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Wednesday 13 Nov 2019

एक कठिन समय में नगाड़ों की आवाज

साठोत्तरी पीढ़ी के वरिष्ठ कहानीकार हैं। हाल ही में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके कहानी संग्रह थाने के नगाड़े के पूर्व उनके पांच कहानी संग्रह, एक उपन्यास और कई समीक्षा-निबंध संग्रह आदि प्रकाशित हो चुके हैं। वे बच्चों के लिये भी कहानियां लिखते रहे हैं और छत्तीसगढ़ी कथा गीतों पर शोध कार्य किया है। वे प्रगतिशील जीवन मूल्यों से संपृक्त रचनाकार हैं जिनके लिये साहित्य समाज की बेहतरी के लिये किया गया सृजन है, मनोविनोद मात्र नहीं। इसलिये उनकी कहानियों में आम आदमी के पक्ष में सहानुभूति हर एक कहानी के साथ बढ़ती ही जाती है। पिछले कहानी संग्रह टोरकिल का शहर में वे बदलते परिवेश और बाजारवादी समाज के दौर में बनते जा रहे पाखंड के द्वीपों से मुठभेड़ करते हैं तो सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह में विमर्श के कई आयामों पर एक साथ सक्रिय नजर आते है। चंूंकि उनके अनुभवों का दायरा बुंदेलखंड से लेकर छत्तीसगढ़ और सुदूर आदिवासी अंचल से लेकर दो-दो राज्यों की राजधानियों तक विस्तारित है इसलिये उनकी कहानियों में जीवन के प्रमाणिक अनुभव सजीवता के साथ उपस्थित होते हैं। छत्तीसगढ़ और बुंदेलखंड दोनों ही अंचलों के समाजिक जीवन में लोककथाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और रमाकांत जी लोकजीवन के साथ गहरे से जुड़े हुए रचनाकार हैं तो कहानी लिखने से अधिक कहानी सुनाने की कला उनको भाती है। यही कारण है कि उनकी कहानियों में ब्यौरे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं जिनके संबंध में समकालीन कहानी दरिद्रता की शिकार बताई जाती है। रमाकांत जी का एक कुशल किस्सागो होना उन्हें कहानियों में ब्योरों पर अधिक ध्यान देने के लिये प्रेरित करता होगा। पुराने संग्रहों की ही तरह ये कहानियां भी आम जीवन से लीं गईं हैं और बदलते परिवेश में आम आदमी जिस प्रकार के दवाबों, तनावों और अभावों का सामना करता है या करने के लिये अभिशप्त है, ये कहानियां भी उन्हीं से मुठभेड़ करतीं हैं। जाहिर है कि लेखक का विचार इन परिस्थितियों का वर्गीय और वैज्ञानिक विश्लेषण करने में सहायता करता है। इस संग्रह की कहानियों में बाजारवाद के प्रसार और आदिवासी संस्कृति के विस्थापन तक उसकी भूमिका, धर्म के नाम पर हो रहे पाखंड जैसे कई सवालों पर एक नवीन दृष्टि के साथ विमर्श का सहज विस्तार किया गया है और रमाकांत जी अपनी शिल्प की प्रयोगधर्मिता को भी नये सोपान देते हुए नजर आते हैं। 

रमाकांत जी की कहानियां पीडि़त और वंचित मानवता के हक में प्रतिबद्धता के साथ खड़ी हैं। वे उस प्रत्येक बाधा और बंधन का पर्दाफाश करती हैं जो समाज को आगे बढऩे से रोकतीं है। वे वैज्ञानिक विचार के कथाकार हैं। हालांकि, माक्र्सवाद उनकी कहानियों में प्रेरक की तरह है न कि निर्णायक की भूमिका में। इसलिये वे अपनी कहानियों में वैज्ञानिकता के साथ खड़े होते हैं और अंधविश्वास की परतों को खोलते भी हैं पर अमूर्त में नहीं बल्कि इन अंधविश्वासों के भ्रम में पड़े अधिकांश लोगों के जीवन की मजबूरियों को भी वे महत्व देते हैं जिनके कारण उसे इन धतकरमों में ही शांति मिलती है। आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि विज्ञान की प्रगति के साथ समाज में भी वैज्ञानिक मूल्यों का संचार होगा और वह अपने आप ही अंधविश्वासों से किनारा कर लेगा। परंतु हमने देखा है कि ऐसा हुआ नहीं है बल्कि अब बाबा लोगों का ठिकाना ही तकनीक में है। किस प्रकार से टीवी और अखबार के माध्यम से दुनिया के एक दिन अचानक समाप्त हो जाने की अफवाह स्वरूप भविष्यवाणियों का प्रसरित किया जाना अधिकांश लोगों का अपने असर में ले लेता है क्योंकि भारतीय समाज में समाचार माध्यमों के प्रति एक खास प्रकार का श्रद्धाभाव है जो उसे आसानी से सवाल करने नहीं देता। समाज में बाबाओं का बढ़ता असर और त्याग का उपदेश देने वाले तथाकथित इन साधुओं की आलीशान और भोगवादी जीवन शैली के कारण लोग उनकी ओर आकर्षित तो होते हैं पर देर-सबेर इन बाबाओं के जीवन का पाखंड उनको पता चल जाता है। बहुत कम होते हैं जो साहब, बीबी और बाबाजी कहानी के जलतारे की तरह विद्रोह कर सकते हैं क्योंकि उनके अपने मोह हैं। अधिकांश तो इस पाखंड से प्रभावित ही होते हें और देर-सबेर यह पाखंड समाज के चरित्र में उतरने लगता है क्योंकि अंतत: यह आया भी तो वहीं से है। मुझे लगता है कि यही कारण है कि रमाकांत जी अपनी कहानियों में इस सवाल को बहुत प्रमुखता के साथ उठाते हैं और अगर हम देखें तो इस संग्रह ही अधिकांश कहानियों में धर्म के नाम पर फैलता यह पाखंड एक केंद्रीय प्रश्न की तरह उपस्थित है। उनकी दहशत और हॉट- हॉट डांस, साहब, बीवी और बाबा जी, मिशन पीआरटी, संधि,विग्रह और मित्र लाभ कथा इत्यादि। छत्तीसगढ़ के समाज में मध्यमवर्ग एक उभरता हुआ वर्ग है जो खासतौर पर सरकारी नौकरीपेशा लोगों का समूह है। इसमें अन्य हिंदीभाषी राज्यों से आये हुए उच्चवर्णीय द्विज तो शामिल हैं ही लेकिन आरक्षण के कारण शिक्षा और रोजगार प्राप्त आदिवासी बाबू लोग भी हैं। वंचना की चौहद्धियों पर खड़े आदिवासी समुदाय के ये प्रतिनिधि भी अब स्वयं को नौकरीपेशा वर्ग के साथ ही जोड़कर देखते हैं इसलिये उनकी ही परंपराएं, उनके ही पाखंड अब इनके भी अभीष्ट हैं। यही कारण है कि अमरकंटक से लेकर रायपुर तक बाबा लोगों का नेटवर्क सक्रिय है और उनके नित-नये अनुयायी भी। लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि यही तबका है जो अभी तक बाबा के स्वयं गांजा पीने और दूसरों को नशा न करने की नसीहत के विरोधाभास को पहचान कर नकार सकता है। क्या पता यह भी कब तक? लेकिन मध्यम वर्ग इन सब से कैसे पार पाता है? उसके पास भी चिंताएं हैं और डर भी। इसके लिये कहानी- उनकी दहशत और हॉट- हॉट डांस का यह उद्धरण दृष्टव्य है- आधे सोये और आधे जागे प्रोफेसर ने झपकियां लेते हुए अपने आभासी संसार को टुकड़े-टुकड़े सपनों में देखा। एक तरफ  ग्लोबल गर्मी, पिघलते ग्लेशियर और उन्हीं के तट पर बाबाओं के आश्रम, टूरिस्ट कॉटेज और बार। आखिरी झपकी में उन्होंने देखा............... आयोग में सातवें वेतनमान की बैठक हो रही है और चेयरपर्सन की कुर्सी पर मर्लेन डॉल टॉपलेस बैठी है। कल्पना के नील जल में संतरण करते हुए वे मीठी नींद की गोद में चले गये।

यही है मध्यम वर्ग की वैज्ञानिक.....नहीं, तकनीकी चेतना और वास्तविक सवालों की दुनिया से आभासी पलायन। इस संग्रह की कहानियां अक्सर ही शहरीकरण की प्रक्रिया पर सवाल उठातीं हैं। लेखक के लिये शहर का एक मतलब आदिवासी समुदाय और संस्कृति पर अतिक्रमण का नाम है। वह विकास की उस परिभाषा पर भी प्रष्न करता है जिसमें सिर्फ  अधोसंरचना और पैसा पैदा करने पर ही ध्यान दिया जाता है और इसके लिये समाज के हाशिये पर पहले से ही खड़े लोग हर बार कुर्बानी देने के लिये बाध्य होते हैं। अन्धी मछलियां और प्लेजर कैप्सूल कहानी में वाहन चालक मरकाम कहता है- हमने कब कहा कि विकास न हो पर ईमानदारी से तो हो। हमारी जमीन-जंगल छीनकर हमें विस्थापित करके यह होगा क्या? हमारी नस्ल खत्म करके होगा क्या?

यह केवल बस्तर की कहानी नहीं है। पूरे देश में विकास नामक इस दैत्य का आहार आदिवासियों और किसानों के जल, जंगल और जमीन ही बन रहे हैं। एक समय में आदिवासियों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर मिशनरियों ने बहुत काम किया था लेकिन धर्मान्तरण और घर वापसी की प्रक्रिया और नारों के बीच पिसता तो आदिवासी ही है। मरकाम कहता है- आदिवासियों को समझने के लिये कोई नहीं आता। बस्तर तो हम आदिवासियों का निवास है लेकिन हमें कोई ईसाई बनाना चाहता है तो कोई हिन्दू बनाना चाहता है। हमारी अपनी पहचान के साथ अपनाना तो दूर की बात है। शहर अपने विकास के साथ अपने सीमांत भी रचता जाता है। यही शहर में झुग्गी बस्ती बनाते हैं और फिर एक दिन ये उसकी सुंदरता के लिये दाग मानकर यहां से भी विस्थापित कर दिये जाते हैं लेकिन दरअसल शहर इनका अपने में अधिग्रहण करता है। कहानी प्लम्बर रिजवान का सपना का यह अंश देखिये- हालांकि शहर अपने पंजे बढ़ाता हुआ उसके गांव के पास तक पहुंच गया है।

रमाकांत जी व्यंग्य के सिद्धहस्त रचनाकार हैं। प्रसिद्ध व्यंग्यकार परसाई जी की ही भांति रमाकान्त जी के लिये भी एक पृथक विधा नहीं है बल्कि उनकी कहानियों में ही वह अंडरकरेंट की तरह गुजरता है। उनके व्यंग्य प्रहार से कोई नहींबचता। न राजनेता, न धर्म के धन्धेबाज, न नौकरीपेशा, न प्रोफेसर और न ही समानधर्मा साहित्यकार। इस तरह यह व्यंग्य कभी गैरजिम्मेवार हास्य का अनुगामी नहीं बनता बल्कि आत्मालोचना करता है और अपने वजूद में गहरी करूणा को समाये रखता है। कहानीकार छत्तीसगढ़ की राजनीति से भलीभांति वाकिफ  है इसलिये उनके लिये अपने व्यंग्य की धार में राजनेताओं को समाहित करना क्या मुश्किल होता? प्लम्बर रिजवान का सपना का यह अंश नेताओं के बारे में पढऩे योग्य है- मुख्यमंत्री, जाहिर है समझदार आदमी थे। वे जनता के आदमी तो थे ही, राजाओं-महाराजाओं के भी खास थे।..... तो एक तरफ थी व्यवहारिकता और अमर होने की इच्छा और दूसरी ओर थी रणनीति और नमक अदा करने की वफादारी। अब समय बदलने के साथ राजा-महाराजा के स्थान पर इसे उद्योगपति-व्यापारी मान लिया जाये तो आज की राजनीति और कॉरपोरेट का गठबंधन अर्थात क्रोनी केपिटलिज्म समझ में आ जाता है।

साहित्य खासतौर से, हिन्दी का साहित्य आमतौर पर पाठकों की उपेक्षा का शिकार बना रहा है लेकिन फिर भी लेखकों ने एक खास तरह की व्यावसायिक नैतिकता का पालन किया है और किताब बिक्री के लिये सम्मानजनक तरीके ही अपनाये जाते रहे हैं लेकिन तथाकथित भूमंडलीकरण जो वास्तव में एक भूमंडीकरण अर्थात विश्वबाजारीकरण है, के आने के बाद तो अब जैसे नैतिकताएं गुजरे जमाने की बात हो गई है। नये जमाने के नये लेखक और कवि तैयार हुए हैं जो युद्धक रणनीति के साथ किताब बेचने का धन्धा करते हैं। कहानी- राजधानी से गुमी किताब का एक उद्धरण देखिये- प्रकाशन के तीन महीने बाद ही बेस्टसेलर की सूची में तीसरा स्थान पा लेने वाली उस महत्वपूर्ण किताब की विषयवस्तु की ही तरह उसकी साईज भी खास थी- बारह इंच लंबाई और दस इंच चौड़ाई। लिलाक के हल्के रंग के कवर के बीचोंबीच पांच इंच के क्रीम कलर के वर्गाकार में चटकीले रंगों से एक कोलाज बना था जिसमें शिवलिंग, खजुराहो की मिथुन मूर्ति की कमर, जूलिया राबर्ट की आंखें, मेडोना की जांघें, माधुरी दीक्षित के चोली में से झांकते स्तन, पोर्न फिल्म के नीग्रो अभिनेता डेविड के चेहरे की आक्रामक उत्तेजना, मकबूल फिदा हुसैन के पांव, सुरंग में प्रवेश करती हुई ट्रेन और स्वाधीनता की मूर्ति की मशाल थी। ब्लर्ब में लिखा था- दुनिया के ग्लोबल गांव बन जाने के बाद विश्व भर के मानव समूहों के स्त्री-पुरूष सहज रूप से एक-दूसरे को उपलब्ध हो गये हैं तब जीवनानुभव के नये आयाम की ओर दृष्टि डालने का यह सद्य प्रयास है।

किताब के मुखपृष्ठ पर बने कोलाज के बहाने कितना बड़ा व्यंग्य चित्र उपस्थित किया गया है, यह स्पष्ट करने के लिये कुछ और लिखने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती है। जैसे एक कहानी में उनके द्वारा प्रस्तुत नेता का चरित्र राजनीति की जिस धरती से लिये गया है, उसके पात्रों का स्मरण दिला देता है वैसे ही इस कहानी में आगे जब वह दो आलोचको की बात करते हैं तो न केवल साहित्य की राजनीति की परतें खुलतीं हैं बल्कि आलोचना के नये प्रतिमान भी दृष्टिगोचर होते हैं। नेता की तरह ही आप अपने आस-पास या परिचय के दायरे में उनको पहचानने का प्रयास करने लगते हैं। लेकिन यह व्यंग्य अपने चरम पर पहुंचता है जब वाचक एक आलोचक महोदय के बारे में अपनी यह टिप्पणी देते हुए आलोचना कर्म की व्यावसायिक निरपेक्षता की यह कह कर बधिया उधेड़ देता है- लेखिकाओं का मामला होने पर उनकी उदारता बढ़ जाती है और ईमानदारी उसी अनुपात में घट जाती है।

इसी कहानी में आया क्षतिपूर्ति का प्रकरण पढ़कर चाहें तो आप सिर धुने या फिर अमिताभ बच्चन- कुमार विश्वास प्रकरण को जोड़ कर देख लें और लेखक की दानाई की तारीफ  कर लें क्योंकि यह कहानी तो अमिताभ-कुमार प्रकरण के कई माह पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी। आजकल के लेखकों का समाज और दुनिया से कटाव कई बार इस संग्रह में उनके कटाक्ष का कारण बनता है। राजधानी से गुमी किताब में ही एक वाकया आता है जहां एक लेखक-प्रोफेसर बस्तर से आये लेखक से पूछ ही लेता है कि क्या वहां अभी भी जंगली जानवर रहते हैं? लेकिन लेखक जंगल के रोमांस का शिकार नहीं है जैसा कि बाजार का प्रतिकार करते समय अधिकांश लोगों की समस्या रहती भी है।

इसी कहानी में बस्तर के ही प्रोफेसर का कहना है कि स्नाबरी केवल दिल्लीवासियों की जागीर नहीं है। दरअसल इस वाक्य को ऐसे पढ़ा जाना चाहिये कि स्नाबरी अब केवल दिल्ली वालों की जागीर नहीं है। यही नहीं आपको वे सब धतकरम अब इन कहानियों के बरास्ते आदिवासी अंचलों के नये बनते शहरों में भी दिखाई देंगे जो अब तक नगरों व महानगरों की पहचान रहे हैं। नगरों के मंदिरों की पुरोहिताई का उभरता हुआ व्यवसाय तो गाहे- बगाहे हमें दिखाई दे जाता रहा है लेकिन उसका व्यावसायिक प्रबंधन, उत्तरजीविता तथा प्रतियोगिता एकदम भोग-भौतिकवादी युग में प्रवेश करते हुए हमें संधि विग्रह और मित्रलाभ कथा के माध्यम से देखने के लिये मिलती है। हालांकि इसी कहानी में तथ्यात्मक त्रुटि की तरह दिखलाई देने जैसा वाकया भी है कि कहानी आरंभ तो होती है तेलीबांधा इलाके अर्थात रायपुर से परंतु समाप्ति तक पहुंच जाती है भोपाल के दानिश कुंज तक। संभवत: यह स्थान परिवर्तन लेखक के किसी खास शहर को इंगित करने से बचने के कारण भी हो सकता है।

बहरहाल, रमाकांत जी का व्यंग्य ध्वजारोहण कहानी में एक अलग तरह से आरंभ होता है और पंद्रह अगस्त पर स्कूली बच्चे द्वारा लिखा गया निबंध हमेंं इब्ने इंशां की याद दिलाता है- स्वाधीनता दिवस पंद्रह अगस्त को कहते हैं। इस दिन हमारा देश आजाद हुआ था। उसी दिन मेरा छोटा भाई भी पैदा हुआ था। पंद्रह अगस्त के दिन सभी जगहों पर झंडा फहराया जाता है। मेरा भाई समझता है कि पब्लिक उसका बर्थ डे मनाती है।......झंडा फहराने के बाद नेता भाषण देते हैं। भाषण से बच्चे बोर होते हैं इसलिये उनको बूंदी के लड्डू खिलाये जाते हैं।

इन कहानियों का व्यंग्य आरंभ में गुदगुदाता अवश्य है लेकिन जल्दी ही अपने साथ मानवीय संवेदनाओं की करूण बाढ़ में बहा ले जाता है। उदाहरण के लिये प्लंबर रिजवान का सपना कहानी का यह अंत - प्लंबर रिजवान ने देखा कि वह एक शानदार बाथरूम में खड़ा है। बारह बाई अठारह के बाथरूम में सब कुछ गुलाबी था। दीवारों के कोनों में लगे ग्लास कार्नर्स पर छोटे- छोटे गमलों में लगे फूल गुलाबी थे।....गुलाबी रंग का एसी, दीवार पर लगे फ्रेम पर गुलाबी टॉवेल। उस चमचमाते बाथरूम में शानदार कमोड भर गुलाबी नहीं था। कमोड ठोस सोने का बना हुआ था।

समृद्धि का यह चित्रण भला किसे प्रसन्न करेगा? किसे गुदगुदायेगा? अक्सर प्रदर्शन की यह पराकाष्ठा जुगुप्सा ही जगाती है। खासकर तब जबकि समाज में समृद्धि के वितरण का हाल यह हो कि महज एक प्रतिशत लोगों के पास के उतनी ही संपत्ति हो जितनी कि देश की आधी आबादी के पास है। एक ओर संपन्नता के द्वीप हैं तो दूसरी ओर गरीबी और भुखमरी के महासागर। यही कारण है कि एक हद तक पहुंचकर यह व्यंग्य एक गहरी चीख या त्रासदी में परिवर्तित होने लगता है- राही मासूस रजा के उपन्यासों की तरह। जैसे कि कहानी ध्वजारोहण की यह पंक्तियां जो चपरासी की बेटी तब कहती है जब कुत्ते की करतूत को रंगोली के सुंदर आवरण में छिपाने के इनाम स्वरूप सरकारी गाड़ी में घर जाने मिलता है- वो कुत्ता मिल जाता तो उसे जलेबी खिलाती। उसी के कारण अपने को इनाम मिले और सरकारी गाड़ी में बैठने को मिला।

रमाकांत जी कहानी की साठोत्तरी पीढ़ी की नुमाइंदगी करते हैं, वह भाषा और शिल्प को लेकर बहुत सजग रही है। रमाकांत जी की कहानियों में हिंदी के बीच बुंदेली और छत्तीसगढ़ी वैसे ही चली आतीं हैं जैसे दाल में नमक। वे किस्सागोई में निपुण हैं तो कहानी की तकनीक पर भी अपना असर कायम रखते हैं। उनकी एक खास शैली है जो हाल के संग्रहों में और निखर कर सामने आई है। कहानी का अंत एक त्रासदी के साथ हो रहा है या बहुत कम मामलों में सुख आश्चर्य के साथ-जीवन की ही तरह। परन्तु अन्त का सूत्र छिपा रहता है कहानी के मध्य के किसी सूत्र के साथ।

अपने समय के समाज की वास्तविकता, भूमंण्डलोत्तर भारत की द्वन्द्वात्मक अतिशयोक्तिपूर्ण वास्तविकताओं-शहर और जंगल को समझने के लिये रमाकांत श्रीवास्तव का कहानी संग्रह थाने के नगाड़े पढऩा बहुत प्रासंगिक होगा।