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Monday 18 Jun 2018

विविध भारती और नरेन्द्र शर्मा

आकाशवाणी से डॉ. नरेन्द्र शर्मा का संबंध 1947-48 से ही जुड़ गया था। स्वतंत्रता के बाद रेडियो पर लेखकों-कवियों को अधिकाधिक बुलाने की परंपरा डाली जा रही थी। नए-नए कार्यक्रम खोजे-बनाए जा रहे थे। इसी प्रकार के कार्यक्रमों में एक था 'कवि और कलाकार'। इसमें कवियों को आमंत्रित किया जाता था। हिन्दी फिल्मों में गीत लिखने वाले हिन्दी कवि के रूप में नरेन्द्र शर्मा पहले से विख्यात थे। कवि नरेन्द्र शर्मा इस कार्यक्रम में भाग लेने आकाशवाणी गए तथा उन्होंने 'युग की संध्या कृषक वधू-सी/किसका पंथ निहार रही है' गीत पढ़ा। इसके तुरंत बाद प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास ने इसे संगीतबद्ध किया तथा सुश्री लता मंगेशकर ने इसे रेडियो पर गाया। रेडियो के नियमित श्रोता डॉ. रामविलास शर्मा इसे आकाशवाणी पर सुनकर रोमांचित हो उठे। उन्होंने इस गीत का स्मरण करते हुए लिखा- ''आज भी मन की किसी मृदुल टहनी पर ताजा खिले पुष्प की तरह (इस गीत की पंक्ति) रस-विभोर करती रहती है।'' फिर तो इनका रेडियो आने-जाने का सिलसिला चल निकला। नरेन्द्र जी ने एक रेडियो रूपक लिखा- ''चांद मेरा साथी'' इसमें उन्होंने 'चांद' से संबंधित अपनी कई कविताएं इस प्रकार एक रूपक में पिरोयी कि चांद के साथ मनुष्य की अनेक मन:स्थितियां सामने आ जाती थी। इस प्रकार कुछ अन्य रूपकों की रचना भी नरेन्द्र जी ने रेडियो के लिए की थी।

फिर कुछ ऐसा हुआ कि साहित्यकारों को आकाशवाणी के बड़े पदों पर लाकर नए-नए सुरुचिपूर्ण और लोकप्रिय कार्यक्रम निर्माण करने की योजना बनी। आकाशवाणी के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए उस समय हिन्दी साहित्यकारों में सुमित्रानंदन पंत से लेकर भगवतीचरण वर्मा, उदयशंकर भट्ट आदि अनेक साहित्यकार उससे जुड़े। पब्लिक गाने सुनना चाहती थी, इसलिए इन्होंने एक व्यापक कार्यक्रम बनाया कि आकाशवाणी के बड़े केन्द्रों पर लाइट म्यूजिक यूनिट यानी 'सुगम संगीत' विभाग बनाए जाएं जहां फिल्मी गीतों की तरह का छिछोरापन या बाजारूपन न हो। श्रोताओं को ऐसे गीत सुनने को मिले जिससे उनका स्वस्थ मनोरंजन हो सके। ऐसे में आकाशवाणी पर नए प्रकार के गीत प्रसारित करने की जिम्मेदारी नरेन्द्र शर्मा पर आन पड़ी। नरेन्द्र शर्मा ने तत्कालीन सुगम संगीत विभाग को कलात्मक रूप देने की विस्तृत योजना बनाई। फिल्मी दुनिया के अपने संबंधों का इस्तेमाल करते हुए इन्होंने प्रसिद्ध संगीतकारों से प्रसार गीतों की धुनें बनवाई। नौशाद, एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, अनिल विश्वास. उस्ताद अकबर अली खां आदि तथा लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता राय, सुमन कल्याणपुर, मुकेश, मन्ना डे, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, सुधा मल्होत्रा आदि सब लोग इनके बुलावे पर रेडियो पर आए। इन्होंने आकाशवाणी पर गाया। यह कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुआ था। इसके अतिरिक्त आकाशवाणी के लिए जो अद्वितीय कार्य नरेन्द्र शर्मा ने किया वह था- मनोरंजनपरक गीतों का कार्यक्रम- 'विविध भारती' का ढांचा खड़ा करना तथा उसकी प्रस्तुति। इन्होंने अखिल भारतीय वैविध्यपूर्ण गीतों को न केवल ढांचा खड़ा किया, वरन उसकी ऐसी सुरुचिपूर्ण प्रस्तुत की कि श्रोता रेडियो गोवा अथवा रेडियो 'सीलोन' को भूलने लगे। कहा गया कि यह आकाशवाणी का ऐसा इंकलाबी कदम था जिसने न सिर्फ उसकी खोई हुई साख वापस दिलाई, बल्कि आकाशवाणी के श्रोताओं में नई रुचि पैदा की और उनमें हल्के-फुल्के प्रोग्रामों द्वारा राष्ट्रीयता और देशप्रेम का अहसास जगाया और आगे चलकर यह कार्यक्रम आकाशवाणी के लिए 'लक्ष्मी का अवतार' साबित हुआ।

नरेन्द्रजी ने ही 'विविध भारती' का नामकरण किया वे इसका स्वरूप निर्धारित करने और उसके निर्माण के सम्पूर्ण सूत्रधार बने। इस कार्यक्रम को सम्पन्न करने के लिए इन्हें अथक परिश्रम करना पड़ा। इन्होंने पुराने फिल्मी और गैर-फिल्मी गीतों को एक-एक करके सुना। इसमें से सिर्फ दस प्रतिशत गीत ही काम में आते थे, शेष व्यर्थ। इन गीतों पर इतना अधिक परिश्रम किया कि नरेन्द्रजी बीमार पड़ गए। मगर इन्होंने अच्छे-अच्छे गीत पसंद किए। विख्यात संगीत-निर्देशकों ने उन्हें संगीतबद्ध किया था। चोटी के गीतकारों से उन्हें गवाया गया। यह अपने आपमें अनूठा कार्यक्रम बना। 'विविध भारती' कार्यक्रम इतना लोकप्रिय हुआ कि 'रेडियो सीलोन' की छवि धूमिल होने लगी। आप थोड़े समय में ही 'विविधभारती' के चीफ प्रोड्यूसर बना दिए। इसमें अनेक प्रयोग करते हुए ग•ालों और गीतों का मिला-जुला कार्यक्रम 'गजरा' बनाया गया और उसे 'हल्की-फुल्की' चटाखेदार हिन्दुस्तानी जबान की 'कंपेयरिंग' में पिरोया। इस प्रकार के पंचरंगी प्रोग्राम लोगों को बहुत पसंद आए। उनकी यह यूनिट एकजुट होकर काम करतीं थी। भाषा के विषय में अवश्य मतवैभिन्य रहता था। नरेन्द्रजी की मान्यता थी कि ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो संस्कृत के निकट हो क्योंकि वही देश के विभिन्न हिस्सों में सर्वाधिक समझी जाएगी। 'विविधभारती' का नामकरण इसी की पुष्टि करता है। 'विविधभारती' के अतिरिक्त 'पत्रावली', 'बंदनवार', 'मंजूषा', 'स्वरसंगम', 'रत्नाकर' आदि भी ऐसे ही नाम है, जो तत्सम प्रधान हैं।

दूसरे आकाशवाणी की पुरानी मान्यताओं और सरकारी तंत्र के तले दबे रेडियो के खिलाफ उसमें रोष था जिसे सुधारने के लिए ये अपने स्तर पर कार्य करते रहते थे। अन्य सुधार करने वालों को प्रोत्साहित भी करते थे। श्री अमीन सयानी का वक्तव्य इसका प्रमाण है ''आकाशवाणी से पुराने जाले हटाकर उसमें नया उत्साह जगाने की मेरी बेताबी पंडिजी ने देखी। परिवर्तन की राहों पर हठधर्मी की दीवारों से मेरा टकराना देखा और देखकर मुस्कराए। और कहा- 'रुको नहीं, डिगो नहीं।' जो तुम लोग कर रहे हो, सब उचित है। इसे अपना मिशन समझकर बस लगे रहो। एक न एक दिन तुम्हारी बातें सच साबित होंगी और स्वीकार भी की जाएंगी।''

1953 से 1971 में सेवानिवृत्ति तक नरेन्द्र शर्मा ने एकाग्रचित्त और पूरे मनोयोग से आकाशवाणी की सेवा की। हालांकि इन्हें फिल्मों में गीत लिखने की भी अनुमति प्राप्त थी पर इन्होंने आकाशवाणी के सेवाकाल में फिल्मों में गीत नहीं लिखे। इनके इसी महत्वपूर्ण योगदान के कारण इन्हें 'प्रोड्यूसर-एमेरिट्स' बनाया गया, परन्तु ये निर्लिप्त भाव से अपने काम में संलग्न रहे।