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Tuesday 21 Aug 2018

दोहराना इतिहास का अपने...

आज की बहती हवा देखकर अपने तंग दायरे में बैठा सोचने पर मजबूर हूँ कि वह कहाँ हैं, कहाँ हैं जिन्हें नाज़ था हिन्द पर, वह कहाँ हैं? अपने स्टूडेंट लाइफ में अक्सर 'हिस्ट्री रिपिट्स इट्सेल्फ' यानी इतिहास सदा अपने को दोहराता है, की बात बड़ों-बूढ़ों से सुना करता था। तब तो सुना भर करता था, लेकिन ऊपर वाले के रहमोकरम से आज देखने को मिल रहा है। अपने हिस्ट्री के मास्साहेब बताया करते थे कि आदमियों के जंगल जब सबसे पहले धरती पर उगे तो उसी तरह कबीलों या समूहों में यहाँ-वहाँ रहा करते थे जैसे आजकल कहीं गन्ने के खेत, कहीं गेहूँ या सब्जी और कहीं अरहर के खेत अलग-अलग नजर आते हैं। कहते थे कि कुस्तुंटूनिया से लेकर टिंबकटूँ तक वे कबीले फैले थे जो आपस में कभी-कभी अपने को दबंग बताने के लिए एक दूसरे कबीलेवालों से उठापटक किया करते थे। जो जीतता था वही सिकंदर कहलाता था।

इसी संदर्भ में अपने तंग दायरे कि दरो-दीवार पर उसी जमाने में जन्मे मशहूर हाब्स, लॉक और रूसो की बहुचर्चित फिल्म सामाजिक समझौते के सिद्धान्त के खुशनुमा दृश्य देखते हुए खुश हो रहा था। साथ ही यादों की रोशनी में अखण्ड भारत का नारा बुलन्द करनेवाले आज के दिग्गजों की आदमकद आकृतियाँ देखने की कोशिश कर रहा था। सोच रहा था कि उस अखण्ड भारत को जब सात समन्दर पार वाले फिरंगियों ने दो हिस्सों में बांटा था तो लोगों ने बड़ा हो-हल्ला मचाया था। तभी अपने लंगोटिया यार मीर साहब ने धीरे से चपत लगाते हुए पूछा 'अमां जरा अपनी उम्र का तो ख्याल करो। देवदास बने किस पारो की याद में खोये हुए हो मियाँ ? भाई कम से कम इस बुढ़ापे में अपने लख्तेजिगर रमफेरवा की बूढ़ी माई का तो ख्याल करो।

मीरसाहब रमफेरवा की माई का नहीं तो किसी न किसी माई के ख्याल में गुम हो रहा हूँ जो सिर्फ किसी एक की माई नहीं पूरे हिंदोस्तानियों की माई है। इज़हारेख्याल के साथ सब कुछ उन्हें बताया तो मीरसाहब ने ऐसा ठहाका लगाया कि उनके चुचके गालों के गड्ढे यूं दिखे जैसे आजकल सरेराह गली-मोहल्लों की सड़कें गड्ढों से भरी दिखाई देतीं हैं। मियाँ किस जमाने की बातें कर रहे हो? जमाना बदल चुका है। हकीकत सामने है। रोज-ब-रोज मीडियावाले खबरें सुनाते हैं कि फलां गाँव-मोहल्ले में अपने स्वार्थ में अपनी ही माई के टुकड़े-टुकड़े कर के कभी गन्ने के खेत में फेंक देते हैं तो कहीं किसी लावारिस नाले में छुपा देते हैं। मेरा कहने का मतलब वह नहीं है मीरसाहब। मैं तो अपने मुल्क और प्रदेश की बात कर रहा हूँ जहाँ आस्था रखने वाले लोग गंगा-जमुनी तहजीब को एक मुकद्दस माँ की तरह मानते थे। आज वही उसके टुकड़े-टुकड़े करने पर तुले हैं सिर्फ विकास और व्यवस्था के नाम पर। मीरसाहब सुनकर काफी सीरियस हो उठे। कहने लगे मैं हालिया हालात पर तुम्हारे जज़्बात को खूब समझता हूँ मेरे दोस्त, पर किसी सिक्के के दोनों पहलुओं को बदलना अपने बस की बात नहीं है। नया इतिहास लिखने की उनकी पुरानी आदत है। वैसे आदत बुरी नहीं है क्योंकि हर बादशाह की अपनी ख्वाहिश होती है कि वह कुछ ऐसा कर जाये जिससे उसके बाद उसे याद रखा जाये। नाम न सही, बदनाम ही सही।

मुझे अच्छी तरह याद है मियां कि कभी इसे गंगा-यमुना का बड़ा मैदान कहा जाता था। सहारनपुर से सकलडीहा तक संयुक्त प्रांत आगरा व अवध कहलाता था। उसके बाद इसे यूनाइटेड प्राविन्स यानी यूपी के नाम से नवाजा गया। आजादी मिली तो इसे उत्तर प्रदेश कहा गया। इसकी खूबसूरती पर रीझ कर लोगों ने इसे उत्तम प्रदेश तक कह कर अपनी पीठ खुद थपथपाने की कोशिश कर डाली और गड्ढामुक्त सड़क व अपराधमुक्त समाज का दावा ठोंकना शुरू कर दिया। बहरहाल किसी ने इस उत्तम-प्रदेश को एक दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा की बात ख्वाब में भी नहीं सोचा। मैं भी सोचने पर मजबूर हो रहा हूँ कि उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश के बाद अब यह नौबत आ गई कि अब इसे नये नाम उखड़ा प्रदेश से नवाजा जाए। चलिये दिल को बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है कि चलते-चलते सात समंदर पार वाले फिरंगियों ने एक अजीमुश्शान मुल्क को दो हिस्सों में तक्सीम कर दिया। हम आह करके रह गए। उसके बाद अपने ही बिरादरी के नामी-गिरामी लोगों ने सोने की चिडिय़ा कहलाने वाले इस प्रदेश का सर (उत्तराखंड) ही धड़ से अलग कर दिया तो भी हमने अपना समझ कर उफ तक नहीं किया मगर उस धड़ को भी जब टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर अपने मुंह के नेवाले का इंतजाम किया जा रहा है तो रामकसम कलेजा मुंह को आ रहा है।

मन से मजबूत लेकिन दिल से दिवालिया अपने लख्तेजिगर रमफेरवा की माई बीच में टपकते हुए बिना कुछ बके कहाँ रह सकती थी ? आखिर बोलना शुरू किया कि तबै तो एक-एक परिवार में कहाँ एकै चूल्हा पर घर के पूरे परानीन के खाना बनत रहा, कहाँ अब एक-एक घरे मा चार-चार चूल्हा जलत बाटे। हे भगवान कौन बखत आये गवा? सत्ते पे सत्ता लगावे वाले ई अलगाव-बिलगाव के खेल समझत बाटेन तो हमरे सब के कवन कसूर है मीर चच्चा? रसतवा तो वही दिखाये रहे हैं। अपनी मगजमारी माई की लाइन पर चलते हुए रामफेरवा बोल उठा कि हमको तो सबसे अधिक अफसोस यह सोच कर हो रहा है कि वे समझदार लोग भगवान कृष्ण, श्री राम और काशी के शिव को अलग-थलग कर के हमारी आस्था के साथ खिलवाड़ करने पर तुले हैं। उन सब की बातें सुन कर मेरी छठी इंद्री ने समझाया कि मियां इसमे कसूर किसी का नहीं है बल्कि उस इतिहास का है जो केचुल बदल-बदल कर हमारे सामने आता है। वही जमाना याद करो जब हम सब छोटे-छोटे कबीलों या समूहों में रहा करते थे और अपनी दबंगई दिखाया करते थे। पर उस जमाने में हम लिख लोढ़ा पर पत्थर थे। असभ्य कहलाते थे। पर आज तो हम लोग तालीम के तराजू पर खूब भारी साबित हो चुके हैं। चौराहों पर खड़े हो कर दुनिया एक परिवार है का उपदेश सुनते-सुनाते हैं पर खुद जहां बसते हैं उसी को छोटे-छोटे कबीलों में बाँट कर एकता का मजाक उड़ा रहें हैं सिर्फ कानून और व्यवस्था के झूठे सब्जबाग के नाम पर। कोसने को जी चाहता है उस कमबख्त इतिहास को जो बार-बार लौट कर हमें पीछे ढकेल रहा है। लेकिन एकता का ढोल बजाने वालों को तो अक्ल का दरवाजा खोल कर हकीकत देखना चाहिए। अंजाम सोचना चाहिए।