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Wednesday 23 Oct 2019

'आधे-अधूरे’: यथार्थवादी रंगशिल्प का क्लासिक उदाहरण

संस्कृत साहित्य में नाटकों की समृद्ध परम्परा प्राचीन काल से ही थी, परन्तु हिन्दी में नाटक विधा अन्य नवीन विधाओं की तरह भारतेन्दु युग में पल्लवित हुई। पारसी रंगमंच की चुनौती को स्वीकार करते हुए भारतेन्दु जी ने सर्वप्रथम साहित्यिक नाटकों को लिखने का बीड़ा उठाया था। भारतेन्दु जी द्वारा खाली किए गए रिक्त स्थान को भरने के लिए प्रसाद जी एक श्रेष्ठ विकल्प के रूप में उभरे। उन्होंने हिन्दी नाटक को अपने रूप पर इतराने का अवसर दिया। प्रसाद जी हिन्दी नाटक की धुरी माने जाते हैं। हालाँकि कुछ आलोचक उनके नाटकों पर रंगमंचीयता के अभाव का आरोप लगाते है, फिर भी उनके दाय से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है।

'अंधेर नगरी' से जो तूफान उठा था वह उमड़ता-घुमड़ता स्वात्त्रंयोत्तर नाटक तक आते-आते 'आधे-अधूरे' में परिवर्तित हो जाता है। यहाँ तक पहुँचने से पहले, सफर में ही हिन्दी नाटक ने ऊपर से ओढ़े गए लगभग सभी अयथार्थवादी शिल्पों को एक-एक कर के उतार दिया। अब न तो रोमानी भावुकता बची और न ही आदर्शों की मखमली चादर। स्वतन्त्रता का पाल्हा छूने के बाद नाटक जीवन-जगत के 'खुरदुरे यथार्थ' से जुड़ा एवं नाटक तथा रंगमंच के बीच लम्बे समय से चला आ रहा बैर भी तत्कालीन नाटककारों की सूझबूझ से खत्म हुआ।

जगदीश चन्द्र माथुर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश और लक्ष्मीनाराण लाल ने मुख्य रूप से नाटक और रंगमंच की दूरी को पाटने का प्रयास किया। मोहन राकेश का साफ  कहना था कि 'यदि कोई ऐसी रचना जो नाटक कहलाती है और रंगमंच से अलग है तो, उस रचना को नाटक कहकर केवल भ्रान्ति पैदा की जाती है।'

माथुर के 'कोणार्क' (1951), धर्मवीर भारती के 'अंधायुग' (1954) और मोहन राकेश के 'अषाढ़ का एक दिन' एवं 'लहरों के राजहंस' में बात भले ही समकालीन मनुष्य की गई हो, लेकिन यहाँ भी सहारा मिथकों, ऐतिहासिक पात्रों एवं घटनाओं का लिया गया है। यह बैसाखी भी 'आधे-अधूरे' में टूट जाती है, मिथकों का झीना पट गिर जाता है। यहाँ समकालीन मनुष्य बिना तैयार हुए 'एकदम नंगा' ही उपस्थित मिलता है। इस नाटक में नाम, काम, पहनावा-ओढ़ावा सब कुछ एक सामान्य आदमी का है। नाटक में उतरायी 'तल्खी' प्रेक्षक को जानी पहचानी लगती है। कभी सावित्री के चेहरे में, कभी बिन्नी-किन्नी-अशोक तो कभी महेन्द्रनाथ के चेहरे में प्रेक्षक को जाने-पहचाने चेहरे दिखने लगते हैं। वह भूल जाता है कि नाटक देख रहा है या जीवन का 'रियल ड्रामा' चल रहा है। हिन्दी नाटक के लिए समकालीन सच्चाई की ऐसी और इतनी तलाश एकदम नयी है।

'आधे-अधूरे' के रंग-शिल्प पर चर्चा करने से पहले यह जानना जरूरी है कि रंग-शिल्प क्या है? साधारणत: 'रंगमंच संबन्धी कारीगरी' को रंग-शिल्प के नाम से जाना जाता है। रंग शिल्प बहुत व्यापक शब्द है, इसमें पात्र की वेश-भूषा, भाषा, मंच सज्जा, रंग-निर्देश, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि व्यवस्था, रंगयुक्ति और संगीत आदि सब कुछ आ जाता है।

रंगमंच के इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि मोटे तौर पर दो प्रकार के रंग-शिल्प होते हैं

1.      कृत्रिम रंगशिल्प

2.     स्वाभाविक या यथार्थवादी रंग-शिल्प

पहले के ज़्यादातर प्राच्य और पाश्चात्य नाटकों में कृत्रिम रंग-शिल्प मिलता है। इसका कारण यह है कि पहले का दर्शक रंगमंच पर अपने आस-पास का चलचित्र देखने के लिए नहीं जाता था, वह अपनी रोजमर्रा की परेशानियों संघर्षों एवं अंतद्र्वन्दों को भूलकर प्रेक्षागृह में सिर्फ और सिर्फ रसमग्न होने के लिए जाता था। यही वजह है कि पहले कृत्रिम रंग-शिल्प काफी आकर्षक तत्व माना जाता था।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कृत्रिमता का स्थान धीरे-धीरे स्वाभाविकता ने ले लिया। तड़क-भड़क कम होने के कारण रंगमंच यथार्थ के निकट आ गया। हिन्दी नाटकों में यह परिवर्तन 1950 के बाद लिखे नाटकों में मुखर रूप में मिलता है।

'आधे-अधूरे' का प्रकाशन 1969 में धर्मयुग में होता है। इसके पहले मोहन राकेश 'अषाढ़ का एक दिन' (1958) एवं लहरों के राजहंस (1963) को लिखकर नाटककार के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे। 'आधे-अधूरेÓ समकालीन मध्यवर्गीय जिन्दगी का नाट्य रूपान्तरण है। पारिवारिक विघटन, स्त्री-पुरुष संबन्धों में आ रही तल्खी, बढ़ती महत्वाकांक्षा, जीवन मूल्यों का ह्रास, अर्थ का बढ़ता प्रभाव आदि का गहन अंकन है 'आधे-अधूरेÓ। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के नगरीय जीवन में जो बदलाव आया है, खासतौर से मध्य-वित्तीय परिवारों के जीवन में, 'आधे-अधूरे' उसी जीवन की देन है। 'आधू-अधूरे जीवन को मंच पर दिखाने के लिए नाटककार के द्वारा जो तरीके अपनाये गये हैं, वे इस नाटक के यथार्थवादी रंग-शिल्प का सफल उदाहरण घोषित करते हैं।

मोहन राकेश के अनुसार आधे-अधूरे ''आज के सामान्य वर्ग से संबन्धित है जो अपने आप में 'आधा' भी है और 'अधूरा' भी। यह इस शहर के एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है जिसे परिस्थितियाँ निचले वर्ग की ओर धकेलती जा रही हैं।'' बिना कहे इस दृश्य को दिखाने के लिए राकेश जी नाटक की शुरुआत से ही ऐसी रूपरेखा खींचते हैं, जिससे यह पता चल जाता है कि यह घर पहले तो कुछ संपन्न था। लेकिन अब आर्थिक तंगी की दौर से गुजर रहा है। उपयोग किए गए सामानों के 'टूटते अवशेष', 'घिसे फटे' गद्दे, परदे, मेजपोश और पलँगपोश मूक रहकर भी घर की आर्थिक स्थिति को बयाँ कर देते हैं। 'आधे-अधूरे' के पात्रों की वेश-भूषा एवं चेहरे की भंगिमा भी अपने समय के यथार्थ को उभारती है। काले सूट वाले आदमी की 'चेहरे की शिष्टता में एक व्यंग्य' है, क्योंकि वह शिष्टता दिखावी और खोखली है। पुरुष एक जिसने 'पतलून-कमीज़' पहन रखी है, वह व्यवस्था से हारे, लाचार एवं दब्बू व्यक्ति का प्रतिनिधि है। पुरुष दो के 'बन्द गले का कोट' यह बताता है कि आज का मनुष्य कैसे सारे घुटन-तनाव को अपने अंदर ही कैद करके कसमसाते हुए जीवन जीने को अभिशप्त है। पुरुष तीन जिसने पतलून के ऊपर टी-शर्ट डाल रखी है, वह उस समय के लापरवाह, आवारा एवं फक्कड़ चरित्र को दिखाता है, जिसे सिगरेट के धुँए के आगे कुछ नहीं दिखता। पुरुष चार के चेहरे से झलकता काइयाँपन उसका ही नहीं है, वह एक प्रकार से तत्कालीन समाज में व्याप्त काइयाँपन है।

'स्त्री' जो कि इस नाटक की केन्द्रीय पात्र है, उसका परिधान साधारण है, लेकिन अंदर की 'चाह फिर भी शेष' है। यही 'चाह' ही 'आधे-अधूरे' नाटक की संजीवनी है और इसी 'चाह' का बढ़ते जाना ही परिवारों के विघटन का एक प्रमुख कारण भी। 'बड़ी लड़की' और 'छोटी लड़की', 'सावित्री' के युवा और किशारवय रूप की द्योतक हैं। जो लड़की 12 वर्ष की उम्र से ही 'यौन-सम्बन्धों में दिलचस्पी लेगी वही यौवन की दहलीज पर पहुँचकर 'मनोज'के साथ भाग जाएगी और अन्तत: 'सावित्री' के रूप में अपने आप को अधूरा ही पाएगी। एक प्रकार से इन तीनों 'फीमेल' पात्रों के द्वारा नैतिक मूल्यों के क्रमश: होते क्षरण को मोहन राकेश ने दिखाया है।

आधे-अधूरे के रंगशिल्प की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें मोहन राकेश जी ने परम्परागत प्रतीकों के प्रयोग की अपेक्षा रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली आम और बहुत साधारण चीज को ही गहरे और नये अर्थ देकर प्रतीक के पद पर प्रतिष्ठित किया। नाटककार शुरुआत में ही कमरे का परिचय देते हुए कहता है कि ''तीन दरवाजे तीन तरफ  से कमरे में झाँकते हैं।'' यहाँ कमरा उस घर की चल रही अच्छी भली जिन्दगी एवं तीन दरवाजे सिंघानिया, जगमोहन एवं जुनेजा के प्रतीक हैं। पुरुष एक का पाजामा स्वयं महेन्द्रनाथ का प्रतीक बन जाता है जिसे सावित्री ''मरे जानवर की तरह उठा कर देखती है और कोने में फेंकने को होकर फिर एक झटके के साथ उसे तहाने लगती है।'' इसी प्रकार अनेक स्थानों पर पात्रों का दराज/कबर्ड को बार-बार खोलना बंद करना, कुर्सी को झुलाना उनके मन की उलझन और उनके असमंजस को द्योतित करता है। 'धूल', 'हवा', 'फाइल', 'स्टैम्प', 'पर्स, जैसे सामान्य शब्द भी इस नाटक में प्रतीक की ओट लेकर कई अर्थ व्यंजित करते हैं।

इस नाटक की भाषा भी इसके यथार्थवादी रंगशिल्प का स्पष्ट प्रमाण देती है। गिरीश रस्तोगी का कहना है कि ''इस नाटक की सबसे बड़ी खूबी है इसके ठोस जानदार संवाद और सही नाट्य भाषा की खोज।ÓÓ यहाँ आकर नाट्य भाषा सामान्य जनजीवन की भाषा हो जाती है। समकालीन जीवन के तनाव को पकड़ सकने की शक्ति पहली बार इस नाटक के संवादों और भाषा में मिलती है जो केवल बोलचाल की भाषा होने के कारण नहीं, शब्दों के चयन, उनके क्रम, संयोजन और ध्वनियों के कारण है जो पात्रों के मनोविज्ञान को, तल्खी, कड़वाहट को उसी तेवर के साथ व्यक्त करती है। इसी कारण ओम शिवपुरी इस नाटक की भाषा को वह मुख्य वजह मानते हैं, ''जिसके कारण यह नाट्य रचना बंद और खुले, दोनों प्रकार के मंचों पर अपना सम्मोहन बनाये रख सकी।''

एक ही अभिनेता द्वारा पाँच भूमिकाएं निभाने की एक नयी रंग-युक्ति भी यथार्थवादी रंग-शिल्प का एक नमूना है। यह युक्ति संकेत करती है कि समकालीन व्यक्ति कई मुखौटे लगा कर टहल रहा है।

इस नाटक में रचनाकार ने ध्वनियों का उल्लेख भी बड़ी सूझ-बूझ से किया है। अशोक की कैंची की ध्वनि, टिन-कटर, कप-प्लेटों की या महेन्द्र के फाइल झटकनें की आवाजें आदि ऐसा वातावरण निर्मित करती हैं जो मुँह से बोलने की अपेक्षा प्रेक्षक को अधिक प्रभावित करती हैं। मोहन राकेश ने इन ध्वनियों को ऐसे सेट किया है कि इसका कोई स्थानापन्न नहीं हो सकता। कल्पनाशील रंगकर्मी रामगोपाल बजाज ने इन्हें बदलने की कोशिश की, लेकिन अंत में उन्हें लगा कि ''कैंची की चक्-चक्' से बेहतर और कोई ध्वनि प्रभाव संभव नहीं है।''

राकेश जी चूँकि एक 'थियेटर एक्टिविस्ट' हैं, इसलिए रंगमंच से जुड़ी कोई भी चीज उनकी नजरों से बच नहीं पाती है। 'आधे-अधूरे' में उन्होंने 'प्रकाश व्यवस्था' का उपयोग करके प्रेक्षक का ध्यान उस तरफ  आकर्षित किया है, जहाँ वे प्राय: नहीं पहुँच पाते हैं। प्रकाश-व्यवस्था संबन्धी रंग-निर्देश आधे-अधूरे में केवल दोनों अंकों के आरंभ और अंत में दिये गये हैं तथा शेष जगहों पर यह कार्य निर्देशक की कल्पना पर छोड़ दिया गया है। संगीत संबन्धी निर्देश भी राकेश ने दिया है। नाटक के अंत में जो 'हल्का मातमी संगीत उभरता है'', उसका प्रभाव प्रेक्षक के अन्दर प्रेक्षागृह से बाहर जाने पर भी बना रहता है।

कुल मिलाकर अब यह कहा जा सकता है कि आधे-अधूरे यथार्थवादी रंग-शिल्प का क्लासिक उदाहरण है क्योंकि यह गिरीश रस्तोगी के शब्दों में ''हिन्दी के यथार्थपरक रंग-शिल्प की विकास-दिशा दिखाता है।'' इस नाटक में रंगमंच से जुड़ा ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहाँ यथार्थवादी-शिल्प ने पारम्परिक-शिल्प में सेंध लगाकर अपने को प्रतिष्ठित न कर लिया हो।