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Sunday 16 Dec 2018

त्रिलोचन की कहानियां

त्रिलोचन शास्त्री की छोटी-बड़ी बीस कहानियों का इकलौता संग्रह 'देशकाल’  सन् 1986 में प्रकाशित हुआ। अपनी संक्षिप्त भूमिका 'कुछ शब्द’ में उन्होंने कहानियों के संकलन के लिए दिनेश शर्मा और अनुक्रम के लिए जगत शंखधर के अविस्मरणीय योगदान के लिए आभार प्रकट किया है। लेखक, संकलन या अनुक्रम प्रदाता की ओर से ऐसा कोई संकेत उपलब्ध नहीं है कि ये कहानियां कब लिखी गर्इं, इन्हें कहां से संकलित किया गया या ये पहली बार कहां और कब प्रकाशित हुर्इं। इससे इन कहानियों के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को तो समझने में कठिनाई होती ही है इनके वास्तविक विकास क्रम को समझना भी मुश्किल होता है। सावधानीपूर्वक इन कहानियों को पढऩे के बाद ऐसे कुछ सूत्र अवश्य प्राप्त होते हैं, जिन्हें आधार बनाकर इनके रचना-परिवेश या ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश भर की जा सकती है।

ये कहानियां अधिकतर अवध के ग्रामीण क्षेत्र से संबद्घ हैं। इनके पात्र प्राय: ही भारतीय समाज के हाशिए से आए लोग हैं। जो खेती की दुर्दशा के कारण, परिवार के भरण-पोषण के लिए कलकत्ता, बम्बई और जब-तब रंगून भागते हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि ये प्राय: ही औपनिवेशिक भारत की सामाजिक संरचना को आधार बनाकर लिखी गई कहानियां हैं। यह वह दौर है जब 'दलित’ जैसा शब्द प्रचलन में नहीं आया था और कथित रूप से नीची समझी और मानी जाने वाली इन जातियों की पहचान उनके काम से ही होती थी- चमार, भंगी, मल्लाह आदि।

त्रिलोचन की ये कहानियां एक कवि के रूप में उनकी पहचान के दौर की कहानियां हैं- जब धरती (1945) और दिगन्त (1953) के प्रकाशन के बाद वे उपेक्षा और अनदेखी की मार झेल रहे थे। लंबे अंतराल में, उनके कवि-कर्म के बीच, उनकी ये कहानियां भी लिखी गईं और यहां-वहां छपीं। इनकी अपनी नियति भी उनकी कविता से बहुत भिन्न थी। इनके संकलन और प्रकाशन की आवश्यकता कदाचित, तब अनुभव हुई जब 'ताप के ताए हुए दिन’ (1980) और 'उस जनपद का कवि हूं’ (1981) के प्रकाशन के बाद उनके प्रति व्याप्त उपेक्षा का दौर पिघला। यही वह दौर भी था जब मुक्तिबोध सृजनपीठ पर पहुंचकर वे अपने को नए सिरे से आविष्कृत और स्थापित कर तथा करवा सके।

त्रिलोचन की ये कहानियां हिन्दी कहानी के अपने काल के रचनात्मक विकास के अधिक मेल में नहीं हैं। इस तरह इन्हें हिन्दी कहानी की विकासमान परम्परा का अंग मानकर इनके मूल्यांकन की सुविधा लगभग नहीं है। हिन्दी में कवियों द्वारा लिखित कहानियों की जो एक पर्याप्त समृद्घ परंपरा रही है- प्रसाद, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध,  श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय आदि- उस परंपरा में भी त्रिलोचन की ये कहानियां नहीं अंटती। प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी में कहानीकारों की जो बहुत संभावनाशील और ऊर्जावान त्रयी आई- जैनेन्द्र, अज्ञेय और यशपाल- भाषा, संरचना और विचार के स्तर पर ये कहानियां उनसे भी मेल नहींखातीं।  त्रिलोचन की ये कहानियां कुछ-कुछ प्रेमचंद की कहानियों के जरूर निकट लगती हैं। अपनी किसानी पृष्ठभूमि, शोषण, अन्याय, अभाव और संघर्ष की दृष्टि से। त्रिलोचन के अपने इस संघर्ष की झलक उनके 'रोजनामचा’ (1992) में सुवस्थित है। त्रिलोचन की ये कहानियां उनके अपने समय और समाज की ही कहानियां हैं जिन्हें उनके कवि-कर्म को विस्तार के रूप में खुलकर देखना ही उचित होगा।

त्रिलोचन की इन कहानियों में जो चीज विस्मित करती है, प्रमाणित तो वह करती ही है, वह है इन कहानियों का अनुभव-विस्तार। 'अपनी इज्जत आप करो’, 'नदी किनारे’ और 'जोखन’ जैसी कहानियां अपने संपर्क में आसपास के जीवित और वास्तविक लोगों पर लिखी नई कहानियों के उदाहरण हैं। अपनी ऐसी ही कहानियों को प्रसंग में त्रिलोचन कदाचित 'माटी की गंध’ की बात करते हैं। 'अपनी इज्जत आप करो’, जीवन में सिद्घांत और व्यवहार के तनाव को व्यंग्य की सूक्ष्म अंतर्धारा के साथ अंकित करती है। झूरिया-झूरी जाति का चमार है। दिन भर वह जमींदार के यहां इस आशा में खटता है कि मजूरी मिलने पर शाम को चूल्हा जलेगा। तब अपने परिवार के साथ से आए पहुनों के सेवा-सत्कार का अवसर भी उसे मिलेगा। ठाकुर से मजूरी तो उसे नहीं ही मिलती उल्टे उसके पहुना भी उसी के साथ भूखे-प्यासे ठाकुर की पालकी उठाने के लिए हांक दिए जाते हैं। कहानी में दो पात्र आमने-सामने हैं: कहानी का वाचक अर्थात् 'मैं’ और 'स्वयं झुरिया’। वाचक सवर्ण और किताबों के संपर्क से बना ज्ञानी है। यह 'अमृत-सिद्घांत’ उसे किसी किताब से ही मिला है कि अपनी इज्जत आप करो। यदि तुम अपनी इज्जत करोगे तो दूसरे भी तुम्हारी इज्जत करेंगे। इस सिद्घांत को व्यावहारिक रूप देने के लिए झुरिया उसे मिल जाता है। झुरिया का ज्ञान किताबी नहीं है। उसने अनुभव के ताप में तपकर सब-कुछ सीखा है। वाचक पर्याप्त उदारतापूर्वक झुरिया को समझने को तत्पर है। वह उसे वह छूट भी देता है कि समझ में न आने पर वह उससे कोई बात कितनी ही बार पूछ सकता है। उसका सारा जोर इस पर है कि बात झुरिया की समझ में आनी चाहिए। लेकिन झुरिया अपनी जगह दृढ़ है, 'समझने की बातें बहुत हैं। उनका अंत नहीं है। जीवन का अंत है। जीवन की उलझनों का अंत नहीं है।‘ (देश-काल, संस्करण) 1986 पृ. 21) झूरी जब से समझने लायक हुआ है- उसे पेट समझाया गया और काम समझाया गया, घर-बार का इंतजाम समझाया गया। अपनी जिज्ञासा के रूप उसका सवाल है- इज्जत है क्या? वाचक जब उसे 'विचार’ की सलाह देता है, झुरिया का उत्तर है- वह कामकाजी आदमी है, सिर्फ विचार उससे नहीं सधेगा। फिर वह अपने अनुभव के ताप में तपी इज्जत की परिभाषा देता है, 'मैंने अब तक जो बूझा है,सो कहता हूं। इज्जत धन है। इज्जत सजावट है। इज्जत आतंक है। इज्जत वह सब कुछ है जिससे दूसरा आदमी दब जाए। किसी आदमी का दब जाना, झुक जाना ही इज्जत करता है।‘ (वही पृ. 23) अपने अनुभव से उसने यह भी जाना है कि यह धनियों को बिना यत्न मिलती है। वे बेइज्जत तब होते हैं जब अपनी तड़क-भड़क हटा देते हैं। अपनी पीड़ा और संताप की राह चलकर ही झुरी ने कुछ तर्क विद्या सीखी है। उसने यह भी जाना है कि अपनी इज्जत का मतलब है- टीम-टाम का बढ़ाव, धन से यश का विस्तार। जिन दरिद्रों को कभी इज्जत मिली ही नहीं, वे उसका मूल्य क्या समझेंगे। जिस दिन वे उसका मूल्य समझ गए, चीजें पूर्ववत नहीं रहेगी। फिर वाचक को चेतावनी-सी देता हुआ वह कहता है, 'उनकी आग को शांत रहने दीजिए, उस आग को सुलगाइए नहीं।‘ (वही, पृ. 25) यह दरिद्र वस्तुत: 'पहाड़ की आत्मा’ के पहाड़ की तरह सब कुछ सहता है- अविचल एकान्त, अभय और गंभीर। दरिद्र, त्रस्त निपीडि़त भ्रमित वर्ग भी ऐसा ही है। उसने भी पहाड़ की आत्मा वास करती है।

झूरी जब वाचक की बात नहीं समझ पाता, वाचक खीझ उठता है। उसे शांत करने के लिए झूरी कहता है- 'मेरी समझ का दोष है बाबू। आपका नहीं। न समझा। न समझ पाऊंगा।‘ (वही पृ. 25) झूरी के अनुभव के ताप में सिद्धांत की जड़ता, सारे निहित अमृतत्व के बावजूद पिघलकर बिखर जाती है। उत्साह टूट जाने के बाद भी वाचक अपना विश्वास बनाए रखना चाहता है। दुनिया ही मूर्ख है जो दुनिया के कल्याण की उसकी बात को समझना नहीं चाहती। उसकी खीझ उसे दुनिया की ओर से उदासीन बना देती है- यद्यपि उसे विश्वास है कि दुनिया उसकी बात माने और उसको पूजे तो दुनिया का मंगल अवश्य हो जाता है।

अपनी रचना के लिए त्रिलोचन गंभीर तैयारी वाले लेखक हैं। एक सवाल के उत्तर में अपने कहानी लिखने के कारणों का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं- ''जब बात कविता में पूरी तरह नहीं कही जा सकती तब वह धीरे-धीरे 'कहानी’ का रूप ग्रहण करने लगती है। समाज हमारे सामने होता है। उसकी विसंगतियां हमें कचोटती हैं। अनुभव और संवेदना के धरातल पर चरित्र मन को मथते रहते हैं।‘’ मैं यह मानता हूं कि लेखक का कर्तव्य है कि जो सच दिखे उसी को वे लिखो। लेखक और आचरण में एकरूपता होनी चाहिए- इसी कारण मेरी चेतना मुझे कहानी लिखने को बाध्य करती है।‘’ (सापेक्ष-57, जन्म शताब्दी : त्रिलोचन (सं.) महावीर अग्रवाल, पृ. 228) उनकी कहानी 'नदी किनारे’ अवध में ही गोमती के किनारे, बसे मल्लाहों के गांव की कहानी है- सुरियारी की। छोटा-सा गांव है पन्द्रह-बीस घरों का। ईख की पत्तियों और मिट्टी की भीत वाले घरों का। कहानी में त्रिलोचन मल्लाहों की जीवनशैली और दिनचर्या के साधन ब्यौरे प्रस्तुत करते हैं। मछली मारना, मुसाफिरों को नदी के पार उतारना, थोड़ी-बहुत खेती, फुरसत के समय शिकार और पशु-पक्षियों को पालना ही उसका काम है। गाय-भैंस, भेड़-बकरी-कुत्ते, बुलबुल, तित्तिल, बत्तखें और ऐसा ही और भी बहुत कुछ। नदी से पकड़ी जानेवाली मछलियों की किस्मे हैं, टेंगर, पाहिना, झेंगर, टेंगना, सिंगी, रोहू, मायसोरी, सिधरी, चिलवा, मोंगरी आदि- प्राय: सभी मछलियां।

कहानी मुख्यत: मनोगी और भगेलू नामक दो युवा मल्लाहों पर केन्द्रित है। अपने-अपने ढंग से दोनों स्त्री के बिना ही जी रहे हैं। दूर नदी के सन्नाटे में, लहरों के ऊपर से तैरकर मनोगी की आवाज आती है 'फागुन मस्त महीना रे। जिय धरन न चैन।‘ बतकही में भगेलू अपनी आमदनी का ब्यौरा देता है। बारह रुपए खिवाई और कुल जमा पांच रुपए नौहार के मिलते हैं। वह भी ठेकेदार कभी समय से नहीं देता। बहुत मिन्नत के बाद उसने दो रुपए दिए हैं। उसकी औरत सुधिया को मरे साल होने को आया है, दूसरा कोई डौल बैठ नहीं सका है। मनोगी के भी औरत थी। लेकिन एक साधू के फेर में पड़कर साल हुआ, वह भाग गई। साधु उसके यहां पन्द्रहरिया-बिसवारा आता था। भजन-कीर्तन करता था। मनोगी उसे सिद्ध समझता था। वह मल्लाहों की एक उपजाति  'तीयर’ का था। कोई औरत देता न था। इसी फेर में साधु बना। औरत के पास एक बच्चा भी था, उसे भी लेकर चली गई हरामजादी। अब दोनों आमदनी बढ़ाकर औरत की जुगाड़ में है।  शेरपुरा में भन्ती नाम की एक औरतहै। घर वाले उसे कहीं और बैठाना चाहते हैं। लेकिन वह भगेलू के पक्ष में है। साधु-वेश में भगेलू द्वारा झुन्नी को 'बेटी’ कहकर मनोगी की टूटी गृहस्थी फिर बसवा दी जाती है। लेकिन साधु से मुक्त होकर झुन्नी मामा के यहां कैसे पहुंची और फिर मनोगी के संपर्क में कैसे आई, कहानी में यह स्पष्ट नहीं है। घर-गृहस्थी जमाने की स्त्री की हौंस और उनकी वर्जनामुक्त उन्मुक्त जीवन-शैली कहानी का मुख्य आकर्षण है। मुक्तिबोध की तरह त्रिलोचन ने भी बड़ी संख्या में मध्य वर्ग को आधार बनाकर कहानियां लिखी हैं। इन कहानियों में ही वे वस्तुत: अपने निजी जीवन के अनुभव प्रसंगों को भी विन्यस्त करते हैं। इस तरह कभी कम, कभी ज्यादा, ये कहानियां उनके जीवन में झांकने का अवसर भी देती हैं। इन कहानियों में 'संबंध’, 'सोलह आने’ और संग्रह की शीर्षक कहानी 'देश-कालÓ का उल्लेख खासतौर से किया जा सकता है।

'संबंध’ चित्रकार बसंत की कहानी है। चित्रकार के नाते संवेदना ही उसकी पूंजी है। लेकिन संसार उसे ही संशय की दृष्टि से देखता है। त्रिलोचन की ही एक अन्य कहानी 'जिउधन’ का सूत्र वाक्य इन कहानियों पर भी लागू होता है- ये 'जो कुछ बातें कहेगा, अपनी देखी-सुनी। फिजूल बात एक भी वह नहीं कहेगा।‘ (देश-काल, पृ. 79)।

'सोलह आने’ त्रिलोचन के युवा और फक्कड़ दौर की कहानी है, वैसे फक्कड़ तो वे जीवनभर रहे। कहानी में तीन मित्र हैं- कमलनयन, वाचक देवल अर्थात् स्वयं त्रिलोचन और वरूण। बेरोजगारी और निराहार जीवन के लंबे और सामान्य बन चुके अंतरालों के बाद देवल को प्रेस में पन्द्रह रुपए की नौकरी मिलती है। यह संभवत: वही दौर है जब उन्होंने बनारस में ही मुक्तिबोध के साथ सरस्वती प्रेस में नौकरी की थी। बड़ी मुश्किल से देवल ने तीन रुपए अग्रिम लिए हैं। कमल वरुण के मकान में उसके साथ ही रहता है, संभवत: किराए पर। उस दिन देवल के पहुंच जाने पर कमल उससे भी वहीं खाने का आग्रह करता है। वह वरुण को तीन आदमियों का खाना बनाने को कहता है। लेकिन न घर में राशन है न ही कमल या वरुण के पास कोई पैसा। जो तीन रुपए देवल ने अग्रिम लिए हैं, उसमें से अब सिर्फ एक रुपए छह आने बचे हैं। कमल के आग्रह पर उन्हीं में से देवल तेरह आने वरुण को दे देता है, जल्दी ही वापसी के आश्वासन पर तीन आने वरुण ने देवल से पहले कभी लिए हैं। सो कुल मिलाकर सोलह आने हो जाते हैं। पूरा एक रुपया। तीन आदमियों के उस दिन के भोजन पर कुल जमा नौ आने खर्च होते हैं।

संकोच त्रिलोचन के चरित्र का जैसे स्थायी भाव था। वे बताते थे कि उनकी अच्छी-भली खुराक के कारण बचपन में मां उन्हें कहीं खाना-खाने नहीं जाने देती थी- लोगों की नजर लग जाएगी। अनशन सप्ताह का उन्हें खासा अभ्यास था। पूरी कहानी मुख्यत: संवादों के सहारे विकसित होती है। संकोच के कारण ही देवल कभी खुलकर वरुण से तकाजा नहीं कर पाता। कमल से भी वह कुछ कह नहीं पाता। कई बार इसी इरादे से जाने के बावजूद एक दिन कमल से, बातों-बातों में ही उसे पता चलता है कि उस दिन के खाने के अपने हिस्से के तीन आने वह वरुण को दे चुका है। तभी वह देवल से उसके पैसों के बारे में भी पूछता है। वरुण एक-दो बार उधारी के पैसे भूल जाने का नाटक भी करता है। फिर एक दिन देवल के उसकी ओर जाने पर, कमल से पता चलता है कि वरुण अचानक कलकत्ता चला गया है। लंबे समय तक उसके लौटने की संभावना नहीं है। हो सकता है, न ही लौटे। संभव है इधर से निराश होकर वह नौकरी की तलाश में ही उधर गया हो। कहानी में 'साहित्याचार्य शरदचन्द्र’ जैसी पुस्तक और 'शरद ग्रंथावली’ का उल्लेख भी वस्तुत: एक दौर का इतिहास छिपाए हैं- त्रिलोचन की युवावस्था का दौर 'साहित्याचार्य शरदचन्द्र’ भले ही कोई वास्तविक पुस्तक न हो, लेकिन एक दौर में हिन्दी की युवा पीढ़ी पर शरद के संक्रमण प्रभाव का संकेत तो इससे मिलताही है।

त्रिलोचन की किताबों पर ब्लर्ब के रुप में, उनका जो जीवन परिचय छपता था उसमें प्राय: यह सूचना भी होती थी कि उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. प्रीवियस किया था. आगे चलकर इस अधूरे एम.ए. ने ही उनके लिए अध्यापकी की नौकरी का द्वार भी खोला। 'देश-काल’ वस्तुत: उनके इस दौर की स्मृतियों के संरक्षण का एक रचनात्मक उद्यम है। कहानी में 'बासुदेउ’ नामक एक पात्र भी है जो गांव में अकेली बूढ़ी मां के साथ रहता है। लम्बे समय तक वह गांव से बाहर घूमता-भटकता है। अब लौटा है और फिलहाल कुछ दिन गांव में ही उसका रहने का विचार है। त्रिलोचन का प्रसिद्ध काव्य-नायक नगई महरा संभवत: पहली बार इसी कहानी में प्रकट होता है। अंग्रेजी एम.ए. (प्रीवियस) में त्रिलोचन ने कविता को पढ़ा होगा। उसके 'प्रोलॉग टू कैंटरबरी टेल्स’ की पूरी दुनिया, पात्र निरुपण उसकी विशिष्ट शैली 'देश-काल’ में बहुत स्पष्ट है। मानवीय व्यवहार में निहित प्रदर्शन और पाखंड, व्यंग्य की गहरी अंतर्धारा के साथ, 'देशकाल’ के पात्रों में सब कहीं लक्षित की जा सकती है। ताली का नाम रामकरन सिंह है। मिडिल तक पढ़े हैं। अवधी ही बोलते हैं। कभी-कभी हिन्दी भी बोल लेते हैं-तभी जो कोई अमीन हल्केदार या पढ़ा-लिखा आदमी आ जाता है। गांव वाले हिन्दी बोलने वाले को पसंद नहीं करते- देसी कुत्ती, मरहठी बोल। दुल्लीलाल पटवारी हैं- गांधी टोपी, कुर्ता-धोती और देशी जूते। गांव में कहीं आते-जाते नहीं। अपने मतलब से लोग उन्हीं का दरवाजा घेरे रहते हैं। नई उमर है और अंग्रेजी मिडिल तक की पढ़ाई की है। पुराने पटवारी हिन्दी-उर्दू जानने वाले थे। ये थोड़ा तीनों जानते हैं। इसलिए उनका और भी आदर है। चॉसर के वकील की तरह- 'ही लुकेथ विजियर दैन वॉट ही इ•ा।‘

नगई महरा द्वारा रामायन का पक्ष लेने पर, पटवारी, दुल्लीलाल उसे खारिज कर चुके हैं। सिउपाल चमार है। वह भी कबीर का पक्ष लेकर रामायन को नकारता है। उसका तर्क है, 'काउ व रमायन मं? ओ से अच्छात कबीर साहेब कहिग बाटेन...(वही, पृ. 89)’

जब दुल्लीलाल बासुदेउ सिंह से उसकी राय पूछते हैं, उसका उत्तर है, 'मेरी बात तो सिउपाल भगत कह चुके हैं।‘ (वही,पृ. 90)

त्रिलोचन की अनेक कहानियां सामाजिक कुरीतियों और व्याप्त अंधविश्वासों को केन्द्र बनाकर लिखी गई हैं। 'अंतर्दाह’ में वर्णसंकर संतान की पीड़ा का अंकन है। 'उपलब्धि’ में एक विधवा और बेसहारा स्त्री के शोषण के विभिन्न रूप सामने आते हैं। उसके शोषण के लिए दो परस्पर विरोधी व्यक्ति भी एक हो जाते हैं। जमीन की देखभाल, रोपनी-बोआई-कटाई के नाम पर रामनाथ सिंह, पंडाइन की जमीन हथियाता है और सिवहरख सुकुल उसका संबंधी बनकर उसकी बेटी का ही सौदा करने को तैयार है। इस सामाजिक संरचना में स्त्री सबसे कमजोर है। अनेक स्तरों पर उसका शोषण ही पुरुष की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

संरचना की दृष्टि से त्रिलोचन के यहां वैसी कहानियां भी पर्याप्त संख्या में हैं जो आकार की दृष्टि से बहुत छोटी होती हंै। जब ये कहानियां लिखी गर्इं, हिन्दी में लघु-कहानी की कोई अवधारणा नहीं थी। जिस सामाजिक विडम्बना और चोट को आधार बनाकर बाद में लघु कहानी का विकास हुआ, वह कचोट और तराश त्रिलोचन की इन कहानियों में प्राय: नहीं है। देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर मंटों ने 'स्याह हाशिए’ जैसी लघु कहानियां लिखीं, त्रिलोचन के यहां वैसी सामाजिक और कलात्मक सजगता प्राय: ही अनुपस्थित है। जीवन के छोटे-छोटे घटना-प्रसंग सामन्ती मूल्यों की आलोचना और इसी तरह के विचारों को आधार बनाकर त्रिलोचन अपनी कहानियां बुनते हैं। ये कहानियां किसी भी स्तर पर अपने समय की राजनीति में कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करतीं। लेकिन 'व्यवस्था की चिंता’ जैसी कहानी उनके यहां अवश्य है। इसमें रामगढ़ कांग्रेस में एक निर्धन कार्यकर्ता को इसलिए प्रवेश नहीं मिलता क्योंकि उसके पास प्रवेश के लिए अधिकृत टिकट नहीं है। भूखा रहकर, दो दिन पैदल चलर वह किसी दूरदराज क्षेत्र से कांग्रेस में शामिल होने आया है। ड्यूटी पर तैनात स्वयंसेवक कर्तव्य और व्यवस्था के नाम पर उसे अंदर नहीं जाने देता। हाथापाई और धक्का-मुक्की में वह व्यक्ति जमीन पर गिर जाता है और भीड़ का रेला उसके ऊपर से निकल जाता है। त्रिलोचन सवाल उठाते हैं- व्यवस्था और अनुशासन के नाम पर कुछ 'बड़े’ दिमाग उसके पीछे होंगे, उस बेचारे स्वयंसेवक की क्या बिसात और कुसूर। इस तरह वे प्रकारान्तर से महात्मा गांधी की उस बहु प्रचारित उक्ति को ही कटघरे में खड़ा करते हैं जिसमें कतार के आखिरी आदमी तक की सुविधा की बात कही गई है।

त्रिलोचन की ये कहानियां ताप के उन्हीं ताए दिनों और उस जनपद को ठीक से समझने के लिए याद की जाएंगी, त्रिलोचन की कविता में जिनकी एक विशिष्ट भूमिका है।