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Wednesday 19 Sep 2018

कदमों के निशाँ

बात 1976 की है जब देश में इमरजेंसी का आतंक छाया हुआ था, तब मेरी पोस्टिंग हाथरस में थी। उसी साल मुझे माक्र्सवादी आलोचक डा. राम कृपाल पांडे के साथ आगरा में डा. राम विलास शर्मा जैसे इतिहास पुरुष से मिलने का सौभाग्य मिला था। उस मुलाकात के दौरान डा. शर्मा ने बताया था कि जब हम लोगों ने माक्र्सवाद पढ़ा तब वह साहित्य प्रतिबन्धित था और छुप कर पुस्तकें मंगानी पड़ती थीं व छुप कर ही पढऩी होती थीं, आज तो दुनिया भर में सबसे अधिक पुस्तकें माक्र्सवाद पर ही उपलब्ध हैं और यह तुम लोगों को अवसर है कि स्वतंत्र रूप से पढ़ सकते हो। तब से मैं किसी भी व्यक्ति की जीवन गाथा को पढ़ते समय उस काल के इतिहास को अवश्य याद रखता हूं जिस काल में उस व्यक्ति ने अपना गौरवपूर्ण जीवन जिया। विशेष रूप से क्रांतिकरियों का इतिहास पढ़ते समय देखना होता है कि उनका सहयोग करने वाले कितने साहसी लोग थे जिन्होंने सारे खतरे उठा कर उनके कार्यों में मदद की। इसी पुस्तक में क्रांतिकारी बेताल सिंह का एक साक्षात्कार सम्मिलित है जो 4 मार्च 1984 के अमर उजाला में प्रकाशित हुआ था। बेताल सिंह वह व्यक्ति थे जिनके द्वारा कामरेड गुरुदयाल सिंह ने आगरा कलेक्टर हार्डी की कुर्सी के नीचे बम रखवाया था, वे कहते हैं - वे दिन और ही थे, अंग्रेजी हुकूमत। अत्याचार, हाहाकार, और इंकलाब जिन्दाबाद। अंग्रेजों के खिलाफ, अंग्रेजी सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलना भी तमाम मुसीबतों को निमंत्रण देना था। काम चाहे कितना भी गुप्त रूप से करें, अंग्रेज सरकार के गुर्गे, अमन सभाई गांव गांव में फैले हुए थे जो क्रंतिकारियों के बारे में सरकार को सूचना पहुँचा कर इनाम पाने को लालायित रहते थे। क्रांतिकारियों को सरकार और उनके गुर्गों की दुधारी तलवार से बच कर काम करना होता था।

भारत शर्मा द्वारा सम्पादित पुस्तक कदमों के निशाँ, जो कामरेड गुरुदयाल सिंह के जीवन से जुड़ी उपलब्ध स्मृतियों पर आधारित है, को भी उस काल के परिवेश में किये गये कार्यों के अनुरूप परखने से पता चलेगा। कामरेड गुरुदयाल सिंह अपने संघर्षों दमनों और जेल यात्राओं के बीच कुल 50 वर्ष जिये। आज गर वे होते तो 96 वर्ष के होते। हम कल्पना कर सकते हैं कि आज जितनी अशिक्षा, धर्मान्धता, और स्वार्थ की अन्धी दौड़ है तो उस दौर में समाज में परिवर्तन की धारा बहाना कितना कठिन रहा होगा। आज की वैज्ञानिक शिक्षा और वैज्ञानिक उपलब्धियों पर निर्भरता के बाद भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण इतना कम है और कम्युनिस्ट पार्टियां भी वर्गीय दृष्टिकोण में जातिवाद जैसे सामंती मूल्यों से टकराने की जगह उनका ही सहारा लेने को विवश हो रही हैं तब कल्पना की जा सकती है कि जातिवाद से लाभान्वित वर्ग से टकराना कितना संघर्षपूर्ण रहा होगा। इस पुस्तक में कामरेड सिंह के द्वारा सीमित साधनों में जन शिक्षण, संघर्ष, व संगठन निर्माण का जो चित्रण है उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

कामरेड गुरुदयाल सिंह का जन्म 1921 में हुआ था और 14 साल की उम्र में ही वे फतेहाबाद काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष निर्वाचित हो गये थे। 19 वर्ष की उम्र में किये सत्याग्रह में उन्हें पहली बार जेल यात्रा का स्वाद चखना पड़ गया। पर इसके दो वर्ष बाद ही उन्हें बम केस, प्रसिद्ध आगरा षड्यंत्र केस, और ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध की गयी राजनीतिक गतिविधियों के अंतर्गत जेल यात्रा करना पड़ी। जेल में किये गये अध्ययन और क्रांतिकारियों से निरंतर किये गये विमर्शों के बाद वे बाहर निकल कर 1946 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये।

1948 में उन्होंने जो झाड़ी आन्दोलन किया वह अपने आप में नजीर है। यह तेलंगाना, तेभागा, और नक्सलबाड़ी आन्दोलन की तरह जमीन के वितरण का आन्दोलन था किंतु जिसमें किसी तरह की हिंसा के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। शम्साबाद थाने के अंतर्गत चन्दौरा नामक गांव में लाला छक्की लाल ने बहुत बड़ी झाड़ी अर्थात घना जंगल लगा रखा था। कई एकड़ में फैली इस झाड़ी में जो जंगली जानवर रहते थे उनके आतंक से किसान और जनता बहुत परेशान थी। कामरेड गुरुदयाल सिंह ने, जो उस समय बड़े जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे, संगठन की दृष्टि से भी इस आन्दोलन को समर्थन देने का फैसला किया। लाला छक्कीलाल काँग्रेस समर्थक नेता थे, उन्होंने झाड़ी काटने के खिलाफ एक सभा बुलवायी जिसमें प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष और तत्कालीन वित्त मंत्री कृष्णदत्त पालीवाल भी सम्मलित हुए थे। कामरेड गुरदयाल सिंह ने वह सभा नहीं होने दी व किसानों ने ढेले मार मार कर आये हुए नेताओं को भागने को मजबूर कर दिया। कुछ ही दिनों में झाड़ी को काट कर साफ कर दिया गया व कामरेड सिंह क्षेत्र के एक बड़े किसान नेता की तरह चर्चित हो गये।    

1952 में उन्होंने फतेहाबाद फिरोजाबाद क्षेत्र से कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ा।

1959 में विभिन्न आन्दोलनों और जेल यात्राओं के दौरान उनका जो स्वास्थ बिगड़ा तो उन्हें स्थान परिवर्तन की सलाह दी गयी, जहाँ से वे भिलाई में अपनी जीवन साथी उर्मिला सिंह के भाई के यहाँ रहने के लिए निकले किंतु बीच में इटारसी ही उतर गये और एक धर्मशाला में ठहरे। वहाँ उन्होंने अपना राजनीतिक परिचय किसी को नहीं दिया अपितु अपने को कलाकार की तरह ही प्रस्तुत किया। उल्लेखनीय है कि वे एक अच्छे पेंटर भी थे और किसी भी दृश्य या व्यक्ति का चित्र देखते ही देखते बना देते थे। इस तरह की चित्रकला को बेच कर उन्होंने कुछ दिन काम चलाया कि कुछ युवा उनसे जुड़ गये और उन्होंने गल्ला मंडी में चल रहे शोषण के बारे में बताया। संयोग से पार्टी समर्थक एक ठेकेदार वहाँ कार्यरत थे जिनके पास सुप्रसिद्ध कामरेड सरजू पांडे [ आधा गाँव उपन्यास में भी जिनकी चर्चा है] जो सांसद रहे, वहाँ आये थे, इटारसी के उन लड़कों के कहने पर उनसे भेंट हो गयी तो वे बोले अरे कामरेड आप तो बड़े छुपे रुस्तम हो? हमें पता ही नहीं था कि कलाकार भी हो। तब उनका परिचय उजागर हो गया, और उन्हें गल्ला मण्डी का आन्दोलन नेतृत्व करना पड़ा। इटारसी आन्दोलन की चर्चा पूरे प्रदेश में व्याप्त हुई और उन्हें बड़े असमंजस के बीच म.प्र. में किसान सभा का दायित्व सम्हालना पड़ा।1962-64 के बीच उन्हें फिर डीआईआर के अंतर्गत जेल यात्रा करना पड़ी। 1964 में जब कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ तब उन्हें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का प्रदेश महासचिव व किसान सभा केन्द्रीय परिषद का सदस्य चुना गया। । 1971 में उन्होंने लाल मशाल साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया व 1972 को भोपाल में ही उन्होंने अंतिम साँस ली।

इस पुस्तक में एक कामरेड के जीवन के बहाने हर सच्चे कामरेड के जीवन की गाथा झलकती है जो एक आन्दोलनकारी होने के साथ साथ कवि, लेखक, कलाकार, भी होता है व हर स्थिति हर हालत में कामरेड रहता है। उसके मतभेद भी विमर्श का हिस्सा होते हैं चाहे वे गाँधीवादियों के साथ हों या माओवादियों के साथ हों। पुस्तक में कामरेड सिंह की कविताएं और उनके लेख भी संकलित हैं किंतु उनके बनाये चित्र भी सम्मलित हो पाते तो और भी अच्छा होता।

भारत शर्मा ने स्वयं को इस पुस्तक का सम्पादक बतलाया है किंतु असल में उन्होंने इसे शोधग्रंथ की तरह मेहनत से तैयार किया है। निश्चित रूप से सामग्री जुटाने में उन्होंने समुचित श्रम किया होगा जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं।