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Thursday 16 Aug 2018

आकाश में शब्द

मैं रेडियो सुनता हूं

और देखता हूं,

आवाजों में छुपे चित्र,

महसूस करता हूं

शब्दों की गंध, उनके रंग

बनाता हूं एक आकृति

और खो जाता हूं

अपने ही कल्पना लोक में

आकाश के स्वप्न में।

ऐसा ही था वो समय, लगभग 90 के दशक तक। जब शिक्षा, सूचना और मनोरंजन के लिए रेडियो यानी आकाशवाणी एक मात्र तो नहीं लेकिन हां, एकमात्र सहज, सुलभ और सस्ता माध्यम था, जो 'बहुजन हितायÓ उपलब्ध था, आकाशवाणी का यह ध्येय वाक्य बौद्ध त्रिपिरक से लिया गया है, पूर्ण श्लोक है-

 चरभ भिक्खने चादिकं,

बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।

लोकानुकम्पाय अत्याय,

सुखाय देव मनुस्सानं।।

और नि:संदेह बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का महत उद्देश्य लेकर आकाशवाणी ने अपने कार्य और कार्यक्रम की योजना बनाई।

याद आता है 07 अगस्त सन् 1976 का वो दिन, हमारे शहर छतरपुर में उत्साह था वातावरण था, लोग उत्सुक थे, प्रतीक्षारत थे, क्योंकि आकाशवाणी केन्द्र का उद्घाटन था, इस दिन बुन्देलखण्ड के कला, संस्कृति और साहित्याकाश पर एक स्वरलहरी, ध्वनिरंग उभरी, और इसकी गूंज अनुगूंज बनकर नित्य प्रात: घर-घर में गूंजने लगी, आकाशवाणी के छतरपुर केन्द्र ने अपना कार्य आरंभ किया और इस अंचल के इतिहास, संस्कृति, कला, साहित्य, संगीत और लोकजीवन के जीते-जागते चित्र उकेरे, यहां का लोक भी जीवन्त हो उठा। 8 अगस्त 1976 से विधिवत कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू हुआ। और मुझे युववाणी के पहले कार्यक्रम में युवा कवि के रूप में शामिल होने का अवसर मिला। प्रथम प्रसारित युवा कवि गोष्ठी के अन्य कवि थे- गोकुलचंद्र जैन 'मधुर', नवलकिशोर 'मायूस', सुभाष काले और इंदिरा मिश्र। इन पांच कवियों में से सुश्री इंदिरा मिश्र और मैं स्वयं आकाशवाणी की नियमित सेवा में उद्घोषक के रूप में, बाद के वर्षों में चयनित भी हुए।

सन् 1976 से लेकर सन् 2016 तक की अवधि में फर्श से अर्श तक यानी छतरपुर जैसे छोटे से शहर से लेकर मुंबई, पुणे जैसे केन्द्रों पर कार्य करने का अवसर मिला । आकाशवाणी के लिए कहा जा सकता है-

हजार पतझड़ के बावजूद,

मैं अब भी, वहीं हूं

मेरी आंखों में वसन्त है,

सूखी बाहों में

बल अनन्त है।

और इस बात की पुष्टि आकाशवाणी और विविध भारती से प्रसारित होने वाले अनेक कार्यक्रमों से होती है। एफ.एम. चैनल्स की भीड़ और टी.वी. चैनल्स की बाढ़ (भाड़) में भी एक 'अर्थहीन प्रसन्नताÓ की जगह एक 'अर्थवान प्रसारण' करने का प्रयास आकाशवाणी और विविध भारती कर रही है। भाषा का संस्कार जो आकाशवाणी और विविध भारती के पास है, वो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता 'सरलताÓ का आग्रह केवल हिन्दी को लेकर ही किया जाता है, अन्य भाषाओं के संदर्भ में यह आग्रह उतना नहीं है, कारण कुछ भी हों, सच तो यह है कि कोई भी भाषा कठिन या सरल नहीं होती, उसका प्रयोग और परिवेश ही उसे सरल और कठिन बनाता है। अपने ही एक अनुभव पर चर्चा करना यहां प्रासंगिक होगा।

मेरे रूपक संग्रह 'मोहन से महात्मा' की भाषा के संदर्भ में एक मित्र ने कहा कि 'कुछ रूपकों की भाषा'  'ग्रंथिक' (पुस्तकीय) लगती है तब अन्य मित्र का जवाब था, ''दरअसल आप महाराष्ट्र से बाहर नहीं गए हो, मध्यप्रदेश में तो यह वहां की सहज भाषा है।''

मेरा अपना मानना है कि भाषा विषय के अनुरूप होनी चाहिए, किसी खेल के संदर्भ की भाषा अलग होगी, और साहित्य, संस्कृति से संदर्भित कार्यक्रमों की भाषा अलग होगी, या कहें कि होनी चाहिए।

संस्कृति विषय रूप की भाषा का उदाहरण-

- श्लोक के पाद- उद्घोषक का स्वर-

वाणी का पर्व है वसन्त, सरस्वती का उत्सव है वसन्त, नाद का सम है वसन्त, प्रकृति का उत्कर्ष है वसन्त और ऋतु का उन्माद है वसन्त।

-अब एक उदाहरण फिराक गोकखपुरी पर केन्द्रित रूपक का-

-निवेदक का स्वर (ए) फिराक गोरखपुरी जो आज $गमेफिरा$क है, लेकिन हर दिल आज जुदाई के इस गुमा को अपने में बसा लेना चाहता है, उसकी बात करना चाहता है, उसे याद करना चाहता है,

(बी) एक ऐसी शख्सियत जिसमें हर खास ओ आम की बेचैनी और दर्द समाया हुआ है, जो इसंानियत से बड़ी मुहब्बत करती है। ......

इन उदाहरणों से शायद आप सहमत हों। मेरा ये सौभाग्य रहा कि सेवा के आरंभ से ही ऐसे अधिकारी मिले जो भाषा साहित्य : प्रसारण सभी दृष्टि से समृद्ध थे। कार्य के प्रति समर्पित थे, उनके ही संस्कारों का फल और बल था कि तमाम अन्तर्विरोधों, उलझनों के बाद भी कार्यक्रमों को लेकर कोई टालमटोल या समझौता नहीं किया। रेडियो एक क्षणजीवी माध्यम है, एक बात रेडियो से बोली जाए तो हम पाते हैं कि प्रसारण के साथ ही शून्य में विलीन हो जाती है। यहां पलटकर पूर्व संदर्भ देखने की सुविधा या गुंजाइश इसलिए नहीं है और न ही कुछ ठहरकर सोचने का अवसर। इसलिए रेडियो या श्रव्य माध्यम में शब्द प्रधान है, शब्द ही उसका अर्थ है, उसमें 'अर्थात्' कुछ नही ंहोता। क्यों कोई ऐसा शब्द बोला जाए जिसके कोई अन्य मतलब भी निकलते हों यहां संदेह के लिए भी कोई स्थान नहीं- कहा जाता है, 'इफ देयर इ•ा ऐनी डाउट, वुड बी आऊट।'

इन तत्वों का अनुपालन अब थोड़ा कमजोर हुआ सा जान पड़ता है, कारण, आकाशवाणी पर प्रायोजित कार्यक्रमों का प्रसारण। एक उदाहरण पुणे केन्द्र का ही, प्रायोजित कार्यक्रम में वक्ता ने कहा- ''हम सब जानते हैं कि वाल्मिकी जी बोलते गए और गणेश ने रामायण लिखी।'' इस पर अधिक कुछ न कहा जाए, यही उचित है।

अक्टूबर 1957 में आकाशवाणी में एक नए युग का आरंभ हुआ था, जब संगीत पर आधारित विविध भारती सेवा शुरू हुई। यह अखिल भारतीय प्रसारण सेवा है। इसलिए कुछ क्षेत्रीय अंतरों की छोड़कर लगभग एक ही तरह के कार्यक्रम सभी विविध भारती केन्द्रों से प्रसारित होते हैं। एक नवम्बर 1967 से विज्ञापनों के प्रसारण की शुरूआत हुई। प्रारंभ में विज्ञापनों के संबंध में अनेक सावधानियां बरती गई। 'कमर्शियल कोड' भी है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी पकड़ कमजोर पड़ती गई। केन्द्रों को दिए गए अव्यवहारिक 'राजस्व अर्जन' के 'टारगेट' ने प्रसारण का 'टारगेट' (लक्ष्य) विचलित कर दिया। 26 जनवरी 1985 से एक और नीतिगत निर्णय लिया गया। जब सभी प्रायमरी केन्द्रों से भी विज्ञापनों के प्रसारण का निश्चय किया गया। आज तो देश के सभी एफ.एम. विविध भारती और प्रायमरी चैनल्स विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं।

विज्ञापन के संदर्भ में एक शेर है-

हमारी दास्तां शहर के दीवारों पे चिपकी है,

हमें ढूंढेगी दुनिया, कल पुराने इश्तिहारों में।

नि:संदेह विज्ञापन आज युग का धर्म और जीवन के लिए आवश्यक बन गया है, लेकिन विज्ञापनों की भीड़ में कार्यक्रमों की गुणवत्ता और समग्रता के खो जाने का खतरा भी बढ़ गया है, वैसे भी यह समय दृश्य माध्यमों के वर्चस्व का समय है जिसके चलते हमारा ''श्रोता'', ''दर्शक'' में बदल गया है यह कई अर्थों में ''सुने जाने योग्य'' शब्दों पर संकट है, जो शायद अन्तत: 'वाणी' के संस्कारों को विदा करेगा। ऐसे समय में आकाशवाणी की भूमिका और उसके कार्यक्रमों का प्रसारण न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि भाषा, साहित्य, संगीत के माध्यम से मनुष्य के वैचारिक कल्पना लोक को बनाए रखने के लिए अनिवार्य भी। गेब्रिल गार्सिया माक्र्वेज ने अपनी कृति ''हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीड्यूड'' को टीवी या फिल्म वालों को देने से मना करते हुए कहा था- अलबत्ता रेडियो को दे सकता हूं क्योंकि रेडियो मेरे पाठक या श्रोता की कल्पनाशक्ति को (इमिजैनेशन पावर) बाधित नहीं करेगा।

इस न•ारिये से भी आकाशवाणी, विविधभारती के कार्यक्रमों को देखना होगा। सुनना होगा। कार्यकर्ताओं की जितनी विविधता आज भी आकाशवाणी के पास है, उतनी अन्य माध्यमों के पास नहीं है, और शायद अन्य एफ.एम. चैनल्स ने वैसा चाहा भी नहीं है। आकाशवाणी और विविध भारती की विविधता की प्रसार भारती की नीति और नीयत के चलते जिस 'घुटन' का अनुभव ही रहा है, उसके प्रति आंख बंद कर लेने या नजरअंदाज कर देने का अर्थ है, एक समृद्ध विरासत का विसर्जन।

7 अगस्त 1970 से शुरू हुए इस सफर के अंतिम दिन यानी 31 जुलाई 2016 के दिन वर्ष भर से प्रसारित होने वाले अपने कार्यक्रम ''बड़े अनमोल गीतों के बोल'' के लिए जो गीत मैंने चुना था- वह था फिल्म 'दो बीघा जमीन' का गीत, ''अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा, मौसम बीता जाए।''

सच है, जीवन का मौसम बहुत तेजी से बीतता है, हम जिसे सफर की शुरूआत समझ रहे होते हैं देखते ही देखते अंतिम पड़ाव आ जाता है और जहां से होकर गुजरे उस ओर फिर जाने की इच्छा, सुविधा, साधन और समय शायद नहीं होता। हमारे हाथ मेें सिर्फ इतना है कि मिले हुए पल को कल पर न छोड़े-गीत कह रहा है-

कौन कहे इस ओर तू फिर आए न आए।

इसी गीत की पंक्ति है,- मन की वंशी पे तू भी कोई धुन बजा ले-

नीला अम्बर मुसकाए, हर सांस तराना गाए,

नीले अम्बर में हर सांस का शब्द के रूप में परिवर्तित होना ही आकाश में शब्द की गूंज है। इस गंूज को सुरजित पातर की कविता के माध्यम से सुनना और समझना होगा-

मैं आठ बॅण्ड का ट्रांजिस्टर हूं / मुझमें बी.बी.सी. बोलता है /

बोलता है वाइस ऑफ अमेरिका

मैं दुनियाभर की सूचनाओं का संवाहक हूं।

नहीं बोलता तो बस,

मैं ही नहीं बोलता

मैं खामोश हूं।

माध्यमों के शोर में, शब्दों की खामोशी को सुनिए या मौन आपको हमें मुखर बनाएगा।