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Monday 18 Nov 2019

जीव-जगत की सच्चाइयों से रू-ब-रू कराते कुछ अल्प विराम

सच्चिदानंद जोशी का सद्य: प्रकाशित गद्य संग्रह 'कुछ अल्प विराम' पढऩे के बाद सहसा प्रश्न उठता है कि उक्त संग्रह को साहित्य की किस विधा में समाहित किया जाये-वैसे इस गद्य संग्रह को साहित्य की किसी विधा या फ्रेम में बांधने की आवश्यकता नहीं है। मेरी दृष्टि में यह स्वच्छंद गद्य की परिधि में यात्रा वृत्तांत और संस्मरण का सम्मिलित स्वरूप है, जिसमें लेखक छोटी-छोटी अनुभूतियों के माध्यम से कई बार स्वयं से प्रश्न-प्रतिप्रश्न करता दिखाई देता है। इस संग्रह की रचनाओं में जीव-जगत की सच्चाइयों से रू-ब-रू होकर लेखक पाठक के मन में कई ऐसे प्रश्न छोड़ जाता है जिन पर चिंतन करने के बाद लगता है कि लेखक संवेदनशील है। लेखन में संवेदना का होना उतना ही जरूरी है जितना कि शरीर में चेतना का। संवेदना के बिना लेखक आधा अधूरा सा निष्प्राण लगता है। सच्चिदानंद ने अपने आत्मानुभव से इन छोटे-छोटे संस्मरणों में समय की नींद अथवा तन्द्रा को तोडऩे का काम तो किया ही है-कभी-कभी ये छोटी-छोटी रचनायें हमें जगाने का काम भी बखूबी करती है और जीवन का एक बड़ा सबक देकर हमें बताती हैं कि जिन्दगी जीने का तरीका क्या होना चाहिए? सीधी-साधी आम फहम भाषा में सच्चिदानंद जी के ये संस्मरणात्मक आलेख भले ही 'देखन में छोटे लगें पर घाव बहुत गंभीर कर जाते हैं- सतसईया के दोहरे की तरह। चिंतन और कहन के स्तर पर ये अल्प विराम हमें कुछ रुकने को-सोचने को मजबूर करते हैं, फिर वहीं से आगे बढऩे के लिए प्रेरित भी। ये अल्प विराम प्रत्येक के जीवन में हैं और हम इनसे क्षण-प्रतिक्षण रू-ब-रू भी होते हैं, लेकिन 'सब चलता है' के दौर में हमें इन्हें नजरंदाज कर आगे बढ़ जाते हैं। लेखक इसमें आगे नहीं बढ़ता है-रुकता है-सोचता है-चिंतन करता है और फिर प्रश्न करता है-संतुष्टि की स्थिति तक। इस संग्रह की रचनाओं का पैनापन हमें सोचने को बाध्य करता है झकझोरता भी है। कहीं कहीं जीवन के ऐसे दस्तावेज भी हमारे सामने खोलकर रखता है कि हमें स्वयं पर आत्मग्लानि होने लगती है। आत्ममुग्धता के इस परिवेश में लेखक के अल्प विराम जीवन में संजीदगी के साथ-साथ एक सोच भी विकसित करते हंै जिनसे जीवन में एक नई स्फूर्ति और शिक्षा भी मिलती है। इन रचनाओं में संगीत की तरह एक लय है, ताल है और महीन से महीन मुरकियां भी हैं जिनसे घटनाक्रम उस दिशा में स्वत: मुड़ जाता है जिसे हम अर्थहीन समझकर नजरंदाज कर जाते हैं। सच्चिदानंद जी का यही अंदाज इस संग्रह की खूबसूरती भी है और वैशिष्ट्य भी।

'अपने-अपने बाज बहादुर' में नन्हें बच्चों द्वारा माण्डू का दिल्ली दरवाजा दिखाना उतना महत्वपूर्ण नहीं लगता जितना कि उन बच्चों का प्लेजर ट्रिप के नाम पर फैंकी गई कांच की बोतलों के टुकड़े बीनना। हमारे सभ्य समाज के पर्यटकों द्वारा फेंकी हुई बोतलों के टुकड़े जंगल से देर शाम लौटती हुई किसी बीननहारी के पांव में न लग जाए नन्हें से बालक का यह दृष्टिकोण यह बताता है कि वह उम्र के इस दौर में भी पर पीड़ा से कितने वाकिफ है। निर्धन समाज के बालकों का यह सोच श्रेष्ठि वर्ग पर न केवल पैना प्रहार करता है वरन हमें सोचने को बाध्य भी करता है। 'बालश्रम' पर व्याख्यान देने को तत्पर लेखक उस छोटी सी बच्ची की अर्धरात्रि में मदद करने में स्वयं को असमर्थ पाता है तो स्वयं को धिक्कारता भी है। वहीं 'भाई-दूज' संस्मरण में लेखक यह इंगित करना नहीं भूलता कि संतति कितनी भी गलतियां करे पर मां-बाप का दिल उनके लिए पसीजता रहता है। 'भ्रूण हत्या' में उस मर्म को प्रतिस्थापित किया गया है जिसमें पुत्र की चाहत है वहीं 'छोटी सी आशा' में एक बच्ची के माध्यम से गरीब बच्चों की पुस्तकों हेतु जन्मदिन मनाने के लिए दिये गये पैसे दान करने की कथा है जिसमें भविष्य की पीढ़ी से आशा के स्वर सुनाई देने का संकेत है। 'लेन-देन' में घर की सहायिका द्वारा मेम साहब को ब्रांडेड साड़ी उपहार देकर लेन-देन में फर्क करने वाली घर मालकिन को शर्म के साथ सोचने को विवश कर देने का तेवर है-और यह संकेत भी किया है छोटा आदमी दिल का कितना उदार होता है। संग्रह में हवाई यात्रा जैसे यात्रा वृत्तांत भी हैं तो पांडिचेरी और पूर्वोत्तर जैसी यात्राओं में ड्रायवरों के नाजुक और भावुक संवाद भी हैं। 'किराये के महापुरुष' में हल्का सा व्यंग है तो 'लेडी श्रवणकुमार' में सास बहू का चित्रण रोचकता के साथ घर-घर की कहानी बयां करता है। 'नीयत' में एक कुली की र्ईमानदारी है तो विदेशों में हिन्दी के अनुभव में लेखक अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति सजग और सावधान भी है। 'स्वतंत्रता दिवस' पर दिल्ली के चौराहों पर झण्डे बेचने वाले शिशुओं के अन्तर्मन की व्यथा और वेदना को शब्द देकर लेखक द्वारा स्वयं से किए गए प्रश्न मन को झकझोर देने वाले हैं।

इस संग्रह में तात्कालिक यथार्थ के महीन से महीन रेशे से ताना-बाना बुन लेखक अपके लेखकीय कर्म का निर्वाह समग्रता की अन्तरदृष्टि से करता है। सामाजिक जीवन के सरोकारों की पड़ताल जिस शिद्दत से इन संस्मरणों/बोधकथाओं के माध्यम से लेखक ने की है वह श्रेष्ठता की परिधि को संस्पर्श करने के लिए पर्याप्त है और हमारे समय के तमाम प्रश्नों से दो-दो हाथ करने की अकुलाहट भी इन अल्प विरामों में संजीदगी से दिखाई देती है।

इन रचनाओं के अंर्तस्रोत हृदय की अतल गहराइयों से नि:सृत हुए हैं इसलिए ये अल्प विराम मन को छूते भी हैं गुदगुदाते भी हैं और प्रश्न के साथ प्रति प्रश्न भी करते हैं। आज के दौर की सच्चाई से बावस्ता होने के लिये इन रचनाओं में अंर्तव्याप्ति की दृष्टि है। ये अल्प विराम सचमुच के 'अल्प विराम' हैं जहां थोड़ा समझकर जीवन की गहराई और यथार्थ बोध से परिचित हुआ जा सकता है। भाषा और कथ्य के स्तर पर किशोर मन से वय: संधि के प्रस्थान यात्रा काल में ये अल्प विराम बालकों के मन पर  प्रस्थापित होकर निश्चित ही 'उद्धरण चिन्ह' बन सकेंगे-ऐसा मेरा विश्वाास है।