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Wednesday 19 Sep 2018

बादलों के घेरे : कृष्णा सोबती

जब मोह और प्यार की उछलन आती है, तो मीरा नहीं, मन्नो की आँखें ही सगी दीखती हैं।

....अकेलेपन से घबराकर जब मैं बाहर देखता हूँ तो धुंधभरे बादलों के घेरों में घुँघराले बालोंवाला वही चेहरा दीखता है, वही....

अकेले जीवन की अस्थिर-सी लगती यात्रा में, बीतते हुए के बीच अन्यमनस्क होने के पलों में, अपनी तरह से जीने की कमजोर जिद के साथ हम जब अन्यों से व्यवहार कर रहे होते हैं तब हमारी तात्कालिकता के चमकीले क्षणों से हमारे अनिर्णीत साबित होने की आशंकाएँ हमें नजऱ नहीं आती हैं। हमें अपने जीने-होने-करने में गुँथी इच्छाओं की शक्ति का वास्तविक आवेग कहाँ पता चल पाता है। हम नहीं जान पाते कि वे अचानक ही ओट हो जाती हैं। हम यदि यह सब जान भी लेते हैं तो भी हम तात्कालिक सुख को खोना नहीं चाहते। हम अपनी जवाबदेही से विमुख दूसरों की तकलीफों और वंचनाओं को पनपने देते हैं। हम अपनी सारी चेष्टाओं को अपने पक्ष तक ही सीमित रखते हैं, जिसके साथ होने से हमें किंचित भी सुख मिलता है उस व्यक्ति व उस सुख के प्रति हममें प्रतिदान जैसी कोई चीज होती ही नहीं। हम कुछ चाहते तो हैं लेकिन इस चाहना को सुविधाजनक स्तर तक ही रखना चाहते हैं। यदि संवेदना के सहारे ही प्रेम के उत्पन्न होने के संभावित क्षण हमें मिलते हैं तो उन क्षणों को विस्तार देने का हमारा मानवीय उपक्रम निष्क्रिय रहकर दुनियावी सहूलियतों की तरफ  चला जाता है।

अनिश्चयों और अस्थिरताओं का अतिक्रमण कर कुछ निश्चयों व स्थिरताओं को रच पाना आसान नहीं होता। उसे रचे जाने के लिए खुद को दांव पर लगाना होता है। खुद को दांव पर लगाए बिना कुछ भी रच पाना मुमकिन भी कहाँ होता है और प्रेम भी तभी संभव हो पाता है। संभव-असंभव की जटिलताओं से शीघ्र ही मुक्त होकर हम एक आसान जीवन की राह चुन लेते हैं। बहुत आगे जाकर भी हममें तब तक स्मृति में बचे समय की ओर लौटने की आकांक्षा पैदा नहीं होती जब तक हमारा जीवन सुविधाजनक रास्तों पर चलता जाता है। वह अतीत जिसमें हमारा शामिल होना सचमुख सुखप्रद है, हमें याद भी नहीं आता। जब जिंदगी घूम-फिरकर उस एक जगह हमें स्थगित कर देती है जहाँ कभी हमने किसी को यूँ ही उसकी नियति पर छोड़ दिया था, तब जाकर हम उस निपट सच्चाई से रूबरू हो पाते हैं जहाँ वंचनाओं, उपेक्षाओं, अकेलेपन से अभिशप्त जीवन के बादल हमें घेरे हुए हैं।

अब क्षयरोग और उसके संक्रमण का वैसा खौफ नहीं रहा। अब समयोचित इलाज से क्षयरोगी पूर्णत: स्वस्थ तो हो ही जाता है, उसके आसपास के लोगों को संक्रमण का वह डर नहीं रहता जिसके चलते एक समय उन्हें परिवार से अलग सुदूर अकेले रहना पड़ता था। इस पूरी कहानी में क्षयरोगी की यंत्रणा, अकेलेपन और निर्वासन के उबाऊ जीवन का वृत्तान्त समूची नीरवता के साथ फैला है। हालाँकि कहानी उससे आगे जाकर ही कहानी बनती है। कहानी की शुरुआत क्षयरोग से पीडि़त रवि के आत्मप्रलाप से होती है। रवि जो कहानी का आख्याता भी है, भुवाली में एक छोटी सी कॉटेज में लेटा हुआ सुबह से शाम तक अपने आसपास, मुश्किल से बीतते समय, गृहस्थ जीवन के सुखद क्षणों और सुदूर अतीत में बसी मन्नो को देखता है, याद करता है, अपने अकेलेपन को भरने की कोशिश करता है। रवि की पत्नी मीरा कभी कभार मिलने आती है, कभी बच्चे भी साथ होते हैं और वे एक बेगानी मुलाकात की औपचारिकता पूरी कर जल्द ही रवि को फिर अकेला छोड़ घर लौट जाते हैं। रवि अब इस निरंतरता का अभ्यस्त हो चला है। वह अपने ही बच्चों से निकटता से नहीं मिल सकता। बच्चे उसे दूर से प्रणाम करते हैं। रवि का दस बरस का सुखद वैवाहिक जीवन रहा है। जिस सुन्दर, प्रेम करने वाली और रवि के जीवन में उत्साह भरने वाली पत्नी मीरा के साथ बिताए अन्तरंग समयों की अनेक सुखद स्मृतियाँ रवि की स्मृतियों में जगमग हैं, उसी पत्नी से अब कुछ पलों का ही औपचारिक नैकट्य संभव हो पाता है। रवि याद करता है- कहाँ हैं वे सुगंध भरे केश, जो मेरे वक्ष पर बिछ-बिछ जाते थे? कहाँ हैं वे रस भरे अधर जो मेरे रस में भीग-भीग जाते थे? सब था, मेरे पास सब था। बस, मैं आज सा नहीं था। जीने का संग था, सोने का संग था। मैं धुले-धुले सिरहाने पर सिर डालकर सोता रहता और कोई हौले से चूमकर कहता- उठोगे नहीं, भोर हो गयी।

गृहस्थ जीवन की स्मृतियाँ और वर्तमान औपचारिकता रवि को जब बहुत व्यथित करती हैं तब वह इसके पहले के अकेले के जीवन में पहुँच जाता है जहाँ रवि के बेपरवाह, अनमने और अस्थिर जीवन में अचानक हुए लगाव की अपूर्ण इच्छित और अतृप्त आकांक्षा का एक ऐसा दौर है, जिसकी अब इस हालत में याद जैसे खुद को ही अंतिम रूप से जान लेने और पा लेने की तरह है। यह याद मन्नो की है।

मन्नो की चाची रवि के पिता की मौसेरी बहिन अर्थात रवि की बुआ हैं। उन्हीं के यहाँ रवि पहली बार मन्नो से मिलता है। मन्नो क्षयरोग ग्रस्त है। चाचा-चाची ही उसका परिवार है। दो बरस सेनेटोरियम में रहने के बाद इन दिनों भुवाली की एक कॉटेज में रहती है। कभी दो दिन के लिए चाची के यहाँ आती है लेकिन संक्रामक बीमारी की वजह से होने वाले औपचारिक, अजनबी तथा ठंडे-रूखे व्यवहार से अपमानित मन्नो एक ही दिन में लौट जाती है। चाची मन्नो को घर के ऊपर वाले कमरे में रोकती हैं, उसके आने के पूर्व ही किराए से जरूरी चीजें मँगाकर घर की चीजों से उसे दूर रखती हैं। चाची अपने बच्चों को भी मन्नो के पास नहीं जाने देतीं। हालाँकि बच्चे मन्नो के पास जाने की ललक रखते हैं। जब रवि मन्नो की ऐसी स्थिति देखता है तो उसमें मन्नो के प्रति उत्पन्न सहानुभूति और अपनत्व का भाव उसे व्यथित और बेचैन कर देते हैं। बुआ रवि की मनोदशा भांप लेती हैं। बुआ और रवि के बीच उम्र का बहुत फासला नहीं हैं। मन्नो को लेकर बुआ रवि को आगाह करती हैं- रवि, उसके लिए कुछ मत सोचो, उसे अब रहना नहीं है। बुआ की बात से सिहरकर रवि भी कह देता है- बुआ, मुझे ही कौन रहना है।

चाची के यहाँ से मन्नो भुवाली चली जाती है अपनी पीड़ा का अकेलापन और अकेलेपन की पीड़ा के साथ। मन्नो जानती है कि उसके हिस्से आया यह तिरस्कार दरअसल क्षयरोग के भय के कारण है। सभी नजदीकी लोगों द्वारा बना ली गयी दूरियाँ लगातार बढ़ती ही चली जाती हैं। जैसे सभी अब मन्नो के जाने की प्रतीक्षा ही कर रहे हैं। जब प्रदत्त रिश्तों में इतना अलगाव है तब किसी नए रिश्ते की संभावना कैसे घटित हो सकती है? जिन्दगी में यह कितना खौफनाक समय होता है जब किसी को स्थगित जीवन को ही जीने की तरह जीने को अभिशप्त होना पड़ता है।

रवि मन्नो से मिलने भुवाली जाता है। मन्नो के बीमारी से अभिशप्त जीवन में, निपट अकेलेपन के दुख में, अपनी पीड़ा को समेटकर अपने पास छुपा लेने के स्वाभिमान में एक आकर्षण है, रवि जिससे स्वयं को बिंधा हुआ पाता है। परन्तु यह एक स्थिति मात्र है। रवि के इस लगाव और मन्नो से अनौपचारिक व्यवहार की सदिच्छा में भी एक सतर्क दूरी कायम रहती है। रवि के अन्दर प्रेम की वह गहरी आकांक्षा अजन्मी ही रही आती है जो किसी ठोस और दायित्त्वपूर्ण निर्णय तक ले जा सके। यह एक अजीब स्थिति है कि मोह तो उपजा है लेकिन उत्कंठा का आवेग कुछ मद्धिम ही है। इसीलिये अन्यों से,  मन्नो की नियति से रवि को अफसोस होता है पर अभी खुद की अकर्मण्यता का बोध भी मन में नहीं आता।

मन्नो से रवि का मिलना तीन बार और भी होता है, वहीं भुवाली की एक कॉटेज में। अंतिम बार जब रवि मिलता है तब तक उसमें किंचित छटपटाहट और मन्नो के नियति से उबर जाने की एक मरी सी इच्छा सतह पर आ जाती है। रवि भयमुक्त सा होकर एक क्षण के लिए नैकट्य की ऊष्मा महसूस करना चाहता है जिसमें मन्नो के प्रति प्रेम भी जाहिर हो सके - मन्नो को छूने का भय, उसके रोग का भय, जो अब तक मुझे रोकता था, बांधता था, अलग जा पड़ा। मन्नो खुद ही रवि को दुविधा से उबार देती है- रवि, जिसे तुम झेल नहीं सकते, उसके लिए हाथ न बढ़ाओ !

मन्नो के कहने में उलाहना या आक्षेप न होकर यथास्थिति पर प्रश्नांकन ही है। रवि निरुत्तरित ही रहता है। इस अंतिम बार जब रवि मन्नो से विदा लेकर लौटने लगता है तब जैसे मन्नो भी अंतिम बार ही अपनी नियति पर और अब अकेले रह जाने पर रोने लगती है। मन्नो के तिरस्कृत जीवन में रवि ने किंचित आत्मीय निकटता का अहसास दिया था। वंचनाओं के कगार से किसी ने खींचने की निष्क्रिय ही सही, चेष्टा तो की ही। विदा लेते समय रवि जानता है कि मन्नो रो रही है किन्तु रवि सिसकती हुई मन्नो को छोड़कर चला जाता है।

अपने सुखमय गृहस्थ जीवन के दौरान ही बुआ से मन्नो के नहीं रहने की खबर रवि को मिलती है और तभी बुआ रवि को एक पार्सल देती हैं जिसे मन्नो ने भेजा था। उसमें रवि के लिए जर्सी निकलती है। अब बुआ जैसे पछताते हुए मन्नो के लिए दुख प्रकट करती हैं- यही बार-बार सोचती हूँ कि जिसके प्यार को भी कोई न छू सके, ऐसा दुर्भाग्य उसे क्यों मिला, क्यों मिला?

बुआ के इस आत्मप्रलाप का क्या मतलब? जब मन्नो थी तब दूसरी चिंताएँ हावी थीं जिनमें मन्नो के तिरस्कार की अमानवीयता ढँक जाती थी। अब जब नहीं है तब उसके लिए अफसोस के क्या मायने? हमारा जीवन व्यवहार ऐसा ही रहता है, बीते हुए पर अफसोस कर अपने दुव्र्यवहारों से मुक्ति पा लेना।

मन्नो को जब करुणा, समानुभूति और प्रेम की दरकार थी, तब कहाँ मिल पाता है। निर्वासित जीवन जीते हुए मन्नो किन यंत्रणाओं से गुजर रही होगी, कौन जान सकता है। प्रेम की आकांक्षा जन्म लेने से पहले ही मुरझा जाती है। भय से, लोक से, अनिश्चय से, कायरता से मुक्त होकर कहाँ कोई मन्नो को प्रेम कर पाता है? मन्नो के होने की सम्पूर्णता अधूरेपन के कगार पर ठेल दी जाती है। जीते जी उसके होने को सभी कमतर ही करते नजर आते हैं।

रवि गृहस्थ जीवन की खुशहाल स्थितियों में वर्षों इस कदर व्यस्त रहता है कि मन्नो की कोई टीस नहीं उठती। अच्छी पत्नी और दो बच्चों के साथ रवि के जीवन में इतना अवकाश भी कहाँ रह गया था। लगभग एक बरस तक लगातार बीमार रहने के बाद रवि के क्षयरोगी होने का पता चलता है और वह भुवाली मन्नो की तरह का जीवन बिताने पहुँचता है।

अब सब कुछ वैसा ही रवि के साथ घट रहा है जिसे कभी निरुपाय रहकर मन्नो ने भुगता था। तिरस्कार, निर्वासित जीवन, औपचारिक व्यवहार, अकेलापन, कॉटेज की सूनी दुनिया, बाहर चौतरफा पसरा सन्नाटा, जो कभी मन्नो के जीवन साथी थे, अब रवि के हिस्से आ पड़े। जब खुद के साथ घटित हो रहा है तब जाकर मन्नो के साथ घटित की भीषणता समझ आ रही है। जिन्दगी इतनी बेगानी और निरुपाय हो सकती है, यह अहसास अब जाकर अपने अर्थ चरितार्थ कर रहा है। ठीक इस समय जब किसी के सघन साथ की सबसे अधिक जरूरत है, कोई नहीं है और न ही कोई उम्मीद है। अपनी वंचना में, पीड़ा में अब मन्नो ही प्रतिबिंबित हो रही है। रवि के हाल ही के खुशहाल जीवन की कोई स्मृति मदद नहीं कर पा रही। उसे इस वंचित, अकेलेपन के उबाऊ, नीरस और यातनामय जीवन से कुछ निजात दिलाने में। ऐसा कुछ भी उत्कट, सघन और उर्वर गृहस्थ जीवन से नहीं मिल पा रहा। इस समय मन्नो की स्मृतियाँ ही एकमात्र सहारा बन पा रही हैं। मन्नो, जिसके दारुण जीवन में रवि साहस का हाथ नहीं बढ़ा सका। अनुभूतियों और आकांक्षाओं का कोई ठोस वजूद यदि अब रवि को कुछ राहत दे पा रहा है तो वे मन्नो के इर्दगिर्द की स्मृतियां ही हैं।

रवि के इस प्रत्याख्यान में पत्नी मीरा के साथ बिताया अनुरागमय लंबा समय, मन्नो के साथ दो-चार मुलाकातों के समक्ष बौना नजर आता है तो इसलिये नहीं कि यह अपने तिरस्कार, निर्वासन में किसी अन्य से बावस्तगी के सहज मानव स्वभाव के कारण है। बल्कि इसलिए कि जीवन में एक बार किसी स्थगित रही आतुर पुकार को अनसुने कर जाने की आत्मपीड़ा के सिरे से दुनियावी स्थूल जीवनचर्या की निर्मम जाँच-पड़ताल कर, वहीं उस अधूरेपन की अपनी कायर स्थिति में अपने सच्चे प्रेम की तपिश अनुभव कर लेना है। मन्नो से रवि को उस वक्त जो मिल सका, उससे कहीं ज्यादा वह अब दे पा रही है। यह खामोश, उदास लेकिन चाहना की निरुपायता में जीती रही मन्नो से मिलती प्रेम की वह शक्ति है जहाँ अपना निर्मम पुनरवलोकन ही रवि को सच्चे प्रेम का अनुभव करा पाता है। रवि के लौटने पर मन्नो की सिसकियों में जो बह रहा था, वर्षों बाद रवि उसे पा रहा है। इसीलिये अब रवि को मन्नो की स्मृतियों का ही संबल हैं और बादलों के घेरों में मन्नो का चेहरा ही नजर आता है।

इस कहानी ने स्मृति को मनुष्य के अपरिहार्य जीवन प्रत्यय की तरह प्रतिष्ठित किया है। स्मृति का यह  आख्यान कृष्णा सोबती ने इस तन्मयता के साथ रचा है कि इसमें रचने की चेष्टा का नितांत अभाव नजर आता है। एक फिल्म की तरह यह कहानी गुजरती है। सिर्फ रवि और मन्नो के जीवन की नीरवता ही नहीं, हम कहानी से रिश्तों की विरलता का सघन स्पर्श भी पाते हैं।

बादलों के घेरे सिर्फ कृष्णा सोबती की ही नहीं बल्कि हिंदी कहानी परम्परा में उल्लेखनीय कहानी है। ताजगी और नवाचार का एहसास जिन कहानियों से मिलना शुरू हुआ, यह कहानी उनमें शुमार है। स्त्री केन्द्रीयता का अनाटकीय और स्वत: स्फूर्त विधान यहाँ मिलता है। यह कहानी कुछ देने की जल्दबाजी न होकर कुछ विचार करने की प्रस्तावना लगती है। हमारी कथाएँ बहुत आकांक्षी हैं, स्मृति-यथार्थ-कल्पना के बहुविध प्रयोगों ने अनेक बार श्रेष्ठ सृजन संभव किया है। हमें ऐसी कहानियाँ भी चाहिए जो हमें शामिल होने की जगह दें सकें, जिनमें स्मृति-यथार्थ-कल्पना हमें साथ लेकर चल सकें अन्यथा हमारा रिश्ता बहुत आत्मीय नहीं हो सकता। हिंदी में जो कहानियाँ पाठक से विश्वसनीय रिश्ते को बना सकी हैं, उनमें इस  कहानी की गणना असंदिग्ध है।