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Wednesday 13 Nov 2019

भूमंडलीकरण व बाज़ारवाद की खबर लेते हुए..

मुक्तिबोध की पंक्तियों में यदि बात शुरू की जाए तो -

'शून्य में मन के/ टीन छत पर गर्म,/ हर पल चीखता हूं,

शोर करता हूं कि/ वैसी चीखती कविता,/ बनाने में लजाता हूं।'

कविता समाज में आवेगपूर्ण भावात्मक स्थिति को व्यक्त करने का ज़रिया है। गहन विचारशील कवियों ने शताब्दियों तक अपनी अहमियत को बनाए रखा, समाज को आंदोलित किया। कविता के दायित्वबोध ने ही डॉ श्यामबाबू शर्मा को 'नई शती और हिंदी कविता' नामक पुस्तक रचने की प्रेरणा दी। बात हो रही थी, उस रोज़ शर्मा जी से, बताया उन्होंने कि इस पुस्तक में संकलित लेखों की प्रेरणा वे विसंगतियां हैं जो आज के पाश्चात्य जगत से प्राप्त 'डेबिटेड कल्चर' से उभरी हैं। लेखक के रूप में आप अपने पारिपाश्र्विक समाज की अस्थिरता के प्रति चिंतातुर हैं। पुस्तक के लेख आपकी इसी चिंता, समझ व सोच को बयान करते हैं।

स्वयं लोकजीवन को अपनी सृजनात्मक यात्रा का संबल बनाने वाले शर्मा जी कविता के प्रति अत्यंत जागरूक हैं। कविता को अपने समय की उपज मानने के कारण उक्त पुस्तक में आपने हिंदी के कई महत्वपूर्ण कवियों जैसे अज्ञेय, भवानीप्रसाद मिश्र, भगवत रावत की कविताओं पर विचारों को केंद्रित किया है। दूसरी ओर स्त्री चिंतन को अपनी कलम की चिंता बनाने वाली नीलेश रघुवंशी, अनामिका, निर्मला पुतुल, सविता सिंह, कात्यायिनी आदि की जनचेतना की अभिव्यक्ति को परत-दर-परत समझा, परखा और उस पर लिखा। व्यक्ति स्वातंत्र्य के हिमायती अज्ञेय की कविताओं में विचार व जीवन के स्तर पर तमाम संकीर्णताओं को तोडऩे के प्रयास पर विचार व्यक्त किए गए। इसी प्रकार वर्तमान समय के पाखंड, क्रूरता व हिंसा के विरुद्ध कमर कसकर खड़े होने की प्रेरणा देने वाली भवानीप्रसाद मिश्र की कविताओं के ज़मीनी सच को परखा गया। वैश्वीकरण, फैशन, सांप्रदायिकता की चपेट में दम तोड़ती मानवीय अस्मिता के विषय में मिश्र जी की कविताओं में संवेदना है। शर्मा जी के शब्दों में ''कवि की मसि गरीब, असहाय, लाचार, शोषित, हाशिएकृत दोपाये मानव की आंखों का पानी लेकर उतरी है और आपका स्वर बेचारों की वाणी का स्वर है।' (पृ-58)

शर्मा जी कवि व कविता की अंतरात्मा की गूंज व तड़प को महसूस करते हैं। उक्त कृति में आपने आलोच्य रचनाकारों की उन मंशाओं को खंगाला है जो बेहतर भारतीय समाज के स्तंभ बनना चाहती रहीं। भगवत रावत की कविता को आपने समय से मुठभेड़ करते हुए पाया है। सच ही तो है! कविता समय की अनैतिकता से पलायन नहीं करती। वह आक्रमणकारी पाश्चात्य संस्कृति के समक्ष घुटने नहीं टेकती। भगवत रावत के भीतर वह कवि बसता है जो ग्लोबल दुनिया का अंधानुकरण करने वाली महानगरीय जीवन-प्रणाली में आ रहे अमानवीय व हिंसक बदलाव को अनदेखा नहीं करता। साथ ही उनके द्वारा कलमबद्ध देश एक राग है, अम्मा से बातें और कुछ लंबी कविताएं में भूमंडलीकरण की प्रचंड आंधी के सर्वग्रासी झोंकों को शर्मा जी ने निष्ठापूर्वक चिंतन के साथ बयान किया है।

शर्मा जी की उक्त कृति में भूमंडलीकरण के बड़वानल के प्रति चरम असंतोष अध्याय दर अध्याय व्यक्त हुआ है परंतु चिली के प्रख्यात कवि पाब्लो नेरूदा की कविताओं को सही अर्थों में आपने ग्लोबल या वैश्विक प्रभाव की कविता करार दिया है। भौगोलिक हदबंदी को तोड़ते हुए नेरूदा ने विश्व के चप्पे-चप्पे में बसे किसान, जुलाहे व श्रमिक की झुलस व ताप को अपनी कविता की चिंतना के केंद्र में रखा है। शर्मा जी यों लिखते हैं, ''नेरूदा ड्राइंग रूम के कवि नहीं थे। वे फैक्ट्री और चौपाल के कवि थे। प्रकृति की दुनिया में मानवीय हस्तक्षेप के कवि नेरूदा को गेहंू और रोटी का कवि कहा गया।'' (पृ-69)  आम आदमी की रोटी की चिंता को वैश्वीकरण के दलालों ने सौदेबाज़ी का ज़रिया बनाया। तभी तो लोकग्रासी भूमंडलीकरण: कविता के सरोकार में शर्मा जी ने चंद्रकांत देवताले कृत उनके सपने, हरजेंद्र चौधरी की जैसे चांद पर से दीखती धरती, ऋतुराज रचित आशानाम नदी, मदन कश्यप की नीम रोशनी में, मनोज मेहता रचित सुलगा हुआ राग आदि पर मनन करते हुए भारतीय समाज के हाथ से छूट रहे लोकजीवन के प्रति मार्मिक उद्गार व्यक्त किए हैं। शर्मा जी लिखते हैं- 'लोक की सबसे समर्थ और संप्रेषणशील शैली है लोकगीत। विश्व की शायद ही कोई सभ्यता मिले जहां मानवीय कार्यव्यापारों से जुड़े और उसकी अभिव्यक्ति करने वाले लोकगीत न हो। गांव-देहात में ग्रामीण जन विभिन्न संस्कारों और ऋतुओं में गीत गा-गाकर अपनी आत्मा और हृदय को तमाम चिंताओं से मुक्त करते हैं। भारत संस्कारों का देश है। हमारे पूर्वजों ने जीवन को उत्सवधर्मी बनाने के लिए अनेक अवसरों की सृष्टि की।''(पृ-79-80)

श्यामबाबू जी वर्षों से मेघालय की मनोरम हरितिमा में जीवन बसर कर रहे हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्य अपनी प्राकृतिक संपदा व लोक जीवन की स्निग्धता के लिए बहुचर्चित हैं। मेघालय के नैसर्गिक सौंदर्य व वैविध्यमय लोकजीवन को लेखक ने मेघालय की प्रणम्य लोक संस्कृति शीर्षक लेख में समेटा है। मेघालय के भौगोलिक परिवेश, खनिज संपदा, पशु-पक्षी, नामकरण, खासी, जयंतियां व गारो जनजातियों की उत्पत्ति से संबंधित तथ्य, लोक जीवन, खान-पान, लोक गीत, उत्सव, मान्यताएं, सामाजिक संरचना, खेती-बाड़ी एवं जीवन-शैली को साहित्यिक कलेवर में प्रस्तुत किया है। पूर्वोत्तर राज्य देश के अन्य विकसित राज्यों की दौड़ में कदाचित पीछे छूटे हुए हैं पर उनके जीवन में निहित मानवीय संस्कार शर्मा जी को अभिभूत कर देते हैं, फलस्वरूप वे लिखते हैं - 'प्रकृति के सीधे सानिध्य ने इनके हृदय को स्वच्छ, सरल रखा है। अधिक सभ्य, सुसंस्कृत एवं स्मार्ट होने की दंभी मानसिकता से दूर, अभिजात्यता से इतर विश्व ग्राम के चौंधियाने वाले ग्लैमर से इनका सरोकार कम है। अपनी कला और संस्कृति के अद्भुत रंगों से सजी प्रकृति को साक्षात ईश्वर मानने वाला, मनुष्य और मनुष्य की सहभागिता वाला मेघालय का सहज सरल समाज अपनी प्रणम्य संस्कृति को आज भी सहेजे हैं।'' (पृ-92)

आलोचना के रूप नामक अध्याय में निबंधकार ने भूमंडलीकरण की वैचारिक सुनामी के इस दौर में हिंदी आलोचना के मानक, कसौटी व कृति के मूल्यांकन व समीक्षा पद्धति पर विचार किया है। बड़े रचनात्मक साहस के साथ वे लिखते हैं कि आलोचना के क्षेत्र में निर्मित गढ़ों, मठों तथा उनके मठाधीशों की रूढ़ मान्यताओं को साहित्यिक मर्यादा रखते हुए तोडऩा होगा। उनके निम्नांकित कथन आलोचकों को स्मरण रखना चाहिए- असहमति और विरोध, मूल्यों की शर्त पर हो, सत्ता और कुर्सी के लिए नहीं। समीक्षक को अपने ज्ञान का अहंकार न हो बल्कि अहंकार का ज्ञान हो। (पृ-97)

2017 में स्वर्गीय व्यंग्यालोचक बालेंदुशेखर तिवारी जी के संपादन में एक नई पुस्तक आई है - अनुवाद शास्त्र। उक्तपुस्तक में संकलित निबंधों में तिवारी जी तथा अन्य लेखकों ने वर्तमान युग में अनुवाद की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई भूमिका पर बल दिया है। शर्मा जी ने इक्कीसवीं सदी में अनुवाद की प्रासंगिकता में विश्व ग्राम में तब्दील हो रहे इस परिवेश व दुस्समय में अनुवाद की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला है। उनके मान्यतानुसार ग्लोबल गांव का रूप लेते इस विश्व में विभिन्न राष्ट्रों में निर्मित व विकसित होते हुए आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक संबंध स्थापन व सशक्तीकरण के लिए अनुवाद का माध्यम ही सुलभ है। लेखक ने बड़े ही सुगठित व सुव्यवस्थित रूप में तथ्य देते हुए यह साबित किया है कि अनुवाद की सुविधा लेते हुए भारत जैसे बहुभाषी देश में अनेकता के बीच एकता के मंत्र फूंके जा सकते हैं। आपने 'डेल प्रस्ताव' तथा 'विश्व व्यापार संगठन' की नीतियों का वास्ता देते हुए बताया है कि बाज़ारवाद के कसते शिकंजे ने विज्ञापन को अपना चरम अस्त्र बना लिया है। आपके शब्दों में,''सारी दुनिया में एक समान संस्कृति, जीवन-शैली, रहन-सहन, खान-पान, सौंदर्य-चेतना और मूल्यबोध की एकरूपता स्थापित करने के लिए अनुवाद महत्वपूर्ण घटक के रूप में सामने आया है। बाज़ार, मीडिया और उदारीकरण से लबरेज ग्लोबल संस्कृति सब कुछ ब्रांडेड कर तगड़ी मलाई मारना चाहती है। भाषा इसका ब्रह्मास्त्र है। वास्तव में इसके लिए भाषा इतिहास के प्रवाह में निर्मित मानव संस्कृति की संवाहक नहीं बल्कि धनार्जन का माध्यम मात्र है। बाज़ार विज्ञापनों के ज़रिए अपना प्रोडक्ट विपणन करता है, इसमें अनुवाद की बड़ी सार्थक व सहायक भूमिका रहती है।'(पृ-101)

शर्मा जी ने यही स्वर 'हिंदी का क्रियोलीकरण' नामक अध्याय में ध्वनित किया है। आपने पूरी शिद्दत के साथ यह साबित किया है कि क्रियोलीकरण में देशज भाषा से उसका व्याकरण छीन कर उसमें 'डिस्लोकेशन ऑफ वॉकेब्युलरी' के ज़रिए उसके 'मूल शब्दों' का 'वर्चस्ववादी' भाषा के शब्दों से विस्थापन किया जाता है। इसे शल्यक्रिया का नाम देते हुए उन्होंने बताया है कि हिंदी पर यह प्रयोग सर्वाधिक किया जा रहा है जिससे पाश्चात्य जगत वल्र्ड बैंक, आई. एम. एफ, डब्ल्यू टी ओ के घातक तीरों से लैस अपना विजय रथ हांक सके। इस जघन्य क्रिया में भारत अपनी सांस्कृतिक व सामाजिक ताकत खोता जा रहा है। यह वह युग है जहां ज्ञान को सूचना में तथा रचनाशीलता को मनोरंजन के रूप में परोसा जा रहा है। ''सैटेलाइट टी वी चैनलों ने भाषा को बर्बाद करने में महती भूमिका निभाई है। संकर भाषा को पल्लवित-पुष्पित करने में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कुत्सित सहयोग विस्मृत नहीं किया जा सकता। दोगली भाषा की धुन भाषाई सभ्यता में विष घोलती जा रही है। नवासों की भाषा से मिठास गायब होती जा रही है। भाषा का चरित्र दिन पर दिन चिंतनीय होता जा रहा है।'' पृ-23

सारसंक्षेप यह है कि शर्मा जी ने प्रस्तुत ग्रंथ में आधुनिक हिंदी काव्य, अनुवाद, विज्ञापन, स्त्री चिंतन का एक सर्वसमावेशी साक्ष्य प्रस्तुत किया है। मौलिक चिंतन व गतिवान परिकल्पना के आधार पर आपने वर्तमान विश्व के ज्वलंत मुद्दों को खंगाला है। पाश्चाात्य जगत की बाज़ार नीति के असाधारण दबाव के कारण कमर तोड़ती हमारी भाषा, संस्कृति, साहित्य व अभिव्यक्ति की पीड़ा व छटपटाहट की टोह ली है। अपनी तर्क शक्ति के बल पर आपने पाठकों के साथ एक विश्वासप्रद तारतम्य स्थापित किया है। आपका युक्ति सत्य अद्वितीय है, आपकी लेखनी की धार भी सत्य को प्रस्फुटित करने में शत-प्रतिशत सक्रिय है। अत: 'नई शती और हिंदी कविता' में संकलित सभी लेख पठनीय हैं, सोच के नए किवाड़ पर दस्तक देने वाले हैं, मनन व चिंतन योग्य हैं।