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Tuesday 21 Aug 2018

दूधनाथ सिंह की कहानियाँ सामाजिक विसंगति के खिलाफ प्रतिशोध हैं

नई कहानी आंदोलन’, जिसे कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश ने हिंदी साहित्य जगत में प्रतिष्ठित किया था 1961-62 तक आते-आते धीरे-धीरे अपनी रूढिय़ों और त्रुटियों के कारण दम तोडऩे लगी। साठोत्तर युवा मानस जहां स्वातंत्र्यपूर्व की पीढिय़ों से कट जाना चाहता था, वहां स्वतंत्रता से लेकर 1960 तक कहानी में भी उनको तीखापन, आक्रोश और जीवन के यथार्थ की सही पकड़ नहीं मिल रही थी, इसलिए वह नई कहानी से कटकर ही अपनी रचनाधर्मिता को साबित और स्थापित करना चाहता था, उसने यह अनुभव किया कि 'नई कहानी’ जिन्दगी और आज के परिवेश की सही अभिव्यक्ति दे पाने में अक्षम हो गई हैं और उसमे कई तरह की त्रुटियों का समावेश भी हो गया है। 1 नई कहानी में वैयक्तिक आक्रोश, यौन कुंठित उत्पात, संत्रास, घुटन, अकेलापन, अजनबीपन आदि स्थिति जो बड़ी ही तीक्ष्णता से उद्घटित की जा रही थी 1960 तक आते-आते वह भोगी हुई और प्रामाणिक नहीं, बल्कि ओढ़ी हुई और आयातित प्रतीत होने लगी। इन्हीं त्रुटियों ने साठोत्तरी कहानीकारों को विद्रोही बना दिया और फिर 'सचेतन कहानी’, 'सहज कहानी’, 'समकालीन कहानी’, 'आधुनिक कहानी’, 'सक्रिय कहानी’, 'समांतर कहानी’, 'अकहानी’ आदि नाम से साठोत्तरी कथा आंदोलन का दौर चला।

'दूधनाथ सिंह’ को हिंदी साहित्य के इतिहास में उन कथाकारों में शामिल किया जाता है जिन्होंने अपनी राह से भटकी हुई नई कहानी आंदोलन को चुनौती दी और साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया के साथ दूधनाथ सिंह 'हिन्दी के चार यार’ के रूप में विख्यात हैं जिन्होंने अपने जीवन के उत्तराद्र्ध में हिन्दी लेखन को न केवल नई धार दी बल्कि लेखकों की पीढ़ी तैयार कर साठोत्तरी कथा आंदोलन को सांगठनिक मजबूती प्रदान की।

दूधनाथ सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। कहानी, कविता, नाटक, उपन्यास, निबंध, संस्मरण, पत्रिका का संपादन आदि विधाओं में उन्होंने साहित्य सृजन किया। साठोत्तरी कहानी को वैचारिक धरातल प्रदान करने में दूधनाथ सिंह का विशिष्ट योगदान रहा है। इनकी कहानियों ने समकालीन समाज और जीवन में व्याप्त चिरंतन कही जाने वाली मूल्यों पर चोट कर उन्हें पुनर्परिभाषित करने का काम किया। डॉ ज्ञानवती अरोड़ा के शब्दों में- उनका लेखन समकालीन जीवन बोध से संपृक्त है। उनमें आत्मपरक प्रवृतियों की प्रधानता है। मध्यमवर्गीय जीवन अपनी संपूर्ण मानसिकता - कुंठा, निराशा और घुटन के साथ अभिव्यक्त हुआ है। उनके रचनाकार में सामाजिक प्रतिबद्धता है। पूरी ईमानदारी से परिवेश स्वयंमेव उभारा है। आज के जीवन के तमाम दबाव और विशेषताएँ उनकी कहानियों में यथातथ्य चित्रित है। ऐसा लगता है कहानीकार स्वयं इन स्थितियों का भागीदार रहा है। 2

कहा जाता है कि एक बड़ा कवि जीवन भर एक ही कविता को बार-बार लिखता है, जबकि एक बड़ा कथाकार हरेक बार एक अनछुई और अलग कहानी लिखता है। दूधनाथ सिंह की हर कथा दूसरे से अलग है और समाज की अलग-अलग विसंगतियों का पर्दाफाश करती है। 'सपाट चेहरे वाला आदमी’ दूधनाथ सिंह का प्रथम कहानी संग्रह है जिसमे आठ कहानियां संकलित है- (1) रीछ (2) दु:स्वप्न (3) सब ठीक हो जाएगा (4) प्रतिशोध (5) आईसवर्ग (6) कोरस (7) रक्तपात (8) सपाट चेहरे वाला आदमी। 'हिंदी कहानी: समीक्षा और संदर्भ’ में डॉ विवेकी राय इन कहानियों पर टिप्पणी करते हैं- इस संकलन की आठों कहानियाँ भारतीय जीवन के आंतरिक 'केआँस’ के साक्षात्कार के घोषणा पत्र के रूप में प्रकाशित हुई हैं। वास्तव में विसंगतियों और अंतर्विरोधों के जिस विद्रोही स्वर को लेखक अपनी रचनाओं में अस्वीकार करता है, वह व्यापक प्रभाव में आंतरिक से अधिक बाहरी 'केआँस’का साक्षात्कार बन जाता है। 3 इन कहानियों में एक तरफ तो समाज में व्याप्त सड़ी-गली परंपराओं और अनाचारों का विरोध के साथ नई और पुरानी पीढ़ी के बीच दिनानुदिन बढ़ती हुई वैचारिक दरारों का वर्णन मिलता है, तो दूसरी तरफ पूंजीवादी तत्वों द्वारा विज्ञापनबाजी के शातिराना हथकंडों से उपभोक्ताओं के ऊपर कृत्रिम आवश्यकताओं को जबरन थोपकर बाजारवादी संस्कृति को बढ़ाने की साजिश और परिणामस्वरूप दिन-प्रतिदिन अप्रतिहत बढ़ते जाने वाली महंगाई को उजागर किया गया है। इनकी कहानियाँ 'नई कहानी’ की कहानियों से नितांत भिन्न है। इस संदर्भ में स्वयं दूधनाथ सिंह का कथन है- इन कहानियों ने एक जमाने में हिंदी-कहानी में एक उत्तेजक परिस्थिति पैदा कर दी थी। कहानी के क्षेत्र में अपने सारे आरोपों-प्रत्यारोपों के बावजूद इनकी ताजगी और इनका अनहोनापन अभी भी बरकरार है। इस कहानीकार के बहुत सारे समकालीनों ने इनकी तर्ज पर कहानी लिखने की कोशिश की लेकिन इसमें वे असफल ही नहीं हुए, हास्यास्पद भी बनें। सच बात यह है कि इसी नकल के प्रयास में बहुत सारे कहानीकार बर्बाद हो गए। इस बर्बादी से जो सबक मिलता है, वह यह कि अपनी ही तरह लिखें। 4     

'सुखान्त’ कहानी संग्रह में कुल पांच कहानी संकलित है- (1) स्वर्गवासी (2) शिनाख्त (3) उत्सव (4) विजेता (5) सुखान्त। इस कहानी संग्रह की प्राय: सभी कहानियों में दूधनाथ सिंह ने युवाओं में दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाने वाली यौन उच्छृंखलता पर कटाक्ष के माध्यम से उन्हें सही दिशा देकर समाज को गर्त में जाने से बचाने की कोशिश की है। इन कहानियों के माध्यम से रचनाकार ने यह भी दिखाने की कोशिश की है कि भारतीय समाज के गरीब तबके के लोग सामाजिक नियंताओं के षड्यंत्रों के आगे किस प्रकार विवश होकर भाग्यवाद और नियतिवाद जैसे खोखले दर्शनों के प्रति धीरे-धीरे और भी आस्थावान होते जा रहे हैं। इस संग्रह की कहानियों में दूधनाथ सिंह इस बात पर कई बार जोर देते हैं कि देश के आजाद हो जाने, जमींदारी प्रथा के उन्मूलन होने तथा इतनी वैज्ञानिक प्रगति करने के पश्चात आज भी हमारा समाज सामंतवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाया है। इस संग्रह की कहानियों का शिल्प बहुत ही प्रभावशाली है। इस संग्रह की कहानियाँ शब्दार्थ को अंदर से बाहर की ओर फेंकती है और इस तरह कथा की एक नयी संरचना का इजाद करती है। 

तीसरा कहानी संग्रह 'प्रेम कथा का अंत न कोईÓ में भी पांच कहानी संकलित हैं- (1) वे इन्द्रधनुष (2) बिस्तर (3) ममी तुम उदास क्यों हो (4) सीखचों के भीतर (5) आज इतवार था। इस संग्रह की कहानियों में अधिकांश विफल प्रेम की कहानी है, साथ ही स्वतंत्रता के पश्चात राजनीतिक दिशाहीनता के कारण युवाओं में फैलती जा रही आजादी से मोहभंग की स्थिति, पूंजीवादी सभ्यता के प्रसार के कारण परिवार के लोगों में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के पनपने से धीरे-धीरे संयुक्त परिवार की टूटने, एकल परिवारों में फैलते जा रहे विफल दाम्पत्य जीवन को बड़ी ही कुशलता से उकेरा गया है। दूधनाथ सिंह जी इस संग्रह की भूमिका में लिखते हैं- ये कहानियाँ उसी दौर में लिखी गई, जिस दौर में 'सपाट चेहरे वाला आदमी’ और 'सुखान्त’ संग्रहों की कहानियाँ। मेरे पिछले, उपर्युक्त संग्रहों से किसी भी माने में कम नहीं हैं। 5

कहानी संग्रह 'माई का शोकगीत’ में पांच कहानी संकलित है- (1) हुंडार (2) जॉर्ज मेकवान (3) गुप्तदान (4) लौटना (5) माई का शोकगीत। 'हुंडार’ कहानी में उच्च जाति के पुरुषों द्वारा निम्न जाति की महिलाओं के दैहिक शोषण को बड़ी ही मार्मिकता से उजागर किया गया है। 'जॉर्ज मेकवान’ उन गरीब कलाकारों की व्यथा कथा को सामने लाता है जो अप्रतिम कला का निर्माण तो करते हैं किन्तु वह कला उनकी गरीबी को दूर नहीं कर पाती, परिणामस्वरूप, कलाकार आज भी रोटी के लिए तरसते हैं। 'गुप्तदान’ मंत्रालयों में चल रही घूसखोरी की कहानी बयान करती है और यह दिखाती है कि कैसे कोई मंत्री बिना गुप्तदान लिए कोई प्रोजेक्ट मंजूर नहीं करता है। 'लौटना’ कहानी में दूधनाथ सिंह जी ने बुजुर्गों के साथ बच्चों के मन में झांकने की कोशिश की है। इस कहानी में दूधनाथ जी का मनोविज्ञान देखते ही बनता है। इस संग्रह की कहानियों में लेखक ने राजनेताओं और उद्योगपतियों की मिली भगत से भारतीय समाज में फैल चुके भ्रष्टाचार, घूसखोरी, महंगाई, जुगाड़बाजी आदि विकृत्तियों को उजागर किया है। 'माई का शोकगीत’ भारतीय समाज में महिलाओं की शारीरिक और मानसिक यातना जैसे घरेलू हिंसा की कहानी है। इस कहानी के माध्यम से दूधनाथ जी स्त्रियों को अपने ऊपर हो रही यातनाओं का बहिष्कार कर पुरुषों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित करते हैं- क्यों? क्या मरद हमें दाम देता है? दाम देता नहीं... उल्टे लतियाता भी है। तुम अभी छुट्टा घूम रही हो ननद रानी ! तुम क्या जानो। लेकिन कुछ हमसे भी गियान ले लो। हम कहते हैं कि जब तक हम खाना पकाते रहेंगे, गुलाम बने रहेंगे। और गुलाम बने रहेंगे तो लतियाए भी जाते रहेंगे। तुम और तुम्हारे गान्ही महतमा भारतमाता सौ बार सात समुन्दर पार से छुड़ा लायें... ये गुलामी बनी रहेगी। 6

नौ कहानी को संकलित कर दूधनाथ सिंह ने 'धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ कहानी संग्रह की रचना की- (1) काशी नरेश से पूछो (2) रेत (3) दुर्गन्ध (4) सन्नाटा चाहिए (5) आखिरी छलांग (6) वारिस (7) नपनी (8) वह लौटता नहीं (9) धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे। इस संग्रह की कहानियों में लेखक ने भारत के सामाजिक यथार्थ को उद्घाटित करने की कोशिश की है। इस संग्रह के बारे में स्वयं दूधनाथ सिंह का कथन है - धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे प्रतीकों और फैंटेसी की कहानी नहीं है। वह हमारे जीवन की एक दुर्घटना, जो आम है, उस पर प्रतिष्ठित है। चुपचाप माँग पर स्त्रियों का खरीदना और बेचना। जो लोग कहते हैं कि इस कहानी का कथ्य पुराना है, वे उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों और बिहार के बहुत सारे हिस्सों के आज के जीवन से परिचित नहीं हैं। जहाँ लड़कियों की खरीद फरोख्त आम है। 7 आज गंगा का प्रदूषण स्तर इतना बढ़ गया है कि गंगा की स्वच्छता के लिए भारत सरकार द्वारा 'नमामि गंगे’ योजना चलाई जा रही है, दूधनाथ सिंह ने अपनी कहानी 'काशी नरेश से पूछो’ में वाराणसी शहर में गंदगी के साम्राज्य और गंगा के प्रदूषण को मुख्य विषय बनाया तथा गाँवों में रहने वाले लोगों के रहन सहन का चित्रखिंचित वर्णन किया है। देश को स्वतंत्र हुए दशकों बीत जाने के बावजूद हमारे समाज में निम्न वर्ग कैसे अभी तक अपनी परंपराओं और रूढिय़ों की बेडिय़ों में फंसा हुआ है इसका वर्णन 'रेत’ कहानी में मिलता है। यह कहानी तत्कालीन समाज में सामंतवादियों द्वारा अपनाने वाली रहन-सहन के तौर तरीकों को भी उजागर करता है। शिक्षा कैसे किसी को अपने परिवार और अपने समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाती है इसका यथार्थ चित्रण 'दुर्गन्ध’ कहानी में मिलता है। समाज जब पतन के दौर में जाता दिखाई दे रहा था उस समय इस कहानी के माध्यम से दूधनाथ सिंह समाज में नैतिक शिक्षा को प्रोत्साहित कर समाज में आवश्यक और उचित शिक्षा का प्रसार करना चाहते थे। 'सन्नाटा चाहिए’ कहानी न्यायाधीशों के भयभीत जीवन को ध्यान में रखकर लिखी गयी है कि किस तरह उनका पेशा उनके जीवन को एकरस और डर के साये में जीने के लिए मजबूर करता है जिससे उनका जीवन दयनीय हो जाता है। 'आखिरी छलांग’ कहानी ऐसे युवक की कहानी है जो रोजगार के लिए शहर आता है लेकिन शहर आकर भी वह ग्रामीण जीवन को ही जीता रहता है और शहर में रहकर भी शहर को अपना नहीं पाता। 'वारिस’ बेमेल विवाह के बाद पारिवारिक रिश्तों के बिखरने की कहानी है। इस कहानी की नायिका अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट होकर योजनाबद्ध तरीके से अपने पति की हत्या कर देती है। 'नपनी’ कहानी में देश में संक्रामक बीमारी की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार और समाज में जड़ जमा चुके दहेज प्रथा को बहुत मार्मिकता से उकेरा गया है। 'वह लौटता नहीं’ गांवों में रहने वाले लोगों के जीवन को सामंतवादियों द्वारा कष्टप्रद बना देने की दारुण कहानी है। 'धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ कहानी विफल दाम्पत्य जीवन और स्त्रियों के खरीद फरोख्त की कहानी है। यह कहानी धर्म की आड़ में धंधा करने वालों का पर्दाफाश करती है - नगीना दास दोनों हाथ जोड़कर परनाम करते हैं, साधु बने हो, संत बने हो और कारोबार करते हो? अँचला पहिर के, टीका-फाना करके, घरी-घंट बजाते हो, पोथी बाँचते हो, कनफूँका मंतर देते हो और दोसरे के बहु बेटी बेंचते हो? 8     

चीनी भाषा के महान कवि तूफू के नाम पर दूधनाथ सिंह ने अपने छठे कहानी संग्रह का नाम 'तूफू’ रखा। इस संग्रह में कुल अठारह कहानी संकलित है- (1) तूफू (2) माननीय न्यायमूर्ति जी लोग और सन्नाटा (3) आखिरी छलाँग (4) दो पीढिय़ाँ (5) एक सनातन प्रेम कथा (6) जलमुर्गियों का शिकार (7) नव्य न्याय (8) टोपी वाले: एक कहानी, दो जबानी (9) पहलवान (10) मसखरा और पिछलग्गू (11) खोये हुए (12) नपनी (13) 1857 की गाली (14) नाम में क्या रखा है।

दूधनाथ सिंह जी ने अपने जीवन काल में जो कुछ भी देखा और अनुभव किया उसे शब्दों के माध्यम से पन्नों पर उकेर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं में हमेशा सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समस्याओं को केंद्र में रखा और इस प्रक्रिया में उनकी लेखनी हमेशा समाज के शोषित वर्गों के साथ रही है, इसलिए उनकी हर कहानी तत्कालीन जीवन के यथार्थ का उद्घाटन करती है और इनको अपने समकालीन कथाकारों से अलग करती है। डॉ रत्न लाल शर्मा के शब्दों में- समकालीन हिंदी कहानी में साठोत्तरी पीढ़ी ने अनेक प्रयोग किए हैं जिनमें सर्वाधिक प्रयोग दूधनाथ सिंह की कहानियों में परिलक्षित होते हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में प्रतीकों, बिम्बों और सांकेतिकता को अपनाया है कि आधुनिक जटिल जीवन की सक्षम और सार्थक अभिव्यक्ति की जा सके। 9 अपनी कहानियों में हमेशा दलितों और शोषितों का साथ देने के संबंध में दूधनाथ सिंह की मान्यता थी कि हमारा समाज दो भागों में बंट गया है। रोजी-रोटी, किसानी, नौकरी, मजदूर वर्ग के हालात सब धीरे-धीरे खराबी की ओर जा रहे हैं। राजनैतिक आशावाद समाज को छल रहा है। जनता की भोली-भाली मन:स्थिति (चेतना नहीं) को लगातार ठगा जा रहा है। ठगी का व्यापक प्रभाव चारों ओर दिख रहा है। जन आंदोलनों का अभाव, ट्रेड यूनियनों की दलाली एक तरह से राजनीति को क्षरणीय कर रहे हैं। यह देश बहुत बड़ा है और यह कभी भी अपने राजनैतिक और आर्थिक शोषकों के खिलाफ उठ खड़ा हो सकता है। अत: सारे व्यक्तिगत घटाटोपों, निराशाजनक स्थितियों, अंदर और बाहर की मार से मैं कभी त्रस्त नहीं होता। अवसाद मुझे मारता है तो एक संजीवनी दृष्टि भी देता है। वह यह है कि जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं। वह यह भी कि एक ही जीवन मिलता है और हर समझदार व्यक्ति को उसे समाज को अर्पित कर देना चाहिए। मैंने अपना जीवन संयोगवश हाथ लगे एक लेखक के रूप में समाज को अर्पित किया। मैं जब अपने दुखों के बारे में लिखता हूँ तो वे सार्वजनिक दुख होते हैं। मैं अपने बारे में कुछ नहीं लिखता। सार्वजनिकता के बारे में जीवन की इस पटकथा को बार-बार दर्शकों के सामने अभिनीत करता हूँ।

       दूधनाथ सिंह बहुत भावुक प्रवृत्ति के इंसान थे इसलिए वे दूसरों के दु:ख से दुखी हो जाते थे। समाज में जब इतना अधिक दु:ख पसरा हो तो कैसे कोई संवेदनशील प्राणी उसे देखकर तटस्थ रह सकता है? कैसे किसी नेक आत्मा का आंतरिक भाव उसके हृदय का बांध नहीं तोड़ सकता? ध्यातव्य है कि किसी इंसान का आंतरिक भाव जब हृदय का बांध तोड़कर भाषा से संबंध स्थापित करने लगता है तो संवेदना का उद्गम निश्चित हो जाता है। संवेदना मानव मस्तिष्क की एक ऐसी भाव-दशा है, जिसमे करुणा, दया, ममता, सहानुभूति, क्रोध आदि अनुभूतियाँ सन्निहित होती है। संवदेना हर मानव का एक विशेष गुण है जो उसे दूसरे जीवों से अलग और विशिष्ट बनाता है। स्वयं-वेदना को शब्दों में ढालकर पाठकों के लिए सम-वेदना बना देना हर मानव से संभव नहीं है। इस तरह का दुष्कर कार्य दूधनाथ सिंह जैसे साहित्यकार ही कर सकते हैं।

संदर्भ

1.      साठोत्तर हिंदी कहानी और राजनीतिक चेतना- डॉ जितेन्द्र वत्स, पृष्ठ-62

2.     समकालीन हिंदी कहानी-यथार्थ के विविध आयाम- डॉ ज्ञानवती अरोड़ा, पृष्ठ-96

3.     हिंदी कहानी : समीक्षा और संदर्भ- विवेकी राय, पृष्ठ-75

4.     सपाट चेहरे वाला आदमी- दूधनाथ सिंह, पृष्ठ-9

5.     प्रेम कथा का अंत न कोई - दूधनाथ सिंह, पृष्ठ-3

6.     माई का शोकगीत - दूधनाथ सिंह, पृष्ठ-88

7.     कहा सुनी - दूधनाथ सिंह, पृष्ठ-73

8.     धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे - दूधनाथ सिंह, पृष्ठ-120

9.     कहानी के नए सीमांत- डॉ रत्न लाल शर्मा, पृष्ठ-29