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Monday 18 Jun 2018

विविध भारती: कानों में मिसरी की तरह घुलतीं सुमधुर स्वर लहरियां

थोड़ा परिचय होने के बाद लोग प्राय:एक दूसरे के शौक के बारे में पूछते हैं; मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है; और तब मैं इसके जवाब में कहता हूँ- किताबें पढऩा, मूवी देखना, लेख एवं कहानियाँ पढऩा और लिखना, और ...। मेरे उपर्युक्त शौक को सुनकर लोग कुछ नहीं कहते, यह उन्हें सामान्य लगता है; किंतु इसके बाद जब मैं आगे कहता हूँ- ......और रेडियो पर विविध भारती सुनना; तो सामने वाला थोड़ा आश्चर्य करता है। 'पहले मैं भी सुनता था', कुछ लोग जवाब देते। तो कुछ कहते, 'हाँ, मुझे भी पुराने गाने सुनना पसंद है, मैं कार में जाते समय सुनता हूँ।'  

एक बार मैं अपने एक महिला और पुरुष सहकर्मी के साथ बैठा हुआ था, शौक को लेकर बातचीत चली तो मेरी महिला सहकर्मी गार्गी ने पहले तो अपने शौक बताये। इसके बाद उसने मेरे शौक बताने शुरू किये, 'आपको लिखना पसंद है।'' मैंने 'वाह वाह' किया। तो उसने आगे कहा, 'आपको पढऩा भी पसंद होगा।' मैंने उससे सवाल किया, 'यह तो ठीक है लेकिन तुमने कैसे अंदाज़ा लगाया ?'' तो उसने कहा, 'मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कहा जाता है कि टू बी ए गुड ओरेटर यू नीड टू बी ए गुड लिसनर इस आधार पर कहूँ तो अगर आपको लिखने का शौक है, तो पढऩे का शौक भी होगा।' मैं गार्गी की बातों पर उसकी दाद दिए बिना नहीं रह सका। मैंने कहा, 'और कुछ?' इस पर उसने कहा, 'मूवी देखना भी आपका शौक होगा।' मैंने उसकी समझदारी पर मुस्कुराते हुए पूछा, 'तुमने अनुमान कैसे लगाया?' तब उसने कहा, 'इसलिए क्योंकि यह शौक बहुतों को रहता है।' मैंने कहा, 'हाँ, तुमने अब तक सही कहा है, लेकिन इसके बाद और कुछ अनुमान लगा सकती हो?'  इस पर उसने कहा, 'नहीं, मैं और कोई अनुमान नहीं लगा सकती।' तब मैंने कहा, 'मेरा एक और शौक है- विविध भारती सुनना।' फिर मैंने उससे सवाल किया, 'विविध भारती के बारे में सुना है?' इस पर गार्गी ने असहमति में अपना सिर हिलाया। लेकिन मेरे दूसरे सहकर्मी पुलक ने अपने मुख से मधुर ध्वनियाँ निकालते हुए कहा, 'विविध भाऽऽरती।' उसने ठीक वैसी ही ध्वनि निकालने की कोशिश की जैसी विविध भारती के प्रसारण के समय सुनने को मिलती है।

आज इंटरनेट, मोबाइल और डीटीएच का युग है, ऐसे समय में जब फिल्में और टेलीविजऩ धारावाहिक आपकी जेब में आ जाती हैं; वैसे समय में अगर कोई कहे कि उसे रेडियो सुनने का शौक है, तो बहुतों को थोड़ा अजीब लगता है। एक दो बार मेरे साथ ऐसा हो चुका है; किसी ने मुझसे यहाँ तक कह दिया, 'क्या आपके पास टीवी नहीं है?' तब मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया कि 'मेरे पास टीवी है, दो लैपटॉप और दो टच स्क्रीन मोबाइल हैं। लेकिन तब भी मैं टीवी नहीं देखता, न ही व्हाट्सएप और फेसबुक पर समय बिताता हूँ ; मुझे रेडियो पर विविध भारती सुनना पसंद है।' मेरी इस बात पर कई बार सामने वाला अपने दांतों तले उंगुली दबा लेता है। लेकिन सच यही है कि मेरे दो तीन शौक हैं, लेकिन इनमें भी सबसे ज़्यादा पसंद रेडियो पर विविध भारती सुनना है।

विविध भारती पर कई बार ये पंक्तियाँ प्रसारित होती हैं-'विविध भारती......देश की सुरीली धड़कन....।' मैं अपने शब्दों में इन पंक्तियों को दोहराकर कहना चाहता हूँ- 'विविध भारती: मेरी सुरीली धड़कन।' विविध भारती सुनना मेरा शौक ही नहीं ; बल्कि इससे दो क़दम आगे बढ़कर कहूँ तो मैं विविध भारती का गहरा आशिक हूँ ;और यह आशिकी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बहुत बड़े परिवार से भी नहीं हूँ, यहाँ तो पानी पीने के लिए हर दिन कुआँ खोदना पड़ता है; विविध भारती के सारे कार्यक्रम अपने समय पर आते हैं; और मुझे उस समय अपने ऑफिस जाना पड़ता है; इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि इसके कार्यक्रम सुनने के लिए मुझे युक्ति निकालनी पड़ती है, कुछ अन्य सुखों का त्याग करना पड़ता है।

दोस्तो, उपर्युक्त बातों को पढ़कर हो सकता है कि आपके मन में कुछ सवाल आ रहे हों कि - कैसी युक्ति? किस तरह के सुखों का त्याग करना पड़ता है? क्या विविध भारती सुनने के लिए भी कुछ त्याग करने की ज़रूरत है?  मैं आपके सारे सवालों का जवाब दूँगा, बस समझ नहीं आ रहा कि कहाँ से शुरू करूँ ? ......चलिए मैं बिना किसी भूमिका के शुरू से आपको बताता हूँ। सबसे पहले रेडियो से अपने परिचय से शुरुआत करता हूँ। रेडियो से मेरा परिचय मेरी माँ ने करवाया। मेरे घर में एक रेडियो था, मैं अपनी माँ को अक्सर रेडियो सुनते देखता। यह कब की बात है, मुझे ठीक से याद नहीं, लेकिन कुछ अनुमान के सहारे कहने का प्रयास करता हूँ। मेरा जन्म 1977 में हुआ है, मुझे लगता है कि मैं उस समय सात-आठ वर्ष का रहा होऊँगा; यानी एक अनुमान से कहँू तो यह 1983-84 की बात होगी। माँ रेडियो सुनती रहती। मैं जब पूछता कि माँ तुम क्या सुन रही हो ? तो माँ कहती-'रेडियो सीलोन'। माँ 'रेडियो सीलोन' के साथ और भी रेडियो चैनल सुनती थी; लेकिन मुझे उनके नाम अब याद नहीं। उन दिनों हमारे यहाँ टीवी नहीं आया था, रेडियो मनोरंजन का केंद्र हुआ करते थे। मैंने उन दिनों के बारे में यह भी सुना था कि लड़की के विवाह में साइकिल के साथ रेडियो दहेज के रूप में दिया जाता था।

मुझे यहाँ पर रेडियो से संबंधित अपने बचपन की एक घटना याद आ रही है। हमारे घर से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर योगेन्द्र मास्टर साहब का घर था। मैं अपने छोटे भाई प्रदीप के साथ उनके यहाँ ट्यूशन पढऩे जाया करता था। मेरे पड़ोस में ही संगीता और नवीन रहते थे, वे दोनों भी आपस में भाई बहन थे। संगीता उम्र में हम सब से बड़ी थी। उसके बाद मेरा नंबर था। मेरे बाद नवीन और सबसे छोटा प्रदीप था। हम चारों योगेन्द्र मास्टर साहब से पढऩे जाते। एक बार हम सब जब योगेन्द्र मास्टर साहब के यहाँ पहुँचे तो उनके घर में एक बड़ा रेडियो देखकर दंग रह गए; हम इसलिए दंग रह गए क्योंकि रेडियो अपने आकार में बहुत बड़ा था। यह आज के समय की माइक्रोवेव ओवन से भी बड़ी थी। हमने इतना बड़ा रेडियो पहले कभी नहीं देखा था। हम हैरान रह गए। फिर योगेन्द्र सर ने हमें पढ़ाना शुरू किया, लेकिन हमारा ध्यान रेडियो पर ही अटका रहा। हमने उनसे अनुरोध किया कि वे रेडियो बजाकर हमें सुनाएँ। हमारा अनुमान था कि जब रेडियो इतना बड़ा है तो उसमें गीत भी ऊँची आवाज़ में बजते होंगे, लेकिन हुआ उल्टा। योगेन्द्र सर ने रेडियो की नॉब घुमाना शुरू किया; उन दिनों रेडियो में सुइयाँ हुआ करती थीं। सुइयों को बार-बार इधर-उधर घुमाना पड़ता था और तब खडख़ड़ाहट के साथ आवाज़ सुनाई पड़ती थी। योगेन्द्र सर रेडियो की सुइयाँ घुमाते रहे और रेडियो सांय सांय करती रही। हम गीत नहीं सुन पाए, किंतु इतना बड़ा रेडियो देखने, उसकी सुइयों को घूमते देखने और उसे छूने का रोमांच भी कम नहीं था।

रेडियो के बाद ट्रांजिस्टर का समय आया और रेडियो छोटे आकार में आने लगे। उन दिनों कई लोग इधर-उधर टहलते समय रेडियो अपने साथ रखते थे। मैं जिन लोगों को रेडियो लेकर टहलते देखता, उनके प्रति कुछ ज़्यादा सम्मान का भाव मन में आ जाता। फिर मेरे घर में टेलीविजऩ आया। अब हमारे यहाँ टीवी चलता और समय-समय पर रेडियो बजता; किंतु धीरे-धीरे रेडियो सुनना कम होने लगा। इसका एक कारण तो यह था कि तकनीकी कारणों से रेडियो सुनते समय बीच-बीच में व्यवधान आ जाता, हमें खऽर्र खऽर्र की ध्वनि सुनाई पड़ती, जो सारा मज़ा किरकिरा कर देती; हमें कई बार रेडियो के मीटर की सुइयाँ इधर-उधर खिसकानी पड़तीं। दूसरा कारण यह था कि अब रेडियो का स्थान टीवी लेने लगा था; रेडियो में सिर्फ सुनने का सुख था, जबकि टीवी में सुनने के अलावा देख भी सकते थे। तीसरा कारण यह था कि हमारा रेडियो अब बूढ़ा होने लगा था; पहले रेडियो रिपेयर के लिए कई दुकानें थीं, किंतु टीवी के आने के बाद ये दुकानें धीरे-धीरे बंद होने लगी थीं; अब रेडियो बनाने वाले मुश्किल से मिलते, उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दीं या फिर अपना धंधा बदल डाला। इस तरह कुछ समय के बाद हम लोगों ने धीरे-धीरे रेडियो सुनना छोड़ दिया। लेकिन यह रेडियो से संबंधों में एक छोटा सा ब्रेक भर था, क्योंकि आने वाले समय में इससे फिर एक नया संबंध जुड़ा, और इस संबंध को जोडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका मेरे बड़े भैया ने निभाई।

मेरे बड़े भैया राज कुमार बर्णवाल बीआईटी, सिंदरी (तत्कालीन बिहार, वर्तमान समय में झारखंड में स्थित) में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। बड़े भैया को गीत सुनने का शौक था, पिताजी ने उनके लिए एक नया रेडियो खरीद दिया था। बड़े भैया इंजीनियरिंग पास करके घर आए। यह शायद 1993-94 की बात होगी। घर आने के बाद भी वे नियमित रूप से रेडियो सुना करते। हमारा पुराना रेडियो खऱाब हो गया था, इसलिए जब बड़े भैया रेडियो लेकर घर आए तो उनके साथ परिवार के अन्य सदस्य भी इसे सुनने लगे। पिताजी समाचार सुनते। माँ कभी-कभी बड़े चाव से गीत सुनती। बड़े भैया से छोटे पवन भैया कई बार समाचार और गीत सुनते। मैं तो नियमित रूप से बड़े भैया और पवन भैया के साथ रेडियो सुनने लगा। उन दिनों रेडियो पर 'सिबाका गीतमाला' कार्यक्रम आता, मैंने बड़े भैया से ही इस कार्यक्रम के बारे में सुना। अमीन सयानी की जबरदस्त आवाज़ में यह कार्यक्रम हमें मंत्रमुग्ध कर देता। मुझे उस समय सिबाका गीतमाला में बजने वाले गीतों का स्मरण अब नहीं है, किंतु अमीन सयानी की आवाज़ में प्रस्तुत कार्यक्रम की स्वर लहरियों की झंकार जैसे मेरे कानों में आज भी गूँज रही हैं-'भाइयो और बहनो......इस बार फलाना गीत इस पायदान पर है..।' हम पूरे सप्ताह इस कार्यक्रम का इंतज़ार करते। इसके अलावा हर रोज रात में 7:40 से 8:30 बजे तक बीबीसी हिंदी से समाचार प्रसारित होता। बीबीसी हिंदी के कार्यक्रमों के क्या कहने- इसमें विभिन्न ख़बरों के विस्तृत विश्लेषण सुनने को मिलते, और समय-समय पर विभिन्न साप्ताहिक कार्यक्रम भी प्रसारित होते। हम इसके अलावा विविध भारती से प्रसारित हिंदी में समाचार भी सुनते।

झारखंड में बोकारो जिला में एक जगह पड़ता है- गोमिया। मैं यहीं का रहने वाला हूँ। मैं अब तक गोमिया के बारे में ही बातें कर रहा हूँ। 1993 में मैंने दसवीं की परीक्षा दी। परीक्षा पास करने के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए हजारीबाग, पटना फिर वाराणसी पहुँचा, जहाँ पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से मैंने एम ए और पीएचडी की। इस दौरान रेडियो का साथ लगभग बना रहा, हालांकि बीच बीच में कुछ सालों तक यह संबंध टूटा भी।

बड़े भैया ने अपना रेडियो मुझे दे दिया; अब तक उनकी नौकरी लग गई थी और रेडियो के प्रति उनका आकर्षण भी कम हो गया था। रेडियो ने मेरा साथ कुछ वर्षों तक हजारीबाग और फिर पटना में दिया। मैं पटना में अपने छोटे भाई प्रदीप के साथ रहता था, मनोरंजन के नाम पर हमारे पास एक रेडियो था; हम इसी पर आकाशवाणी से प्रसारित समाचार सुनते, बीबीसी हिंदी से प्रसारित समाचार और कभी कभी फिल्मी गीत सुनते। लेकिन फिर वह खऱाब हो गया।

मेरा रेडियो खऱाब हो गया था; लेकिन मेरा रेडियो सुनना छूटा नहीं। मैं अपने छोटे भाई के साथ एक लॉज में रहता था, इस लॉज में सिर्फ विद्यार्थी ही रहते थे। मेरे छोटे भाई ने पटना छोड़ दिया, तब मैंने अपना कमरा बदल लिया। मेरे ही लॉज में धीरज जी रहा करते थे। हम दोनों आपस में रूम पार्टनर बन गए। धीरज जी के पास एक रेडियो था। मैं अब धीरज जी के साथ ही रेडियो सुनता। रात के भोजन को सुस्वादु बनाने में हमारा साथ विविध भारती देती। विविध भारती सुनते हुए कब भोजन तैयार हो जाता पता ही नहीं चलता। धीरज जी और मेरा साथ लगभग एक वर्ष तक रहा, मैं इसके बाद 2005 में वाराणसी आ गया।

2005 में मेरा नामांकन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में एमए प्रयोजनमूलक हिंदी (पत्रकारिता) में हो गया। मेरा एमए का सत्र 2005-07 तक था। बीएचयू में पढऩा बहुत से लोगों का ख्वाब होता है, मेरा यहाँ पर नामांकन हो गया, मैं इस बात से बहुत खुश था। मुझे यहाँ पर रहते हुए एक बात की जानकारी मिली कि एमए में अपने विषय में विश्वविद्यालय में टॉप करने पर गोल्ड मेडल मिलता है। तब मैंने अपने मन में एक लक्ष्य तय किया कि मुझे दो वर्षों तक खूब ध्यान देकर पढऩा है, और इसलिए मैंने दो वर्षों तक विविध भारती से दूरी बना ली, मैंने नया रेडियो नहीं खरीदा। मैं हमेशा पढ़ाई के बारे में सोचता, क्लास करने विभाग जाता और क्लास से लौटने के बाद जब मेरे मित्र घूमने फिरने और गप्पें हाँकने में अपना समय बिताते, मैं पढ़ाई करता; मैं हमेशा गोल्ड मेडल के बारे में सोचता। दो वर्षों तक सतत परिश्रम का सुखद परिणाम मुझे मिला, मैं अपने क्लास में टॉप आया और फिर वर्ष 2008 में एक दीक्षांत समारोह में मुझे गोल्ड मेडल मिला।

मैं एमए करने के दौरान बीएचयू में ही बिरला-बी हॉस्टल में रहता था। एमए के बाद मुझे अपना हॉस्टल खाली करना पड़ा। इसके बाद मैंने एक कमरा किराये पर लिया। इस कमरे में हम चार मित्र एक साथ रहते थे। एक मित्र अपने साथ एक छोटा रेडियो ले आया था। 2007 में ही वाराणसी में रेडियो मिर्ची और रेडियो मंत्रा का एफ एम बैंड शुरू हुआ, शायद रेड एफ एम बैंड भी उसी वर्ष शुरू हुआ। मित्र के पास जो रेडियो था, वह डिजिटल था, यानी उसमें पहले के रेडियो की तरह मीटर की सुइयाँ नहीं थीं; इसलिए इसे सुनने में सुविधा होती थी। उस समय तक मोबाइल में भी एफ एम बैंड आ गया था; मेरे साथ रहने वाले कई लोगों के पास ऐसा मोबाइल था, जिसमें रेडियो एफ एम बैंड भी बजता था। मैंने 2006 में एक मोबाइल खरीदा था, किंतु मेरे मोबाइल में रेडियो सुनने की सुविधा नहीं थी, सिर्फ  बातचीत की जा सकती थी। मैं इन मित्रों के साथ कुछ दिनों तक रहा और फिर वही माहौल शुरू हो गया जैसा पटना में धीरज जी के साथ था; यानी कि हम मिलकर भोजन बनाते और साथ में रेडियो बजता रहता। हम रेडियो के गीतों का आनंद उठाते, किंतु मुझे जो आनंद विविध भारती सुनने में आता; वह आनंद इन नये एफ एम बैंड को सुनने में नहीं मिलता था; किंतु तब भी मैं अपने मित्रों के साथ भोजन करता और एफ एम बैंड में बजने वाले नये गानों का आनंद उठाता। एक साल होते होते इन मित्रों ने कमरा छोड़ दिया, सब अपने अपने सफर के लिए निकल लिए; जिस मित्र का रेडियो था, वह जाते वक्त अपना रेडियो साथ ले गया और इसलिए कुछ समय के लिए रेडियो से मेरा संबंध टूट गया, यह संबंध दोबारा तब जुड़ा जब मैंने नया रेडियो खरीदा।

एमए के बाद मेरी इच्छा हो गई थी कि बीएचयू से ही आगे पीएच.डी. करूँ, इसलिए मैंने वाराणसी नहीं छोड़ा; और पीएच.डी. के प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने लगा। बीएचयू में ही मेरी मित्रता अरविंद से हो गई थी। हम दोनों की ही हिंदी साहित्य खासकर कहानियों में गहरी रुचि थी। मैं जब अपने कमरे में अकेले रहने लगा तो अरविंद अक्सर मुझसे मिलने मेरे कमरे पर आता। अरविंद ने बीएचयू से ही बीएड, एमएड कर लिया था और उसकी प्राथमिक विद्यालय में नौकरी हो गई थी। उसकी पहली नियुक्ति नौगढ़ के किसी स्कूल में हुई थी। अरविंद को जब भी छुट्टी मिलती, वह भागकर मेरे पास आता और फिर हम दोनों किसी साहित्यिक पत्रिका की बातें करते। किसी लेखक या कहानी पर चर्चा करते। अरविंद बहुत अच्छी कविताएं लिखता था। मैं कई बार भोजन तैयार करता और उसे इस दौरान कविता लिखने के लिए प्रेरित करता। अरविंद ने इस दौरान कई अच्छी कविताएं लिखीं, जो प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी भी। फिर एक दिन अरविंद ने ही मुझे सलाह दी कि रेडियो खरीद लीजिए। अरविंद ने बताया कि वह भी विविध भारती का प्रशंसक है और अपने गाँव में अपनी बहन के साथ रेडियो सुनता था। मेरे मन में विविध भारती के प्रति गहरा लगाव था, लेकिन इधर कुछ समय से मैंने जानबूझकर इसे नजऱअंदाज कर दिया था; अरविंद के जोर देने पर मैंने तय किया कि एक नया रेडियो खरीद लेते हैं और तब एक दिन मैं और अरविंद रेडियो खरीदने के लिए बाज़ार की ओर चल दिए।

यह शायद वर्ष 2008 या 09 की बात होगी, मुझे ठीक से याद नहीं, हम दोनों रेडियो खरीदने बाज़ार की ओर चले; लेकिन हमें बाज़ार में रेडियो खरीदने के लिए काफी भटकना पड़ा। ऐसा इसलिए क्योंकि अब बाज़ार में धीरे धीरे रेडियो बिकना बंद हो गई थीं; रेडियो बेचने वालों ने अपनी दुकानें बंद कर लीं या फिर अपना धंधा बदल लिया था। अगर कहीं कहीं पर रेडियो बिक भी रहे थे तो डिजिटल वाले; जिसमेें एफ एम बैंड ही सुने जा सकते थे; किंतु मुझे तो वह रेडियो चाहिए था जिसमें एफ एम बैंड न होने पर भी सामान्य रेडियो चैनल सुने जा सकें। अंतत: एक दुकान में हमें फिलिप्स कम्पनी का रेडियो मिल गया। संयोग से इस दुकान पर सिर्फ़  दो ही रेडियो बचे हुए थे। उनमें से एक रेडियो मैंने खरीद लिया और फिर विविध भारती से नया नाता शुरू हो गया। मैं कमरे में रेडियो सुनता। हर शाम 4:00-5:00 बजे तक रेडियो पर कुछ विशेष कार्यक्रम आते, जो कि अब भी आते हैं; विविध भारती की भाषा में कहूँ तो - पिटाराऽ......वैसे तो पिटारा हर रोज़ खुलता है, इसे खोलते रहिए और सुनते रहिये.....पिटारा। विविध भारती से खुलने वाला 'पिटारा' मुझे बेहद पसंद है। 

मैंने 2007 में एमए पास कर लिया, किंतु बीएचयू हमेशा आता जाता रहता; इसका कारण था बीएचयू का वृक्षों से आच्छादित सुरम्य परिसर। बीएचयू का परिसर इतना मोहक है कि जिसने एक बार यहाँ से पढ़ाई कर ली, उसे यहाँ के परिसर से विशेष लगाव हो जाता है; वह इसे कभी भूल नहीं सकता। मैं यहीं से आगे पीएच.डी. करना चाह रहा था, इसलिए मैं कई बार यहाँ आ जाता और पढ़ाई करता रहता। मैं कई बार बीएचयू जाते वक्त अपने पास एक बैग रख लेता; बैग इतना बड़ा था कि उसमें आसानी से मेरी किताबों के साथ रेडियो आ जाता। मैं कई बार डेलीगेसी में पढ़ाई करता; डेलीगेसी के बगल में ही स्थित मैत्री जलपान गृह में दोपहर का भोजन कर लेता; फिर ठीक 4 बजे मैदान की ओर निकल जाता। बीएचयू में कई खुले मैदान हैं, मैं मैदान में किसी पेड़ के नीचे बैठकर 5 बजे तक विविध भारती का आनंद उठाता।

वर्ष 2009 के अक्टूबर में मेरा बीएचयू में पीएच.डी में नामांकन हो गया। पीएच.डी. के दौरान भी रेडियो पर विविध भारती सुनने का सिलसिला लगातार जारी रहा। वर्ष 2011 के जुलाई या अगस्त माह में मैंने नया मोबाइल खरीदा। जिसमें रेडियो के एफ एम बैंड को सुनने का फीचर था। इसलिए अब विश्वविद्यालय परिसर में आते समय बैग में भरकर रेडियो लाने की ज़रूरत नहीं रही; मैं अपनी जेब में रखे मोबाइल के माध्यम से विविध भारती को लेकर कहीं भी आ जा सकता था। मोबाइल पर विविध भारती सुनने का मज़ा ही कुछ और है, इसमें आवाज़ साफ साफ सुनाई पड़ती, कहीं कोई व्यवधान नहीं, मीटर की सुइयों को घुमाने का कोई झंझट नहीं। धीरे धीरे विविध भारती से मेरी यारी तथा आशिकी और भी बढ़ती गई।

विवाह के उपरान्त भी विविध भारती से लगाव बना रहा; किंतु मैं अब धीरे-धीरे व्यस्त होने लगा था। लेकिन इन व्यस्तताओं के बावजूद मैं विविध भारती के कुछ कार्यक्रम ज़रूर सुना करता; जैसे- उजाले उनकी यादों के, आज के मेहमान, सरगम के सितारे, इनसे मिलिए, आज के फऩकार, जिज्ञासा, सिनेमा के नक्षत्र इत्यादि; इन कार्यक्रमों का समय तय था। इसलिए मैं कोशिश करता कि इन कार्यक्रमों के प्रसारण के समय घर से बाहर न निकलना पड़े। मैं कोशिश करता कि अपने काम पहले से ही निपटा लूँ , ताकि जिस समय विविध भारती के कार्यक्रम आए मैं उन्हें इत्मीनान से सुन सकूँ. किंतु ऐसा हमेशा नहीं हो पाता, कोई न कोई काम ज़रूर निकल आता और मैं अपना मनपसंद कार्यक्रम सुन नहीं पाता। तब मैंने विविध भारती के अपने पसंदीदा कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करना शुरू किया।

विविध भारती के अपने पसंदीदा कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग को लेकर मेरे कुछ मज़ेदार अनुभव हैं। वाराणसी में ही एक जगह है- रामनगर। यहाँ पर प्रत्येक वर्ष दशहरा के आसपास रामलीला का मंचन होता है। रामनगर की रामलीला कुछ विशेष है। इसका कारण यह है कि रामनगर की रामलीला एक मंच पर न होकर कई मंचों पर आयोजित होती है। रामचरितमानस' की कथा के अनुसार राम लक्ष्मण जब अयोध्या से लंका की ओर गमन करते हैं तो रामलीला में राम लक्ष्मण बने कलाकार एक जगह से दूसरी जगह चले जाते, और दर्शक भी उनके पीछे पीछे चले आते। यूनेस्को ने रामनगर की रामलीला को वल्र्ड हेरिटेज घोषित किया है। भारत में एक सरकारी संस्था है- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, इसने कई महत्वपूर्ण कामों का दस्तावेजीकरण किया है। इसने रामनगर की रामलीला पर भी 2014 के सितम्बर-अक्टूबर में एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का निश्चय किया। बीएचयू में अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफेसर संजय कुमार से मुझे इस संबंध में जानकारी मिली; उन्होंने मुझे बताया कि आईजीएनसीए रामनगर की रामलीला पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने जा रही है, उन्हें वाराणसी को जानने वाले चार स्थानीय लोगों की ज़रूरत है। मैं डॉक्यूमेंट्री में काम करने के लिए सहर्ष तैयार हो गया; मेरे साथ बीएचयू के तीन अन्य मित्र सुकेश लोहार, सुनील और धर्मेन्द्र भी तैयार हो गए। तब फिर एक दिन बीएचयू में मेरे शोध निर्देशक प्रोफेसर राजकुमार और संजय सर हम चारों को आईजीएनसीए के वाराणसी स्थित ऑफि़स ले गए। वहाँ पर हमारी बातचीत हुई, फिर हम चारों डॉक्यूमेंट्री में काम करने के लिए रख लिए गए। हम चारों ने इस डॉक्यूमेंट्री में फील्ड रिसर्च असिस्टेंट के रूप में काम किया। एक महीने तक डॉक्यूमेंट्री में काम करने के दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा। हम दोपहर में करीब ढाई तीन बजे तक रामलीला की जगह पर पहुँच जाते और कई बार रात के साढ़े दस ग्यारह बजे तक अपने घर लौटते। इस दौरान विविध भारती के कार्यक्रम अपने तय समय पर आते रहते, मैं कार्यक्रम नहीं सुन पाता, लेकिन मैं अपने मोबाइल पर विविध भारती ऑन कर उसे रिकॉर्डिंग मोड पर डाल देता। मैं फील्ड रिसर्च असिस्टेंट के रूप में काम करता रहता और मेरे मोबाइल पर मेरा पसंदीदा कार्यक्रम रिकॉर्ड होता रहता। मैं बाद में अपनी सुविधा के अनुसार उन कार्यक्रमों को सुन लेता।

बीएचयू के मुख्य द्वार के पास स्थित बाज़ार को लंका के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर कई दुकानें हैं। शाम में यहाँ पर बीएचयू के विद्यार्थी जुटते हैं; चाय, नाश्ता करते हैं, गप्पे हाँकते हैं; बनारस की भाषा में हम इसे लंकेटिंग कहते हैं, तो शाम में मैं भी यहाँ पर अपने मित्रों राजीव रंजन प्रसाद, अरविंद, अशोक सिंह यादव, सर्वेश, राजेश, सुकेश, लक्ष्मण इत्यादि के साथ लंकेटिंग के लिए जुटता था। बुधवार की शाम  7:45-8:00 बजे तक इनसे मिलिए; शनिवार की शाम 7:00-7:45 और 7:45-8:00 बजे तक क्रमश: विशेष जयमाला और जिज्ञासा कार्यक्रम प्रसारित होते हैं- मैं इन्हें सुनना पसंद करता हूँ। इसी तरह हर रोज रात में 8:00-8:15 और 9:00-9:30 तक क्रमश: हवा महल और  हिट सुपरहिट कार्यक्रम प्रसारित होते हैं- मैं कभी कभी इन्हें भी सुनता हूँ। मैं पहले से तय कर लेता कि आज इन्हें सुनना है या नहीं। तय करने के बाद, मैं पहले तो इस बात की कोशिश करता कि उस समय घर से बाहर न निकलना पड़े, लेकिन अगर कभी मित्रों का फ़ोन आ गया कि आज लंकेटिंग करना है, तो फिर मैं समय पर अपने मित्रों के समक्ष उपस्थित होता; अपने मोबाइल को रिकॉर्डिंग मोड पर लगा देता और उनके साथ चाय और गप्प में शरीक हो जाता।

मैं कई बार अपने गुरु प्रोफेसर राजकुमार से शाम में मिलने उनके घर जाता। अगर उस समय मेरी विविध भारती के कार्यक्रम का समय होता तो मैं वहाँ भी यही करता, यानी अपने मोबाइल को रिकॉर्डिंग मोड में डाल देता और सर से डिसकस करता रहता।

मोबाइल पर विविध भारती सुनने में बहुत सहूलियत थी, दिक्कत थी तो सिर्फ़  एक कि अगर उस समय किसी का फ़ोन आ जाता तो मोबाइल की घंटी बजने लगती और उसमें विविध भारती बजना बंद हो जाता। मेरे मित्र राजीव रंजन प्रसाद का कई बार इसी समय फोन आता, तब मैंने उससे कहा कि रात में 9:00-10:00 और दिन में 4:00-5:00 बजे तक मैं मोबाइल पर विविध भारती सुनता हूँ , इसलिए कृपया करके इस समय फोन मत करना।

वर्ष 2015 में मेरी पीएच.डी. की थीसिस जमा हो गई और 2016 में अंतिम रूप से पीएच.डी. की मौखिक परीक्षा हो गई। मैंने 26 मार्च, 2016 से वाराणसी के ही एक प्राइवेट स्कूल में प्राथमिक शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया। मुझे स्कूल सुबह सात बजे तक पहुँच जाना होता था। विविध भारती पर सुबह 6:00-6:30 तक 'तेरे सुर और मेरे गीत' और 7:00-7:30 तक 'भूले बिसरे गीत' प्रसारित होते हैं। मैं इन दोनों कार्यक्रमों को सुनना पसंद करता हूँ , लेकिन सुबह सुबह स्कूल जाने के कारण इन्हें सुन नहीं पा रहा था; तब मैंने उपाय लगा कर इन्हें सुनना शुरू किया। मैं इन्हें मोबाइल पर रिकॉर्ड कर लेता और फिर बाद में सुन लेता। मैं अपने मोबाइल को रिकॉर्डिंग मोड में डालकर घर से निकलता, स्कूल पहुँचते पहुँचते 'तेरे सुर और मेरे गीत' कार्यक्रम रिकॉर्ड हो जाता। इसके बाद मैं असेम्बली ग्राउंड में रहता या फिर अपने स्टॉफ़ रूम में जहाँ पर मेरी जेब में रखे मोबाइल में 'भूले बिसरे गीत' रिकॉर्ड होता रहता और मैं अपना काम भी करता रहता। मैंने उस स्कूल में एक वर्ष तक काम किया। मैं इसके बाद एक अन्य प्राइवेट स्कूल में टीजीटी टीचर के रूप में नियुक्त हुआ। इस स्कूल का मालिक फ़ौज से सेवानिवृत्त था। उसने अपने स्कूल में मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया था। कोई भी शिक्षक/शिक्षिका स्कूल के परिसर में मोबाइल पर बातचीत नहीं कर सकते थे। मैं यहाँ पर दसवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाता था, इनकी कक्षा लगभग साढ़े ग्यारह से शाम के साढ़े चार बजे तक लगती; मुझे स्कूल से निकलते निकलते लगभग साढ़े पाँच बज जाते। विविध भारती में हर रोज शाम में चार से पाँच बजे तक एक से एक बेहतरीन कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम आता है, जिसमें सिनेमा से जुड़े किसी व्यक्ति का साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसी तरह शुक्रवार को विविधा प्रसारित होता है, इसमें विविधरंगी कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। ये दोनों मेरे बेहद पसंदीदा कार्यक्रम हैं। मुझे स्कूल से संबद्ध होने के बाद जब पता चला कि यहाँ मोबाइल पर प्रतिबंध है तो मैंने अपना सिर पीट लिया, ऊपर से तुर्रा यह कि यहाँ पर जगह जगह पर सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था, यहाँ तक कि शिक्षकों के स्टाफ रूम में भी कैमरा लगा हुआ था यानी कि किसी की नजऱों में आए बिना मैं विविध भारती सुन नहीं सकता था। बस समझ लीजिए कि जालिम ज़माने ने विविध भारती और मेरे बीच उत्पन्न मोहब्बत के बीच फासला लाने का पुख्ता इंतज़ाम कर रखा था। इस पहरे में विविध भारती से आशिकी और भी गहरी हुई। मैंने एक उपाय निकाला, विद्यालय का मालिक हर जगह सीसीटीवी कैमरा लगा सकता है, लेकिन बाथरूम में तो नहीं लगा सकता न; शाम में चार बजे जब मेरे कार्यक्रम का समय हो जाता मैं बाथरूम चला जाता, अपनी जेब से मोबाइल निकालता और उसे रिकॉर्डिंग मोड पर करके पुन: जेब में रख लेता। मैं कक्षा में बच्चो को पढ़ाता और मेरी जेब में मेरा प्रिय कार्यक्रम रिकॉर्ड होता रहता। उस स्कूल में अध्यापकों को कुछ समझा ही नहीं जाता था, मैं इस स्कूल में मुश्किल से 19 दिन रहा, उसके बाद मैंने उस स्कूल को छोड़ दिया।

दोस्तो, मैंने 10 अक्टूबर, 2017 को अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में नौकरी ग्रहण की है। मैं इस समय मध्यप्रदेश के खरगोन नामक शहर में नौकरी कर रहा हूँ। खरगोन जिला मुख्यालय है। मैंने यहाँ आकर सबसे पहले रेडियो के बारे में पता किया-मैंने अपने ऑफि़स के एक दो सदस्यों को बताया कि मुझे विविध भारती सुनने का शौक है;मैंने उनसे पूछा कि क्या वे विविध भारती सुनते हैं ? मैंने अपने मोबाइल में कई बार विविध भारती बजाने का प्रयास किया, किंतु निराश हुआ जब मुझे पता चला कि यहाँ खरगोन में एफ एम बैंड की सुविधा नहीं है। एफएम बैंड की सुविधा न होने का मतलब यह था कि मैं अपने मोबाइल पर विविध भारती नहीं सुन पाऊँगा।

लेकिन एक दिन यहाँ पर यादगार घटना घटी। खरगोन में मेरा ऑफि़स चमेली की बाड़ी नामक जगह पर है,  मैंने चमेली की बाड़ी में ही किराये से एक फ्लैट ले लिया। मेरे घर से ऑफिस की दूरी लगभग तीन सौ मीटर होगी। मेरा ऑफिस साढ़े नौ बजे से शाम के छह बजे तक लगता है।  सुबह साढ़े नौ बजे विविध भारती पर आज के फऩकार का समय होता है, यही कार्यक्रम रात के साढ़े नौ बजे प्रसारित होती है। विविध भारती में विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत में अलग अलग सुमधुर ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। विविध भारती की स्वर लहरियाँ मेरी इतनी अपनी हैं कि उन्हें सुनकर मुझे पता चल जाता है कि अब कौन सा कार्यक्रम प्रसारित होने वाला है। एक बार की बात है, मैं अपने घर से ऑफि़स जा रहा था, यह नौकरी ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद की बात है। अचानक मेरे कानों में कुछ स्वर लहरियाँ बरसीं ; मैं चौंका..... ये विविध भारती की सुमधुर स्वर लहरियाँ थीं। मैं ठिठककर रुक गया। मैंने उधर ध्यान दिया जिधर से सुमधुर स्वर लहरियाँ आ रही थीं। मैंने देखा-एक घर के आंगन में कुर्सी पर कोई बूढ़ा आदमी बैठा हुआ था, उसके बगल में रेडियो रखी थी और उसी से सुमधुर स्वर लहरियाँ निकलकर मेरे कानों में घुल रही थीं। मैं वर्षों बाद किसी व्यक्ति को रेडियो सुनते देख रहा था, टीवी आने के बाद इस तरह के दृश्य गायब हो गए थे। मैं गहरे आनंद से भर गया।

दोस्तो, मैं मई 2018 के दूसरे सप्ताह में जब यह संस्मरण लिखने बैठा हूँ , तो वह दृश्य आज भी मेरी आँखों के सामने चलचित्र के दृश्यों की भाँति गतिशील हो गया है,ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। इस घटना का मतलब एक ही था कि मैं अपने मोबाइल में न सही, परंतु परंपरागत मीटर की सुइयों वाले रेडियो में विविध भारती सुन सकता था। मैं एक दिन बाज़ार गया और मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि यहाँ खरगोन की दुकानों में अभी भी मीटर की सुइयों वाला रेडियो बिक रहे थे।  मेरे पास विकल्प था कि मैं एक रेडियो खरीद लूँ और उस पर विविध भारती सुनूँ ; किंतु तभी मुझे एक दूसरा विकल्प भी नजऱ आया। मुझे याद आया कि मैंने वाराणसी में विविध भारती पर यह सुना था कि मोबाइल के प्लेस्टोर से विविध भारती का ऐप डाउनलोड करके विविध भारती सुनी जा सकती है। तब मैंने अपने मोबाइल पर विविध भारती का ऐप डाउनलोड किया और विविध भारती सुनने लगा। लेकिन ऐप से विविध भारती सुनने में कुछ दिक्कतें थीं, इसमें अक्सर विज्ञापन आते। विविध भारती सुनते समय अगर ग़लती से भी उंगुलियाँ इन विज्ञापनों पर चली जातीं तो तुरंत कोई सेवा मेरी मोबाइल पर एक्टिव हो जाती और मेरे मोबाइल से पैसे कट जाते। मैं कस्टमर केयर से बातें करके इसकी शिकायत करता, इस पर वे कहते कि मैंने ही कोई सेवा सब्सक्राइब की है, जिसके कारण मेरे पैसे कट गए; मैं उनसे जिरह करता कि मैंने सब्सक्राइब नहीं किए, वे अपना तर्क देते। कस्टमर केयर ने एक दो बार मेरे कटे पैसे लौटाए तो एक दो बार नहीं भी लौटाए। ऐसा बार बार होता और मैं परेशान होता रहता। मैं सोचता कि क्या करूँ, मैं विविध भारती सुनना चाहता था और यह भी चाहता था कि इस दौरान मेरे पैसे न कटें। मैं परेशान होता रहा, लेकिन तभी मुझे विविध भारती सुनने का एक तीसरा तरीका मिला और मेरी समस्याएँ हल हो गईं।

मैं अभी खरगोन में श्री जयप्रकाश जायसवाल और श्रीमती लता जायसवाल के मकान में किराये पर रहता हूँ। मैं एक बार उनके यहाँ गया तो देखा कि उनके यहाँ एक डिजिटल रेडियो है, जो डीटीएच के माध्यम से जुड़ा हुआ है। आंटी ने मुझे बताया कि अंकल को रेडियो पर गीत सुनने का शौक है। मैं बहुत खुश हुआ, इसलिए कि अब मुझे विविध भारती सुनने का उत्तम उपाय मिल गया था। मीटर की सुइयों वाली रेडियो में सदा से एक दोष रहा है कि उसमें मीटर की सुइयों को इधर उधर खिसकाना पड़ता है, और इस पर भी उसमें कई बार खर्र खर्र की आवाज़ें सुनाई पड़ती रहती हैं। मोबाइल के ऐप से विविध भारती सुनने के ख़तरे मैं देख चुका था, इसमें कई बार मेरे पैसे कट जाते थे। मैंने अब विविध भारती सुनने के लिए तीसरा उपाय करने का निश्चय किया। अब मेरे यहाँ डीटीएच से रेडियो सुनने की व्यवस्था हो गई; मैं उस दिन बहुत बहुत खुश हुआ और उस दिन के बाद से आज भी अपना समय विविध भारती के साथ बिताता हूँ।

कभी कभी मेरी पत्नी और बेटी मेरे साथ रेडियो पर विविध भारती का आनंद उठाते हैं। राजीव रंजन प्रसाद का अब भी कई बार रात में 9:00-10:00 बजे के बीच फ़ोन आता है, और तब मैं बाद में उसे कॉलबैक करके बताता हूँ कि उस समय रेडियो सुन रहा था; तब राजीव वही चिरपरिचित वाक्य कहता है -''ओह ! मैं भूल गया था।'' या फिर मैं जब उसका फोन नहीं उठाता तो वह समझ जाता है कि मैं विविध भारती सुन रहा हूँ। इसलिए मैं जब उसे कॉलबैक करता हूँ तो वह कहता है- 'रेडियो सुन रहे थे?''