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Sunday 16 Dec 2018

मैं बोल रहा हूं मगर मेरी आवाज नहीं आती

अजीब बात है, मैं बोल रहा हूं, लगातार बोले जा रहा हूं, कई बार जोर से भी बोलता हूं, परंतु वह कह रहा है कि उसे मेरी आवाज नहीं आ रही। मोबाइल फोन पर बात करते हुए कई बार ऐसा भी होता है। यह अनुभव हमें कई बार होता है, किन्तु हम इसे तकनीकी कारण मानकर चुप हो जाते है। इससे उलट एक दूसरा सत्य भी है। हम मोबाइल पर नहीं, प्रत्यक्ष बातें कर रहे होते हैं, परंतु सामने वाला सुनता ही नहीं। बोलचाल की भाषा में भी कहा जाता है कि वह मेरी बात नहीं सुनता। मां बाप बच्चों की शिकायत करते है। बच्चे उनका कहना नहीं सुनते। यह कैसे संभव है? यहां तो कोई तकनीकी कारण नहीं। हवाएं हमारी आवाज को दूसरों तक पहुंचाने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। फिर भी लोग यह शिकायत क्यों करते है कि - मेरी कोई सुन नहीं रहा है ? पहले मोबाइल फोन की बात करे। जिन दिनों हम मोबाइल फोन का बस नाम भर सुनते थे, देखने या पास होने का प्रश्न तक नहीं था, उन दिनों कहा जाता था कि ऐसे फोन तो बस बड़े-बड़े लोगों के पास होते हैं, या उनके पास जो आवश्यक सेवाओं में आते है। उदाहरण के लिए बड़े नामी डॉक्टर्स, जिन्हें पता नहीं कब किस घड़ी किसी की जान बचाने के लिए दौड़ जाना पड़ता हो। या लगता था ऐसे फोन तो नेहरूजी की जेब में हो सकता था जिन्हें दुनियाभर से बात करना जरूरी था, अन्यथा हम दुनिया भर में अकेले होकर महाशक्ति बनने की बात सोचते भी कैसे ? दो महायुद्धों ने मित्र राष्ट्रों की अवधारणा और शक्ति का जो प्रभाव विश्व पर डाला, उससे एक बात साफ हो चुकी थी कि हमारे मित्र ही हमारी शक्ति बन सकते है। यह मैत्री बिना बातचीत या वार्ता के संभव नहीं। विज्ञान ने जब हर आदमी को यह मोबाइल फोन सुलभ करा दिया है तो हम निकट के दूर के सभी लोगों से अपना संवाद जारी रख सकते है। अपना मित्र मण्डल अधिक जीवंत बना सकते है। इसके बाद हम अकेले नहीं रह जाते। फिर भी मोबाइल का महत्व इतना भर नहीं है। वह हमारे भीतर हमारे होने के महत्व का अहसास भी कराता है। विश्वास न हो तो कभी दो-चार रोज दिन के लिए किसी यात्रा पर चले जाइए और अपना फोन बंद कर लीजिए, फिर खुद ही आपको पता चल जाएगा कि आप कितने महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। कितने लोग आपके लिए चिंतित उत्सुक और अधीर हंै। आपकी आवाज भर सुनाई दे तो उनके गले से पानी का घूंट उतरे। आपकी कितनी जरूरत अपनों को और दूसरों को है। मोबाइल के बहाने ही सही, एक आम आदमी को भी अपना महत्व समझ में आया तो यह कम बात नहीं है। एक आदमी की आवाज़ का महत्व भी जब यह मोबाइल सब को समझा देगा, तब दूसरी और महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

एक पुरानी कहावत है, नक्कारखाने में तूती की आवाज़, परंतु जिन लोगों की तूती बोलती है, उनके लिए नक्कारखाने इतना शोर करते हैं कि, तूती की आवाज को ही खा जाते है। नक्कार का अर्थ है नगाड़ा। इसे डंका और भेरी भी कहा जाता है। इसका इतना शोर होता है कि पतली आवाज की तूती इसमें गुम हो जाती है। दुनिया एक तरह का ऩक्कारखाना है। इसमें किसी की कोई सुनने को तैयार नहीं हैं, अलबत्ता हर कोई अपनी कहने को बेसब्री से इंतजार करता रहता है। वैसे भी नक्कार या नकार शब्द इनकार का ही संबंधी है, इनकार करना इनका स्वभाव है, यह कहता है, मैं ही बोलूंगा और किसी की नहीं सुनूंगा। एक बार ओशो ने कहा था कि कई लोग दूसरों की बात नहीं सुनते वह सिर्फ इतनी प्रतीक्षा करते हंै कि आप चुप हो तो वह शुरू हो सके।                                               

इस संकट को आधुनिक भाषा में संवादहीनता कहा जाता है। यह एक बड़ा संकट है, इसके पीछे कोई तकनीकी कारण नहीं, हमारे भीतर व्याप्त एक तरह की मानसिकता है जो शहरी संस्कृति की सह उत्पाद प्रक्रिया है। संवाद हमेशा दो पक्षीय होता है। एक पक्षीय नहीं। भाषण एक पक्षीय होता है, परंतु सर्वविदित है कि भाषण सुनने को कितने लोग तैयार होते है। हमारे यहां अंग्रेजी के लेक्चर शब्द के लिए इसी लिए दो अलग अलग शब्द चुन लिये गए है। भाषण और व्याख्यान। भाषण सुनना विवशता हो सकती है, और व्याख्यान सुनना आवश्यक्ता। यह भिन्न भिन्न लोगों की स्थितियां हो सकती है।

बात की शुरूआत- आवाज नहीं आने से हुई थी। यह एक दूसरा संकेत है। हमारी आवाज़ का अपना एक अलग महत्व है। हर आदमी की आवाज़ यदि वह सत्य और न्याय के पक्ष में है, तो वह महत्वपूर्ण हो जाती है। अन्याय के विरूद्ध यदि हमारी आवाज़ नहीं उठती, तो हमारी आवाज़ एक शोर का हिस्सा भर है। आवाज़ होने की उसमें पात्रता नहीं है। जब कोई दिखावे के लिए विरोध करता है और भीतर से भ्रष्ट व्यवस्था का साथ देता है तो उसकी आवाज़ अपनी अर्थवत्ता खो देती है।

संसार में इतनी आवाजें़ अन्याय के विरूद्ध उठती रहती है, परंतु उन्हें कोई नहीं सुनता। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर एक-एक समाचार को दिन-दिन भर घसीटते, चीखते और उस पर निरर्थक बहसें हवाओं में व्याप्त हैं, पर वह किसी को सुनाई नहीं देती, तो इसलिए कि इन आवाज़ का आधार कहीं नहीं है। इन आवाजों के पीछे सत्य की पक्षधरता नहीं है, केवल दिखावा और प्रचार है। ऐसी आवाज़ें अनसुनी कर दी जाती हैं, परंतु जब भीतरी कुहासों को चीरती हुई किसी कबीर की आवाज़ उठती है तो उसे सदियों तक सुना जाता है।

यदि हम बोल रहे है और हमारी आवाज़ नहीं आ रही है तो केवल  ऩक्कारखाने को दोष देने से कुछ नहीं होगा। हमें अपनी आवाज़ के साथ उसकी अर्थवत्ता को जोडऩा होगा। हमारे संवाद को आत्मीय और स्वार्थरहित बनाना होगा।

वस्तुत: वाणी धर्म का बीज है। वह शक्ति है। मनुष्य को वाणी  का वरदान मिला है। इसे तुच्छ तर्कों-विवादों या व्यर्थवादों से बचाकर ही ऊर्जा के संपन्न किया जा सकता है। वाणी व्यक्तित्व को उध्र्व आयाम दे सकती है। जिस साधना के द्वारा सज्जन वाचा सिद्धि को प्राप्त करते है, वह साधना निष्कपट और सत्यनिष्ठता के द्वारा ही संभव होती है।

व्यर्थ विवादों, पिष्टपेषणों, चुगलखोरी और निंदा के लिए वाणी का उपयोग करने वाले अपनी वाणी की शक्ति और उसका प्रभाव खो देते हैं। ऐसी वाणी बोली तो जाती है पर सुनी नहीं जाती। इसलिए इतना शोर है सब दूर, इतनी बड़बड़ाहटों से थरथराती हवाएं है, परंतु काल की स्मृति में वह सब विस्मृति के द्वारा मिटा दी जाती है। कुछ बातें है जिन्हें मानवीय स्मृतियां हमेशा संजो कर रखती है। बोलने वाले तो चले गए परंतु बोला हुआ अमर हो गया। जब तक अपनी आत्मीयता और अपने अस्तित्व की सार्थकता को वाणी में बचाया नहीं जाता, तब तक वाणी में सुनने लायक तत्व नहीं जगते। इसके अभाव में कहा गया सुनकर भी सुना नहीं जाता।

वह सब सुना जाता है जो सचमुच कहा जाता है। जो सचमुच नहीं कहा जाता वह कानों को छूकर भी नहीं छूता। वह सुनकर भी अनसुना रह जाता है।

हमारी आवाज़ सुनी जा सके इतनी ऊर्जा, इतनी सत्यनिष्ठा और आवाज़ की सच्चाई यदि हम संजो सके, जो हमारे ही आचरण से जन्मी हो तो हमारी आवाज़ भी सुनी जाएगी अन्यथा यह कहते ही रहने से कोई लाभ नहीं होगा कि हमारी आवाज़ सुनी नहीं जा रही।