Monthly Magzine
Tuesday 21 Aug 2018

सीता की खोज में लंका में हनुमान: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से

रामकथा से थोड़ा भी परिचित व्यक्ति भली-भांति जानता है कि सीता की खोज में अंगद के नेतृत्व में दक्षिण दिशा की ओर गया वानर दल किसी तरह यह जानकर कि सीता लंका में है समुद्र किनारे पहुंच कर प्रसन्न होता है किंतु 100 योजन समुद्र को देख सबकी हिम्मत पस्त हो जाती है। तब जामवंत के उत्साहवद्र्धन पर हनुमान अपने शरीर को विशाल बना कर समुद्र पार कर लंका की ओर बढ़ते हैं। यहां अनेकानेक बाधाओं को पार कर और फिर लंका की पहरेदार विकटवदना लंकिनी को पराजित कर हनुमान सीता की खोज में अंतत: लंका में प्रवेश करते हैं। लंका में हनुमान ने सीता को कैसे खोजा, इसका वाल्मीकि तथा अन्य रामायणों में भी सुंदर वर्णन है जो हनुमान की सूझबूझ तथा राम और सीता के प्रति भक्ति को तो दर्शाता है ही, किसी भी कठिन कार्य का बीड़ा उठाये व्यक्ति की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी करता है।

अस्तु, रात के अंधेरे में पवनपुत्र लंकापुरी पहुंचते हैं। सौ योजन की यात्रा के बाद हनुमान ने नेत्रों को सुख देने वाली जगमगाती लंका नगरी को देखा। तब मन में विचार आया कि मेरा विशाल शरीर और तीव्र वेग देख राक्षसों को कौतूहल होगा, अत: उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप को धारण किया। वाल्मीकि यहां सुंदर उपमा देते हैं पुन: प्रकृतिमापेदे वीतमोह इवात्मवान् अर्थात् जैसे मन को वश में रखने वाला मोहरहित पुरुष अपने मूलस्वरूप में प्रतिष्ठित होता हेै वैसे ही हनुमान अपने मूलरूप में आ गये।

लंकापुरी की शोभा ,उसकी भव्यता और विस्तार और सुरक्षा देख हनुमान चमत्कृत थे किंतु तभी अनेकानेक शंकाओं ने भी उनके मन को घेर लिया। लंका की सुरक्षा व्यवस्था को देख हनुमान क्षण भर को तो लगभग निराश ही हो गये थे। मन में विचार आया ...यदि वानर किसी तरह यहंा आ भी गये तो व्यर्थ होगा क्योंकि युद्ध के द्वारा देवता भी लंका पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते (वा.रा.सुं.कंा. 2..27) । इससे बढ़कर और कोई विषम स्थान नहीं है। इस रावणपालित दुर्गम  लंका में आकर महाबाहु राम भी क्या कर लेंगे (वही , 2.28)! वैसे बाद में राम और लक्ष्मण के पराक्रम का विचार कर वे इस विचार को झटक देते हैं तथा मन में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं किंतु उनके मन में गहन मंथन भी चलते रहता हैं...कैसे मैं सबसे बचते हुए तथा सबसे ओझल रहते हुए सीता माता का पता लगाऊं? कहीं ऐसा न हो कि मेरे अविवेक के कारण राम का कार्य और भी बिगड़ जाये! अविवेकी दूतों के कारण ऐसा ही होता है। इससे तो मेरा समुद्र लांघना भी व्यर्थ हो जायेगा। इस रूप में तो तत्काल मैं पहचान लिया जाऊंगा...मैं राक्षस का रूप धारण करूं तो भी पकड़े जाने की आशंका है, यहां तो लगता है कि वायुदेव भी राक्षसों से छिपकर प्रवेश नहीं कर सकते! तब हनुमान ने यह सोचकर कि यदि अपने वास्तविक रूप में भी लंका में प्रवेश करूं तो तत्काल पकड़ा जाऊंगा, अपने शरीर को छोटा, बिल्ली के बराबर कर लिया (वही, 2 .49)।(यहां उल्लेखनीय है कि विभिन्न रामायणों ने हनुमान के इस रूप-परिवर्तन का अलग-अलग वर्णन किया है। मानस में वे मच्छर के समान छोटे बन गये-मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।-सुं. कां. 4) ,जगमोहन रामायण में हनुमान कभी बिल्ली तो कभी बाज तो कभी भंवरे का रूप धारण करते हैं (खंड 3 ,पृ.123.-128)।

अस्तु ,वाल्मीकि के अनुसार बिल्ली के समान छोटे आकार में सतोगुण का आश्रय ले रात्रि के अंधकार में मारुति ने सतर्कतापूर्वक लंका में प्रवेश करने का प्रयास किया। किंतु सारी सतर्कता व्यर्थ गई। जाने कहां से एक विकटवदना राक्षसी वहां प्रगट हो गई! कठोर स्वर में वह हनुमान से उनका परिचय और इस तरह छिप कर प्रवेश का उद्देश्य पूछने लगी। किंतु हनुमान भी निर्भीक बने रहे...उल्टे उसी से उसका परिचय पूछा। पता चला कि वह लंका की अधिष्ठात्री देवी है। उसका नाम 'लंकाÓ (मानस में लंकिनी, रामकियेन में लंकासुंदरी) है और वह लंका नगरी की रक्षा के लिये रावण द्वारा नियुक्त की गई है। अत्यंत गर्व से उसने कहा - अहं हि नगरी लंका स्वयमेव प्ल्वंगम् अर्थात् हे वानर! मैं स्वयं ही लंका नगरी हूं और सब ओर से इसकी रक्षा करती हूं (सुं.कां.3. 30)। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा ...मैं तेा कौतूहलवश केवल लंका की शोभा देखने आया हूं । इसे देखकर जैसा आया हूं वैसा ही लौट जाऊंगा।

      एक मामूली सा बंदर और लंका की शोभा देखने आये! रावण की लंकानगरी के लिये यह अपमान था , अत: लंका ने भयंकर गर्जना करते हुए हनुमान को झनाकेदार थप्पड़ मारा। तब क्रोधित हो हनुमान ने भी बाएं हाथ की अंगुलियों को मोड़कर मुक्का बनाया और उसके मुख पर जड़ दिया। स्त्री होने के कारण हनुमान ने मुक्का अधिक बल से नहीं मारा किंतु लंका के लिये उतना ही बहुत था। चारों खाने चित्त हो वह धरा पर गिर पड़ी...किंतु फिर उठकर उसने हमला करने का प्रयास नहीं किया वरन् प्राणों की भीख मंागते हुये उसने हनुमान से एक रहस्य की बात कही कि ब्रह्मा का वचन अब निश्चय ही सच होने वाला है जिन्होंने कहा था कि जब कभी कोई वानर तुम्हें वश में कर ले तो समझ लेना कि लंका और लंकापति का विनाश निश्चित है! (बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।। -मानस) लंका की अधिष्ठात्री देवी होते हुए भी वह इस घटना पर दु:ख नहीं मनाती बल्कि रावण को ही कोसती है जिसने सती-साध्वी सीता का हरण कर लंका के विनाश के बीज बोए हैं...और वह सादर हनुमान को लंका में प्रवेश करने तथा सती सीता की खोज करने की अनुमति दे देती है (वही, 3.47-51)।

      महाकवि कंबर ने भी हनुमान के लंका-गमन का और लंका में सीता की खोज का का सुंदर वर्णन किया है। उड़ते हुए हनुमान जब लंका पहुंचे तब आकाश में तारे चमक रहे थे। ये ऐसे लग रहे थे मानों कर्तव्यरत हनुमान के ऊपर देवों द्वारा बरसाये गये फूल हों जो रावण के डर से न पृथ्वी पर गिरे न ऊपर ही जा सके और  बीच में ही लटक गये (कं.रा.सुं.कां 152 )। सीता का अन्वेषण प्रमुख कार्य था अत: हनुमान बहुत संभल कर लंका की चारदीवारी के पास पहुंचे जहां एक विशालकाय राक्षसी लंका की निगरानी बड़ी चौकस होकर कर रही थी। उसकी आंखों से अंगार छिटक रहे थे। उसकी आठ भुजाएं, चार मुख, वक्ष आदि ज्योतिर्मय थे। उसकी अंाखें निरंतर घूमती थीं। उसके हाथों में भाला, तलवार, शूल, गदा, धनु और अन्य अस्त्र थे। पैरों की भयानक पायल वह हिला रही थी जिसकी ध्वनि मानों वर्षा के शब्द थे । वह विद्युत् सी चमक वाले आभरण एवं पंचरंगी साड़ी धारण किये हुए थी। यह लंका की संरक्षक लंकादेवी थी । हनुमान बच कर चल रहे थे। किंतु हनुमान को लंका में प्रवेश करते उसने देख लिया। रोककर कहा- रुको ! ठहरो! कहां जा रहे हो ? मूर्ख! तुमने वह काम किया है जिसे करने की किसी ने हिम्मत नहीं की है... पर तुम शाखामृग हो... तुम पर क्या कोप करूं? चलो भागो यहां से। तुम प्राचीर से कूद कर मेरी शत्रुता मत मोल लो। पर हनुमान तो शत्रुता मोल लेने ही आये थे। निडर हो उन्होंने कहा-मैं लंका देखने आया हूं। देखकर ही जाऊंगा। तब लंकादेवी ने शूल चलाया जिसे वायुपुत्र ने सहज ही तोड़ दिया। खूब छकाने के बाद अंतत: हनुमान के बलिष्ठ मुक्के के प्रहार से लंकादेवी समझ जाती है कि अब ब्रह्मा की बात सच होगी। लंका का विनाश निकट है। ...और वह सादर पवनपुत्र को लंका में जाने देती है (वही 190)। मानस में लंका की रक्षक लंकिनी मसक के समान रूप धरे हनुमान को लंकाप्रवेश से रोक देती है, किंतु तभी मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी। एक घूंसे में ही खून की उल्टियां करने लगी। बस तुरंत हाथ जोड़कर होकर बोलने लगी कि मैं समझ गई कि आप तो राम के दूत हैं। वह अपने को धन्य कहती है कि उसे सत्संग मिला क्योंकि सत्संग के सामने स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) के सुख भी पासंग बराबर नहीं है। आगे तुलसी ने लंकिनी के मुख से एक सुंदर बात कहवाकर उसे बड़ा मान दिया है-

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। हृदयं राखि कोसलपुर राजा ।।

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।। (सुं.कां.4.1)

चलिये आगे वाल्मीकि के अनुसार हनुमान का लंका-प्रवेश के बाद का दृश्य देखते हैं। महाकवि लिखते हैं कि तब लंका के स्वर्णिम परकोटे को फंाद कर सुग्रीव के हित का ध्यान रखते हुए हनुमान लंका में प्रवेश करते हैं, मानों शत्रुओं के सिर पर बायां पैर रखते हैं (वा.रा.सुं.कां.4.3) । लंका के जिस सौंदर्य को दूर से ही देखकर वे अभिभूत हो उठे थे उसे करीब से देखते हुए वे और भी विस्मित हो लंका में विचरने लगते हैं। लंका के सतमंजिले भवन अनुपम वास्तुकला के नमूने तो थे ही, उनसे निकल कर आने वाली संगीत और गीत की ध्वनि भी मनोहर थी । वैसे कहीं-कहीं राक्षसगण मंत्रजाप भी कर रहे थे और कहीं स्वाध्याय भी हो रहा था। विचित्र वेशभूषा में रावण के गुप्तचरों को भी हनुमान ने घूमते देखा। सूक्ष्मरूपधारी हनुमान एक के बाद एक अनेकानेक महलों का निरीक्षण करते बढ़ते गये। किंतु राम के वियोग में कृशकाय हो चुकी अनुपम सुंदरी सीता उन्हें कहीं नहीं दिखी। वहां तो सभी सुंदरियां अभिसारिका बनी प्रियतमों के अंगों में समाई हुई सो रही थीं। अंत में वे रावण के महल में गये जहां राक्षस-कन्याओं के अतिरिक्त अनेक देव, दैत्य, नाग, किन्नर तथा गंधर्व स्त्रियां रावण के आसपास थक कर सोई हुई थीं। जैसे शरद काल में निर्मल आकाश तारों से प्रकाशित और सुशोभित रहता है वैसे ही इन सुंदरियों से रावण का महल प्रकाशित था और वह रावण तारों से घिरे नक्षत्रपति चन्दमा के समान सुशोभित हो रहा था। सभी स्त्रियों की भावभंगिमा रावण में आसक्ति दर्शा रही थी। सभी मदिरापान किए हुए थीं। हनुमान को ऐसी एक भी स्त्री दिखाई नहीं दी जो वहां प्रसन्न न हो या जिसे बलात् वहां लाया गया हो। रावण के विशाल पर्यंक पर जो सुंदरियां उसकी बाहों, पैरों और छाती के सहारे सोईं थीं वे तो प्रसन्नवदना लग ही रही थीं, जो स्त्रियां यहां-वहां सोई थीं, वे भी खिन्न नहीं लग रही थीं। कोई किसी वाद्य को छाती से लगाये सो रही थी तो कोई-कोई एक दूसरे को रावण समझ एक दूसरे को गले लगाकर सो रही थीं। हनुमान को तनिक भी सोचना नहीं पड़ा कि इनमें से कोई सीता हो सकती है। हां, रावण के ही महल में एक अलग सुंदर पर्यंक पर एक अकेली, अत्याधिक महिमायुक्त सुंदरी महिषी को सोते देख हनुमान को लगा कि यह सीता हो सकती है। ...मैंने सीता का पा लिया, मन में यह विचार आते ही हनुमान खुशी से झूम उठे। उनकी प्रसन्नता का यहंा वाल्मीकि ने बड़ा सुंदर वर्णन किया है-वे अपनी पूंछ को पटकने और चूमने लगे। अपनी वानरों जैसी प्रकृति का प्रदर्शन करते हुये आनंदित होने, खेलने और गाने लगे तथा इधर-उधर चक्कर लगाने लगे। वे कभी खंभों पर चढ़ जाते तो कभी पृथ्वी पर कूद पड़ते। किंतु अचानक ही उनके मन में विचार आया...यह सीता कैसे हो सकती है? राम के बिना सीता क्या इतनी निश्ंिचतता से किसी पर-पुरूष के महल में सो सकती है ?...वह भी पूरा श्रृंगार किये हुए और मदिरापान किये हुए! नहीं नही...यह श्रीदेवी नहीं हो सकती...और यह दृढ़ निश्चय होने पर हनुमान की प्रसन्नता क्षणभर में काफूर हो गई। तब वे रावण का महल छोड़ सीता को ढंूढने दूसरी जगह रवाना हुए। लंका में हनुमान के लिये सीता की खोज सचमुच कठिन काम था। विभिन्न रामायणकारों ने अपनी-अपनी रुचि से इसका वर्णन किया है। कंबर ने भी मंदोदरी को सीता समझने की हनुमान की भूल का सुंदर चित्रण किया है। रावण के महल में एक कक्ष में एक अपूर्व सुंदरी को देख वे प्रसन्न हुए कि यही सीता है। रम्भा, मेनका आदि अप्सराएं उसके चरण-पल्लवों को सहला रही थी। किंतु उसकी गतिविधियां देख हनुमान संशय-ग्रस्त भी हो गये। राम पर इसका प्रेम हो या यह उनके विरह का अनुभव कर रही हो, ऐसा नहीं लग रहा था । क्या सीता ने प्रेम-बंधन को, उत्तमकुल में जन्म के गौरव को, दिव्य पातिव्रत-धर्म को छोड़ दिया है ? यदि यह बात है तो सब गया ! राम का यश और गौरव, मैं, यह लंका और उसके राक्षस सभी मिट जाएंगे। यह सोचकर वे जल से गये। पर फिर उन्होंने विचारा ...सीता मानव-शरीरी है, यह भिन्न शरीर वाली दिखती है। यह यक्षिणी या दानवी लगती है। जो हो, यह जानकी नहीं हो सकती।... मेरा विचार उद्दंड एवं असत्य था। फिर, इसके सामुद्रिक लक्षण भी कुछ और ही कहते हैं। इसमें उत्तम स्त्री होने के लक्षण है किंतु इसके असीम द:ुख पाने का समय निकट है। लगता है इसका पति शीघ्र मर जायेगा। तब उन्हें पक्का विश्वास हुआ कि यह सीता नहीं है (कं.रा.सुं.कां.262-270)। असमिया रामायण माधवकंदली में भी हनुमान ने पहले मंदोदरी देखकर उसे ही सीता समझा था किंतु एक तो वह रावण के बगल में सोई थी, दूसरे वह मदिरापान किए हुए प्रतीत हो रही थी, इसलिये हनुमान को उसके सीता होने में संदेह हुआ। देवी सीता रावण के साथ शयन नहीं कर सकती थी... और मदिरापान, यह वे कैसे कर सकती हैं ! रहा नहीं गया तो हनुमान निद्रालीन मंदोदरी के पास पहुंचे, उसका मुख सूंघकर देखा ...सचमुच वह मदिरापान किए हुए थी ! फिर उन्होंने उसकी वेणी मापकर देखी। देवी सीता की एक पहचान उनके पास थी कि उनकी वेणी आठ हाथ लंबी है। इस सुंदरी की वेणी आठ हाथ से एक बित्ते भर कम थी। अब मारुति को विश्वास हो गया कि यह रामप्रिया नहीं हो सकती (4145-50 )। श्रीधर की मराठी रामायण राम विजय में भी हनुमान ने मंदोदरी को पहले सीता ही समझा किंतु जैसे ही दशानन आया , मंदोदरी ने उठकर उसके चरण धोये। कवि लिखते हैं-यह देखकर हनुमान प्रलय-कृतान्त की भांति क्षुब्ध हो गये। क्या यह सीता है ? यह तो रावण के वश में हो गई है? उनका मन हुआ कि प्रचंड पाषाण से दोनों के यहीं प्राण ले ले या दोनों को बंाधकर प्रभु के पास ले जाएं ...पर सीता ऐसे कैसे हो सकती हैं ? राम ने कहा था सीता के मुख में कपूर की सी दीप्ति है और वह जहां होगी वहां राम-राम की ध्वनि समाई होगी। किंतु इस नारी के मुख से तो मद्य की गंध आ रही है ...न कहीं राम नाम सुनाई दे रहा है! तभी हनुमान के लिये मंदोदरी की चीख मानों वरदान बनकर आई। सोते हुए अचानक उठकर वह चीखने लगी- मेरा मंगलसूत्र जल गया है। एक वानर ने अशोकवाटिका को उजाड़ दिया ...हमारे पुत्र अक्ष का वध कर दिया है। आप शीघ्र ही सीता को लौटा दीजिये। ...यह सुन हनुमान प्रसन्न हुए । तब रावण ने भयभीत मंदोदरी को तो समझाया कि ऐसा ही करेंगे , किंतु शीघ्र एक दूती को बुलाकर चुपचाप कहा कि अशोकवन जाकर सीता का समाचार लाओ। हनुमान को सीता तक पहुंचने का रास्ता ही तो चाहिये था,  प्रसन्नमन से वे दूती के पीछे-पीछे चल पड़े... और अनायास ही सीता तक पहुंच गये (20.17-44)।

मैथिली से भेंट

अस्तु, आइये वाल्मीकि रामायण में चलते हैं। रावण के महल में सीता को न पाकर पवनपुत्र आगे बढ़े। सामने रावण की मधुशाला थी...यहां तो स्त्रियां और भी निर्लज्ज होकर पसरी पड़ी थीं...इनमें भी सीता नहीं हो सकती थी। किंतु वे रावण के भवन का कोई कोना नहीं छोडऩा चाहते थे इसलिये यहां भी सोई स्त्रियों में उन्होंने सीता को ढूंढने की चेष्टा की। सहसा उनके मन में विचार आया कि मैंने आज तक किसी पराई स्त्री की ओर नजर नहीं उठाई है, इस पापी रावण के कारण मुझे यह भी करना पड़ रहा है किंतु अच्छा यह है कि मेरे मन में इन्हें ऐसी अवस्था में देखने के बाद भी कोई विकार नहीं आया है। मनो हि हेतु: सर्वेशामिन्द्रियाणंा प्रर्वतने अर्थात् मन ही समस्त इन्द्रियों को शुभ और अशुभ अवस्थाओं में लगने की प्रेरणा देने वाला है किंतु मेरा वह मन सुव्यवस्थित है। हनुमान को यह विचार सांत्वना देता है। आगे वे स्वयं को समझाते हैं ...अब जानकी को स्त्रियों के ही बीच में तो देखना होगा, हिरणियों के बीच तो उन्हें नहीं खोजा जा सकता (सुं.कां.11.42-43)। इसके पश्चात् सीता की खोज में हनुमान रावण का महल छोड़ लतामंडपों में, चित्रशालाओं में और रात्रिकालीन विश्रामगृहों में भी गये किंतु हर ओर असफलता ही उन्हें हाथ लगी। धीरे-धीरे हनुमान के मन में निराशा घिरने लगी । उन्हें लगने लगा कि अवश्य सीता जीवित नहीं है...या तो इस राक्षस ने उन्हें मार डाला है या स्वयं उन्होंने ही अपने प्राण ले लिये है...या फिर समुद्र पार करते समय वे रावण की पकड़ से छूट कर समुद्र मेंसमा गई हैं। अब मैं क्या करूं? सीता की कोई खबर लिये बिना मैं लौट भी नहीं सकता। मेरी प्रतिज्ञा में आस लगाये बैठे अंगद आदि को मैं क्या उत्तर दूंगा? फिर सुग्रीव के पास हम लोग क्या मुंह लेकर जाएंगे? सबसे बड़ी बात, मैं राम से क्या कहूंगा? ...यही कि रावण की लंका में मुझे सीता के कहीं दर्शन नहीं हुए ! यह सुनकर क्या वे जीवित रह पाएंगे ? और यदि राम को कुछ हो गया तो क्या लक्ष्मण ही जीवन धारण कर पाएंगे? यह समाचार सुन अयोध्या में बैठे भरत, शत्रुघन और उनकी माताएं भी अवश्य प्राण त्याग देंगी और यह सब देखकर सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव ही भला कैसे जीवित रहेंगे? सुग्रीव के बिना रूमा और तारा भी मर जाएंगी...तब तो सारा वानरसमाज ही मर गया समझो। ...ओह ! कितने आगे की कल्पना कर गये अंजनिकुमार! इस अंतिम कल्पना ने तो उन्हें भयानक रूप से विचलित कर दिया।

और थोड़ी देर पहले जो वायुपुत्र स्वयं को यह कहकर उत्साहित कर रहे थे कि उत्साह ही प्राणियों को सर्वदा सब प्रकार से कर्मों में प्रवृत करता हेै और वही उन्हें वे जो कुछ भी करते हैं, उनमें सफलता प्रदान करता है, उत्साह ही परम सुख का हेतु है...निराश हो सोचने लगे कि अब मैं क्या करूं? सीता को देखे बिना यदि मैं लौटता हूं तो मेरा सारा पुरुषार्थ व्यर्थ जायेगा और चारों ओर हाहाकार मच जायेगा। अच्छा यही है कि अब मैं लंका में ही रहूं ...मैं यहीं वानप्रस्थी होकर समय बिताऊंगा। किसी वृक्ष के नीचे बैठकर मेरे हाथ अपने आप जो भी फल-फूल आएंगे उन्हें ही खाकर जीवित रहूंगा....या फिर जीवित भी क्यूं रहूं? चिता में आग लगाकर उसमें प्रवेश क्यों न कर लंू ? या फिर जल-समाधि ले लूं या उपवास कर शरीर का त्याग कर दूं ...भले ही इस प्रयत्न में चील, कौवे या हिंसक जीव मेरे शरीर को आहार बना ले! (वा.रा.सुं.कां.सर्ग 13) कंब रामायण में सीता के कहीं न मिलने पर हनुमान मन में आशंका करते हैं कि कहीं देवी की हत्या तो नहीं कर दी गईं ? अब लौट कर क्या कहूंगा? असफलता का दुख मरे बिना नहीं छोड़ेगा। मैं राम को और अन्य वानरों को क्या उत्तर दूंगा। मन में आया, रावण के मुखों को रक्त बहते तक पकडूं और कहूं कि बता सीता कहां है ? देवों से पूछो तो उनमें क्रूर रावण के डर से सत्य बताने का साहस नहीं होगा (कं.रा. 321-326)। हनुमान अभी किसी एक उपाय पर दृढ़ होते तभी उन्हें अचानक रावण की अशोकवाटिका दिखाई दी। इसका तो उन्होंने अनुसंधान किया ही नहीं! अचानक उनके शरीर की शिथिलता विलुप्त हो गई और वे राम, लक्ष्मण तथा समस्त देवगणों को नमस्कार कर सबसे पहले अपने मन में अशोकवाटिका में जाकर क्या करना है, इसका निश्चय करते हैं, और फिर क्षणभर सीता का ध्यान कर वे विशाल वृक्षों से आच्छादित अशोकवाटिका की चारदिवारी पर चढ़ जाते हैं। उन्हें विश्वास हो गया कि सीता यहीं कहीं मिलेगी क्योंकि वन से प्रेम करने वाली सीता अवश्य यहां विचरण कर प्राण धारण करती होंगी।

इस बार हनुमान को निराश नहीं होना पड़ा। एक विशाल श्वेत रंग के चैत्यप्रासाद के मध्य उन्होंने कुछ राक्षसियों से घिरी हुई एक अत्यंत सुंदरी, किंतु मलिन रेशमीवस्त्र धारण किए हुए द:ुखीयारी नारी को बैठे देखा। उन्हें सहसा स्मरण हो आया कि किष्किंधा के आकाश में राक्षस द्वारा हरण कर ले जानी वाली रोती हुई नारी यही तो है जिसके आभूषणों को पहचान कर राम ने उसके सीता होने की पुष्टि की थी! तो उनका लंका आना व्यर्थ नहीं गया...किंतु इस बार उन्होंने न पूंछ पटक कर खुशी मनाई और न ही उछलकूद की । हां, मन ही मन अतीव प्रसन्न अवश्य हुए। हर्ष से आंखों में आंसू भी आ गये। एक बड़ा काम उनका जो सिद्ध हो गया था!

किंतु हनुमान जानते थे कि अभी भारी काम बचा है। उन्हें गुप्तचरी करनी थी। पहले तो यह जानना था कि माता सीता के साथ यहां कैसे व्यवहार हो रहा है तथा स्वयं उनके मन में क्या चल रहा है? सो वे रात के अंधेरे में चुपचाप एक विशाल अशोकवृक्ष में छिप कर सारी गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं।

हनुमान ने पुन: गौर से सीता को देखा। बड़ी दयनीय लग रही थी जनकदुलारी रामप्रिया इस समय। पूरा शरीर मलिन हो गया था। वस्त्र भी मलिन थे पर फिर भी सौंदर्य सुवर्ण के समान दमक रहा था। श्रीराम के सर्वथा योग्य हैं यह देवी। मन ही मन हनुमान सोचते हैं ...इन्हीं के लिये राम ने बाली का वध किया, कबन्ध को मार गिराया, जनस्थान में खर आदि चौदह हजार राक्षसों का वध किया ! इनके लिये यदि वे समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को उलट दें तो भी उचित ही होगा। इनसे बिछुड़कर श्रीराम के लिये शरीर धारण करना एक दुष्कर कर्म ही है। पृथ्वी को फाड़ कर प्रगट हुई इस जनकतनया को हनुमान ने मन ही मन प्रणाम किया किंतु सीता का दु:ख उनके हृदय को जैसे मथे डाल रहा था। उनके सामने ही तरह-तरह की क्रूर एवं विकृत आकृति की राक्षसियां उन्हें लगातार रावण की पत्नी बनने डरा रही थी। बेचारी सीता डर भी जाती थी किंतु रट एक ही थी कि वे राम की धर्मपत्नी हैं, रावण की पत्नी कभी नहीं बनेगी।

      फिर देखते-देखते रात का अंतिम प्रहर भी बीत गया। हनुमान ने देखा कि सूर्योदय के साथ ही एक नई आफत सीता के सिर पर रावण के रूप में प्रगट हुई। सौ सुंदरियों से घिरा कामी रावण सीता का प्रणययाचक बन कर अशोकवाटिका आ पहुंचा किंतु सीता का नकार सुन क्रोधित हो उनका अचानक प्राणभक्षक बन गया। फिर रानियों के समझाने पर उसने सीता के प्राण तो नहीं लिये पर उसकी रानी बनने के लिये उसने समय-सीमा निर्धारित कर दी। राक्षसियों से उसने कहा-दो महीने का समय मैं इसे दे रहा हूं ...यदि इसके बाद भी यह मेरी रानी बनने तैयार नहीं हुई तो इसे मारकर मेरे कलेवे में ले आना।

रावण ने तो दो माह का समय दिया था सीता को, पर राक्षसियां थीं कि रावण के जाते ही सीता को डराने के लिये उन्हें तत्काल मारने की योजना और स्वयं ही मापतौल कर बराबर हिस्सा कर खाने की येाजना बनाने लगीं। सीता का भयभीत होना स्वाभाविक था। उनका यह भय वैसा ही था जैसे जंगली कुत्तों के बीच घिरी किसी हिरणी का होता है। तभी त्रिजटा ने गत रात देखा स्वप्न सबको बताया कि शीघ्र ही राक्षसराज के साथ-साथ समस्त लंका दुर्दशा को प्राप्त करेगी और सीता का राम से पुनर्मिलन होगा। यह सुनकर राक्षसियां शांत हुईं। कुछ भयभीत भी हुईं। इससे सीता को कुछ राहत मिली। हनुमान भी कुछ निश्ंिचत हुए और आगे की रणनीति पर विचार करने लगे।

यहां भी हनुमान की विचारधारा कितने ही तर्क करते हुए आगे बढ़ती है। पहली बात जो उनके ध्यान में आई वह थी कि सीता से कैसे मिला जाये क्योंकि एक तो उन्हें राम का संदेश देना आवश्यक है, दूसरे वह जिस अवस्था में हैं उसमें यदि उन्हें कोई सांत्वना नहीं मिली तो वह अवश्य अपना जीवन नष्ट कर लेंगी। ऐसी स्थिति में रावण से युद्ध करना व्यर्थ होगा। दूसरी बात, लौटने पर राम अवश्य उनसे पूछेंगे कि जानकी ने क्या संदेश भेजा है, इसलिये भी उनसे बात करना आवश्यक था। किंतु सीता से वार्तालाप कैसे किया जाये? हनुमान सोचते हैं, एक तो राक्षसियां चारों ओर से उन्हें घेर कर बैठी हैं। चलो, किसी तरह अवसर देखकर यदि मैंने उनसे कुछ कहा भी तो किस भाषा में कहूंगा? यदि मैं द्विज की भांति संस्कृत में बोलूंगा तो सीता मुझे रावण समझकर भयभीत हो जाएंगी। अत: मुझे सामान्य मनुुष्य द्वारा बोली जाने वाली बोली का प्रयोग करना चाहिये, तभी सीता को मैं सांत्वना दे पाऊंगा। हनुमान यह भी सोचते हैं कि मैं किस रूप में उनके सामने प्रगट होऊं? यदि मैं वानर रूप में जाता हूं और मानवी भाषा में बात करता हूं तो भी वे भयभीत हो जाएंगी और मुझे मायावी रावण समझ जोर-जोर से चीखने लगेंगी। इससे ये भयानक राक्षसियंा अस्त्र -शस्त्र ले मुझ पर टूट पड़ेंगी और इनकी चीख-पुकार सुन राक्षसगण भी आ जाएंगे...संभव है वे मुझे बंदी भी बना ले ...ऐसी स्थिति में श्रीराम का सीता प्राप्तिरुपी अभीष्ट कार्य ही नष्ट हो जायेगा। यदि मैं पकड़ा या मारा गया तब मुझे वानरों में कोई ऐसा वीर नहीं दिखता जो सौ योजन समुद्र लंाघकर यहां आ सके। अत: राक्षसों को अभी युद्ध का मौका देना ठीक नहीं है (वा.रा.सुं.कां. सर्ग 30)।

भारी समस्या सामने थी। सीता से बात करो तो राक्षसों से युद्ध की संभावना है और न करो तो सीता के आत्महनन का खतरा है। हनुमान सोचते हैं...अविवेकी या असावधान दूत के हाथ में पडऩे पर बने बनाये काम भी देशकाल के विरोधी होकर उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य के उदित होने पर चारों ओर फैला अंधकार अपने आप नष्ट हो जाता है।

अस्तु, किस प्रकार यह काम न बिगड़े, किस तरह मुझसे कोई असावधानी न हो जाये, किस प्रकार मेरा समुद्र-लंघन व्यर्थ न हो और कैसे सीता मेरी सारी बातें सुन लें, किंतु घबराहट में न पड़े... इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमान हनुमान ने निश्चय किया कि इसी वृक्ष पर बैठे-बैठे मैं सीता को धीरे-धीरे मीठी वाणी में राम के गुण तथा उनका संदेश गा-गाकर सुनाऊंगा ताकि उन्हें मुझ पर विश्वास हो जाये।

इस प्रकार सारी नीति निर्धारित कर अंतत: हनुमान ने राम की गाथा गाना प्रारंभ किया। प्रारंभ उन्होंने राजा दशरथ से किया और राम के वनगमन तथा रावण द्वारा सीता के अपहरण से लेकर अपने यहां तक पहुंचने की सारी कथा फूलों से माला बनाने की भांति कही (वही, सर्ग 34)।

मिथलेशनंदिनी के लिये ये वचन रोमहर्षित करने वाले तो थे, किंतु अतीव विस्मयकारी थे। भला यहां कौन है जो इस वाणी में उन्हें रामकथा सुना रहा है? यहां-वहां दृष्टि दौड़ाने पर अंतत: उन्हें अशोकवृक्ष की डाल में छिपा एक वानर दिखाई दिया...तत्काल तो उन्हें देखते ही सीता मूच्र्छित हो गईं। कुछ क्षण बाद उस वानर को अपने से कुछ दूर बैठे देख उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि वे जागृत हैं अथवा स्वप्न देख रही हैं। किंतु उन्हें तो नींद आती ही नहीं है...अत: यह स्वप्न कैसे हो सकता है? कहीं रात-दिन राम का स्मरण करने के कारण यह मन की भावना तो नहीं है, यह भी वे सोचती हैं, किंतु मनोभाव इतना स्थूल रूप नहीं ले सकता ! यह वानर तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है और मुझसे कुछ कह भी कर रहा है! तब हनुमान उनके और निकट पहुंचे और बातचीत उन्होंने ही प्रारंभ की। पहले तो उन्होंने सीता से उन्हीं का परिचय पूछा और फिर इस तरह रोने का कारण भी पूछा...साथ ही आगे मन की बात भी कह दी कि कहीं आप सीता तो नहीं हैं ?

जनकनंदिनी के लिये ये अत्यंत भावुकता भरे क्षण थे। हनुमान से अपने विषय में उन्होंने कुछ भी नहीं छिपाया। विवाह से लेकर अब तक की सारी कहानी उन्होंने हनुमान को सुना दी किंतु जैसे ही हनुमान यह कहते हुए सीता के कुछ निकट पहुंचे कि मैं राम का दूत हूं और राम ने ही मुझे आपका पता लगाने भेजा है, सीता का मन पुन: आशंका से भर गया कि कहीं यह रावण तो नहीं है जो माया के सहारे कपि बनकर मुझे धोखा देकर मेरे निकट आना चाह रहा है? इसी भयवश उन्होंने हनुमान का प्रणाम भी स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि तुम रावण हो तो याद रखना यह तुम बहुत बुरा कर रहे हो। एक बार जनस्थान में संन्यासी के रूप में तुम मुझे धोखा दे चुके हो किंतु अब मैं तुम्हारी बातों में आने वाली नहीं हूं (वा.रा.सुं.कां.सर्ग 35) । यहां जानकी का तेजस्वीरूप देखते ही बनता है।   

      बेचारे हनुमान ! जिसकी रक्षा हेतु वे सौ योजन समुद्र पार कर आये हैं वह ही उन्हें भक्षक समझ रही हैं ! सीता की आशंका का समाधान वे कैसे करें, अभी सोच ही रहे थे कि सीता का मन अचानक स्वयं ही बदल गया। वस्तुत: क्षण भर बाद ही सीता को मन में प्रसन्नता की अनुभूति हुई...और उन्होंने हनुमान के रावण होने के विचार को झटक दिया...किंतु उनके मन के द्वन्द्व फिर भी समाप्त नहीं हुए। एक मन ने कहा कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं है? दूसरे क्षण वही मन कहता कि ऐसा संभव नहीं है कि क्योंकि स्वप्न में वानर को देखने पर अमंगल होता है जबकि मुझे अभी प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है! (आश्चर्यचूड़ामणि में सीता का हनुमान के प्रति संदेह यह सोचकर भी कम होता है कि यह वानर बहुत मीठी वाणी बोल रहा है जबकि राक्षस कभी मधुर वचन नहीं बोलते। -6.5)

अंतत: हनुमान पर विश्वास ठहराने के लिये वैदेही उनसे राम और लक्ष्मण के लक्षण पूछती हैं । इस पर हनुमान अत्यंत विस्तार से राम-लक्ष्मण के शारीरिक चिन्हों का वर्णन करते हैं साथ ही उनके स्वभाव का भी बखान करते हैं। सामान्यतया साहित्य में नारी के रूप का नखशिख वर्णन मिलता है । वाल्मीकि ने यहां राम के बहाने मानों एक पुरूष का सुंदरतम चित्र खींचा है जिसमें एक-एक अंग का विषद वर्णन है। यहंा तक कि राम के तलवों की रेखाओं का भी वे वर्णन करते हैं(सुं.कां.सर्ग 35)।

और फिर सीता को पूर्ण विश्वास दिलाने के लिये मारुति राम द्वारा प्रेषित, रामनाम अंकित मुद्रिका उन्हें देते हैं। सीता के लिये यह क्षण अत्यंत रोमांचक पर अतीव शीतलता देने वाला था। तप्त धरती मानो वर्षा की रिमझिम से भींगने लगती है। मुद्रिका का मिलना मानो राम का ही मिलना था। हनुमान पर वे प्रसन्न होती हैं और उनके प्रति सारा संदेह जाते रहता है। राम ने भेजा है तो अवश्य ही यह वानर पराक्रमी और शीलवान हैं। राम की कुशलता का समाचार जहां उनमें प्रसन्नता उत्पन्न करता है वहीं अब तक उनकी ओर से उदासीनता उन्हें व्याकुल भी करती है। राम अब तक चुप क्यों है? शायद यह उनके भाग्य का दोष है कि अभी उनके दुखों के अंत होने का समय नहीं आया है। वे पूछती हैं कि क्या राम मुझे इस संकट से उबारेंगे ...और क्या भातृवत्सल भरत मेरे उद्धार के लिये अपनी सेना भेजेंगे (वही, 36.24) ? इस पर हनुमान बड़े विनीत स्वर में सीता को ढांढस बंधाते हैं...राम शीघ्र ही आपको लेने आएंगे। उन्हें तो अब तक यह ही पता नहीं था कि आप यहां है। मेरे यहां से लौटते ही वे वानरों और भालुओं की सेना साथ लेकर, सागर को अपने बाणों से स्तब्ध कर, लंकेश को विजीत कर आपको ले जाएंगे। राम तो सदा आपकी ही याद करते रहते हैं। आपकी चिंता के कारण उन्हें नींद नहीं आती। कभी आंख लगी तो 'सिया सिया Óकहते हुए उठ जाते हैं। यहां तक कि आपमें चित्त लगे रहने के कारण उन्हें अपने शरीर में बैठे मच्छर आदि कीड़े-मकोड़ों को हटाने की सुध भी नहीं रहती। आपके लिये वे उत्तम व्रत का पालन भी कर रहे हैं। जैसे ज्वालामुखी पर्वत जलती हुई भीषण आग से सदैव तप्त रहता है उसी प्रकार वे विरहाग्नि में जलते रहते हैं। जैसे भूकंप से पर्वत हिल जाता है वैसे ही आपको न देख पाने का शोक राम को विचलित कर रहा है। (वही, 35.45-47)

राम मेरे लिये व्याकुल हैं, मेरी खोजखबर ले रहे हैं, इतना भर सीता के लिये पर्याप्त था किंतु मेरे वियोग में सुधबुध खो रहे हैं, यह समाचार सीता को विचलित करने वाला था। इसीलिये वे हनुमान से कहती हैं- तुम्हारा यह कथन मुझे अमृतं विषसम्पृक्तं अर्थात् विषमिश्रित अमृत के समान लग रहा है। समुद्र में नौका नष्ट हो जाने पर अपने हाथों से तैरने वाले पराक्रमी पुरूष की भांति प्रभु कैसे इस शोकसागर को पार करेंगे ?

हनुमान के लिये यह मुश्किल घड़ी थी। राम को सीता के वियोग में दु:खी वे देख चुके थे किंतु सीता का दु:ख तो हृदय चीरने वाला था। इसीलिये वे अचानक सीता के समक्ष लंका से उनकी पीठ पर चलने का प्रस्ताव रखते हैं और विश्वास दिलाते हैं...मैं आपको आकाशमार्ग से लेकर समुद्र पार कर ले जाऊंगा। सारी लंका के सैनिक भी मेरा पीछा नहीं कर पाएंगे...मैं आपको उसी तरह रामचन्द्र से मिलवा दूंगा जैसे रोहिणी चंद्रमा से मिलती है (वही, सर्ग 3) ।

एक-एक क्षण मुश्किल से जीवन धारण कर पा रही जानकी हनुमान के इस प्रस्ताव को सुनकर हर्षित तो होती हैं किंतु विश्वास नहीं कर पाती कि छोटे से हनुमान कैसे उन्हें अपनी पीठ पर ले जाएंगे? तब सीता को अपना बल दिखाने के लिये हनुमान अपने शरीर को बढ़ाना शुरू करते हैं। प्रज्ज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और प्रकाशमान उस रूप को देखकर मैथिली आश्वस्त होती है। किंतु फिर भी वे तमाम कठिनाइयों का हवाला देते हुए हनुमान के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती हैं। हनुमान श्रीदेवी के इस इंकार का बुरा नहीं मानते बल्कि प्रशंसा ही करते हैं कि आपने युक्तिसंगत तथा पतिव्रता स्त्री के अनुरूप ही बात कही है। वे यह भी कहते हैं...मैं आपको इसलिये साथ ले जाना चाहता था ताकि मैं रामप्रियचिकीर्षया अर्थात् शीघ्र राम का प्रिय कर सकूं। राम के स्नेह और आपके प्रति भक्ति के कारण ही मैंने ऐसी बात कही। दूसरा कारण यह भी है कि लंका में प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है। तीसरा कारण महासागर को पार करने की कठिनाई भी वे बताते हैं। आगे पवनपुत्र कहते हैं-यदि आपके मन में मेरे साथ चलने का उत्साह नहीं है तो आप अपना कोई अभिज्ञान ही दे दीजिये। तब सीता पहचान के रूप में पहले तो इन्द्र-पुत्र जयंत के रूप में आये कौए की कथा सुनाती है जिसने एक बार चित्रकूट निवास के समय उन्हें चोंच मार-मार कर अत्यंत तस्त्र कर दिया था। उन्हें रक्त-रंजित तथा अश्रु बहाते देख राम ने तब उस काक पर ऐसा अभिमंत्रित बाण चलाया कि उसे कहीं शरण नहीं मिली। अंतत: राम के शरण में आकर क्षमा-याचना करने पर ही वह अपने प्राण बचा पाया था। उस घटना का स्मरण कर सीता पुन: दु:खी हो कहती हैं...इतने शक्तिशाली होते हुए भी राम अपने तीक्ष्ण सायकों से राक्षसों का संहार क्यों नहीं कर डालते या फिर परंतप लक्ष्मण ही भाई की आज्ञा लेकर उनका उद्धार क्यों नहीं करते? ये दोनों भाई दुर्जय हैं, फिर किस लिये उनकी उपेक्षा कर रहे हैं? (वही ,सर्ग 3)

अस्तु, सीता को पुन: विचलित होते देख मारुति उन्हें पुन: समझाते हैं कि आपके विरह-शोक से पीडि़त होने के कारण ही राम सब कार्यों से विमुख हो गये है। भाई के दु:ख से लक्ष्मण भी सदैव संतप्त रहते थे किंतु अब आपका दर्शन हो गया है, अब शोक का कोई अवसर नहीं है। अब शीघ्र ही रावण को उसके बंधुबंाधवों के साथ मारकर राम आपको ले जाएंगे। यहां सीता अपने मन की एक आशंका भी प्रगट करती हैं। हनुमान का विशालरूप देख उन्हें उनकी शक्ति पर तो कोई अविश्वास नहीं रह गया था किंतु सभी वानर तो हनुमान जैसे नहीं होगें? तब क्या वानरों और भालुओं की सेना के साथ रावण को हराया जा सकता है ? इस पर हनुमान कहते हैं कि सुग्रीव की सेना में मेरे समान तथा मुझसे भी बढ़ कर पराक्रमी वीर है । उनके पास ऐसा कोई भी वानर नहीं है जो बल पराक्रम में मुझसे कमतर हो। जब मैं यहां तक आ पहुंचा हूं तो अन्य वीर भी पहुंच सकते हैं। वस्तुत: श्रेष्ठ जन को संदेशवाहक दूत बनाकर नहीं भेजा जाता है। निम्नश्रेणी के सेवक ही इसके योग्य होते हैं, इसीलिये मुझे ही भेजा गया है (वही, 39.39-40)। इसे हम अंाजनेय की विनम्रता ही कहेंगे कि वे अपने आपको सुग्रीव का एक नगण्य सिपाही बता रहे थे वर्ना सत्य तो यही था कि सुग्रीव की सेना में हनुमान बल, बुद्धि और पुरुषार्थ में अद्वितीय थे। इस अवसर पर कवि कंबर लिखते है- सूक्ष्म हनुमान जब मेरुपर्वत के समान आकार बढ़ाते हैं तब उनका यह विशालरूप देखकर जानकी हनुमान के बल, बुद्धि और राम के प्रति उनका समर्पण तत्काल समझ जाती हैं और इस हेतु उनका प्रशंसा भी करती हैं। सीता के इन शब्दों में हनुमान के प्रति उनका परम आदर प्रगट होता है जब वे कहती हैं कि यह लंका नगरी सातों समुद्रों के उस पार रहती तो तुम्हारे गौरव के अनुरूप होता। यह तो एक ही छोटे समुद्र के पार है। यह बात तुम्हारे लिये गौरववद्र्धक नहीं है बल्कि तुम्हारी महिमा कम करने वाली है। मैं राक्षसों को देख कर सोचती थी कि राम का छोटे भाई के अलावा और कौन सहायक है ...यह अभाव देख मैं भग्न-मन हो रही थी। किंतु अब वह संशय मिट गया। जब तुम मेरे पति के सहायक हो गये तो राक्षस क्या कर लेंगे! (सुं.कां. 561-600)

 अस्तु, वाल्मीकि रामायण में हनुमान यहंा मैथिली को दिलासा देते हैं कि शीघ्र हीे रावण, उसका सारा परिवार और लंकावासी वानरों के हाथों पुष्प की माला बन जाएंगे अर्थात बंदर खेल-खेल में उनका नाश देंगे। ...फिर सीता बड़े यत्न से कपड़े में बंधा हुआ एक आभूषण निकालती हैं। यह उनका दिव्य चूड़ामणि था। ...इसे राम को दे देना, इसे देखकर राम के लिये तुम्हारी सारी बातें विश्वसनीय हो जाएंगी.. कहते हुए वे उसे हनुमान को सौंपती हैं।...तब हनुमान सीता से बिदा ले ,उन्हें प्रणाम कर, उन्हें शीघ्र आकर ले जाने का आश्वासन देकर वहंा से निकलते हैं।

लेखिका सेवानिवृत प्राचार्य हैं। उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति विभाग के द्वारा प्रदत्त सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य किया है।