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Sunday 23 Sep 2018

रेडियो मेरा प्रिय साथी

रेडियो से मेरा रिश्ता बचपन से रहा है। मेरे पिताजी के पास रेडियो था। तब हम आकाशवाणी केन्द्र जोधपुर से प्रसारित सभी कार्यक्रमों का आनन्द लेते थे। जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था, तब पहली बार आपकी फरमाइश कार्यक्रम के लिए पत्र लिखा। करीब सप्ताह भर बाद गीत की फरमाइश के साथ हम सभी बच्चों के नाम प्रसारित हुए। पहली बार रेडियो पर अपने नाम एवं पसन्द का गीत सुनकर हमारा मन मयूर की तरह नृत्य करने लगा। यह खबर पूरे परिवार और मोहल्ले में रेडियो सुनने वाले सभी लोगों को मालूम हुई, तब सभी खुश होकर हमारी तारीफ  करने लगे। हमें ऐसा लगा, मानो कोई किला फतह कर लिया हो। परिवार में हम सभी बच्चे रविवार को चुनमुन कार्यक्रम जरूर सुनते थे। बड़ा मजा आता था। थोड़े बड़े हुए, तब युववाणी कार्यक्रम चाव से सुनने लगे। सामान्य ज्ञान प्रश्नोतरी से हमारे ज्ञान में वृद्धि होने लगी और गीत सुनकर मन प्रसन्नता से खिल उठता। इस तरह हमारी जिज्ञासा में बढ़ोतरी होने लगी। पढ़ाई के साथ-साथ रेडियो से हमारी मित्रता होने पर भाषा, स्वभाव एवं व्यवहार में बहुत बदलाव आने लगा। पुराने बाजार में दुकान पर सिलाई कार्य करके पिताजी सांय घर लौटते तो बी.बी.सी. लंदन से प्रसारित समाचार सुनते। हमें देश-विदेश की खबरों की जानकारी देते। पिताजी हमारी पढाई-लिखाई पर भी पूरा ध्यान देते थे। धीरे-धीरे हमें विविध भारती सेवा मुम्बई, ऑल इण्डिया रेडियो, सीलोन की जानकारी देते रहे। पिताजी हमें बताते- रेडियो से हमारी एकाग्रता बढ़ती है, ज्ञान में वृद्धि होती है, गीत सुनने से मन सदैव प्रसन्न रहता है। हमारे परिवार में सभी को नये-पुराने गीत सुनने का गजब का शौक रहा है। इस तरह दिन-भर रेडियो चालू रहता। रात्रि 11 बजे बाद रेडियो को आराम मिलता। घर पर चाचाजी जूती बनाने का काम करते हुए गानों का लुत्फ  उठाते। दिन-भर गीत गुनगुनाने की उनकी आदत पड़ गई। उनके पास चौबीसों घण्टे रेडियो का साथ रहता। जब पड़ोस में या मोहल्ले में चाचाजी जाते तो रेडियो को कन्धे पर लटकाकर ले जाते, दूसरे लोग भी झूमकर संगीत का आनन्द लेते थे। चाचाजी की रेडियो के प्रति दीवानगी इस कदर थी कि कोई भी रेडियो के हाथ लगाने से डरता था। मोहल्ले के जिन घरों में रेडियो नहीं होता था, वे लोग पड़ोसी के घर जाकर समाचार सुनते थे। रात्रि 8 बजे समाचार प्रसारित होते, तब सभी लोग बड़े ध्यान से खबरें सुनते थे। संचार के साधनों में रेडियो की पहुंच आम आदमी तक रही है।

आज टेलीविजन, मोबाइल एवं कम्प्यूटर के युग में रेडियो का  अस्तित्व कम नहीं हुआ है। एफ.एम. सेवा के माध्यम से रेडियो के प्रति लोगों की रूचि में इजाफा हुआ है। गीत-संगीत के साथ मनोरंजन से भरपूर विभिन्न कार्यक्रमों का खजाना यहां मिलता है। मोबाइल पर रेडियो ऐप के माध्यम से श्रोताओं का बड़ा समूह दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। रेडियो का हमारे जीवन में बड़ा योगदान है। मानव मन प्रारम्भ से सुरमयी संसार से जुड़ा रहा है। विभिन्न वाद्य यंत्रों का प्रयोग एवं उन्हें सुनने से मन को आनन्द की गहरी अनुभूति होती है। रेडियो पर हर श्रोता वर्ग के पसंदीदा कार्यक्रम प्रसारित होते है, जिसे सुनकर हर कोई खिल उठता है। अपने अनूठे अंदाज एवं रोचकता से भरपूर कार्यक्रम आम जन में खूब लोकप्रिय रहे है। आज संचार तकनीकी के तीव्र जमाने में रेडियो सेट धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, लेकिन गीत-संगीत के प्रति रूचि इस कदर बढ़ी है कि हर कोई कहे- गाता रहे मेरा दिल ......।

जोधपुर में मेरे दो वर्ष के शिक्षक प्रशिक्षण काल में रेडियो ने मेरा खूब साथ निभाया। हॉस्टल में रहते हुए अपने हाथ से खाना बनाते समय मेरे पास रेडियो रहता था। गीतों की सुमधुर प्रस्तुति से भोजन का जायका भी बढ़ जाता था। उस दौरान (1994-1996) विविध भारती मुम्बई मेरा पसंदीदा चैनल था। सभी उद्घोषकों की कर्णप्रिय आवाज अभी भी मेरे कानों में रस घोलती है। मैं अपनी कॉपी में साप्ताहिक कार्यक्रम की सूची बनाकर लिखता था। सवेरे त्रिवेणी एवं चित्रलोक के तराने सुनकर मन बाग-बाग हो जाता था। आहिस्ता-आहिस्ता नए व पुराने सभी गीत मुझे याद रहने लगे। गीतकार-संगीतकार एवं फिल्मों के नाम भी। अनेक रूचिकर गीतों को मैं अपनी कॉपी में लिख देता था। कॉपियां आज भी सहेजकर रखी हुई है। यादों का अद्भुत संसार ...! जैसे खजाने की पोटली ...! छात्रावास में मेरे अनेक साथियों के पास रेडियो था। आपकी फरमाइश कार्यक्रम में पोस्टकार्ड भेजने के लिए मैंने साथियों के सामने प्रस्ताव रखा। यह सुनकर सभी खुश हुए। हम पांच मित्रों ने सप्ताह में बारी बनाकर आपकी फरमाइश के लिए पोस्टकार्ड भेजने शुरू किए। हर दिन हमारे पसंद के गीत विविध भारती पर सुनाई देते। हमारे हॉस्टल पते के साथ हमारे नाम सुनाई देते। मन गदगद हो उठता ...। फिर, रूचि का गीत सुनकर हमारी बांछें खिल उठती ...। हॉस्टल के दूसरे साथी भी फरमाइशी पत्र भेजने लगे। हमारी पहचान संगीत रसिकों में होने लगी। फुर्सत के क्षणों में हम एक साथ गीत गुनगुनाते ...। हमें बड़ा मजा आता।

विद्वानों ने कहा है, गीत-संगीत हमारे तनाव को दूर करने में रामबाण औषधि है। खेत-खलिहान में किसान, मजदूर व औरतें गीत-संगीत में झूमते हुए काम करते है, उनके जीवन में उल्लास एवं उमंग की किरणें रोशन होती है। कारखानों में लाखों श्रमिक रेडियो सुनते हुए अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। उद्घोषक विभिन्न वर्ग के श्रोताओं से घुल-मिलकर बातें करते है। आत्मीयता का विरल उदाहरण सामने आता है। रेडियो का सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से बड़ा महत्व है। विगत वर्षों में विविध भारती ने अपनी रचनात्मक शक्ति से अनूठी संस्कृति रची है। समय के साथ आमूलचूल बदलाव हुआ है। श्रोताओं की रूचियों को ध्यान में रखते हुए नया इतिहास रचा है। गीत-संगीत एवं ज्ञान के अविरल निर्झर से श्रोताओं के भीतर सुख, शांति एवं समृद्धि का बीज पुष्पित एवं पल्लवित होता है। जीवन में आनंद व उमंग की वर्षा करने वाला मेरे प्रिय साथी रेडियो ने हर पल मेरा साथ निभाया है। मैं कैसे भूल सकता हूं, रेडियो के अपूर्व रिश्ते को ...।

शिक्षक पद पर सुदूर बाड़मेर (राजस्थान) में मेरी प्रथम नियुक्ति (1997) हुई, तब एक ढाणी (एक परिवार की बस्ती) में मैं रहता था। धोरों (रेत के टीले) से घिरी बस्ती में चारों ओर सन्नाटा छाया रहता था। स्कूल से लौटने के बाद मेरे अकेलेपन का साथी रेडियो रहा है। पिछले तीस वर्षों से मेरा विविध भारती से गहरा रिश्ता रहा है। अनेक कार्यक्रमों के लिए मैंने पत्र लिखे है। रेडियो सुनने वाले मेरे मित्रों की तादाद भी अधिक है। मेरे फलोदी (जोधपुर) कस्बे में राजू माली ठेले पर दैनिक उपयोग की चीजें बेचते हैं। बहुत सहृदय व्यक्ति। रेडियो पर प्रसारित होने वाले सभी कार्यक्रमों के बारे में हम आपस में चर्चा करते हंै। राजू माली फोन इन कार्यक्रम पर फरमाइशी गीत में खूब रूचि लेते हैं इसी तरह पत्रकार एवं सम्पादक (फलोदी जयते) प्रवीण व्यास मेरे अभिन्न रेडियो मित्र हैं। पिछले दिनों उन्होंने मुझे मोबाईल पर ऑनलाईन विविध भारती एवं रेडियो गार्डन ऐप के बारे में बताया। इससे जुड़कर मुझे बहुत लाभ हुआ है। मैंने अनेक मित्रों को इस रेडियो ऐप के बारे में जानकारी दी है। सभी मित्र रेडियो गार्डन (वल्र्ड चैनल) से जुड़कर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते है।

मैं रेडियो को बेस्ट फ्रेंड कहता हूं, तो मेरे बच्चे कौतुहल से रेडियो को अंकल नाम से सम्बोधित करते है। वाह! क्या रिश्ता बना है। मेरे मोहल्ले में बुजुर्ग बाबूलाल जी का रेडियो से गहरा रिश्ता रहा है। वे साफा, कुर्ता एवं धोती में अपने कन्धे पर रेडियो को लटकाए रहते थे। गली-मोहल्ले में घूमते हुए हथाईयों पर लोगों को रेडियो पर प्रसारित सभी कार्यक्रम सुनाते थे। लोगबाग बड़े आनंद के साथ बाबूजी को बुलाते एवं रेडियो सुनते। आज बाबूजी नहीं रहे, लेकिन रेडियो के साथ बाबूजी का रिश्ता लोग नहीं भूलते है।                                                                    

अनेक गांवों और कस्बों में रेडियो श्रोता संघ भी बने हुए है, इससे उन जगहों की पहचान भी देश भर में बनी है। झुमरी तलैया (झारखंड) का नाम रेडियो के इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा। यहां रेडियो सुनने वाले श्रोताओं की तादाद देश भर में चिर-परिचित है। फरमाइशी गीतों को लेकर देश-दुनिया में झुमरी तलैया को जो ख्याति मिली, उसकी जमीन तैयार करने का श्रेय दो लोगों को जाता है। रामेश्वर वर्णवाल और गंगाप्रसाद मगधिया। अपने कस्बे का नाम आम श्रोताओं के दिलों में बसाने के लिए इन्होनें भरपूर श्रम किया, साथ ही लोगों को जागरूक किया। झुमरी तलैया का बखान फिल्मी गीतों में भी रचा बसा है। इसी तरह भाटापारा कस्बा भी रेडियो की दुनिया में खूब चर्चित हुआ है। अपने गांव, कस्बे एवं शहर का नाम सुनकर हर कोई रोमांचित हो उठता है, अपनी फरमाइश के साथ।

बरसों से रेडियो पर नाटक, रूपक, झलकियां, गीत, कथा रचना एवं समाचारों ने  श्रोताओं में गहरी पैठ बनाई है। उद्घोषक महोदय की धारदार, ठाठदार, जानदार एवं शानदार खनक देती भाषा की दीवानगी श्रोताओं के सिर चढ़कर बोलती है। युवाओं, पुरूषों, महिलाओं एवं बुजुर्गों की हर पसंद का ख्याल रखते हुए विविध भारती एवं आकाशवाणी के विभिन्न चैनलों ने समय के साथ अपनी सोच का विकास किया है। नई सोच-नया अंदाज। जन-मन के साथ। रेडियो मेरा अभिन्न मित्र है, इससे मेरे जीवन में नया उजाला आया है। मेरी साहित्य में गहरी अभिरूचि का कारण रेडियो है। मेरे जीवन का हमसफर तुम ...। मेरे जीवन की पूंजी तुम ...। आए हो मेरी जिन्दगी में तुम बहार बनके .....। मेरे साथी तुझे सलाम ...।