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Tuesday 21 Aug 2018

ओमान की खाड़ी में हिन्दी बोलते बतियाते हुए

हम थे तो विदेश में पर विदेशी रंग दिखा नहीं था. ऐसा लगता था जैसे हम अपने ही देश में तीन घंटे पहले छोड़ आए दिल्ली हवाई अड्डे में कहीं घूम रहे हों। दिल्ली की तरह इसका भी हवाई अड्डा विशाल है। दोनों के नाम में हिंदी अंग्रेजी के पहले अक्षर एक समान हैं 'द’ और 'डी’ यानि दिल्ली और दुबई। इसकी अंतिम मात्रा हमारी मुंबई की तरह है, और यह मुंबई की तरह हसीन भी है अरब सागर के किनारे बसी मियामी शैली की बहुमंजिली इमारतों  वाली। इन दोनों की तरह यह भी एशिया महाद्वीप का एक प्रमुख महानगर हो गया है। सात राज्यों को समेटे हुए इसका देश भारत की तरह गणतांत्रिक देश अपने को कहता है और अपने पूरे नाम में लिखता भी है 'संयुक्त अरब अमीरात यानि गणराज्य।‘

दिल्ली में विमान पकडऩे या विमान से उतरने पर हमें टर्मिनल भवन तक छोडऩे का काम शटल बस करती हैं पर यहां एयरपोर्ट के अंदर शटल ट्रेन चलती है। एयरपोर्ट के भीतर ट्रेन पहली बार बैंकाक में दिखी थी पर वे शटल या मेट्रो नहीं स्काई ट्रेन कहलाती हैं और शहर में ऊँचे बने पुलों पर ऐसे दौडती हैं मानों आसमान से बातें कर रही हों। वे जब आसमान से जमीन पर आती थीं तब सीधे बैंकाक के सुवर्णभूमि एयरपोर्ट में घुस जाती थीं और हवाई यात्रियों को उतारकर फिर आसमान में उड़ जाती थीं।

एयरपोर्ट के लंबे उतार चढ़ाव के बाद हम एक पारदर्शी सुरंग के सामने खड़े हो गए थे जिसके भीतर बिना किसी शोर-शराबे के शटल आकर खड़ी हो गई थी। हम इसमें बैठकर टर्मिनल के निर्गम द्वार की ओर आ गए थे। इंडिगो की अपेक्षाकृत सस्ती फ्लाईट में ज्यादा संख्या में मजदूर भी उतरे थे जो अपने अपने क्षेत्र के हुनरमंद कारीगर और टेक्नीशियन रहे होंगे। वे अपने बड़े छोटे सारे सामान अपने हाथों और कंधो में लटकाए हुए थे। अपने झोला झपाटे लिए वे विमान से वैसे ही उतर कर चल रहे थे जैसे देस में अपनी बस यात्रा के बाद बस से उतर कर चलते होंगे। हमारी तरह उन्होंने अपने लगेज विमान के नीचे रखने के लिए जमा नहीं किए थे।  इसलिए वे लगेज बेल्ट के सामने लाइन लगाने से मुक्त थे। पर निकलने से पहले दस्तावेजों की जांच के लिए लाइन में सब खड़े थे।

अचानक हिंदी में निर्देश देने की आवाज आई। तब काउंटर पर बैठे एक जांच अधिकारी दिखाई दिए जो अरबी इस्लामी लंबी पोशाक 'अबाया’ पहने हुए थे। उन्होंने एक यात्री का वीसा दिखाते हुए लाइन में लगे लोगों से कहा कि 'भाई साहब! आप लोग अपना ये वाला कागज भी निकाल कर रखें।‘ तब परदेस में अपनी बोली को सुनकर मैंने और चंद्रा ने एक दूसरे को सुखद आश्चर्य से देखा था। हाँ इस बार विदेश यात्रा में थोड़ी हिम्मत करके हम केवल दो ही आ गए थे मैं और पत्नी चंद्रा। तब साड़ी में लिपटी चंद्रा के हिन्दुस्तानी चेहरे को जांच अधिकारियों ने तरलता से देखा था।

'आप लोग कहाँ जा रहे हैं इधर आइये।‘ एक ट्राली लेकर चलती हुई अकेली महिला थी। वह भी चंद्रा की तरह साड़ी पहने हुए थी और चंद्रा जैसे ही सामान्य गृहणी लगी थी पर यहां दुबई प्रवासी हो जाने के कारण भारत से दुबई अकेले आ गई थी यहां रह रहे अपने परिवार के पास - 'बाहर निकलने का रास्ता इधर से है’ उसने कहा था तब हम उनके पीछे हो चले थे। उस महिला के साथ कस्टम वालों ने हमें रोक लिया था और हमारे बैग को स्केनर में डाल दिया था। सुना था कि अरब में नियम कानून बड़े सख्त हैं। यहां सिगरेट, शराब और दवाइयाँ रखने पर भी आपत्तियां ली जाती हैं। सबके लिए अनुमति पत्र दिखाने होते हैं और नियमित खायी जाने वाली दवाइयों के लिए डाक्टर का प्रिस्क्रिप्शन लैटर अलग। पर पता नहीं स्कैनर मशीन ने कितनी सेंध मारी कि हम बैग की तलाशी लिए जाने से बच गए थे। हमारे पास दवाइयां थीं और मेरी सिगरेट का एक पैकेट भी।

हाथों में लटकती हुई अनेक प्लैकार्ड (छड़ी में लगी तख्तियों) में मेरे नाम की तख्ती अंतिम हाथों में मिली थी तब तक के लिए थोड़ी घबराहट हुई थी पर अपने नाम के दिख जाने के बाद जो प्रसन्नता होती है सो अलग –'इज इट योर नेम सर?Ó उसने पूछा था। उसका हिन्दुस्तानी चेहरा देखकर तब मैंने कहा 'हाँ!’ इसके बाद वे हिंदी ही बोलने लगे थे सिवा इसके कि 'वी वेल्कम बोथ ऑफ यू सर.. फ्रॉम बोंटन टूर्स एंड ट्रेवेल्स’ वे उस कंपनी के स्टाफ थे जिन्हें पांच दिनों तक हमारे दुबई प्रवास एवं भ्रमण के कार्यक्रम को अंजाम देना था।  वे दो थे एक कंपनी का एयरपोर्ट प्रभारी जिसे आने वाले यात्रियों की अगुवानी करना उन्हें यथा-स्थान व्यवस्थित करना था और दूसरा ड्राइवर।

बाहर सैंतीस डिग्री तापमान बेहद उमस भरा और शरीर को झुलसाने वाला लगा। अगस्त का महीना सबेरे आठ बजे अपने शहर दुर्ग से रायपुर एयरपोर्ट वातानुकूलित बस से निकले थे। तब से चौदह घंटे बाद दुबई एयरपोर्ट तक इतनी ठंडकता रही थी कि मुझे स्वेटर पहनना और चंद्रा को शाल ओढना पढ़ा था। पर अब यहां समुद्र और रेगिस्तान के विरोधाभास के बीच बसे दुबई के वास्तविक तापमान से पाला पड़ रहा था।

ड्राइवर टोलटैक्स पटा कर पर्ची लेकर आ गया। हम लैंड क्रूसेडर में बैठ गए थे। गिरे हुए बैरियर को ड्राइवर ने पर्ची दिखाई और मानवहीन बैरियर अपने आप उठ गया। यह दुबई का पहला चमत्कार था। ड्राइवर से नाम पूछने पर वह चालू हो गया था 'हमारा नाम प्रतापसिंह है साब और हम यू.पी. के प्रतापगढ़ से आए हैं। यहां ज्यादातर ड्राइवर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के ही हैं। हिंदी-उर्दू बोलते हैं और दुबई की आधी आबादी हमीं लोगों की है। इधर भाषा को लेकर कोई लफड़ा नहीं है। हम लोग ड्राइविंग परीक्षा भी हिंदी में देते हैं। यहां का आरटीए (सड़क एवं परिवहन प्राधिकरण) में हिंदी सहित चार भारतीय भाषाओं यानी मलयालम, तमिल और बांग्ला में भी परीक्षा दे सकते हैं। यहां किसी बात की कोई परेशानी नहीं है। आप जो सामान जहां छोड़ेगा ना जब आप लेने आएगा तो वहीं मिलेगा। हर चीज़ का नियम-कानून है और नहीं मानने से चालान है। सड़क पर चलते हुए दारू सिगरेट नई पीने का। जेब्रा क्रासिंग छोड़कर सड़क पार करने से दो सौ बीस रुपये का चालान है। ड्रिंक्स करके गाड़ी चलाने वाले के लिए चालान नहीं सीधा जेल है। आप बेफिकर रहिए।Ó उसने एक जगह गाड़ी रोककर हमारे मोबाइल में दुबई का सिम डलवा दिया था पचास दिरहम (अरबी मुद्रा 1 दिरहम = 17 रु.) यानी आठ सौ पचास रुपये का 'अब आप अपने देस, घर परिवार में सबसे बातें कीजिए कोई टेंशन नहीं है।Ó उसने एक झटके में ही इस वैश्विक दुनिया को घर-परिवार में तब्दील कर दिया था। उसने बर-दुबई में बेंग्रे कामत रेस्तरां में हमें गरमागरम पूरियों के साथ सुस्वादु भोजन करवाकर होटल में छोड़ दिया था। हमारी यात्रा का सुरक्षित पहला पड़ाव संपन्न हो गया था। मैंने इंडिगो के दुबई में लैंड करते समय एक नवजवान को थोड़े संशय से पूछा था कि 'आप एयरपोर्ट से निकलते समय थोड़ा सहयोग करेंगे क्या?’ तब उसने बिंदास ढंग से कहा था 'आपको जरूरत नहीं पड़ेगी सर। दुबई इज सेफेस्ट प्लेस इन द वल्र्ड।‘ 

हम रोलां स्ट्रीट के इम्पीरियल सुइट्स होटल के छठवें माले में आ गए थे चार रात और पांच दिनों के लिए।  इस शहर में जहां साल भर बारिश नहीं होती और इस पड़ोसी देश के शेख अपने बच्चों को केवल बारिश दिखाने के लिए मुंबई ले जाते हैं। प्रवासी एवं विदेशी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी वीसा में यह 'स्लोगन’ भी लिख रखा है 'ए सेफर नेबरहुड इज ए सेफर होम’ हम पड़ोस में हैं तो समझो अपने घर में हैं।

हम बर-दुबई में हैं इस अरबी शब्द का अर्थ है मेनलैंड यानि पुरानी दुबई। यह एक अलग जिला है। संयुक्त अरब अमीरात के सात राज्यों (अमीरातों) में से दुबई एक अमीरात है। यह मुंबई जैसा विशाल है पर आबादी महज पच्चीस लाख। इसलिए पैदल चलने वाले भी कम ही दिखते हैं। रेलवे स्टेशन सारे देश में नहीं हैं। सड़कों पर बस व कारें हैं, बसें भी कम और दुपहिया तिपहिया वाहन केवल बेकरी या किराना सामानों की आपूर्ति के लिए है। नियमों से ऐसे स्वचालित हैं लोग कि पुलिस या सुरक्षाबल भी दिखाई नहीं पड़ते। जेब्रा क्रासिंग पर एक भी आदमी दिख जाए तो उसके सम्मानजनक ढंग से पार हो जाने के लिए कारों का काफिला अपने आप रुक जाता है। हम होटल के दरवाजे पर खड़े थे तो हमारे सामने एक कार आकर रुकी उसमें से फिक्सर से खड़े किए बालों वाले नौजवान ने उतरकर पूछा 'मिस्टर विनोद.’ उसने बोंटन टूर्स की कार में हमें अपने निर्धारित कार्यक्रम के तहत ले लिया। उसने पूछा 'हिंदी आर इंग्लिश’ हमने कहा 'हिंदी’ फिर वे हमारे समान ही हिंदी बोलने लगे थे 'सर आज आपका दुबई सीटी टूर है।‘ फिर हमारे टूर आइटिनरेरी (यात्रा दौरा कार्यक्रम) को देखकर उसने दुख व्यक्त करते हुए कहा  कि 'ये तो छोटा कार्यक्रम है सर। इंडिया की जितनी टूरिस्ट एजेंसीज हैं ना .. सब चीट हैं। आप लोगों को धोखे में रखती हैं.. खैर चलिए।‘

केवल एक सदी पहले ही दुबई बेदूईन व्यापारियों और मोती के गोताखोरों के साथ फारस की खाड़ी में बसा एक शांत नगर था। फारस की खाड़ी का मुख्य स्रोत ओमान की खाड़ी है। संयुक्त अरब अमीरात से अपेक्षाकृत बड़ा देश ओमान होने से व्यापक रूप में अरब सागर के कई तटवर्तीय क्षेत्र ओमान की खाड़ी कहलाते हैं। इसे खाड़ी बुलाया जाता है पर भौगोलिक रूप से यह वास्तव में एक जलडमरू है। ये जलडमरूमध्य (दो सागर को जोडऩे वाले संकरे मार्ग) किसी देश के आयात-निर्यात को सुगम बनाकर उन्हें सुरक्षित व समृद्ध कर देते हैं। बहुत ज्यादा बरस नहीं बीते हैं दुबई की समृद्धि को। जब हम विद्यालयों में पढ़ रहे थे तब समृद्ध देशों में बस अमेरिका और यूरोपीय देशों के नाम सुना करते थे। अरब देशों को उनके रेगिस्तान, ऊंट और खजूर के लिए जानते थे। अलीबाबा और चालीस चोर, सिंदबाद, हातिमताई के किस्से सुना करते थे। 'अरेबियन नाइट्स’ से उपजी ये कथाएँ तब हमारे देश में भी बाल-साहित्य की श्रेष्ठ कहानियों में बड़े चाव और हैरत से सुनी जाती थीं। फिल्मों में अरेबियन संगीत के साथ मिस्र की हसीना के मादक नृत्य देखा करते थे। संयुक्त अरब अमीरात या उसके घटक अमीरात के सांस्कृतिक इतिहास से संबंधित कुछ अभिलेख क्षेत्र की मौखिक परंपरा के दर्ज होने और लोककथाओं व मिथकों के आगे बढऩे की वजह से मौजूद हैं। आज के वैश्वीकृत दुबई शहर की अर्थव्यवस्था तेल उद्योग, पर्यटन, रियल एस्टेट और वित्तीय सेवाओं पर आधारित है। शहर की शान है इसका कम अपराध दर, बुर्ज अल अरब (दुनिया के सबसे ऊंचे होटल में से एक), कृत्रिम द्वीप, रेगिस्तान में स्कीइंग और संभवत: दुनिया भर में सबसे अच्छी कर-मुक्त खरीदारी।

जैसे-जैसे भारत से मलयाली भाइयों के दुबई जाने का समाचार सुनते तब जानकारी होने लगी कि अरब में तेल के कुँवें निकल आए हैं और रोजगार के अवसर बढऩे लगे हैं। आज अरब में दुबई, शारजाह, अबूधाबी जैसे इनके अमीरात दुनिया के अमीर राज्यों और महानगरों में शुमार हो गए हैं। इनके पहले तब दुबई के शेखों के पास अपने कमाए इफरात धन को लुटाने और मौजमस्ती के लिए दो घंटे की उड़ान में बसी बम्बई का ही सहारा था। ये शेख बम्बई के सितारा होटलों में अपनी बीवियों बच्चों का हुजूम लेकर पहुंचते, बच्चों को बम्बई की बारिश दिखाते और अपने पैसों की वहां बेहिसाब बारिश करके लौट आते थे। बम्बई का गहरा प्रभाव इन अरबी अरबपतियों पर रहा और इन्होंने अपने लिए एक आधुनिक बम्बई और बसा ली जो दुबई है। इस दुबई का पर्यटन पिछले दो दशकों से उठान पर है और आज एशिया के सैलानियों के लिए थाईलैंड और सिंगापुर के बाद तीसरी पसंद है 'दुबई’।

दुबई और अबू धाबी ही सिर्फ दो अमीरात हंै जिनके पास देश की विधायिका अनुसार राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर प्रत्यादेश शक्ति (क्कह्म्शद्धद्बड्ढद्बह्लद्बशठ्ठ श्चश2द्गह्म्) है। इन दोनों राज्यों को स्वतंत्र देशों की तरह अनेक मामलों में निषेध और हस्तक्षेप करने का अधिकार है। लगभग डेढ़-सौ वर्षों से यहां अल माकतौम वंश ने शासन किया है। इसके मौजूदा शासक मोहम्मद बिन रशीद अल मक्तूम संयुक्त अरब अमीरात के प्रधानमंत्री और उप राष्ट्रपति भी हैं।

शहर के भीतर ही हम चालीस किलोमीटर निकल आए थे। शहर की सफाई और भव्यता तो आँखों में भर गई थी। दुबई में शानदार होटलों और गगनचुम्बी चुम्बी भवनों के लिए विख्यात शेख जायद रोड होते हुए हम घूम रहे थे।  बेहद खूबसूरत मस्जिदें भी दिखती जा रही थीं जो आस्था और भवन निर्माण कला का नायाब नमूना थीं। गाइड की आवाज आई 'सर..दुबई में बारिश नहीं होती.. साल भर में एक मिलीमीटर पानी गिर जाता है इसलिए समुद्र के नमकीन पानी को मीठा पानी कर लिया है। ड्रेनेज सिवरेज के पानी को काम के लायक बना लिया गया है और वह क्यूरिंग और गार्डनिंग के काम आ जाता है।‘

गाइड प्रदीप मेहता गुजरात से आया है और ड्राइवर नूर मोहम्मद मथुरा का है। अक्सर वह मुस्कुराते हुए कृष्ण की बातें करता है। अचानक 'बाबा राम रहीम के बारे में पूछ बैठता है। ‘ तब गाइड बताता है कि 'कल की खबर में उसे बीस साल की जेल हो गई है।‘ ये हमारे लिए भी खबर थी कि बाबा को जेल हो गई और मुंबई में ज़मकर बारिश हो रही है। वे दोनों हमारी ओर मुखातिब होते हैं 'इंडिया को क्या हो गया सर? सब बाबा लोग ये क्या कर रहे हैं?

'बाबा लोग देश का बेडा गर्क कर रहे हैं।‘ मेरे भी मुंह से निकल गया। पर हम थोड़ी देर में ही इस बेड़ा गर्क से कोहिनूर हीरे के एम्पोरियम में आ गए थे। इसकी इमारत किसी किले के समान है और इसका नाम है 'सागा वर्ड’। इसके अरबी रिसेप्शनिस्ट ने बड़ी नफासत से हमें घुमाया और चंद्रा की ओर देखते हुए कहा कि 'वेल्कम विथ योर ब्यूटीफुल वाइफ।‘ चंद्रा खुश हो गई। अरब देस में जहां महिलाओं में बादामी रंग और बादामी आँखों वाली खूबसूरती बसी हुई है वहां भी किसी को खूबसूरती का तमगा मिल गया तब फिर क्या कहने। इस कॉम्प्लिमेंट के कुछ हजार रूपये जरूर देने पड़े जब सफेद सोने में हीरे के नग जड़े कान की बालियों को पसंद करना पड़ा। यहां हमने सोने के तीन रंग देखे– पीला, गुलाबी और सफेद। अरबी महाशय ने बताया कि 'आपके  इंडिया में पीले गोल्ड का चलन है।‘ अरब देश अपने स्वर्ण और मेवों के लिए प्रसिद्ध है। ये थोड़े सस्ते भी हैं, इसलिए जो यहां आता है  इनमें से कुछ लेते जाता है।

हम ओमान की खाड़ी में बने 'पाम आइलैंड’ पर आ गए थे जो आधुनिक नगरन्यास की दृष्टि से अभी दुबई का नया और ताजा बसा नगर है. यह गाइड बताता है 'सर..इस आइलैंड को हेलीकाप्टर में चढ़कर देखने से यह इलाका खजूर के पेड़ की तरह दिखता है. समझ लीजिए हम जिस सड़क पर चल रहे हैं वो खजूर पेड़ के मुख्य तने की तरह दिखता है और सड़क के आजू बाजू बने मकान पेड़ के पत्तों व खजूर के गुच्छों के समान दिखते हैं।‘ एक बड़ा होटल अटलांटिस इससे लगा हुआ है जिसके दो तले रेतों के तहखाने में हैं। गाइड कहता है कि 'इसमें पन्द्रह सौ अपार्टमेन्ट हैं और जिनमें कुछ का किराया एक दिन का बाईस लाख रूपयों तक है।‘ ऐसी जगहों पर बस तस्वीर ही उतरवाई जा सकती है और ये काम मैंने सपत्नीक मुस्तैदी से कर लिया क्योंकि इसके लिए गाइड तो मुस्तैद था ही।

हम जब वाहन से बाहर निकलते तभी सूरज की तपिश का पता चलता। वरना मोटर गाड़ी, होटल, दुकानों सहित सारे भवन वातानुकूलित हैं। यहां तक चाय-नाश्ते की गुमठियों में भी ए.सी.लगे हुए हैं। भ्रमण के निर्धारित समय या तो सुबह के हैं या शाम के. दिन होटलों के भीतर, रातें रजाई में।  गाइड कहता है  'ये जुमेराह बीच है सर.. देख आइये।‘ मुंबई में अरब सागर का पानी नीला है पर अरब में ओमान की खाड़ी का पानी हरा दिखता है। रेतें मुलायम और गुदगुदी हैं। सुबह के ग्यारह बजे हैं पर गर्मी के कारण ज्यादा देर खड़ा नहीं हुआ जा सकता। यह अनुभव भी पहली बार हुआ कि सूर्य की तेज किरणों के कारण मोबाइल कैमरे से कुछ दिखता नहीं। केवल अनुमान लगाकर ही फोटोग्राफी की जा सकती है। ली गई तस्वीरें छाया में आ जाने के बाद देखने पर दिखाई देती हैं कि उतारी गई तस्वीरों में सचमुच जुमेराह बीच बहुत खूबसूरत है। कुछ विदेशी नहा रहे थे तो लगा कि पानी ज्यादा गरम नहीं हुआ है। हमने कुछ कदम अंदर डाले थे तो पानी ठंडा था। संभवत: हवा की ज्यादा नमी ने इन्हें सूरज के ताप से बचा लिया था।

गाइड ने हमें होटल में उतारते हुए कहा कि 'सर! शाम पांच बजे बुर्ज खलीफा और दुबई माल के लिए आप लोग तैयार रहें। आपके पैकेज में नहीं है पर आप सोचिये भला कि यहां से कोई आगरा जाए और ताजमहल देखे बिना आ जाए तो उसे आप क्या कहेंगे? ऐसा कुछ आपके साथ न हो जाए। बुर्ज खलीफा दुनिया का सबसे ऊँचा जानदार टावर है और उसका टिकट अभी से बुक करना पड़ेगा।‘ हमने तुरंत उसे आनलाइन बुक करने के लिए चार सौ दिरहम यानी सात हजार रूपये देकर बुर्ज में चढऩे के लिए अपना जोश दिखा दिया था।

'हम दुबई की आकाँक्षाओं के प्रतीक एक सौ अड़सठ मंजिल के टावर बुर्ज खलीफा को देखने जा रहे हैं। इसके लिए दुबई माल के भीतर से रास्ता खुलता है। दुबई माल दुनिया के कुछ बड़े शापिंग मालों में से एक है। भीतर घुसते ही लगता है टाइटेनिक जैसे किसी विशाल जलपोत के भीतर आ गए हैं।  इसके विशाल फिश एक्वीरियम में तो बोगदे बने हुए हैं। अंडरवाटर जू है। इनके भीतर घुसकर देखना एक नया अनुभव है। माल में घूमते हुए थक जाने वालों के लिए आरामदेह बैठक व्यवस्था हर जगह है। जहां मै और चंद्रा बैठकर कुछ खाया करते थे। अपनी साठ बरस की काया को सुस्ताया करते थे। देश में अपने परिजनों रिश्तेदारों से मोबाइल पर बातें कर उन्हें परदेस में सुरक्षित होने व हमारी  चिंता न करने को आश्वस्त किया करते थे। लौटते समय रात ग्यारह बजे एक रेस्तरां में हम दो बुजर्गों को खाते देखकर एक भारतीय नौजवान ने अचंभित होकर पूछा था 'बस आप दोनों ही इंडिया से यहां घूमने आए हैं? वंडरफुल!’ पर दुबई भी वंडरफुल। ड्राईवर रेस्तरां में हमें उतारकर जा चुका था और हम पति-पत्नी रात बारह बजे एक किलोमीटर पैदल चलते हुए अपने होटल आ गए थे।

जाने से पहले हमने घड़ी देखी स्थानीय समय के अनुसार शाम के सात बज रहे थे हमें ड्राइवर सईद अहमद के कहे अनुसार बुर्ज खलीफा के प्रवेशद्वार पर सात बजे तक पहुँच जाना था अन्यथा सात बजे के बाद प्रवेश नहीं मिलता। हमने आठ अरब डालर से बने टावर में टिकट दिखाकर प्रवेश पा लिया था। दुबई में भी हास्पिटेलिटी व कैटरिंग जैसी सेवाओं पर थाईलैंड की आकर्षक युवतियों ने स्थान पा लिया है और एयरपोर्ट, होटल व सभी पर्यटन स्थलों में वे अपने सलीकेदार सेवाओं की छाप छोड़ रही हैं। इन्हें रोजगार दिलाने के लिए थाईलैंड की अन्तराष्ट्रीय एजेन्सियां काम करती हैं।

हम आठ सौ अ_ाइस मीटर ऊँची इस दुनिया की सबसे ऊँची इमारत में चले जा रहे हैं जिसे फकत छह बरस में बना लिया गया था। इसका लोकार्पण 2010 में हुआ था। इसके लंबे गलियारे में कई वृत्त फिल्में चल रही हैं जिनमें बुर्ज सम्बन्धी जानकारियाँ प्रसारित की जा रही हैं। इसमें विज्ञान केन्द्र, तैराकी का स्थान, खरीदारी की व्यवस्था, दफ़्तर, सिनेमाघर सहित सारी सुविधाएँ मौजूद हैं। इसकी 76 वीं मंजिल पर एक मस्जिद भी बनायी गयी है। कहते हैं यह लगभग 100 किलोमीटर दूर तक दिखाई दे जाती है। इसमें लगायी गयी लिफ़्ट दुनिया की सबसे तेज़ चलने वाली लिफ़्ट है।  पिछले साल 26 जनवरी के मौके पर दुबई में भी तिरंगा नजर आया था और बुर्ज खलीफा तिरंगे के रंगों में रंगी दिखी थी। अबुधाबी के राजकुमार और यूएई के सशस्त्र बलों के उप सुप्रीम कमांडर शेख मोहम्मद बिन जायेद अल नहयान दिल्ली गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य मेहमान थे। इसी सम्मान में बुर्ज खलीफा को तिरंगे के रंगों से रोशन किया गया था। पहली बार परेड में संयुक्त अरब अमीरात के जवानों का दस्ता हमारी सेना के जवानों के साथ परेड की अगुवाई करता नजर आया था। यह दो देशों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का पेशेवर लेकिन अनमोल हिस्सा था।

 हम लिफ्ट के पास पहुंचकर पंक्तिबद्ध हो गए थे। लिफ्ट का दरवाजा बंद करते हुए बाहर खड़े अधिकारी ने कहा कि 'अब आप लोग एक मिनट में 125 वीं मंजिल पर पहुँच जाएंगे।‘ तेज गति के कारण हमारे कानों में हल्की सनसनाहट हुई थी और भीतर लगे टाइम क्लाक में हमने देखा कि ठीक साठ सेकण्ड बाद दरवाजा खुला था और हम उस अवलोकन डैक पर आ गए थे जहां से दुबई का रात्रिकालीन नजारा देखा जा सकता था। लगा हम किसी शहर में नहीं बल्कि तारामंडल में हैं। अदभुत और कल्पना से परे रंगीन झिलमिल सौंदर्य हमारे सामने उपस्थित था। यह दुबई थी जो अपने स्वर्णाभूषणों के लिए प्रसिद्ध है। यहां वह खुद सोने के गहनों से अलंकृत हमारे सामने खड़ी थी अपनी स्वर्णिम चकाचौंध के साथ। जैसे कोई सोलह श्रृंगार किए दुल्हन खड़ी हो। घंटे भर में सैकड़ो स्नैप देशी-विदेशी सैलानियों ने अपने अपने कैमरों से ले लिए थे फिर भी इस अप्रतिम सौंदर्य के छायांकन की प्यास बुझ नहीं रही थी। बुर्ज के 126 वें माले पर झूले लगे थे। पत्नी चंद्रा झूल रही थी और मैं उसे झुला रहा था। नीचे विराट फाउंटेन-शो के रंगीन फौवारों की संगीतमय फुहारें हमारे ह्रदय-पटल को छू रही थीं। इस देश की सांस्कृतिक थाती से निकली अरबी के गीत ने रोमान की दुनिया को जगा दिया था। यह एक दुर्लभ योग था जो इस जीवन में न जाने अब फिर कब आवेगा?

जब हम बुर्ज से बाहर निकलकर बस स्टॉपेज नंबर-दो में छोड़े अपने वाहन व चालक को खोजते हुए विशाल कंक्रीट के जंगल में भटक गए थे तब अबाया पहने एक शेख ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर और हाथ पकड़कर हमें सही रास्ता सुझाया था।

दूसरे दिन शाम को दुबई से साठ किलोमीटर दूर एक रेगिस्तानी गांव की ओर हम चल पड़े थे। रास्ते में ओमान की खाड़ी में दिखता समुद्र का एक छोटा टुकड़ा खत्म हुआ और रेत का समंदर शुरू हुआ। ऐसे रेगिस्तान में बीचोंबीच चौड़ी सडक बना दी गई है। तब लाल-पीले होते रेतों के ढूंह पीछे होते जा रहे थे। थोड़ी देर बाद एक 'बदायेर’ नाम की बस्ती आ गई थी। रेगिस्तान की सबसे बड़ी पहचान ऊंट दिखने लगे थे। यहां से शुरू होते हैं डेजर्ट सफारी के रोमांचक खेल। रेत में झूम झूम कर चलाने के लिए छोटे ट्रैक्टर जैसा चार चक्कों वाला 'क्वाड’ है। गेयर स्वचालित है इसलिए इसे चलाना आसान है। किराया डेढ़-सौ दिरहम यानि सत्ताइस सौ रुपये। हम सवार हुए तो इसके मालिक ने तस्वीर उतारते हुए कहा 'वाह! क्या लग रहे हैं साब आप दोनों। जैसे किसी फिल्म के टीनेजर सितारे हों जो घर से भागे हुए प्रेमी युगल हों।‘

इसे हुड हुड कर दौड़ाने के बाद हम फिर अपने लैंड-क्रुसेडर में जा बैठते हैं। ड्राइवर ने सबके हाथों में झिल्ली पकड़ा दी ये कहते हुए 'किसी को उल्टी हो जाए तो इसका उपयोग करें।‘ हम चौंक पड़े। उसके बाद गाडिय़ों का काफिला दूर रेगिस्तान में चला जाता है। इसके उतार चढ़ाव वाले हिस्सों में लैंड-क्रुसेडर को जितना हो सके दौड़ाया जाता है, रेत की ढूंहों में गाड़ी को तेज रफ्तार में चढ़ा दिया जाता है। लगता है कि गाड़ी अब गिरी तब गिरी, और उसके भीतर बैठे सैलानी भय और आनंद के बीच हिलोरें मारते रहते हैं। वे आपस में टकराते हैं और उत्तेजना में कभी चीखने तो कभी हंसने लग जाते हैं। एक जगह गाड़ी पंचर हो गई तब नीचे उतरकर देखे थे इसके मरू-वैभव को, रेत के भरपूर समंदर और दरिया को। रेगिस्तान के वीराने सौंदर्य को जहां चल रही हवा में उसका मीठा सुर था। हमने इस मिले हुए मौके का फायदा उठाया और प्रकृति के इस अनमोल रूप को अपने कैमरे में कैद कर लिया। मैंने पहली बार सेल्फी ली थी चंद्रा के साथ – एक फोटो और एक विडियो जो सोशल मीडिया पर वाइरल हुई थी।

इस रोमांचक यात्रा को पूरी कर लैंड क्रुसेडर इस रेगिस्तान को पार कर फिर पक्की सड़क पर आ जाती है और एक प्रदर्शनी स्थल पर आ रूकती है।  हिप्पीनुमा बालों वाला ड्राइवर-कम-गाइड बताता है कि 'यहां गीत-संगीत-नृत्य के कार्यक्रम के बाद डिनर है।‘ जाते ही सब वेज-नानवेज के नाश्ते पर टूट पड़ते हैं। अगर कहीं देने वाले ने बताया नहीं तो अंतर नहीं दिखता। नाश्ते की दोनों प्लेटें एक समान दिखती हैं। एक समान रूप के दिखने वाले व्यंजनों में एक में शाकाहार भरा होता है और दूसरे में मांसाहार। चाय काफी व शीतल पेय थे। माइक पर एनाउंस भी हुआ था कि 'हजार रूपए पैग में व्हिस्की भी मिलेगी। दो पैग लेने वालों के लिए एक पैग की छूट यानि दो हजार में तीन पैग।‘

बांस और टट्टों की सजावट से बना यह स्थान है। यहां मंच के चारों ओर जमीन में गद्दे तकिए बिछे हैं और छोटी मेज लगी हुई हैं। सब अपने खाने पीने का समान लेकर यहां गद्दों पर बैठ जाते हैं और उसके बाद रूसी, अरबी और अग्नि नृत्य एक के बाद एक दिखाए जाते हैं। झनझनाते संगीत की ताल पर वैसे ही फड़कते नृत्य हैं। खूबसूरत रूसी नृत्यांगना अपने उत्तेजक लिबास में नृत्य कर लोगों को रिझाती है। कितने ही नौजवान व कुछ प्रौढ़ जनों को अपने साथ नाचने के लिए ललचाती है। उनकी कमीज को ऊपर चढ़वाकर उन्हें नचाती हैं। उसके बाद मिस्र देश का 'तनूरा नृत्य’ है जिसका नर्तक रेगिस्तान के कबीले नुमा वस्त्रों को पहने हुए है वह चकरी की तरह निरंतर घूमते हुए नृत्य करता है। अंत में एक कलाकार आग के गोलों को लेकर एक साहसिक नृत्य करता है। इन नर्तकों ने दर्शकों को मरूस्थल में आनंदमय कर दिया था। वीरान मरूस्थल में पर्यटन के नए रंग भर दिए थे जैसे मिल गया हो रेगिस्तान में नखलिस्तान।

बोंटन टूर्स की गाड़ी जब भी हमें लेने आती है उसके ड्राइवर बदले हुए होते हैं। इस बार सईद अहमद है जो पाकिस्तान पेशावर का है और ज्यादा जोश से भरा हुआ पर सलीका पसंद इन्सान है। सईद ने हमें ओमान  की खाड़ी पर चलने वाले क्रूज में भी पहुँचाया था। जहां डिनर पर हमें अरबियों के पसंद का एक व्यंजन खाने को मिला था जो ब्रेड से बना खीर था। दुबई का यह इलाका 'डेरा’ कहलाता है। यह मछेरों और नाविकों का डेरा है। फारस की खाड़ी का बैकवाटर शांत पड़ा रहता है। उसे अपने किनारों पर तूफान लाने या पास बसी आबादी में उथलपुथल मचाने की कोई जल्दी नहीं होती। उथलपुथल है तो इसके धंधे और बाजार में। डेरा आते जाते हुए हमने देखा कि यह केवल मछुआरों का डेरा नहीं बल्कि सुनारों का भी डेरा है यहाँ स्थित गोल्ड सूक दुबई का गोल्ड बेचने और खरीदने का सबसे बड़ा बाजार है। इन बाजारों को भी किसी पर्यटन स्थल की तरह आकर्षक बना दिया गया है। दुबई क्रीक (संकरी खाड़ी) एक प्राकृतिक पानी का स्रोत है जो बड़ी खूबसूरती से दुबई शहर को दो हिस्सों में बांटता है, मोटे तौर पर आज हम इसे नए और पुराने दुबई के नाम से जानते हैं, एक तरफ है डेरा-दुबई और दूसरी तरफ है बर-दुबई। दोनों किनारों में आपको दिखेगा कि कैसे दुबई ने वक्त के साथ तरक्की की है और इस तरक्की के हम पांच दिनों से साक्षी रहे हैं क्योंकि बर दुबई और डेरा के बीच में हमारा होटल है होटल इम्पीरियल सुइट्स।

हम रोज सुबह पहला काम अपने होटल में नाश्ते का करते जो बेहद लजीज होता खासकर इनके मछली, मुर्गों, अण्डों से बने व्यंजन। ठंडे गोश्त की बनी रोटियां भी यहां पहली बार दिखीं। ब्रेड व पीजा-बरगर थे। हम दूध में कार्नफ्लेक्स रोज खाते। दूध बिना शक्कर के मीठा था। पूछ नहीं पाए कि ये गाय-भैंस का दूध है या ऊंटनी का। अपने खाली वक्त में हम होटल से बाहर निकलकर घूमते। इस रोलां स्ट्रीट में कहीं कहीं बनी भारतीय पाकिस्तानी गुमठियों में भी चाय-काफी पीने व नाश्ते करने का आनंद उठाते थे। भारतीय गुमठी मलयाली भाइयों की है तो पाकिस्तानी गुमठी पख्तूनी मुसलमानों की है। यहां तीन भाई बस रोटी बनाने में भिडे रहते हैं – इनमें पराठे, आलूपराठे, रूमाली रोटी की लज्जतदार रोटियां हैं जो पार्सल कर दी जाती हैं। हमारे होटल के वेटर कासिम ने कहा था कि 'कभी उनकी रोटियां लाकर खाइए जनाब और फिर बताइए.’ हमने बताया कि 'अरे मजा आ गया उस्ताद उन पख्तूनों की रोटियां चबाने में।‘

मलयाली गुमठी में ज्यादातर मेहनतकश भारतीय पाकिस्तानी वहां साम्भर उपमा खाते और काफी पीते बतियाते मिलते। मुझे गुमठी में सपत्नीक आता देख वे मलयाली भद्रता के साथ कुर्सी खाली कर देते और तुरत-फुरत अपनी सेवा देने में जुट जाते। हम रोज एक बार वहां नीम की छाँव के नीचे उनकी चौपाल में बैठकर चाय की चुस्कियां लगा आते, लगे हाथ उनके साथ गपिया आते थे।

आज हमारी यात्रा का आखिरी दिन था। होटल में चेक-आउट दोपहर बारह बजे का था और आज इस मुस्लिम बहुल देश में 'ईद’ का त्यौहार था। होटल के मालिक भी मुसलमान थे। नाश्ता करने हम जैसे ही कक्ष में घुसे होटल स्टाफ ने जबरदस्त गरमजोशी से हमें ईद की मुबारकबाद दी और हमें गले लगा लिया। चंद्रा से भी कुछ लोगों ने हाथ मिलाया। गोवा से यहां खाने कमाने आए नवजवान वेटर 'ज़हूरबक्श’ ने हमें प्लेटें हाथ में थमाकर लजीज व्यंजनों को परोसते हुए अपनी मेजबानी साबित की। उसने होटल रिसेप्शनिस्ट से हमारे चेक-आउट को दो घंटे बढ़वा कर हमें और आराम पहुँचाया। हमारी दिल्ली फ्लाइट रात दस बजे थी और हमें चेक-आउट कर सामान होटल के क्लाक-रूम में रखकर शेष समय होटल के रिसेप्शन हाल में ही काटना था। बोंटम ट्रैवेलर्स की जिम्मेदारी पूरी हो चुकी थी। तब जहूर ने ही आज के शेष बचे समय का सदुपयोग करने के लिए हमें रास्ता सुझाया था और हम होटल से बाहर सड़क पर आ गए थे।

बर-दुबई यानि पुरानी दुबई का यह अल-फहीदी स्ट्रीट और इसके आसपास का पूरा इलाका प्रवासी-भारतीयों का इलाका है। हम पैदल चले जा रहे थे तब हमें ऐसे मध्यमवर्गीय मकान भी दिखने लगे थे जिनकी छतों आंगनों में हमारे देशी घरों की तरह धुले कपड़े सूख रहे थे। इन मकानों की गृहणियां नहाकर अपने बाल सुखाते खड़ीं थीं और अपनी ही तरह की एक गृहिणी को मेरे साथ चलते देखकर वे चंद्रा को सहेलीपन से देख रहीं थीं। इस सड़क पर हम किसी बाजार का रास्ता पूछते हैं तब जवाब मिलता है 'आप एक किलोमीटर निकल जाइए आगे मीनाबाजार मिलेगा और वहां सारे भारतीय खानपान वाले रेस्तरां व गुमठियां मिलेंगी।‘ और सचमुच यह बड़ा गुलजार बाजार अपनेपन से भरा मिला। इतने बड़े बाजार में दुकानदारों द्वारा एक इंच भी अतिक्रमण कहीं नजर नहीं आता। ए.टी.एम.मशीनें भी बिना केबिन के खुली दीवारों पर चिपकी हुई हैं। यहां 'डे टू डे शॉप, वन टू टेन दिरहम या टू टू ट्वेंटी दिरहम जैसे नामों वाली किफायती दुकानें हैं। इनमें भारतीय परिवारों की जरूरत के हिसाब से कपड़े, जूते, खिलौने व हर तरह के फैंसी सामान सस्ते दामों में मिल जाते हैं। खरीदारी करते समय थक कर चंद्रा ने यहां एक गुमठी में दही-कचौड़ी भी खा ली थी।

मीनाबाजार पुरानी दुबई के एक गांव 'बस्ताकिया’ से जुड़ा हुआ है। हमें इस गांव को देखने की तीव्र इच्छा हुई। एक राहगीर ने रास्ता बताया 'आगे दुबई म्यूजियम है जिसमें बस्ताकिया गांव की जिन्दगी को कई बुतों (मूर्तियों) के जरिए दिखाया गया है। उसके आगे बस्ताकिया गाँव है।‘ हमारे सामने यहां की पारंपरिक फारसी भवन निर्माण शैली का सौंदर्य पसरा पड़ा है। रेत और मिट्टी से बनी हुई इनकी प्राचीर हैं। भवनों में रोशनदान खूब हैं और इनमें प्राकृतिक हवाओं को शुद्ध और ठंडी करके भीतर भेजने के लिए विंड टावर बने हुए हैं। इससे इन मकानों में शीतलता बनी रहती है।  सत्रहवीं सदी में यहां ऐसे साठ मकान थे जिनमें उस समय के अमीर रहा करते थे। जब तेल के कुँवें मिलने लगे तब ये अमीरजादे नए आधुनिक बन रहे शहरों की ओर दिन-ब-दिन कूच करने लगे। फिर इसे आधी सदी पहले पूरी तरह नष्ट कर जब नया शहर बसाने के लिए एक ब्रिटिश शिल्पकार को बुलाया गया तब उसने दुबई वासियों को समझाया कि इस फारसी शैली की धरोहर को बचा कर रखना चाहिए और उसी तरह से फिर से बसाया जाना चाहिए। इसके लिए ब्रिटेन से प्रिंस चाल्र्स भी उन्हें समझाने आए कि जितना संभव हो इन्हें पूर्व रूप में बनाकर रखा जाए। अब यह बस्ताकिया दुबई के अतीत को झांकने के लिए एक दुर्लभ पर्यटन स्थल बन गया है। इन ग्रामीण ढंग के भवनों के बीच गांव जैसी संकरी गलियां हैं, कई हस्तशिल्प कला की दुकानें है, बाग-बगीचे हैं, काफीहाउस व जलपान केन्द्र हैं। अँधेरा होते ही यहां प्रकाश व्यवस्था ऐसी रखी गई है कि ये मकान स्वर्णिम आभा से युक्त हो जाते हैं जैसे हम किसी ऐसे सोने की पहाडिय़ों और खदानों को देख रहे हों जिन पर अल्सुबह सूरज की किरणें पड़ रहीं हों.. बस्ताकिया को देखना एक विलक्षण अनुभव है।

दुबई अपनी समृद्धि की ऊंचाई को देख चुका है पर ड्राइवर सईद अहमद कहता है 'लेकिन दुबई को हर बात में नंबर वन होना है सर.. चाहे बुर्ज बनाने के नाम पर हो या विकास के किसी भी माडल के नाम पर। दुबई अपनी तुलना केवल न्यूयॉर्क से करता है, न्यूयॉर्क की तरह यहां राइट-हैंड ड्राइव भी है।‘ तब क्या होगा जब अमेरिका उस पर आतंकवादियों को फंडिंग करने का आरोप लगाकर उसके तेल बेचने के धंधे को बट्टा लगाएगा और ईरान से तेल खरीदेगा। होटल के एक वेटर ने हमें भी चौंकाया था कि 'आप लोग डी-ग्रुप के होटल में रुके हैं – यानि दाउद ग्रुप के।‘

आई.एम.एफ. ने दुबई में रिपोर्ट जारी करते हुए बता दिया है कि क्षेत्र के तेल निर्यातकों के लिए, गिरती कीमतों से राजस्व का नुकसान हो रहा है।  यही हाल छह सदस्यीय खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) में शामिल ओमान और बहरीन का भी है। हालांकि कुवैत, कतर और यूएई जैसे देशों की हालत सऊदी अरब के मुकाबले खासी बेहतर है पर अब इनकी कंपनियों में नौकरियों को लेकर बाहरी लोगों में असुरक्षा की भावना घर कर रही है। अब प्रबंधक जैसे सारे पदों में स्थानीय लोगों का बोलबाला होगा। अब इनकी जनाना भी ऊँची तामिल हासिल कर बुर्का उठाकर काम पर जाने को तैयार बैठी हैं और बुर्का पहनकर हवाई जहाज उड़ाने को आमादा हैं। अब ऊपर दो चांद होंगे - एक आसमान में कहीं और दूसरा बुर्के के भीतर।

दुबई में हिंदी बोलने का चलन उतना ही है जितना हमारे देश में मुंबई कोलकाता में है। हिंदी बोलने के मामले में दुबई दक्षिण भारत के शहरों से आगे है। अपने पांच दिनों के दुबई प्रवास में हमने विमानतल कर्मचारी, टैक्सी चालक, गाइड, होटल कर्मी, दुकानदार सभी को धड़ल्ले से हिंदी बोलते पाया है। यहां पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के लोगों की संख्या भी कम नहीं है। हिन्दी का चलन इतना अधिक है कि दुबई में काम करने वाले अरबी अधिकारी कर्मचारी भी हिंदी बोल लेते हैं और वहां रहने वाले भारतीय तो फिर अरबी पूरी तरह बोल लेते हैं। दुबई में हम जिन्हें हिंदी कहते हैं वह हिंदी होने के साथ साथ उर्दू भी हैं। यहां अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मलेन के आयोजन भी होते रहते हैं। हमारे प्रधानमंत्री विदेशों में होने वाली सार्वजनिक सभाओं में लगातार हिंदी में भाषण बोलते हुए दिख रहे हैं। पिछले दिनों एक सम्मलेन में शामिल होने जब मोदी जी दुबई आए थे तब दुबई के क्रिकेट स्टेडियम में उन्होंने हजारों की जनसभा को हिंदी में संबोधित किया था।

दुबई से लौटते समय विमानतल के जाँच अधिकारी ने मेरे पासपोर्ट को देखा और अचानक पूछ बैठे 'विनोद.. कैसे हैं?’ यह एक आनंददायक विदाई थी। हम ओमान की खाड़ी में हिंदी बोलते हुए पहुंचे थे, हिन्दी में बतियाते हुए घूमे फिरे और हिन्दी बोलते हुए अपने देश लौट रहे हैं।  यह अंग्रेजी की तरह हिन्दी का उपनिवेशवादी रूप नहीं बल्कि जनधर्मी रूप है। हिन्दी किसी भी देश के लोकतंत्रीकरण का और भी विस्तार करती है। आज ईद थी। विमान से दुबई की ईद का चांद दिख रहा था। चंद्रा ने उसे कैमरे में भर लिया और अब यह चांद चंद्रा के हैंडबैग में जा समाया था।