  लेकर आपके सामने उपस्थित होती जाती है।

'पीठ पर आँख’ की कविताओं में न तो कोई मिथ्याभिमान है न ही कोई शब्दाडंबर, यहाँ न तो अपने 'स्व’ का कोई दंभ है न किसी को छोटा आँकने का कोई प्रयास है  और सबसे बढ़कर  इन कविताओं में यदि कुछ रेखांकित करने योग्य है तो वह किसी को खोने का दुख नहीं अपितु जो पाया उसका परितोष है और तभी तो कवि कह सका- अच्छा ही हुआ जो हमने/ अलग होते समय/ लौटाया नहीं  परस्पर वह सामान/ जो कर चुके थे अर्पित/ एक दूसरे के लिए/ वर्ना, मैं तो कंगाल ही हो जाता शब्दश: ('राग विराग’79), यहाँ गुलजार याद आए बिना नहीं रहते जो तुम्हारे पास रहा मेरा कुछ सामान  लौटाने की बात कहते थे। इंदुशेखर जी ने अपने आसपास की दुनिया को अपनी नजर से देखा-परखा है और फिर उसे अपने तरीके से खुद में समोया है और शब्दाभिव्यक्ति दी है।  वे लैंस पर एक आँख टिकाकर निशाना साधने के महत्त्व को जानते हैं और यह भी खूब समझते हैं कि- पूरा संसार देखा जा सकता है/ अकेली आँख से/ पर संसार को पूरी तरह देखने के लिए/ चाहिए दो आँख- अम्लान ( 'संसार को पूरी तरह देखने के लिए’15)। अवश्य यह  'अम्लान’दृष्टि ही होगी जिसके चलते इंदुशेखर की कविताओं में नारी अपनी पूरी गरिमा और गौरव के साथ उपस्थित है, कुछ ऐसे कि उसे नमन करने का मन हो- अजीब शख्सियत वह/ हरदम/ लडऩे को तैयार/ रहती मुझसे/ जऱा-सी बात पर।/ पर मेरे लिए सारे संसार से/ भिडऩे को तैयार/ वह अकेली/ बिना बात पर ('तैयार अकेली’19)।

'पीठ पर आँख’ की कविताओं के विषय सीमित हैं परंतु तब भी कवि अपनी अनुभूतियों का एक ऐसा व्यापक विश्व हमारे सामने ला रखते हैं कि इन्हें पढ़ते हुए कभी हम अवाक रह जाते हैं, तो कभी रुक-से जाते हैं यथा- अजनबी को/ अपनाना/ मुश्किल/ अलगाना/ और भी मुश्किल ('मुश्किल’,17)। गुजराती साहित्य में एक आयातित विधा 'मोनो इमेज’ इतनी प्रचलित हुई है कि अब इस विधा की पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं और पुस्तकें भी। मोनो इमेज में एक ही विषय पर 5-7 छोटी-छोटी कविताएँ लिखी जाती हैं जो भिन्न-भिन्न शब्दचित्र उपस्थित करती हैं। संग्रह में इस श्रेणी की जो कविताएँ हैं वे विशिष्ट हैं फिर वह 'रविवार’ हो या 'आँधियाँ’, 'प्यार एक स्मृति है’ हो या 'राग-विराग’ या कि 'कल्प-विकल्प’। इन कविताओं का विषय भले ही एक हो परंतु कवि ने हर कविता में अपना एक अलग रंग भरा है और उन्हें मोनोटोनस होने से बचा लिया है। कहने को तो वह एक रविवार है और घर है परंतु उसका अर्थ माँ, पिता, पति, पत्नी और बच्चों के लिए कितना अलग-अलग होता है जहाँ बच्चे पिता के साथ धमाचौकड़ी करते हुए एक-दूसरे पर तकिये फेंकते हैं और 'हफ्ते में दो बार/  क्यों नहीं आता रविवार/ सोचते हैं बच्चे तो एक माँ भी है जो कहने को कह तो देती है अरे टूट जाएगी रूई/ मैली हो जाएगी खोली.....आप भी इन बच्चों में... पर कहीं अंदर से खुद की इच्छा को दबाती/ कि एक तकिया उठाके जोर से/ मार दे बच्चों के पापा के सर पर/ वह भी(55) तो दूसरे दृश्य में बच्चे उदास हैं/  पापा को जाना है बाहर/ अबके रविवार (57), तो कोई रविवार ऐसा भी है कि जिसका माई करती है इंतजार/ बड़े धीरज के साथ/ लग ही जाएगी इस बार शायद/ चश्मे की टूटी डंडी/ ईसबगोल और बाय का तैल बेअसर हुआ है और माई को स्कूटर पर बैठकर बेटे के साथ गंगा-भायली के घर भी तो जाना है जो पूरे चार बरस बाद गाँव से अपने बेटे के पास आई है(58)।  ये पन्नों पर उतरे मात्र कुछ शब्द भर नहीं हैं  जिन्हें हम कविता कहकर छुट्टी पा लें, यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसका सामना आज बहुतायत से माँएँ कर रही है। कवि की कलम से- सर्दी-गर्मी-आँधी-बरसात, हारी-बीमारी में भी मुँह-अँधेरे काम पर निकले उन  कर्मयोगियों के घर का वह रविवार भी नहीं छूटता जिसका आना किसी अपशकुन-सा होता है कि गर पिता न जाए काम पर तो, बैठ जाए  चूल्हा/ मिट्टी का मूसलाधार में (59)

संग्रह की छोटी कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं, कहा जा सकता है एकदम 'टेलिग्राफिक इफेक्ट’ वाली, अब भले ही डाक विभाग से यह तार वाला विभाग खत्म कर दिया गया हो परंतु हमारी पीढ़ी घर में तार आने के महत्त्व को खूब समझती है और इसलिए भी कि इन कविताओं में जो 'अनकहा’ है वह किसी कहे-सा मुखर है। बहुतायत में लिखी छोटी कविताएँ बड़ी कोमल, बड़ी सहज और मन को भा जाने वाली हैं। इन कविताओं का कथ्य निश्चित ही आम तौर पर लिखी, छपी जाने वाली कविताओं से सर्वथा भिन्न है और यह भिन्नता ही इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है, बानगी के तौर पर देखिए 'बचा रह गया नमक’- सनसनाते शब्दों से उछलकर/ छलक पड़े आँसू/ ये अच्छा ही हुआ ना !/ अंदर अगर रह जाते/ तो रेतते रहते/ कलेजा देर तक।/  अब देखो तो किस तरह/ बातों-बातों में हवा/ उड़ा ले गई इनको/ बचा रह गया नमक/ वह अपने हिस्से का (23)। अपने हिस्से का बचा रह गया यह नमक भी क्या रहीम के किसी पानी से कम है भला।  'वह सबका प्रभु’ और 'उसका पता’ कुरआन की आयतों का भावांतरण है जो एक अभिनंदनीय  प्रयोग है। संग्रह में 'लंबी कविता’ शीर्षक से एक लंबी कविता है जिसका उल्लेख विशेष रूप से इसलिए कर रही हूँ कि इस तरह की कविता कम ही देखी जाती है। यह एक लंबा दु:स्वप्न है जिसमें चीखती  धड़धड़ाती आती ट्रेन में कवि अपनी पत्नी को एक बड़े बक्से, दो सूटकेस, प्लास्टिक के कट्टे, बंद बिस्तर, तीन बड़े थैलों के साथ ठूंस तो देता है पर केतली में पानी भरने के चक्कर में खुद ट्रेन नहीं पकड़ पाता क्योंकि शुक्र है  एक बुढिय़ा को उसने गिरने से बचा लिया।

ट्रेन पकडऩे के लिए दौड़ता कवि पहुँच जाता है प्रति वर्ष वैशाख पूर्णमासी को लगने वाले कल्याणजी के मेले में, यहाँ का जो वर्णन है वह हर उस मेले का आँखों देखा हाल है जिसे हम सबने महसूस किया है। सात पेज लंबी यह कविता इतनी  पिक्चरस्क है कि कवि जहाँ-जहाँ से गुजरता है हम भी उसके मूक दर्शक होते जाते हैं।  'झाबझोब’, 'हुमक-हुमक’'खुखेरना’ जैसे शब्दों से पहली बार हुआ साक्षात्कार अच्छा लगा और अच्छा लगा प्लास्टिक की बंद बोतलों में पानी पीने के चक्कर में हम जिसे बहुत पीछे छोड़ आए उस 'रामझारा’ को याद करना। एक बहुत  अच्छे कविता संग्रह के लिए इंदुशेखर 'तत्पुरुष’ का हार्दिक अभिनंदन। 'पीठ पर आँख’ का मुखपृष्ठ भी उनकी सादगी का परिचायक है। बोधि प्रकाशन का भी अभिनन्दन इस आग्रह के साथ कि अपने अगले प्रकाशनों में वे चंद्रबिंदु उपयोग अवश्य करें। 'माँ’, 'आँसू’,  जैसे सारे शब्दों का  सौंदर्य चंद्रबिंदु के बिना अधूरा है। 1996 में प्रकाशित 'खिली धूप में बारिश’ के बाद एक लंबे अंतराल से 'पीठ पर आँख’ का प्रकाशन हुआ है, आशा करते हैं कि इंदुशेखर जी का अगला काव्य-संग्रह जल्दी प्रकाशित होगा। 

 

 

कविता संग्रह - पीठ पर आँख
कवि - इंदुशेखर ' तत्पुरुष '
प्रकाशन - बोधि प्रकाशन , जयपुर
मूल्य - १००/-