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Saturday 20 Oct 2018

ये आकाशवाणी है

बात बीते दिनों की है, जब मैंने अपनी पहली तनख्वाह से जबलपुर के अन्धेरदेव की किसी दुकान से दो बैण्ड वाला मरफी का ट्रांजिस्टर खरीदा था। उस समय में प्रसारित होने वाले अन्य कार्यक्रमों के अलावा मुझे समाचार सुनना भी रुचिकर लगता था। समाचार सुनने का शौक आज भी बरकरार है। समाचारों से अवगत होना, माने अपने आपको अपडेट रखना होता है। सुबह के आठ बजने से एकाध मिनट पहले उद्घोषणा होती है कि आप थोड़ी देर में समाचार सुनिए, फिर एक बीप सुनाई देती है, इस बीप के माने हंै कि देश के सभी रेडियो स्टेशन आपस में जुडऩे जा रहे है। जैसे ही सभी स्टेशन आपस में जुड़ जाते, उद्घोषक कहता है, ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए। समाचार वाचक की खनकदार आवाज सुनकर आपका सारा ध्यान रेडियो पर केन्द्रित हो जाता है और आप पन्द्रह मिनट में देश-दुनिया के सभी समाचारों से अवगत हो जाते। जबकि इन्हीं समाचारों को जानने के लिए आपको अखबार के पन्ने पलटने पड़ते हैं। जरुरी नहीं कि अखबार में प्रकाशित होने वाली खबरें एकदम ताजा ही हों। दरअसल अखबारों में प्रकाशित खबरें, बीती रात तक की खबरें होती हैं। जबकि रेडियो में प्रसारित होने वाली खबरें एकदम ताजातरीन और ज्यादा विश्वसनीय भी। अखबार पढऩे की प्रक्रिया में आपको अपना सारा ध्यान अखबार पर केन्द्रित करना होता है, जबकि रेडियो सुनने में ये सब आपको करने की जरुरत नहीं होती। दैनंदिन कार्यों को करते हुए भी आप समाचारों को सुन सकते हैं।

कल्पना कीजिए उन बीते दिनों की, जब न तो रेडियो का आविष्कार हुआ था और न ही समाचार-पत्रों का प्रकाशन होता था।  उस समय आदमी, अपना वक्त कैसे गुजारता रहा होगा? अब कल्पना कीजिए,  उस बेहद चमकीले क्षण की, जब आदमी ने पहली-पहल बार रेडियो पर संदेश प्राप्त किया होगा। कितना खुश हुआ होगा आदमी! कितना आह्लादकारी दिन रहा होगा वह उसके लिए! रेडियो का आना माने उसकी जिन्दगी में जैसे बहार का आना हुआ।

कहते हैं न! आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। रेडियो के विकास की कहानी अभी लिखी जानी बाकी थी। प्रयोग पर प्रयोग चल रहे थे। प्रक्रिया आविष्कार से होकर गुजर रही थी। सैम्यूल एड बी मोर्स ने आखिर वह चमत्कार कर दिखाया और उसने मोर्स की से सुदूर बैठे लोगों तक बिना तार से जुड़े यंत्र से संदेशा भेजकर दुनिया में तहलका मचा दिया।

इस क्रम को आगे बढ़ाने के लिए मार्कोनी आए। 1895 के अंत में उन्होंने 1.5 मील (2.4 किमी) के लिए रेडियो संकेत को सरलता से संचारित कर दिखाया। रेडियो शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के एक शब्द रेडिंयस से हुई है। रेडिंयस का अर्थ होता है, एक संकीर्ण किरण या प्रकाश-पुंज, जो आकाश में इलैक्ट्रो मैगनेट तरंगों द्वारा फैलती है। ये विद्युत तरंगें संकेतों के रूप में सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का काम करती है। पहली बार जर्मन भौतिक शास्त्री हेनरिच हट्र्स ने 1886 में रेडियो तरंगो का सरल प्रदर्शन किया। इसके बाद इटली के गुगलियो ने रेडियो तरंगों के जरिए सरल संचार करने में सफलता प्राप्त की थी।

भारत में पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ विभाग ने सन 1923 में मुंबई से संगीत कार्यक्रम का प्रसारण किया। इसके बाद भारत सहित अनेक देश जैसे कनाडा, ब्राजील, फ्रांस, इटली आदि में प्रसारण को बढ़ावा मिला और विश्व भर में सैकड़ों प्रसारण केन्द्रों की स्थापना की गई। ब्रिटिश राज के दौरान नवम्बर 1923 में रेडियो क्लब आफ बंगाल, 1924 में बंबई प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब और मद्रास सहित अन्य रेडियो क्लब द्वारा प्रसारण शुरु हुआ।  23  जुलाई 1927 को इंडियन ब्राडकास्टिंग कम्पनी लि. को दो रेडियो स्टेशन संचारित करने के लिए अधिकृत किया गया। प्रसारण का दायरा बढ़ाने के लिए उद्योग और श्रम विभाग ने इसका नाम इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस (भारतीय राज्य प्रसारण सेवाएं) कर दिया। 1934 में सरकार ने दिल्ली में रेडियो स्टेशन की स्थापना की स्वीकृति प्रदान की। 8  जून 1936 को आईएसबीएस का नाम बदलकर आल इंडिया रेडियो रखा गया। इसी वर्ष दिल्ली केन्द्र से प्रसारण शुरु हुआ।

 भारत में पहली बार रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुंबई और कलकत्ता में सन 1927 में हुई थी। 1930 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा रखा गया था। सन 1957 में इस नाम को बदलकर आकाशवाणी रखा गया। कई भाषाओं में तथा विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत आकाशवाणी आज जन-जन की वाणी बन चुकी है। विविध भारती, आकाशवाणी की सबसे लोकप्रिय सेवा है। इसे विज्ञान प्रसारण सेवा भी कहा जाता है। आकाशवाणी का प्रमुख उद्देश्य लोककल्याण ही है। अत: इसका ध्येय वाक्य प्रचलन में आया बहुजनसुखाय-बहुजनहिताय, आज वह इसी प्रमुख ध्येय को लेकर चल रहा है।     

विविध-भारती

विविध भारती रेडियो चैनल आकाशवाणी की सबसे लोकप्रिय और सर्वाधिक सुनी जाने वाली प्रमुख प्रसारण सेवा है। इसकी शुरुआत 3 अक्टूबर 1957 को की गई थी।  इसकी स्थापना के पीछे बड़ा ही दिलचस्प वाक्या है। उस समय रेडियो सिलोन का बोलबाला था। एक से बढ़कर एक गीत इस चैनल के माध्यम से प्रसारित हो रहे थे। अमीन सयानी की खनकदार आवाज और गीत प्रस्तुत करने के कौशल से यह चैनल सर्वाधिक सुने जाने वाला चैनल बन गया था। यह वह समय था जब भारतीय कम्पनियां अपने उत्पाद की बिक्री के लिए रेडियो का सहारा ले रही थीं। इस तरह देश का पैसा बाहर जाने लगा था। अपना पैसा किस तरह बचाया जाय, इस परिकल्पना को साकार करने के लिए पंडित नरेन्द्र शर्मा जी को फिल्मी लेखन के लिए बतौर एक अधिकारी बुलाया, तब उन्होंने अंग्रेजी के शब्द मिस्लेनियस को एक नया हिन्दी शन्द दिया विविध, इसी विविध को भारती से जोड़कर एक नया शब्द बना विविध-भारती, जो अत्यन्त ही लोकप्रिय हुआ। इसकी स्थापना के पीछे एक दूसरी वजह यह भी थी और वह यह कि भारत सरकार का ऐसा सोचना था कि फिल्मी गीतों को सुनकर लोग बिगडऩे लगे हैं। फिल्मी गीतों पर प्रतिबंध लगाने के बाद केवल इस चैनल पर सुगम संगीत ही प्रसारित किया जा रहा था। हालांकि इस अभिमत का कोई ठोस कारण नहीं था। यह मात्र कोरी कल्पना थी, जो बाद में निर्मूल साबित हुई।

विविध-भारती की स्थापना के पीछे केशव पांडेय, नरेन्द्र शर्मा, गोपालदास  और गिरिजा कुमार माथुर को कैसे विस्मृत किया जा सकता है। विविध-भारती, आकाशवाणी की शुद्ध रुप से अखिल भारतीय मनोरंजन सेवा, थी। वहीं आकाशवाणी के पंचरंगी कार्यक्रम का अर्थ था, पांच कलाओं का समावेश होना। 3 अक्टूबर 1957 को विविध-भारती का आगाज शील कुमार शर्मा की आवाज में हुआ था। यह विविध भारती है, आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम, लोगों की जुबान पर चढ़ चुका था।

विविध-भारती पर मुख्यत: हिन्दी फिल्मी गीत सुनाये जाते हैं, इसके अलावा वार्ता, रेडियो वृत्तांत, नाटक, संगीत, साहित्य भारती, संस्कृत भारती, चित्र भारती, विज्ञान भारती, युवा भारती सहित अंग्रेजी में हर महिने के चौथे शुक्रवार को रात्रि के 10ण्00 बजे राजधानी दिल्ली के राजधानी चैनल से प्रसारित किया जाता है, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, महिलाओं के कार्यक्रम, बच्चों के कार्यक्रम सहित कृषि के विभिन्न पहलुओं पर भी इसमें व्यापक चर्चाएं प्रसारित होती हैं।

 हमारे देश में तकनीकी रूप में तीन तरह के रेडियो प्रसारण काम करते हैं। मीडियम वेव, शार्ट वेव और एफएम । इनके प्रसारण की फ्रीक्वेंसी भी अलग-अलग होती है।

एफएम रेडियो.                                                

यह एक प्रकार का रेडियो प्रसारण ही है, जिसमें केरियर की आवृत्ति को प्रसारण ध्वनि के अनुसार माड्यूलेट किया जाता है। इस प्रक्रिया को आवृत्ति माड्यूलेशन या आवृत्ति माड्यूलन कहते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा माड्यूलन कर जब रेडियो प्रसारण होता है, उसे एफएम प्रसारण कहते हैं। इस वाहक का आयाम स्थिर बना रहता है और गुणवत्ता अधिक होती है। इसी कारण आजकल एफएम के प्रसारण लोकप्रिय हो रहे हैं। आज रेडियो सुनना इतना आसान और सुलभ हो गया है कि मोबाइल सेट में भी आप रेडियो सुन सकते हैं। जिस प्रकार रेडियो के हार्डवेअर में परिवर्तन हुए हैं उसी प्रकार साफ्टवेअर में भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। रेडियो और अधिक जन-उपयोगी होता जा रहा है। इसके कारण रेडियो की स्वीकार्यता और मांग दोनों बढ़ गई है। कई चैनलों की भरमार हो गई है और इसी के अनुरुप केन्द्रों की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है। इनकी बढ़ती उपयोगिता के चलते ही सामुदायिक रेडियो, सेटेलाइट रेडियो, डिजिटल रेडियो तथा इंटरनेट रेडियो आदि प्रचलन में आए।

भारत की आबादी के लगभग चालीस प्रतिशत के पास ही इंटरनेट की सुविधा है। लेकिन वह हर जगह सही काम नहीं कर पाता। फिर गाँवों और कस्बों में बिजली की समस्या है। लेकिन बैटरी से चलने वाला ट्रांजिस्टर रेडियो हर जगह और हर वक्त चल सकता है। दूरदर्शन के डीडी भारती चैनल को छोड़कर किसी अन्य टीव्ही चैनल पर संगीत, विज्ञान, कृषि या साहित्य से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया जाता। इसलिए हर संगीत प्रेमी के लिए और विविध जानकारी प्राप्त करने के लिए आकाशवाणी से बेहतर और कोई सेवा हो ही नहीं सकती है।

सबसे आसान, सबसे विश्वसनीय और कम खर्चे पर सुना जाने वाला संचार का अगर कोई माध्यम है तो वह रेडियो ही है, जहां श्रोताओं का बहुत बड़ा वर्ग इससे जुड़ा हुआ है।

कुछ स्मरणीय बातें

आकाशवाणी की लोकप्रियता को चार चांद लगाने में साहित्यकारों का भी बड़ा योगदान रहा है। स्व. भगवती चरण वर्मा, पंडित प्रेम बरेलवी, रघुवीर सहाय, रमई काका, अमृतलाल नागर, भवानी प्रसाद मिश्र, जगदीश चन्द्र माथुर, बालकृष्ण राव, भारतभूषण अग्रवाल, विष्णु प्रभाकर, सुमित्रा नन्दन पंत, कमलेश्वर, आदि के नामों को कैसे विस्मृत किया जा सकता हैण्

विविध भारती के आगाज के वक्त सबसे पहले नाच रे मयूरा खोल कर सहस्न नयन, देख सघन गगन-मगन, देख सरस स्वप्न जो कि आज हुआ पूरा गाना सबसे पहले बजाया गया था। इसे इस अवसर के लिए विशेष रूप से पंडित नरेंद्र शर्मा ने लिखा था और अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में मन्ना डे ने गाया था।

एक मनोरंजन रेडियो चैनल के रूप में विविध भारती ने न केवल मुस्तैदी से अपनी भूमिका निभाई, बल्कि साहित्य, शास्त्रीय संगीत, नाटक, सिनेमा और फिल्म संगीत से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण बातों का दस्तावेजीकरण भी किया गया है।सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन जी से लेकर आज के जमाने के कवियों तक। उर्दू अदब में अली सरदार जाफरी, इस्मत चुगताई से लेकर शहरयार तक, शास्त्रीय संगीत में पंडित डीवी पलुस्कर और भीमसेन जोशी से लेकर आज के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों तक। इसी तरह सिनेमा में अशोक कुमार और लीला नायडू से लेकर शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा तक सभी नामी हस्तियों की आवाजें विविध भारती के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।संगीत के दीवानों को विविध भारती पर ही नौशाद से लेकर ओपी नैयर, शंकर जयकिशन, सी रामचंद्र, रोशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, इतने नाम हैं जिन्हें गिनाते-गिनाते थक जाएं।

इन सभी के साक्षात्कार विविध भारती से ही सुनने को मिले हैं। कौन से गाने कैसे बने, रिकॉर्डिंग के समय कौन-कौन सी घटनाएं हुईं। कौन से राग पर बने, शूटिंग के दौरान का किस्सा क्या है, समझ लीजिए कि विविध भारती ने आधी सदी से ज्यादा वक्त में बड़ी लगन के साथ एक ध्वनि-महाग्रंथ तैयार किया है

रेडियो जगत के लिए यह गौरव का विषय था जब युनेस्को ने अपनी 36 वीं महासभा में, रेडियो कैसे हमारे जीवन को एक नया आयाम देने में मददगार हो सकता है इस परिकल्पना के साथ वर्ष 2011 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। पहली बार विश्व रेडियो दिवस आधिकारिक रूप में वर्ष 2012 में मनाया गया। 13 फरवरी युनेस्को के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र के पहले रेडियो स्टेशन की स्थापना का दिन भी यही था। तब से युनेस्को प्रतिवर्ष संगठनों और समुदायों के साथ मिलकर विभिन्न गतिविधियों द्वारा विश्व रेडियो दिवस मनाता है। रेडियो दिवस पर एक विषय का निर्धारण होता हैण्। इस वर्ष रेडियो और खेल विषय के अन्तर्गत आयोजन किए जायेंगे। इसमें पारंपरिक और जमीनी स्तर पर खेलों की विविधता बढ़ाने और खेलों से लोगों को जोडऩा जैसे उद्देश्य शामिल हैं, साथ ही खेलों के माध्यम से विश्व-शांति और विकास के पहलुओं पर फोकस करना भी इस विषय का उद्देश्य है।

हम इस बात को गर्व के साथ कह सकते हैं कि रेडियो शुरु से ही जीवन के अनेकानेक क्षेत्रों में हमारे लिए उपयोगी और लाभकारी रहा है तथा सभ्यता-संस्कृति तथा ज्ञान-विज्ञान और कलाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हुए समाज के लिए वरदान साबित हुआ है।