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Monday 18 Jun 2018

जीवन का राग....विविध भारती

बचपन जब कंटीले रास्तों से गुजर रहा था, तब से रेडियो हमारे साथ-साथ चल रहा था, या यूं कहें कि हम रेडियो के साथ बड़े हो रहे थे और रेडियो हमारे जीवन का सुर बन रहा था।

बचपन का रेडियो एक जीवंत व्यक्ति की तरह घर का मुख्य सदस्य था। हम मुस्कुराते या मुंह बिसूर कर रोते,तो लगता कमरे में मौजूद रेडियो हमें देख रहा है और हम रोते हुए टेढ़ा हुआ मुंह झट से बंद कर लेते और गालों पर ठहर आंसू की बूंदों को आईने के सामने जाकर झटपट पोंछ लेते। इतनी ज्यादा थी रेडियो की अहमियत हमारी जिंदगी में।

असम के छोटे-से कस्बे धुबरी में बीता हमारा बचपन। कई कमरों के उस घर में एक कमरा 'रेडियो वाले कमरे' के नाम से जाना जाता था। उस कमरे में बड़ी-सी टेबल पर बड़ा-सा मरफी रेडियो सेट रखा था। उसी रेडियो के पर्दे से छन कर जब ये उद्घोषणा सुनाई देती....यह श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन का विदेश विभाग है, तो हम रेडियो पर पहनाए गए कवर के पीछे अपनी पूरी मुंडी घुसा कर देखते कि यह कौन लोग हैं जो बोल रहे हैं पर दिखाई नहीं दे रहे।.....बहुत लंबे समय तक यह सवाल पीछा करता रहा। इस सवाल के पीछे और सवाल......फिर और सवाल.......मतलब सवालों की नदी में हम लंबे समय तक ग़ोते लगाते रहे। रेडियो के साथ ही हमारे रास्ते बदले और हम पहुंचे इलाहाबाद।

मेरे मन में आकाशवाणी इलाहाबाद से जुड़ी बड़ी रेशमी और मखमली स्मृतियां है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक लड़का था इंदु प्रकाश जो हम सात सहेलियों के ग्रुप को बहन मान चुका था....मतलब वह हमारा ग्रुप भाई था, उसी ने आकाशवाणी इलाहाबाद के 'उदयाचल' कार्यक्रम में हिस्सा लेने का अनुरोध किया और आकाशवाणी के कार्यक्रम में ये मेरी पहली एंट्री थी। आकाशवाणी से 'उदयाचल' कार्यक्रम में सहभागी के रूप में मेरी आवाज पहली बार गूंजी...।

उसके बाद तो मैं आकाशवाणी परिवार की सदस्य बन गई। वहां के 'युववाणी' कार्यक्रम से जुडऩा, युववाणी के लिए वार्ताएं लिखना, 'गीतों भरी कहानी' लिखना और पेश करना, परिचर्चा में भाग लेना....यह सब हमारे लिए किसी बड़े आयोजन में हिस्सा लेने से कम नहीं था। किसी जादुई संसार में सैर करने से कम नहीं था।  तब 'युववाणी' में एक स्तंभ होता था, 'रजनीगंधा' ..जिसका ढांचा विविध भारती के छायागीत की तरह था, लेकिन वह सजीव करना पड़ता था, जबकि विविध भारती का छायागीत रिकॉर्डेड होता है। उस कार्यक्रम से मिले पहले चेक ने अगले दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैंपस की 'सैर' की। मेरी सारी सहेलियों ने अपनी हथेलियों पर चेक को फूलों की तरह बिठाया और उसे छू कर देखा। वह हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उन दिनों युववाणी के प्रोड्यूसर थे श्री महेंद्र मोदी,  उनकी निगरानी में पहली बार यह चुनौती मैंने स्वीकार की थी। एक प्रोग्राम के लिए आकाशवाणी का कई-कई बार चक्कर लगाना पड़ता था, पर यह हमें कभी बोझ नहीं बल्कि सुखद लगता था।  सोचते, चलो इसी बहाने आकाशवाणी जाने का मौका हमें मिल रहा है।

इलाहाबाद आकाशवाणी में किसान भाइयों के लिए कार्यक्रम करते थे श्री कैलाश गौतम। पहली बार उनसे मुलाकात आज भी ज़ेहन में ताज़ा है। उस रोज़ घर जाकर उनकी ढेर सारी कविताएं पढ़ी थीं। कुछ अपनी डायरी में नोट भी कीं। इतनी बेहतरीन कविताएं लिखने वाले कवि स्वभाव से एकदम सहज-सरल इंसान थे। आज भी जब उनकी कविताएं पढ़ती हूं तो उनका हंसमुख चेहरा, उनकी बातें, उनका मिलनसार व्यक्तित्व आंखों के सामने कौंध जाता है।

वो कड़की और बेहद संघर्ष के दिन थे। संगीत से बड़ा गहरा लगाव बचपन से ही था। नवीं से बारहवीं कक्षा तक शास्त्रीय गायन विषय के रूप में सीखा। ग्रेजुएशन के अन्य विषय और एम.ए. की पढ़ाई के दौरान संगीत पर विराम लग गया। तब मन उदासियों का बीहड़ जंगल बन गया था। मन की पुकार पर घरवालों को फरमान सुनाया कि अब मुझे विधिवत संगीत की तालीम लेनी है, तो मेरे बड़े भैया का तीव्र मध्यम स्वर गुंजायमान हुआ—'फीस के पैसे कहां से आएंगे'। इसका जवाब मेरी अथक मेहनत ने दिया। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाई और उन्हीं दिनों आकाशवाणी से आकस्मिक उद्घोषकों की भर्ती हो रही थी। सो जुट पड़ी आवाज तराशने और बोलने के लिए रियाज और परिमार्जन में। कैसेट रिकॉर्डर वाला टू-इन-वन घर में था। उसी कैसेट रिकॉर्डर पर अपनी आवाज रिकॉर्ड करते, सुनते, उसे बार-बार रिवाइंड-फॉरवर्ड करके सुनते और सुधार करते। कभी-भी अपनी आवाज या अपनी उद्घोषणा परफेक्ट नहीं लगती थी। हर बार उसमें कोई न कोई कमी नजर आती।

बहरहाल... इम्तिहान दिया। आकस्मिक उद्घोषिका के रूप में चयन हो गया और फिर संगीत सीखने के लिए गुरुजी को शुल्क देने का इंतजाम भी हो गया। इलाहाबाद आकाशवाणी मेरे बोलने,  आवाज़ को तराशने और उद्घोषणाओं की पाठशाला थी। वहां हिंदी नाटक के लिए ऑडीशन पास करना टेढ़ी खीर था। तैयारी के दौरान न जाने कितने नाटकों का वाचिक अभिनय किया। पूरी-पूरी दोपहरी अभ्यास में गुजार देते। फिर नाटक का ऑडिशन हुआ और नाटक में पास हो गए।  उसके बाद कुछ संस्कृत और हिंदी नाटकों में भाग लेने का मौका मिला। तब नाटक की रिकॉर्डिंग के लिए 2 दिन रिहर्सल होती थी। तीसरे दिन रिकॉर्डिंग होती थी। नाटक की वह रिकॉर्डिंग किसी उत्सव से कम नहीं लगती थी। पूरे-पूरे दिन बड़ी मशक्कत के बाद नाटक रिकॉर्ड किए जाते थे। और किसी के मुंह से उफ तक ना निकलती थी।

किशोरवय के उस पथरीले सफर में अचानक एक नया मोड़ आया और मेरी राहें इलाहाबाद की सड़कों से मुड़ कर महानगर यानी मुंबई के हाईवे से जुड़ गयीं। मेरे साथ थे मेरे भाई, मेरा हारमोनियम, छोटा-सा ट्रांजिस्टर और मेरा लेखन। ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच अपना अदना-सा क़द.....। जी चाहता फौरन वापस लौट जाऊँ। कई बार बड़ी विकलता से इलाहाबाद शहर वापस भी लौटे, लेकिन मुकद्दर ने विविध भारती के साथ नाता जोड़ दिया फिर तो मन जैसे सपनों के आकाश में उडऩे वाला पंछी बन गया। विविध भारती......रेडियो के मेरे जीवन की तिलिस्मी दुनिया। यह कभी सोचा नहीं था एक दिन रेडियो ही मेरे जीवन का मकसद बन इस कदर घुल मिल जाएगा कि वह मेरे अस्तित्व की पहचान बनेगा। इसी रेडियो के विविध भारती चैनल के जरिए सुर-साम्राज्ञी, सुर-सरिता लता मंगेशकर से बातचीत का मौका मिलेगा। वह गुलाबी नरम शाम थी, जब पहली बार फोन पर लता दीदी की आवाज सुनने का सौभाग्य मिला।

....दीदी मैं आपका इंटरव्यू लेना चाहती हूं

--आप क्या नया पूछेंगी, मुझसे सब कुछ तो पूछा जा चुका है। सब कुछ तो मैं इंटरव्यू में जमाने भर को बता चुकी हूं। .......मिश्री की डली-सी आवाज मेरे कानों में झंकृत हुई थी।

उनसे की गई यह चंद मिनटों की बात मेरे लिए सदी की बात बन गई.....बस थोड़े से मनुहार के बाद लता दीदी इंटरव्यू के लिए राजी हो गई। वह था उनसे पहला इंटरव्यू। उसके बाद उनसे कई बार बातचीत की, रिकॉर्डिंग का मौका मिला। रिकॉर्डिंग फोन पर हुई। पर कुछ बार अनौपचारिक बातचीत भी हुई। उनकी खिलखिलाहट, उनकी बातें मासूम बच्चे की सरल और तिलिस्मी लगती हैं।   ....उनकी बातें यूँ जैसे नदी में हौले-हौले बह रही हो कश्ती और कानों में गूंज रहा हो तराना....। उनकी बातचीत में उनके शिखर का कोई गुरूर नहीं झलकता।

गर्मियों के वे बोझिल दिन थे जब एम.ए. के इम्तिहान हो चुके थे। उमस भरी खाली दुपहरिया। विविध भारती के साथ या किताबों के साथ गुजरती। कूलर के तेज शोर में भी विविध भारती सुरों की पालकी पर सवार ध्वनि तरंगों के माध्यम से मद्धम मद्धम हमारे दिलों को, हमारे वजूद को सहलाते रहती। वह तनाव के दिन थे कि अब पढ़ाई खत्म.....नौकरी की तलाश शुरू.....।

छोटे शहरों में लड़कियों की पढ़ाई के बाद घरवालों पर विवाह का बोझ बढ़ जाता है कि बस अब जैसे-तैसे इसे दूजे घर भेजकर जिम्मेदारी से निवृत हुआ जाए। लेकिन हमारी आस्था विवाह में कतई नहीं थी, बल्कि किसी भी सूरत में रोजगार पाना मकसद था। उन सूनी वीरान दुपहरी में जब कुल्फी आइसक्रीम और काली जामुन वाले बांग देते हुए गली से गुजरते तो उस वक्त हमारा मन विचारों और नौकरी की चिंताओं के घने जंगल में तपते पेड़ की तरह धूप से चनमना रहा होता.....। ऐसे में विविध भारती से प्रसारित हो रहे 'एक फनकार', 'मनचाहे गीत', 'लोक संगीत', 'अनुरंजनी', 'रंग-तरंग'जैसे कार्यक्रम हमें नीम, आम और जामुन के पेड़ की तरह छांव देते। तब हमारे मन में यह ख्याल कभी नहीं आया कि एक दिन इन्हीं उद्घोषकों की तरह इसी घर नहीं.....इसी शहर नहीं....पूरे देश नहीं बल्कि विदेशों में भी गूंजेगी मेरी आवाज। इसी विविध भारती से मिलेगा सृष्टि का अलौकिक जादुई प्यार। अजनबियों के स्नेह के महासागर में गोते लगाऊंगी मैं।

इलाहाबाद में दीदी की शादी थी। उनकी विदाई का समय था। दीदी की आंखों में आंसू....मन में नए संसार के मखमली सपने... मां का आंचल बिछोह से भरा था... लाउडस्पीकर पर शारदा सिन्हा के गाए यह दो विदाई गीत बार-बार बज रहे थे...कहे तोसे सजना—फिल्म 'मैंने प्यार किया' और 'बाबुल का घर छोडऩा'। शारदा सिन्हा के विदाई गीत की पीड़ा में डूबा सुर....सबकी आंखें नम कर रहा था। बरसों बाद विविध भारती के स्टूडियो में शारदा सिन्हा.... जिनके गाए विदाई गीतों के साथ हम रोए थे, जिनके गाए छठ गीतों के साथ मुस्कुराए थे....वही गायिका मेरे सामने स्टूडियो में मेरे बेहद करीब बैठी थी। रोमांच से भर आया था मेरा मन।  आज के मेहमान कार्यक्रम की बड़ी नायाब रिकॉर्डिंग हुई। उन्होंने अपनी सहजता सरलता और स्नेह से पूरे विविध भारती परिवार का मन मोह लिया।

विविध भारती से जुड़ी अनगिनत यादें, अनगिनत घटनाएं हैं। वो धमनियों में बह रहे खून को जमा देने वाली राजस्थान की ठिठुरती सर्दी थी। जब रामगढ़, जैसलमेर और जोधपुर की यात्रा पर हम विविध भारती की टीम के साथ गए थे। उस बरस विविध भारती की 'स्वर्ण जयंती' मनाई गई थी। इसी मौके पर हमारी टीम बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल के फौजियों की विशेष रिकॉर्डिंग के लिए वहां पहुंची थी। उनसे इंटरव्यू करते हुए कई बार आंखें नम हुईं। कई बार माइक्रोफोन थामे हुए हाथ कांपे। कई बार हम स्तब्ध  हुए, निशब्द हुए कि कैसा निर्जन, कैसा विकट जीवन है इन फौजी साथियों का.....जिनकी सुरक्षा की छत्रछाया में हम बेलौस चैन की सांस लेते हैं। गजब का रोमांच हो रहा था जब रेगिस्तान की धूल भरे कच्चे दूर तक वीरान रास्तों से फौजियों की विशेष गाड़ी में सवार हम अपनी टीम के साथ रामगढ़ के उस सिरे तक पहुंचे थे, जहां आम जनता नहीं पहुंच सकती।

वहां एक तरफ हमारे अपने वतन की मिट्टी....तो उस पार पाकिस्तान की सीमा...भारत का तिरंगा सीना ताने शान से लहरा रहा था। भारत-पाकिस्तान की सीमा पर हम बेखौफ खड़े थे...उन एहसासात को अल्फाज़ में बयां करने जरा मुश्किल है..सचमुच हमारे रोंगटे खड़े हो गए थे, रोमांच से हुई सजल आंखों के कैमरे में उस दृश्य को कैद कर लिया था, जो आज भी मन में जीवंत है और हमें जोश से भर देता है। वहां जाकर पता चला कि फौजी साथियों की संगिनी और कोई नहीं सिर्फ विविध भारती है।

सूरज थक कर जब रेत के टीलों के पीछे छुपने जा रहा था, तब हम बड़े-बड़े बंकरों टैंकों और बंदूकों के बीच खड़े थे। युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली इन रोमांचक और खतरनाक सामग्रियों को निडर होकर छू रहे थे। और दूर कहीं फौजियों की छावनी से विविध भारती गूंज रही थी। सचमुच उस आह्लाद को शब्दों में कह पाना असंभव है। छावनी में जाकर फौजियों के बीच उनके अनुभव, उनकी आपबीती रिकॉर्ड कर हम खुद जैसे खजाना बन गए थे,  जो अनमोल धरोहर के रूप में विविध भारती के संग्रहालय में आज भी संग्रहीत है। वहां की गयी बहुत सारी रिकॉर्डिंग का प्रसारण  'सखी सहेली' और विशेष अन्य कार्यक्रमों में हुआ। फौजियों की पत्नियों की आत्मकथाएं, उनके अपने डर, साहस, हिम्मत.... फौजी साथियों की शहादत की खबरों के बाद का दृश्य....उनकी पीड़ा....उनका पारिवारिक जीवन....सब कुछ उनके शब्दों में हमारी टीम ने रिकॉर्ड किया। हमारी टीम में थे राकेश जोशी, यूनुस खान, अशोक जी, कमल जी, शकुंतला जी, कमलेश जी और रेडियो सखी ममता सिंह। इस टीम के कप्तान थे श्री महेंद्र मोदी।

अगले दिन तमाम रिकॉर्डिंग के बाद हम जैसलमेर के रेगिस्तान में थे। रेत पर सूरज की किरणें सोना बिखेर कर अठखेलियां कर रही थीं। हमारी आंखें चौंधिया रही थीं। वहीं ऊँटों की कतार में से एक-एक ऊंट पर हम सवार हो गए। रेत के ऊंचे-ऊंचे टीलों यानी सम तक पहुंचने के लिए।

एक ऊंट पर मैं और मेरे पति यानी साथी उद्घोषक यूनुस खान बैठे। पीछे के ऊंट पर प्रोड्यूसर कमलेश पाठक। ऊँट वाले के एक हाथ में डोर थी, दूसरे हाथ में ट्रांजिस्टर था। उस मरुस्थल में विविध भारती के सुर गूंज रहे थे। सुनकर हमारे भीतर से खुशी छलक छलक पड़ रही थी।

कमलेश जी ने ऊंट वाले से पूछा—'सखी सहेली सुनते हो क्या?....

--'हां जी सुनता हूं'

--'हम विविध भारती से ही आए हैं' कमलेश जी बोलीं। उसकी आंखें थोड़ी चौड़ी हुईं।

--'ममता सिंह को जानते हो'

--'हां, उनकी आवाज तो मैं रोज़ सुनता हूं। उनका हर प्रोग्राम सुनता हूं और बहुत पसंद करता हूं। मैं ही नहीं, मेरे घर वाले भी बड़े ध्यान से उन्हें सुनते हैं।Ó

--'वह देखो सामने वाले ऊंट पर ममता बैठी हैं'

बस फिर क्या था। ऊंट वाले ने उस ऊँट की डोर छोड़ दी.......और 'मैडम जी' 'मैडम जी' पुकारता हुआ मेरी ओर दौड़ा।

'अरे, अरे, मुझे छोड़कर कहां जा रहे हो, इस ऊँट ने गिरा दिया तो...' कमलेश जी इतनी जोर-से चिल्लाईं कि हम सब मुड़ कर देखने लगे।

इस वाकये का जिक्र करने का मकसद इतना भर था कि विविध भारती के प्रति लोगों की किस कदर दीवानगी है। पढ़ाई के दिनों में विविध भारती के हम भी कोई कम दीवाने नहीं थे। कांता गुप्ता और बृजभूषण साहनी की पत्रावली....उनके छायागीत....बिला नाग़ा सुनते थे। जब पहली बार पत्रावली से मेरा और मेरी बहन का पत्र प्रसारित हुआ था तो हम खुशी से बल्लियों उछल पड़े थे।

....हां तो बात चल रही थी विविध भारती के स्वर्ण जयंती के कार्यक्रम की। फौजियों की पत्नियों की रिकॉर्डिंग के दौरान कुछ ऐसे मार्मिक किस्से सुनने को मिले थे कि याद करके आज भी दिल दहल जाता है। उनके पतियों की शहादत की खबर मिलने जैसी मार्मिक घटनाएं इन सब को समेट कर कई फीचर बनाकर विविध भारती से प्रसारित किए गए थे। स्वर्ण जयंती की रिकॉर्डिंग आज भी मन के पन्ने पर साफ-साफ लिखी है। जब मन चाहे तो पढ़ लेती हूं।

विविध भारती के लिए लिए गए कुछ यादगार दिलचस्प इंटरव्यू हैं। अभिनेता नाना पाटेकर से बातचीत के दौरान मैं सवालों की झड़ी लगाए हुए थी। जवाब देते-देते अचानक वह खुद ही सवालों की गुगली डालने लगे। और मेरी ही पसंद का गाना पूछने लगे। मैं तो एकदम कॉन्शस हो गई। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। अमूमन होता भी नहीं कि किसी ने इंटरव्यू लेने वाले का ही इंटरव्यू ले लिया हो। लेकिन नाना पाटेकर ने थोड़ी देर तक मेरा इंटरव्यू ले डाला। याद करके आज भी बहुत हंसी आती है।

विविध भारती के अब तक के कामकाज में सबसे खास  दिन था जब विदुषी गिरिजा देवी विविध भारती के स्टूडियो में आई थीं। होठों पर बनारसी पान की लाली.....नाक में चमचमाती हीरे की लौंग। उनके सुरों के प्रकाश से पूरा स्टूडियो जगमगा गया था। उन दिनों संगीत सरिता की इंचार्ज थीं सह-केंद्र निदेशक रुपाली कुलकर्णी। उनके निर्देशन में संगीत सरिता की कई कडिय़ों की लंबी रिकॉर्डिंग हुई। उन दिनों विविध भारती के केंद्र निदेशक थे श्री राजेश रेड्डी....जो बड़े ही सहज और मिलनसार थे। उनके साथ काम का अनुभव बहुत ही उम्दा रहा है।

फिलहाल बात चल रही है अप्पाजी की। अप्पा जी, यानी विदुषी गिरिजा देवी ने ठुमरी, टप्पा, खयाल गायन की तमाम बारीकियां बताईं। उन्होंने गाया तो विविध भारती का स्टूडियो सुरों से भर गया। बनारसी शैली में वह बोलीं तो हम सब मंत्रमुग्ध हो गए। संगीत सरिता कार्यक्रम में बातचीत के दौरान जब मैंने उनके गुडिय़ों के शौक के बारे में भी पूछा....उस वक्त उनका चेहरा गजब खिल-खिल हो गया था। वो जैसे गुलाबी कली में तब्दील हो गईं हों।

आधी रिकॉर्डिंग के बाद अप्पा जी बोलीं—'बस अब बहुत होई गवा'। केत्ता गवइबो....? एत्ता काफी है...श्रोता लोगन बोर होई जइहै'...

--'अप्पा जी हमका लोगन के लिए ई त सिरफ बूंद है....तनी अउर गावैं.....तनिक बातचीत अउर चाही'

...रुपाली जी और हमारी इस तरह की चिरौरी के बाद तो वे खूब मूड में आ गईं....फिर तो संगीत सरिता की 12 कडिय़ों की श्रृंखला रेकॉर्ड हुई.....। हालाँकि वह रुपाली जी से ही पहले से परिचित थी और उन्हीं के आमंत्रण पर आई थीं पर हम सब से खूब घुल मिलकर स्नेहिल बातें की। वह पूरा दिन मेरे स्मृति पटल पर आज भी ताजा है।

रेडियो की दुनिया जितनी चमकीली और आसान लगती है,  दरअसल उतनी होती नहीं। कई बार लोग मजाक में कहते हैं—'अरे गाना बजाना भी कोई नौकरी है.....यह कोई काम है'। यह तो सिर्फ मनोरंजन है। जब हमारा मन घोर निराशा, उदासी, दर्द के बादलों से होकर गुजर रहा होता है, ठीक उसी वक्त हम हंसते-खिलखिलाते ध्वनि तरंगों पर सवार होकर औरों के दुखों पर फाहा लगा रहे होते हैं। अपनी सारी तकलीफें, सारे जज्बात स्टूडियो के बाहर फेंक कर ही माइक्रोफोन के सामने बैठते हैं। सफल उद्घोषक वही है जिसके निजी भावों की कोई श्रोता थाह ना पा सके।

कई बार ऐसा हुआ जब मेरा बच्चा जादू छोटा था,  सुबह की ड्यूटी होती थी। सुबह 5-30 बजे ऑफिस पहुंचना होता था। ऑफिस की गाड़ी अलसुबह आ जाती थी। अलार्म बजा नहीं कि जादू उठ कर बैठ जाता था। उसके गला फाड़ कर रोने की आवाज बिल्डिंग के कई फ्लोर तक जाती। बच्चों को पता हो कि मां जल्दी में है,  तो वह और ज्यादा ऊर्जा से रोते हैं। वह इतनी कसकर मुझसे चिपक जाता कि अलग करना मुश्किल होता। यूनुस जी उसे खींचकर अपने गोद में लेते और मैं झट से दरवाजे के बाहर.....। इतनी सुबह दुलराने- लाड़ करने का भी वक्त नहीं होता था। बस उसकी चीख़ मेरे कानों में गूंजती रहती.....। मेरी आंखों में उमड़े बादल बूंद-बूंद झरते रहते। लेकिन सजीव प्रसारण के दौरान कभी किसी श्रोता को एहसास नहीं हुआ होगा इस निजी अवसाद का। ऐसे लम्हों में प्रसारण के दौरान कभी जरा भी चूक हो जाए तो अपराध बोध से कई दिनों तक नींद गायब रहती है।

विविध भारती से जुड़ी एक बेहद रेशमी स्मृति है। आई आई टी के एक अनाम प्रोफेसर हैं, जो तकरीबन 16 बरस से पत्र लिख रहे हैं मुझे। मेरे छायागीत की तिलिस्मी तारीफ करते हैं। उनके एक-एक अल्फाज में प्रशंसा की नदी बहती है लेकिन आज तक ना उन्होंने कभी अपना नाम बताया,  ई-मेल भी नहीं। और फोन नंबर भी नहीं। ना ही कभी किसी तरह का संदेश भेजा। सिर्फ चिट्ठियां  भेजते हैं। वो भी ऑफिस के पते पर। उनकी चि_ी लिखने का अंदाज बड़ा ही दिलचस्प और मानीखेज होता है। जब कभी उनसे बात होगी मुलाकात होगी तो मैं जरूर उनका परिचय जानना चाहूंगी।

श्रोताओं के जिक्र पर यह बात बताना जरूरी है। श्रोता विविध भारती से अपना गहरा नाता जोड़ लेते हैं। जिसमें उनकी अपनी एक दुनिया होती है। बड़ी खुशी मिलती है जब हमें अपने घर की बेटी, बहू, बहन या दीदी की पदवी से वह पत्र लिखते हैं। ऐसा ही एक वाकया मैं साझा करना चाहूंगी। मेरे बेटे जादू का जन्म हुआ था और मैं लंबी छुट्टी के बाद जब दफ्तर लौटी तो संदेश मिला कि कवि प्रदीप की पत्नी भद्रा प्रदीप का कई बार तुम्हारे लिए फोन आया था। उनसे बात कर लेना वह सखी सहेली बड़े ध्यान से सुनती हैं और तुम्हारी बहुत बड़ी मुरीद हैं। मेरा उनसे कभी कोई संवाद या परिचय नहीं था।

कई बार नियति बड़ा अजीब बर्ताव करती है। मैंने आदरणीय भद्रा प्रदीप जी से बात करने के लिए उन्हें फोन किया तो पता चला वह इस फानी दुनिया से विदा ले चुकी हैं। आखिरी पलों में भी सखी सहेली कार्यक्रम और हम सब सखियों का जिक्र कर रही थीं। क्या कहूं....मुझे काटो तो खून नहीं। मैं फोन का रिसीवर हाथ में लिए बर्फ बन गई। आज तक इस बात का पछतावा है कि उनसे मेरी बात नहीं हो पाई। जो मुझे इतना ज्यादा स्नेह करती थीं। जिन्होंने मुझे देखा नहीं सिर्फ मेरी आवाज से उन्होंने मुझसे ऐसा गहरा नाता जोड़ लिया था।

विविध भारती के सखी सहेली कार्यक्रम के श्रोताओं ने स्नेह के जिस अनमोल सागर की लहरों से भिगोया है,  मैं सदा शुक्रगुजार रहूंगी। इसी तरह की एक और घटना यहां जोडऩा चाहूंगी। पटना के एक श्रोता ने अपने साजो-सामान के साथ विविध भारती के गेट पर आकर डेरा जमा लिया। सुरक्षा की दृष्टि से आम जनता को विविध भारती के परिसर में आने की मनाही होती है, सो सिक्युरिटी गार्ड ने मुझे बताया वह सज्जन हमसे मिलना चाहते हैं। मैंने उन्हें सादर बुलाया। सत्कार के साथ उनसे मेरी संक्षिप्त मुलाकात हुई। और वह गेट के बाहर चले गए। शाम हो गई....रात हो गई....और फिर सुबह....अगली दोपहर....और फिर शाम भी वहां से गए ही नहीं। गेट के पास के बस स्टॉप पर रेडियो कान में लगाए कई दिनों तक वे महानुभाव विराजमान रहे। इस बीच उनकी बस एक ही रट थी कि ममता जी से मेरी शादी पक्की हो चुकी है। मैं तो उन्हें यहां से ले जाने आया हूं। मैं उन्हें बेइंतिहा प्यार करता हूं। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें समझाया ममता जी शादीशुदा हैं। आप यह बहकी-बहकी बातें ना करें। यहां से जाएं। पर वह सुधि श्रोता कहां मानने वाले। शुरू में तो इस बात पर मुझे बड़ी हंसी आती थी लेकिन जब वह महाशय महीनों वहीं अटल रहे, अडिग रहे, बीच में एकाध दिन के लिए वे ग़ायब होते और फिर प्रकट हो जाते। फिर से वही रट कि मैं तो ममता जी से शादी करूंगा तो फिर यह असुविधा मेरे लिए मुसीबत बन गई थी। बड़ी मुश्किल से उनसे छुटकारा मिला था।

विविध भारती के संग्रहालय में अनमोल रिकॉर्डिंग्स का खजाना है। मेरे मन में  जिए हुए पलों की असंख्य स्मृतियों का खजाना है। एक परिवार की तरह है विविध भारती जहां कुछ कार्यक्रम अधिशासी, उद्घोषक, एडमिन स्टाफ और केंद्र निदेशक ....सब एक दूसरे से परिवार की तरह अपने सुख-दुख साझा करते हैं। हंसी ठिठोली के साथ तल्खियां भी होती हैं... लेकिन उन्हें नजरअंदाज़ कर दिया जाता है।

विविध भारती जॉइन करने के शुरुआती दौर में एक बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम प्रसारित होता था—'आपके अनुरोध पर'...जिसे मैं और यूनुस खान साथ प्रस्तुत करते थे। टेलीफोन पर देश भर के श्रोता इस कार्यक्रम में अपने मन की बातें साझा करते थे और साथ में अपनी पसंद के गाने की फरमाइश करते थे। पहले इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग होती थी, बाद में एडिटिंग और मिक्सिंग। मैं और यूनुस जी मिलकर इसकी रिकॉर्डिंग-एडिटिंग-मिक्सिंग किया करते थे। इसके प्रोड्यूसर महेश केलुस्कर थे। इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के बाद हम एक दूसरे से अपने मन की बातें और जज्बात साझा करते। कई बरस बाद वह कार्यक्रम तो बंद हो गया लेकिन मेरे और यूनुस जी के मन के दरवाजे बंद नहीं हुए। हमने जीवन भर के लिए एक दूसरे का हाथ थाम लिया। इस तरह विविध भारती ने हमें बहुत कुछ दिया है। यहां तक कि अपना जीवनसाथी भी।

जब-जब सजती है छायागीत की महफिल। जब अपने कहानीकार पक्ष को कार्यक्रमों में उड़ेलती हूं.... जब मेरे भीतर की भावनाओं का पाखी आसमान में कुलांचें भरता है तो इन कार्यक्रमों से और ज्यादा मोहब्बत कर बैठती हूं। कार्यक्रम चाहे एसएमएस के बहाने वी.बी.एस के तराने हो, मनचाहे गीत हो, सखी सहेली हो, आज के फनकार हो, त्रिवेणी या फिर मेरा प्रिय कार्यक्रम छायागीत.....जब भी पेश करती हूं तो मैं दूसरी ही दुनिया में विचरती हूं। विविध भारती हमारे लिए एक प्रोफेशन ही नहीं बल्कि घर के एक सदस्य की तरह है जो हमारे ग़मज़दा पलों में फाहा बन जाती है, ख़ुशी के पलों में मिश्री की डली बन जाती है।