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Sunday 19 Aug 2018

सबसे नेक सलाह

मुझे कभी भी मिलने वाली बढिय़ा सलाह इस संसार में ज्ञात महान आत्माओं में से एक गांधी जी ने एक दशक पूर्व धूप से चटकीले तीसरे पहर के एक दिन दी थी।

अनेक लोग व्यथा के बीच से गुजरते हैं जब मानवता के प्रति उनका विश्वास क्षीण हो चुका होता है। मैं ऐसे ही समय से गुजर रही थी। हाल ही में मेरे पति की मृत्यु हो चुकी थी। उनके चले जाने के गहन दुख के बीच मुझे अपमानजनक अनुभूति हुई कि भारतीय कानून की दृष्टि में व्यक्तिगत रूप से मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। अन्य भारतीय महिलाओं के साथ पुरुषों के कंधों से कंधा मिला कर मैंने तब तक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और कष्ट उठाए जब तक आजादी मिल नहीं गई- तथापि कानून अब तक हम स्त्रियों को सिर्फ  पुरुषों के साथ हमारे संबंधों के आधार पर मान्यता देता है। अब विधवा के रूप में, एक पुत्र के बिना, न तो मुझे, न मेरी दो पुत्रियों को परिवार की संपत्ति पर किसी प्रकार का अधिकार था। इस परेशान करने वाली स्थिति पर मैंने अपना आक्रोश व्यक्त किया। मैं अपने परिवार के उन सदस्यों के प्रति कटु हो चुकी थी जो दकियानूसी कानूनों का समर्थन करते थे।

इसी समय एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाने से पहले विदा लेने और सम्मान व्यक्त करने के लिए मैं गांधी जी के पास गई। हमारी बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, ''क्या तुम्हारी अपने संबंधियों के साथ सुलह हो गई है?''

मैं आश्चर्यचकित थी कि वे मेरे पक्ष के विपरीत बोलेंगे। मेरा उत्तर था- ''मैंने किसी से झगड़ा नहीं किया है पर मैं उन लोगों से कोई संबंध नहीं रखना चाहती जो दकियानूसी कानून का लाभ लेकर मेरे लिए दुरूह और अपमानजनक स्थिति पैदा करना चाहते हैं।''

कुछ क्षणों तक गांधी जी खिड़की के बाहर देखते रहे, फिर मेरी ओर घूम कर मुस्कराए और कहा, ''तुम जाओगी और उनसे विदा लोगी क्योंकि यह शिष्टाचार और शालीनता की मांग है। भारत में अब भी हम इन चीजों को महत्त्व देते हैं।''

मैंने दृढ़ता से कहा, ''नहीं, यहां तक कि आपको खुश करने के लिए भी, नहीं। मैं उनके पास नहीं जाऊंगी जो मुझे व्यथा पहुंचाना चाहते हैं।''

अब भी मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, ''तुम्हारे सिवाय तुम्हें कोई तकलीफ नहीं पहुंचा सकता। मैं देख रहा हूं कि तुम्हारे दिल में काफी कड़वाहट है और जब तक तुम इसकी रोकथाम नहीं करती यह तुम्हें ही चोट पहुंचाएगी।''

मैं चुप रही और उन्होंने अपना कथन जारी रखा, ''क्योंकि तुम नाखुश हो, एक नए देश को जा रही हो और स्थिति से बचना चाहती हो। क्या तुम अपने आप से भाग सकती हो? जब तुम्हारे दिल में कड़वाहट है तो क्या बाहर तुम्हें खुशी मिल जाएगी। इस पर विचार करो। तनिक उदार बनो। तुमने अपने प्रिय व्यक्ति को खो दिया है- यह अति दुखदायी बात है। क्या तुम स्वयं को और चोट पहुंचाओगी इसलिए कि तुम में अपना दिल साफ  करने का साहस नहीं है!''

उनके शब्दों में मुझे कोई राहत नहीं मिली। स्वयं से कठोर संघर्ष करने के बाद आखिर मैंने जेठ जी को फोन करने का निर्णय लिया। मैंने कहा जाने से पहले मैं उनसे और परिवार से मिलना चाहती हूं।

मैं नियत समय से पांच मिनट पहले पहुंच गई। मैंने महसूस किया कि हरेक व्यक्ति राहत की सांस ले रहा है। मैंने उन्हें अपनी योजना बताई और अपने जीवन के इस नए सोपान पर चढऩे के लिए उनकी शुभकामनाएं चाहीं। मेरे ऊपर इसका चमत्कारिक प्रभाव पड़ा। मैंने महसूस किया कि मेरे मन से एक भारी बोझ हट गया है। स्वयं को पा जाने की मुझे प्रसन्नता थी।

मेरे भीतर महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होने की शुरुआत होने का यह एक छोटा संकेत था। डेढ़ वर्ष बाद संयुक्तराष्ट्र को जाने वाले शिष्ट-मंडल के नेता के रूप में मैं न्यूयार्क में थी। दक्षिणी अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के प्रति व्यवहार के संबंध में भारत की शिकायत करना हमारे लिए महत्त्वपूर्ण था। दोनों ओर से तीखे वचन कहे गए। मैंने उस तरीके पर नाराजग़ी ज़ाहिर की जिस तरह विरोधी पक्ष व्यक्तिगत आक्षेप कर रहे थे और भारत की व मेरी प्रतिष्ठा को हानि पहुंचा रहे थे। मैंने उसी तीक्ष्ण हथियार से उन पर वार किया।

तब, कष्टदायक शाब्दिक कुश्ती के बाद, मैंने अचानक गांधी जी के बारे में सोचा, क्या वह इसे पसंद करेंगे? उनके लिए साधन उतने ही महत्त्वपूर्ण थे जितना कि साध्य; अंतत:, कदाचित अति महत्त्वपूर्ण। क्या होगा अगर अपने आत्मसम्मान को आहत करने वाली संदिग्ध युक्तियों से हम अपना संकल्प (रिज़ोल्यूशन) पारित कराने में सफल होते हैं!

उस रात बिस्तर पर जाने से पहले मैंने निश्चय किया कि कुछ भी हो संयुक्तराष्ट्र (सभा) में मैं घटिया शब्दों का प्रयोग नहीं करूंगी। उसके बाद मैं बहस को वहां ले गई जहां उसे होना चाहिए था। व्यक्तिगत आक्षेप का मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया, तुच्छ बातों को जीत हासिल करने का जरिया नहीं बनाया। हमारे विरोधी भी हमसे एक नए स्तर पर मिले और उसके बाद हम विषय के गुणावगुणों पर बहस करते रहे।

अंतिम दिन सम्मेलन कक्ष में जाने से पहले मैं विपक्षी शिष्टमंडल के नेता से बात करने पहुंची। ''मैं इसलिए यहां आई हूं कि इस वाद-विवाद में अपने किसी शब्द या कार्य से मैंने आपको चोट पहुंचाई हो तो आप मुझे क्षमा करें।''

उन्होंने गर्मजोशी से मुझसे हाथ मिलाया और कहा, ''मुझे कोई शिकायत नहीं है।''

उनके साथ रहकर अच्छा लगा लेकिन अपने साथ रहकर अधिक अच्छा लगा। एक बार फिर गांधी जी की सलाह ने मुझे अपने आप से बचा लिया। 

छोटे मामलों में भी अपना दृष्टिकोण बनाए रखने में उनके शब्दों से मुझे सहायता मिली। मैं समझती हूं कि अनेक महिलाओं के मेरी ही तरह के बार-बार होने वाले कटु अनुभव एक जैसे होंगे- कोई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति आपके साथ भोजन करने आ रहा है और खाने का समय हो जाने पर भी भोजन तैयार नहीं है। आप पसीने-पसीने हो उठती हैं और यह जानकर राहत पाती हैं कि यह मात्र एक स्वप्न था।

लेकिन हाल ही में ऐसा मेरे साथ (वास्तव में) हो गया। मेरे सम्माननीय अतिथि ग्रेटब्रिटेन के प्रधानमंत्री और लेडी ईडन इंग्लैंड में भारतीय उच्चायुक्त के लिए अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो पाए। मेनू से लेकर फूलों और मोमबत्तियों के रंग तक की हर चीज की योजना मैंने बड़ी सतर्कता से बनाई थी। अतिथियों के आने के बाद शराब का दौर जब दो बार चल चुका तो मैंने बैरों को इशारा किया कि वे अतिथियों को भोजन के लिए आमंत्रित करें। जब तीसरी बार शराब आई तो मैं क्षमा मांग कर उठ गई और नीचे का जीना पार करते हुए रसोई घर की ओर दौड़ी।

वहां का दृश्य चौंका देने वाला था। रसोई घर की नाटे कद की नौकरानी डरी हुई एक कोने में खड़ी थी, दूसरे कोने में गृह-प्रबंधक खड़ा था। मेज पर बैठ कर चमचा हिलाता, गाना गाता और पैर से ताल लगाता रसोइया बैठा था। उसकी आंखें चमक रही थीं और वह बहुत दूर किसी दूसरे ही संसार में विचरण कर रहा था। मेज पर 'चिकन' के टुकड़े फैले हुए थे।

मुझे अपने पैरों पर खड़ा रहना मुश्किल हो गया लेकिन यथासंभव सामान्य वाणी में मैंने कहा, ''भोजन क्यों नहीं तैयार हुआ?''

रसोइए ने दृढ़ता से कहा, ''मैडम, भोजन तैयार है,  सब कुछ तैयार है, हर आदमी बैठ जाए, बैठ जाए।''

मुझे क्रोध आ गया, मेरे मुंह से निकलने ही वाला था, 'निकल जाओ, तुम बरखास्त किए जाते हो', तभी मुझे उस सलाह की याद आ गई जिसने कई अवसरों पर मुझे शांत किया था। अगर मैं नियंत्रण खो देती हूं तो खुद को चोट पहुंचाऊंगी।

हिम्मत जुटाते हुए मैंने कहा, ''आओ मेज पर कुछ चीजें लगा दें।''

हर व्यक्ति जोर शोर से जुट गया। भोजन यद्यपि मेनू के अनुसार नहीं था लेकिन जब मैंने अपने अतिथियों को बताया कि क्या हुआ था तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। किसी अतिथि ने कहा, ''अगर तुम्हारे रसोइए नशे में धुत होने पर ऐसा भोजन देते हैं तो सौम्य होने पर क्या खिलाते होंगें!''

मेरी राहत की हंसी लोगों को उन्मत्तता की हंसी लगी। मेरा दृष्टिक्रम पूर्व स्थिति में आ चुका था। मंैने महसूस किया कि भोजन की दावत कितनी ही महत्त्वपूर्ण हो जीवन की धुरी नहीं होती।

संभाव्यता की भावना बनाए रखना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि घृणा से अपने हृदय को बचाए रखना। हम सभी के लिए, फिर हम चाहे कोई काम करते हों, गांधी जी द्वारा मुझे दी गई सलाह महत्त्वपूर्ण है- आपको, अपने अलावा कोई तकलीफ  नहीं पहुंचा सकता।