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Sunday 16 Dec 2018

सीता के चरित्र पर युगीन प्रभाव : भारतभूषण अग्रवाल की 'अग्निलीक’ के विशेष संदर्भ में

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अत: समाज और समय की गतिशीलता के अनुरूप उसकी सोच व चरित्र भी परिवर्तित होता रहता है। फिर एक साहित्यकार तो समाज का अभिन्न हिस्सा है। जिस प्रकार साहित्य और समाज परस्पर आश्रित और प्रभावित होते हैं उसी तरह साहित्य और साहित्यकार भी एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। साहित्यकार समय के अनुरूप अपनी भूमिका तलाशते हुए रचना कर्म के माध्यम से समाज को दिशा देने का काम करता है। यही कारण है कि रचनाओं के पात्रों के चरित्र में भी समय के अनुरूप बदलाव होता आया है। वैदिक युग से लेकर आधुनिक युग की रचनाएं इसका प्रमाण है।

एक श्रेष्ठ रचनाकार वही होता है जो समय, परिस्थिति, परिवेश के अनुरूप अपने सृजन कर्म को आयाम दे। इसी परम्परा में भारतभूषण अग्रवाल आधुनिक युग में ऐसे सशक्त रचनाकार के रूप में हमारे सामने आते हैं जिन्होंने इतिहास की घटनाओं और चरित्रों को नवीन दृष्टि प्रदान की है। वे मात्र आदर्श की लीक पर चलने वाले या कहें कि थोथे आदर्श का ढिंढोरा पीटने वालों को यथार्थ का आईना दिखाने में सक्षम हैं । उन्होंने 'अग्निलीक' नामक लघु आकारीय किन्तु बहुत ही महत्वपूर्ण रचना के माध्यम से पौराणिक मात्र राम तथा सीता को क्रमश: माननीय तथा आधुनिक युग की नारी का रूप प्रदान किया है। अग्निलीक के राम जब आदर्श चरित्र का लिबास उतारकर यथार्थ के धरातल पर उतरते हैं तो वे स्वीकार करते हैं-

यह शब्दलोक निरा छल है

जो हमें यथार्थ से वंचित रखता है

क्योंकि वह वर्तमान की अनरुंधी लोक पर चलने से इंकार करता है।

भारतभूषण अग्रवाल स्वयं स्वीकार करते हैं 'सच्ची आदर्श दृष्टि की परख यही है कि जो लोक आदर्श अतीत के अंधेरे से विलुप्त हो चुका है उसे अपने प्राणों की मशाल से प्रदीप्त और उपलब्ध करें। साहित्य में सीता का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में स्थापित किया गया। इसी सीता के चरित्र को महर्षि वाल्मीकि और तुलसीदास से लेकर भारतभूषण अग्रवाल जैसे महत्वपूर्ण रचनाकारों ने अपने-अपने तरह से बखान किया है। पारंपरिक भारतीय साहित्य में सीता एक आदर्श भारतीय स्त्री के रूप में स्थापित है। वे संस्कारवान, आज्ञाकारी स्त्री हैं। उनमें कहीं कोई विरोध का स्वर सुनाई नहीं देता। वह अपने पति की परछाई बनकर उनके पीछे-पीछे चलती हंै। अपने माता-पिता, सास-ससुर, गुरु और समाज के सभी बड़े लोगों की आज्ञा का पालन अपना परम कर्तव्य समझती हैं। यही उनका धर्म है। यहां तक कि निष्कलंक सीता के चरित्र पर जब झूठा शक किया जाता है तो वह मूक बन सभी के समक्ष अग्नि परीक्षा तक देती है। इसके बाद भी एक धोबी के कहने पर उन्हें वनवास का आदेश दिया जाता है तो उसे भी वह स्वीकार कर लेती है। राजसी परिवार की वह गर्भवती स्त्री वन में तमाम परेशानियां सहती हुई अपने आदर्शवान होने का पग-पग पर प्रमाण देती हैं और अंत में धरती में समा जाती है। कुल मिलाकर संघर्षों का जीवन और मूक ज़ुबान।'

जब यही सीता समय के ढेर सारे पड़ाव पार करती हुई आधुनिक युग में जन्म लेती है तो वहां इसके तेवर समयानुकूल बदल जाते हैं। तुलसीदास की वह सीता जो अपना मुंह बंद कर आदर्श की गठरी लेकर जीती थी, अब वही सीता 'अग्निलीक' में अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होकर अभिव्यक्ति की हिम्मत रखती है। यह रचना स्त्री की आधुनिक सोच को बखूबी बयां करती है। चूंकि दौर आधुनिक है, अब वह शिक्षित आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गई है। अब वह अबला नहीं रही वरन समय के अनुकूल समाज में मजबूती से खड़ी है। वह अपने अधिकार के प्रति सचेष्ट है। अब वह 'पढिय़े' गीता, बनिये 'सीता' की तरह गउ नहीं रह गई। वह पुरुष के पीछे-पीछे चलने वाली नहीं रही वरन अब वह अर्धांगिनी के समुचित अर्थ व अधिकार से वाकिफ हो चुकी है। इसीलिए आधुनिक युग के लेखक भारतभूषण अग्रवाल ने अग्निलीक की सीता को तुलसीदास की तरह 'जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।' 'नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे, सरद बिमल बिधु बदनु निहारे।।' समझने वाली स्त्री के रूप में स्थापित नहीं किया बल्कि यहां तो वह बड़ी ही मुखरता से अपने पति राम से प्रश्न करती है, अपनी पीड़ा, अपनी भावनाएं निडरता से व्यक्त करती है। उनमें आक्रोश है।

गर्भवती सीता को अग्नि परीक्षा देने के बाद भी जब जंगल में छोड़ गिया जाता है, तो वे वाल्मिीकि के आश्रम में समय व्यतीत करती हैं। सीता बहुत व्याकुल हैं। तब वाल्मीकि उनसे कहते हैं कि यह विकलता तुम्हें शोभा नहीं देती। सीता बड़ी हिम्मत से कहती हैं-

शोभा, शोभा?

हां नारी तो शोभा ही है

उससे तो शोभा ही मांगी जाती है

गुरुदेव, क्या इस रामराज्य में सत्य का कोई स्थान नहीं

सब कुछ शोभा के लिए हैं?

और उस शोभा का सारा भार

एक नारी के ऊपर ही है?

गर्भवती स्त्री को जब अपने पति और परिवार की नितांत आवश्यकता होती है ऐसी हालत में सीता का परित्याग कर दिया गया। सीता अपनी पीड़ा व्यक्त करती हुई कहती है-

मैं जंगलों में मारी मारी फिरी

अपनी प्रसव वेदना के समय

आप ही अपनी परिचारिका बनी

और फिर दो नन्हें-नन्हें बच्चों को अपनी छाती से चिपकाए

पेड़ों के फल खाकर

नदियों और नालों का जल पीकर

जिस-तिस के आगे हाथ पसारकर

लम्बे दिन और सूनी रातों में कलपती बिखरती फिरी

वाल्मीकि उन्हें शांत करने की कोशिश करते हैं लेकिन सीता अपने अंदर के गुबार को रोक नहीं पाती और एक क्रांतिकारी के समान इस पुरुष प्रधान सामाजिक ढांचे पर प्रहार करती हैं -

आप सोचते हैं मैं रो रही हूं?

दया की भीख मांग रही हूं?

प्रलाप कर रही हूं?

आप नहीं समझेंगे गुरुदेव,

इस यंत्रणा को आप नहीं समझेंगे।

आप भी तो पुरुष हैं।

ये आंसू नहीं गुरुदेव ये अंगारे हैं

यह मेरे जीवन की आग है

जो मेरे भीतर धधक रही है

आप क्या जानें

इस संसार में नारी कितनी अकेली है।

यह सर्वविदित है कि सीता का स्वयंवर हुआ था। सीता ने स्वयं राम को पति के रूप में चुना था। सीता ने पूरे विश्वास के साथ स्वयं को राम के प्रति सर्वस्व न्यौछावर किया था, किन्तु उस समर्पण के बदले राम ने सीता को क्या दिया? सिर्फ निष्कासन! आधुनिक युग की सीता राम पर आरोप लगाती हुई तनिक भी नहीं झिझकती-

मैंने इनके ऊपर अपना तन-मन न्यौछावर किया था।

पर ये- न जाने किस मिट्टी के बने हैं?

इन्होंने देखकर भी नहीं देखा

सुनकर भी नहीं समझा।

दिन-रात आठों पहर बस इन्हें एक ही धुन थी

राज्य, राजनीति, संग्राम, विजय!

सोते जागते हर पल में राजा ही बने रहे ये

कभी प्रेमी नहीं बन पाए!

सीता कहती हैं कि मैंने विवाह के समय भावी जीवन के तमाम सुनहरे सपनों के साथ ससुराल में कदम रखा था, किन्तु राम के पिता ने राम को वनवास दे दिया। यहां सीता बड़ी ही मुखरता व बुद्धिमता से रघुवंशियों की परंपरा पर प्रश्न उठाती हैं-

इन महान रघुवंशियों के कुल में

राज्य को इतना महत्व क्यों दिया जाता है?

और भावना का इतना निरादर क्यों होता है?

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नारी प्रेम के बदले राज्य ही मांगती है

और पुुरष उसकी अनुचित मांग पर

अपने कर्तव्य को

अपने पुत्र स्नेह को

अपने धर्म तक को छोड़ बैठता है।

यह कैकेयी के मोहपाश में बंधे राजा दशरथ के निर्णय पर भी प्रश्न उठाती है। कटाक्ष करती है। यह सिर्फ आधुनिक परिवेश के कारण ही संभव जान पड़ता है। यह सर्वविदित है कि राम राज्य में प्रजा का हित ही सर्वोपरि था किन्तु सीता आरोप लगाती है कि ये प्रजापालक बनने का ढोंग रचते हैं। राम राज्य में प्रजा का हित भी प्रचार मात्र था।

यूं तो हर युग की सीता ने वनवास के समय राम का सहर्ष साथ दिया। वह हमेशा राम के सुख-दुख की साक्षी रही, किन्तु आधुनिक युग की सीता वाल्मीकि और तुलसीदास की सीता से बिल्कुल अलग है। उनके अंदर रोष है, पीड़ा है। वह कहती है-

इनका मन राज्य की ही उधेड़बुन में उलझा था।

नारी के प्यार को जानने का

इन्हें अवकाश कहां था?

और अवकाश होता भी तो क्या जान सकते थे?

हाय, वह पुरुष नारी के प्यार को क्या समझेगा

जिसके पिता ने तीन-तीन ब्याह रचाएं हों

और जिसने अपनी आंखों के आगे

प्यार का सौदा होते देखा हो।

सीता के अन्तर्मन की पीड़ा तब और भी फूट पड़ती है जब लंका विजय के बाद पाक-साफ सीता को अग्नि-परीक्षा देने का आदेश होता है। भारतभूषण अग्रवाल ने इस वेदना को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। सीता कहती हैं-

नारी जिसे प्यार करती है उसके दोष नहीं देखती।

मैंने सोचा, कभी तो वह दिन आएगा

जब राम मुझे समझेंगे

और उसी की प्रतीक्षा में मैं सांसें गिनती रही।

पर रावण का नाश होने पर भी,

मेरा सपना पूरा न हुआ।

जब हनुमान मुझे लेकर

विजय वीर के पास पहुंचा

तो उन्होंने गले लगाना तो दूर

मेरी दशा भी न पूछनी चाही।

महत्वाकांक्षाओं से भरी आंखें

दूर क्षितिज पर गड़ाते हुए

राजसी भंगिमा में बोले,

तुम्हें, अग्नि को साक्षी बनाकर वचन देना होगा

कि तुम पवित्र हो।

किसी पतिव्रता नारी का इससे बड़ा अपमान और क्या होगा। सीता कहती हैं ऐसा सुनते ही मेरे सपनों का महल तो जैसे चकनाचूर हो गया। वो कहती है मैंने चौदह वर्ष जिस राम के साथ बिताए वह मुझे इतना भी नहीं समझ सका। वे आगे कहती हैं कि मैंने रघुकुल की लाज बचाने इस अग्नि परीक्षा को भी स्वीकार कर लिया यह सोचकर कि अब मैं ससम्मान अपने परिवार में रह सकूंगी। किन्तु यह मेरा भ्रम ही था क्योंकि 'राम के मनोजगत में प्यार को कोई स्थान नहीं।' वे बराबरी के हक और समर्पण की बात करती हुई कहती हैं-

मैं तो तब मानती

जब ये राजा की तरह दण्ड देते

और फिर

प्रेमी की तरह मेरे साथ चले आते।

मैं भी तो ऐसे ही वन गई थी।

वे महत्वाकांक्षी राम पर आरोप लगाती हैं-

न जाने कब से सुनती आ रही हूं

कि इन्होंने बड़ा त्याग किया,

पत्नी को छोड़कर बड़ा कष्ट भोगा है

पर मैं आपसे पूछती हूं

इन्होंने पत्नी को अपनाया ही कब था?

ये तो राज्य के मतवाले थे,

विजय-श्री के भूखे थे,

प्यार से इन्हें लगाव ही कब था?

सीता राम पर सीधे कटाक्ष करती हैं और कहती हैं कि राम बहुत महत्वाकांक्षी थे। उनके लिए रघुवंश की कीर्ति बढ़ाने की लालसा ही प्रमुख रही। राज्य और राजकीय कार्य प्रमुख थे। उनकी निर्लिप्तता तो सिर्फ सीता के प्रति रही। 'अग्निलीक' की सीता में आधुनिक नारी की तरह साहस, निडरता, बेबाकीपन दिखाई देता है। वह अपनी अन्तस की भावनाओं को व्यक्त करने में तनिक भी झिझकती नहीं। पुरुष प्रधान समाज में जिस तरह पुरुष स्त्रियों के त्याग का अधिकार रखते हैं वैसे ही सीता राम के परित्याग की बात कहती हैं जो आज के समानाधिकार की ओर इशारा करता है-

राम ने तो मुझे पहले ही छोड़ दिया था

आज मैं भी राम को छोड़ती हूं।

अब मैं स्वतंत्र हूं, मुक्त हूं

अपने आप में पूर्ण हूं,

आप अपनी निर्देशिका, आप अपनी कत्र्री और आप अपनी भोक्ता हूं।

वह कहती हैं कि अब तक तो मैंने परिवार की मर्यादा और निष्ठा का आदर किया, मान रखा किन्तु अब मैंने तो आवरण उतारकर फेंक दिया है। अब मैं बराबरी का अधिकार रखती हूं। सीता इस बात को भी रेखांकित करती है कि समाज में स्त्रियों की भूमिका मात्र वंश का विस्तार करना है। वो कहती हैं- शास्त्रों का तो वचन ही है कि भार्या पुत्रप्राप्ति के लिए ही की जाती है, सो वो मैंने दे दिए। अब मेरा यहां क्या काम? उसे अपना जीवन तब और निरर्थक जान पड़ता है जब राम ने पूजन के समय सोने की सीता बनाकर अपना पूजन कार्य पूर्ण किया। इस बात पर सीता पूरी तरह टूट जाती है और कह उठती हैं-

हाय, जिसका स्थान सोनेे की प्रतिमा ले सकती है

उसके जीने का प्रयोजन ही क्या है

उन्हें बहुत ही कष्ट होता है, दुखी होती है और निराश सीता अंत में कह उठती हैं-

मैंने जिसे तन-मन से चाहा था

वह मुझे पहचानने में असमर्थ रहा।

महर्षि वाल्मीकि तथा पुत्र लव-कुश के लाख समझाने के बाद भी धरती पुत्री व्यथित सीता यह कहते हुए मेरी और दुर्गति न कराओ, धरती में समा गईं।

इस प्रकार इस पूरे प्रसंग में सीता आधुनिक परिवेश की बेबाक, निडर व जागरुक स्त्री के रूप में दिखाई देती हंै, जो अपने कर्तव्यों का पालन भी करती है और अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का खुलकर विरोध करने की हिम्मत भी रखती है। वे स्त्रियों के अस्तित्व और अस्मिता का सम्मान करने वाली एक स्वाभिमानी स्त्री के रूप में हमारे समक्ष आती हैं।

भारतभूषण अग्रवाल ने इस ग्रंथ के माध्यम से यह बात भी स्पष्ट कर दी कि इतिहास सिर्फ सीखने के लिए होता है, दोहराने के लिए नहीं। इतिहास के ग्रंथों को दोहराने से भविष्य सिर्फ अंधकारमय होता है। जीवन की सच्ची अनुभूति जीवन में प्रेम, सौहाद्र्र और समर्पण में ही है-

मैंने सिद्ध कर दिया कि ग्रंथों की नींव पर

अंधकार के ही परकोटे खड़े होते हैं

और तुमने अपनी उदय आत्मचर्या से

प्रमाणित कर दिया कि जीवन की सच्ची अनुभूति ही

इस अंधे युग की अकेली अग्निलीक है-

प्यार, सत्य, मुक्ति उसी लीक पर मिलते हैं।

इस प्रकार भारतभूषण अग्रवाल रचित इस काव्य नाटक में समकालीन युग से प्रभावित सीता का चरित्र थोथे आदर्श के स्थान पर यथार्थ के धरातल पर लाकर गहरे प्रभाव डालता हुआ पाठक को नवीन दृष्टि से सोचने को मजबूर करता है।