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Sunday 16 Dec 2018

महावीर प्रसाद द्विवेदी और सरस्वती का महत्व

जिस प्रकार हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में सरस्वती का आना अकथनीय उपलब्धि है, उसी प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी का संपादक होना। सरस्वती पत्रिका का हिंदी साहित्य जगत में किस प्रकार आना हुआ उसके बारे में बाबू श्यामसुंदर दास ने अपनी आत्मकथा मेरी आत्म कहानी (1941)में लिखा है- सन् 1999 में इंडियन प्रेस के स्वामी बाबू चिंतामणि घोष ने नागरी प्रचारिणी सभा में प्रस्ताव किया कि सभा एक सचित्र मासिक पत्रिका के संपादन का भाग ले और उसे प्रकाशित करे। सभा ने इसका आयोजन किया, पर संपादक का भार लेने में अपनी असमर्थता प्रकट की। अंत में यह निश्चय हुआ कि सभा एक संपादक मंडल बना दे। सभा ने इसे स्वीकार किया और बाबू राधाकृष्णदास,  बाबू कार्तिक प्रसाद, बाबू जगन्नाथदास,  किशोरीलाल गोस्वामी तथा मुझे इस काम के लिए चुना।  परिणामत: बाबू चिंतामणि घोष के उद्योग तथा उपर्युक्त पांचों लोगों के संपादकत्व में सरस्वती का प्रकाशन सन् 1900 ई के जनवरी मास से इलाहाबाद से शुरू हुआ। दूसरे वर्ष केवल श्याम सुंदरदास इसके संपादक रहे। सन् 1902 के अंत में बाबू श्यामसुंदर दास ने आगे संपादन कर पाने में असमर्थता व्यक्त कर दी। सरस्वती के आरंभ काल से ही महावीर प्रसाद द्विवेदी अपने लेख इसमें छपने के लिए भेजते थे। इस समय तक इनका नाम हिंदी जगत में सुपरिचित हो गया था। चिंतामणि घोष उनकी लेखनी और प्रतिभा से प्रभावित थे। उस समय आचार्य द्विवेदी आजीविका के लिए रेलवे में नौकरी करते थे किंतु उच्चाधिकारी से कुछ कहा-सुनी हो जाने के कारण उन्होंने त्यागपत्र दे दिया था। अत: चिंतामणि घोष ने सरस्वती के संपादन के लिए उनको आमंत्रित किया। उन्होंने सरस्वती के संपादन का दायित्व सहज ही स्वीकार कर लिया। जनवरी 1903 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती के संपादक बने। यहीं से सरस्वती का हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का और हिंदी भाषा के नव-संस्कार  का स्वर्ण युग आरंभ हुआ। उन्होंने सरस्वती को हिंदी की प्रतिनिधि राष्ट्रीय मासिक पत्रिका बना दिया था। आचार्य द्विवेदी जी की सरस्वती की सेवा के बारे में डॉ उमाकांत गोयल ने डॉक्टर नगेंद्र द्वारा संपादित पुस्तक हिंदी साहित्य का इतिहास में लिखा है- सरस्वती के संपादक के रूप में इन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए जो कार्य किया वह स्मरणीय रहेगा। इनके प्रोत्साहन और मार्गदर्शन के परिणाम स्वरुप कवियों और लेखकों की एक पीढ़ी का निर्माण हुआ। खड़ी बोली को परिष्कार तथा स्थिरता प्रदान करने वालों में ये अग्रगण्य हैं। ये कवि आलोचक, निबंधकार, अनुवादक तथा संपादकाचार्य थे।

सरस्वती का संपादक नियुक्त होने पर आचार्य द्विवेदी ने अपने लिए चार आदर्श निर्धारित किए- वक्त की पाबंदी, मालिकों का विश्वास पात्र बनने की चेष्टा, अपने हानि लाभ की परवाह न करके पाठकों के हानि लाभ का सदा ख्याल रखना और अपने न्यायपथ से कभी विचलित ना होना।

सन् 1930 से 1905 अर्थात तीन वर्ष तक सरस्वती का नागरी प्रचारिणी सभा से अनुमोदन संबंध बना रहा। सन् 1904 में द्विवेदी जी ने नागरी प्रचारिणी सभा की खोज संबंधी रिपोर्ट की कड़ी आलोचना की। इससे सभा असंतुष्ट हो गई। उसने घोष बाबू को लिखा कि सरस्वती से सभा का अनुमोदन हटा दिया जाए। सन् 1905 में प्रकाशित सभा के 12वें वार्षिक विवरण में पृष्ठ 38 पर उक्त बात का विवरण है। सरस्वती से नागरी प्रचारिणी सभा का संबंध हट जाने के कारण द्विवेदी जी ने अपने ऊपर और महत्वपूर्ण दायित्वों का भार महसूस किया। परिणामस्वरुप उन्होंने सरस्वती के उन्नयन और विकास के लिए रात-दिन एक कर दिया। सबसे पहले उन्होंने भाषा के परिष्करण और परिमार्जन का कार्य किया। उस समय हिंदी भाषा (खड़ी बोली) ब्रजभाषा की गोद में पल रही थी। आचार्य द्विवेदी जी ने खड़ी बोली को ब्रजभाषा की गोद से निकालकर परिष्करण-परिमार्जन रूपी पालना दिया। तत्कालीन समय खड़ी बोली को गद्य की भाषा के लिए तो स्वीकार लिया गया था परंतु पद्य की भाषा के लिए कवि लोग अभी भी ब्रजभाषा को ही महत्व देते थे। उनका मानना था कि खड़ी बोली में ब्रजभाषा के समान मधुरता और लचक नहीं है। आचार्य द्विवेदी जी को वड्र्सवर्थ का वह पुराना सिद्धांत पसंद था कि गद्य और पद्य का पदविन्यास एक ही प्रकार का होना चाहिए। उनके लेखों में उनका जोर बराबर इस बात पर रहता था कि कविता की भाषा बोलचाल की होनी चाहिए। आचार्य द्विवेदी जी की ही प्रेरणा से अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने खड़ी बोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास की रचना की।

सरस्वती के रचनाकारों में श्यामसुंदरदास, कार्तिकप्रसाद खत्री, राधाकृष्णदास, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरीलाल गोस्वामी, संत निहाल सिंह, पंडित माधव राव सप्रे, पंडित रामनरेश त्रिपाठी, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, कामता प्रसाद गुरु, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, आदि शीर्षस्थ साहित्यकार शामिल थे। सरस्वती ने ही हिंदी के कई प्रख्यात लेखक को जन्म दिया। सरस्वती की सबसे महत्वपूर्ण देन यह मानी जाती है कि उसने हिंदी लेखन की वर्तनी को शुद्ध किया और भाषा को व्याकरण सम्मत बनाया। हिंदी को मानक स्वरूप देने में सरस्वती ने द्विवेदी जी के 18 वर्ष के संपादन काल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरस्वती ने अपने समकालीन पत्रिकाओं में एक कीर्तिमान स्थापित किया। किसी रचनाकार की रचना का सरस्वती में छपना रचनाकार की महत्वपूर्णता को सिद्ध करता था। सरस्वती में किसी के लेखों का छपना लेखक के लिए गौरव की बात होती थी। डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण में लिखा है- हिंदी में सरस्वती से पहले, उसके साथ-साथ और उसके बाद बहुत सी पत्रिकाएं निकलीं और निकलती रहीं पर किसी भी पत्रिका में हिंदी लेखक अपनी रचनाएं छपाने के लिए ऐसे आतुर और उत्सुक नहीं दिखाई दिए जैसे सरस्वती में।

       आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादनकाल में सरस्वती निरंतर उन्नतिशील रही। सरस्वती का महत्व तीन दृष्टियों से है- एक तो इसके माध्यम से हिंदी भाषा का परिष्कार हुआ और हिंदी की वाक्य रचना एवं पदविन्यास में एकरूपता लाने की चेष्टा की गई, दूसरे इसकी प्रेरणा से हिंदी में अनेक लेखक और कवि प्रतिष्ठित हुए। तीसरे इसी के माध्यम से हिंदी की नवीन गद्य विधाओं के विकास का पथ प्रशस्त हुआ। यह अवश्य है कि सरस्वती के प्रकाशन के पूर्व कई महत्वपूर्ण पत्रिकाएं प्रकाशित हुई थीं और सरस्वती के माध्यम से जो संपादन का आदर्श प्रतिष्ठित हुआ वह परंपरागत आदर्शों का ही उन्नयन था किंतु जिस निष्ठा से द्विवेदी जी संपादन कार्य में लगे हुए थे वह अत्यंत दुर्लभ थी। द्विवेदी जी ने नवंबर 1915 की सरस्वती में भाषा और व्याकरण शीर्षक एक लेख लिखा। इसमें लेखक की भाषा संबंधी भूलें बतलाई गई थीं। संस्कृत साहित्य में श्रृंगार रस  की प्रधानता पर भी उन्होंने चोट की और कालिदास की निरंकुशता शीर्षक लेख लिखा। उनके इस तरह के आलेखों की व्यापक प्रतिक्रिया हुई और भारत मित्र सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बहस चल पड़ी। परिणामस्वरुप द्विवेदी जी के तर्कों की काट को ढूंढने के लिए साहित्य मंथन की नई लहर चल पड़ी। आलोचना-प्रत्यालोचना के इस सिलसिले में हिंदी के लिए जीवंत भाषा का वातावरण बनाया गया।

द्विवेदी जी प्राप्त रचनाओं में लिंग, वचन, कारक एवं विराम-चिन्ह से लेकर शीर्षक तथा अनुच्छेद तक बदल दिया करते थे। दूसरों की रचना में इतना संशोधन करने वाले अपनी कृतियों के प्रति और भी अधिक सजग रहते थे। उन दिनों विराम चिन्ह एवं शब्द रूपों के प्रयोग आज की भांति सुनिश्चित नहीं हुए थे और कुछ तो आज ही सुनिश्चित नहीं हैं। ऐसी स्थिति में कठोर नियंत्रण का  संयमन, विरोध सहन तथा श्रम साधना से काम लेना पड़ता था।

सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन उस समय हुआ था जब भारत में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या लगभग नगण्य थी। जो कुछ थोड़े लोग थे भी उनका आकर्षण हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की ओर नहीं था। वे लोग हिंदी पत्र-पत्रिका पहले तो खरीदते नहीं थे और जब खरीदते थे तो उसका पैसा चुकाने में कोताही बरतते थे। वे पत्रिकाओं को अपने पास के पैसे से खरीद कर नहीं पढऩा चाहते थे। पत्रिकाओं को भी वे प्रसाद स्वरूप मुफ्त में ही प्राप्त करना चाहते थे। उनकी इस भावना से क्षुब्ध होकर आचार्य द्विवेदी ने दिसंबर 1908 की सरस्वती में लेख लिखा था- यहां के मासिक पुस्तक-प्रकाशक सदा घाटे का दुखड़ा रोया करते हैं। बेचारों को घर के धान को पयार में मिलाना पड़ता है। बहुतेरे को तो यहां तक घाटा होता है कि एक बार पत्र निकालकर फिर निकालने का उन्हें साहस भी नहीं होता। इसके कई कारण हैं एक तो यहां शिक्षितों की संख्या कम है। दूसरे सामथ्र्यवान और पढ़े-लिखे लोग मासिक पुस्तकें बहुत कम पढ़ते हैं। तीसरे जो पढ़ते हैं वह गांठ के पैसे खर्च करके नहीं पढऩा चाहते हैं, मांग-मांग कर या प्रकाशकों को धोखा देकर अपना काम निकालते हैं। इनमें वे अपना अपमान नहीं समझते। कम मूल्य देकर मांगने वालों की भी कमी नहीं है। द्विवेदी जी लेखकों के विषय-संकीर्णता की हमेशा आलोचना करते थे। वे लेखों के विषय में विविधता को बहुत महत्व देते थे। वे लेखकों को नूतनता के सृजन का प्रोत्साहन देते थे। बाकी और घिसी पिटी पुरानी बातों को नमक मिर्च लगाकर लेख के रूप में प्रस्तुत करने वाले लेखकों से वह सख्त नाराज होते थे। इन्हीं समस्याओं के निराकरण के लिए वे अपने एक लेख में लिखते हैं- हिंदी पत्रों में अधिकांश का संपादन योग्यतापूर्वक नहीं होता। क्या भाषा के लिहाज से, क्या सामयिक लेखों, नोटों और खबरों के लिहाज से, क्या विषय-बाहुल्य के लिहाज से, क्या पॉलिसी के लिहाज से, बहुत ही कम हिंदी के पत्र आजाद (कानपुर, उर्दू पत्र सन1913) की बराबरी कर सकते हैं। हिंदी पत्रों की पॉलिसी का तो यह हाल है कि जिस नीति का आज वह समर्थन करेंगे, कल ही कोई ऐसी बात लिख देंगे जो ठीक उसके प्रतिकूल है। जो खबरें, अंग्रेजी, उर्दू और मुख्य हिंदी पत्रों में निकल आती हैं, वही बहुत पुरानी हो जाने पर भी किसी-किसी हिंदी पत्र में निकलती देख दुख होता है। कभी-कभी तो छ:.छ: महीने, वर्ष-वर्ष की पुरानी स्पीचें टुकड़े-टुकड़े करके छापी जाती हैं।

द्विवेदी जी हिंदी सेवा को किसी ईश सेवा से कम नहीं समझते थे। वे नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित करते थे तथा उन्हें स्वदेश और स्वभाषा के प्रति प्रेमपरक लेख लिखने की प्रेरणा देते रहते थे। देश प्रांत और समाज की उन्नति के लिए संपादक द्विवेदी जी ने हिंदी भाषा को अपनाने एवं ग्रंथालय की स्थापना पर  बल दिया यथा- हमारी भाषा हिंदी है। उसके प्रचार के लिए गवर्नमेंट जो कुछ कर रही है सो तो कर रही है, हमें चाहिए कि हम अपने घरों का अज्ञान-तिमिर दूर करने और अपना ज्ञानबल बढ़ाने के लिए इस पुण्य कार्य में लग जाएं। यह काम अनेक प्रकार से हो सकता है। समाचार पत्र और सामाजिक पुस्तकें निकाल कर इस तिमिर का पर्दा कुछ-कुछ हटाया जा सकता है। अच्छी-अच्छी नई पुस्तकें लिखकर और अन्य भाषाओं के उपयोगी ग्रंथों का अनुवाद करके सुशिक्षा और ज्ञान की वृद्धि की जा सकती है।

सन् 1909 तक सरस्वती उत्कृष्ट  पत्रिका के रूप में स्थापित हो गई थी। इसके लिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी को जी तोड़ मेहनत करनी पड़ी। फलस्वरुप वे अनिद्रा के रोगी हो गए और उन्हें एक वर्ष का अवकाश लेना पड़ा। सरस्वती के लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिया था। लेखकों से लेख लिखवाना तो कोई द्विवेदी जी से सीखे। इसके लिए वे भाषा और राष्ट्र की सीमाओं को भी बाधक नहीं मानते थे। अपने पत्रिका के लिए ज्ञान-विज्ञान से लेकर कथा साहित्य और कविता तक उपर्युक्त लेखक ढूंढने में उन्होंने अथक परिश्रम  किया। ब्रिटिश गुयेना, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान तथा दुनिया के किसी भी कोने में उन्हें अपने काम का आदमी दिखाई भर दे जाए उससे वे लेख तो लिखा ही लेते थे। उसके अस्तित्व की भनक भर उनके कान में पड़ जाए, वे उसे खोज निकालते में कोताही नहीं बरतते थे। उनके इसी विशेष गुण के बारे में विजय दत्त श्रीधर अपनी पुस्तक में लिखते हैं- एक बार जब महावीर प्रसाद द्विवेदी उस समय के प्रख्यात पत्रकार संत निहाल सिंह से मिलने आनंद भवन गए तो उनसे सरस्वती के लिए लिखने को कहा। जब संत निहाल सिंह ने कहा कि वह तो अंग्रेजी में लिखते हैं तब उन्होंने उत्तर दिया कि कोई बात नहीं हम उसका अनुवाद करा लेंगे तब से संत निहाल सिंह के लेख सरस्वती में छपने लगे।

द्विवेदी जी का हिंदी साहित्य के प्रति विशेष योगदान हिंदी साहित्य को रीतिकालीन मांसलता से निकालकर लोकमानस की यथार्थ भावभूमि पर खड़ा करना है। द्विवेदी जी ने महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचना जूही की कली अपनी प्रतिबद्धता के कारण ही वापस कर दी थी। उसके बारे में डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं- साहित्य के विशिष्ट क्षेत्र में द्विवेदी जी ने रीतिवाद-विरोधी अभियान का संगठन और नेतृत्व किया। जैसे सामाजिक क्षेत्र में वह सामंती रोगियों के आलोचक थे, वैसे ही साहित्य क्षेत्र में उन्होंने दरबारी साहित्य की परंपराओं, नायिकाभेद, अलंकारशास्त्र, चमत्कारवाद की तीव्र आलोचना की। इस रीतिवादी धारा से भक्ति-साहित्य और भारतेंदु युगीन गद्य-लेखन को अलग करते हुए उन्होंने यथार्थपरक साहित्य रचना के नए सिद्धांतों की रूपरेखा स्थिर की।

सही मायने में द्विवेदी युग में ही हिंदी पत्रकारिता का साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप निखरा। वह बड़े दायित्व की ओर मुड़ी और इसका श्रेय नि:सन्देह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को जाता है। द्विवेदी जी ने अपने संपादनकाल में नवोदित लेखकों, कवियों को ना केवल सरस्वती के माध्यम से प्रतिष्ठापित किया, बल्कि स्वयं भी छद्म नामों से लेख लिखकर लेख पूर्ति करते थे। बाद के दौर में महत्वपूर्ण कवियों और लेखकों में गिने जाने वाले लोग सरस्वती से ही सीखकर अपनी पहचान बना सके। आचार्य द्विवेदी ने ब्रज-अवधि और उर्दू-संस्कृत के बीच डगमगाती हिंदी भाषा को खड़ी बोली का आधार दिया। उनके द्वारा खड़ी बोली के परिष्करण और परिमार्जन के कार्य को भुलाया नहीं जा सकता। जब तक हिंदी साहित्य रहेगा दिवेदी जी का नाम सदैव स्मरणीय रहेगा। उनके द्वारा हिंदी साहित्य की सरस्वती के माध्यम से की गई सेवा सदैव उनकी मधुर याद दिलाती रहेगी।